बुधवार, 6 जून 2018

👉 सोना पाने का अधिकारी

🔶 एक बार तीन व्यक्ति गरीबी से तंग आकर धन कमाने के लिये परदेश को रवाना हुए। बहुत दिनों तक वे इधर-उधर भटकते रहे, किन्तु कोई ऐसा उपाय न मिला जो धन कमाते। हताश होकर वे कुबेर देवता को प्रसन्न करने के लिए तप करने लगे। उनकी उग्र तपस्या से कुबेर देवता प्रसन्न हुए, और उनकी पात्रता के अनुसार फल देने के लिए एक साधु का वेश बनाकर उन व्यक्तियों के पास पहुँचे।

🔷 साधु वेश धारी कुवेर ने उनसे पूछा कि तुम लोग क्यों तप कर रहे हो? उन्होंने कहा-धन के लिये। साधु ने कहा- अच्छा, बेटा, मैं तुम्हें एक ऐसा उपाय बताता हूँ जिससे तुम लोग मनचाहा धन प्राप्त कर सकते हो। सामने जो झरना बह रहा है, वह वरुण देवता का बना हुआ है। इसमें यदि गंगोत्री से लाकर थोड़ा सा गंगा जल डाल दो तो इसका सारा पानी सोने का हो जायेगा। यदि तुम लोग गंगोत्री गंगा जल ले आओ तो आसानी से मन चाहा सोना पा सकते हो।

🔶 वे तीनों व्यक्ति बहुत प्रसन्न हुए, क्योंकि गंगोत्री वहाँ से पास ही थी, शाम तक लौट कर वापिस आया जा सकता था। वे लोग अपने अपने घड़े लेकर गंगाजल लेने के लिए चल दिये। रास्ता न तो बहुत कठिन था और न दूर, कुछ ही घंटों में वे लोग वहाँ पहुँच गये और घड़े भर कर वापिस लौटने लगे।

🔷 उनमें से दो के मन में यह विचार उठने लगे कि मैं पहले पहुँच जाऊं और पहले अपना गंगा जल डाल दूँ, इस प्रकार उस सारे झरने पर मेरा ही अधिकार हो जायेगा। पहला और दूसरा दोनों ही गुप्त रूप से ऐसा सोच रहे थे, इसलिये उन्हें बहुत जल्दी थी- वे बहुत तेजी से चलने लगे। तीसरा व्यक्ति उदार हृदय था-उसके मन में किसी प्रकार की आशंका न थी, वह धीरे-धीरे चल रहा था।

🔶 रास्ते में कई मनुष्य ऐसे मिले जो प्यास के मारे चिल्ला रहे थे। आगे दौड़ने वाले उन दोनों ने प्यासे आदमियों को पुकार तो सुनी, किन्तु उस पर कोई ध्यान न दिया, जल्दी सोना पाने की धुन में उन्हें दूसरों का कुछ ख्याल न था। तीसरा साथी जो पीछे-पीछे आ रहा था। उसने एक प्यास के मारे चिल्लाते हुए वृद्ध मनुष्य को रास्ते में पड़ा पाया, उसने तुरन्त ही अपने घड़े में से उसे पानी पिला दिया। आगे चला तो एक स्त्री अपने बालक को गोद में लिए रास्ते में रोती हुई मिली, पूछने पर उसने बताया कि प्यास के मारे मेरा और मेरे बच्चे का दम निकला जा रहा है, उसने उस स्त्री और उसके बच्चे को भी पानी पिलाया। जब झरना थोड़ी दूर रह गया तो उसने रास्ते में एक कुत्ते को पड़ा देखा तो प्यास से छटपटा रहा था, उसने देखा कि यदि कुछ ही देर और उसे पानी न मिलेगा तो जरूर ही उसके प्राण निकल जायेंगे। उसने बचा हुआ सारा गंगाजल उस कुत्ते को पिला दिया और खाली घड़ा लेकर झरने की तरफ चल दिया।

🔷 वह सोच रहा था कि तेज चलने वाले मेरे दोनों साथी झरने पर पहुँच गये होंगे और झरना सोने का हो चुका होगा। पर जब वह वहाँ पहुँचा तो देखा उसके साथी वहाँ तक नहीं पहुँचे और झरना भी वैसा ही बह रहा है। साथी कहाँ गये इस चिन्ता में वह इधर-उधर घूमने लगा। इतने में वही साधु उस के पास आया और कहने लगा-बेटा, मैं ही कुबेर हूँ। तुम लोगों की परीक्षा लेने आया था। रास्ते में जो वृद्ध पुरुष, स्त्री, कुत्ता मिले थे वे और कोई नहीं थे, मैंने ही अपने रूप बना लिये थे और तुम लोगों का हृदय जाँच रहा था। तुम्हारे दोनों साथी अपनी स्वार्थ बुद्धि के कारण पत्थर हो गये हैं और देखो वहाँ पड़े हुए हैं। तुम अपना घड़ा मुझे दो। उस घड़े में एक दो बूँद जो गंगाजल था वह साधु ने झरने में डाला, वह सारा सोना का हो गया। साधु ने कहा-बेटा जितना चाहिये सोना ले जाओ। तुम्हीं सोना पाने के वास्तविक अधिकारी हो, इसलिए तुम्हें ही वह संपदा मैं दे रहा हूँ। उन स्वार्थ बुद्धियों को अपना फल भोगने दो।
 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 June 2018


👉 शान्त विचारों की शक्ति (अन्तिम भाग)

🔶 जिस मनुष्य की इच्छायें जितनी ही अधिक होती हैं उसे भय, चिन्ता, सन्देह और मोह से मनुष्य की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास होता है। अतएव ऐसे व्यक्ति के संकल्प फलित नहीं होते। वह जो काम हाथ में लेता है उसे पूरे मन से नहीं करता। अधूरा काम अथवा आधे मन से किया गया काम कभी सफलता नहीं लाता। आधे मन से किये गये कार्य में मनुष्य का चेतन मन तो कार्य करता है पर अचेतन मन उस की सहायता के लिये अग्रसर नहीं होता। ऐसी अवस्था में मनुष्य के शीघ्रता से थकावट आ जाती है और वह अपने कार्य को अधूरा छोड़ने के लिये बाध्य हो जाता है।

🔷 जिस प्रकार शाँत विचार मनुष्य के स्वभाव को बदल देते हैं और संपर्क में आने वाले व्यक्ति यों को प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार दूर रहने वाले व्यक्ति के हृदय को भी प्रभावित करते हैं। एकान्त में हर किसी भी व्यक्ति का चिन्तन करके उसके मन से अपने मन का सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। ऐसा करने पर हम उससे वही विचार करवा सकते हैं जो कराना चाहते हैं।

🔶 किसी व्यक्ति के प्रति नित्य प्रति हमारे हृदय में आने वाले विचार उस व्यक्ति को प्रभावित करते हैं वह हमारे विषय में भी वैसा सोचने लगता है जैसे कि हम उसके विषय में सोचते हैं। जितना ही हम इस सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं कि रेडियो की लहरों की भाँति विचारों की लहरें दूर−दूर के लोगों को प्रभावित करती हैं उतना ही हम प्रत्यक्ष रूप से अपने विचारों द्वारा दूसरे लोगों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं। दूसरों के कल्याण के विचार जितने बली होते हैं उतने अकल्याण के विचार नहीं होते अतएव कल्याण के सभी विचारों से अवश्य लाभ होता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1955 पृष्ठ 7

👉 Sadhana

🔶 Swami Vivekanand was taking a stroll along the banks of the Ganga near Vellur Matha one evening. Sister Nivedita, Sharatchandra Chakravarti and a few others were also accompanying him. While walking, some of them started discussing about the Divine (India) Culture. Swamiji said, “The  Divine Culture represents a harmonious blend of sadhana (purity and strength of character) and samvedana (loving kindness and compassion).

🔷 Lack of either would strike at the very roots of the structure and aim of our culture. Sadhana without samvedana leads to arrogance. And, samvedana sans sadhana proves to be nothing more than sentimental effervescence. A balanced cultivation of both generates what is essential for the expression of divinity in humanity.

📖 From Pragya Puran 

👉 मृतक भोज के सम्बन्ध में इस प्रकार भी सोचें (भाग 1)

🔶 यह बात नितान्त सत्य है कि किसी मृतक व्यक्ति का सम्बन्धी मृतक भोज खुशी से नहीं देता। वह इस अनुचित एवं अपव्ययी दण्ड को मजबूरन सहन करता है—क्योंकि समाज में इसकी प्रथा चल रही है और वह एक सामाजिक व्यक्ति है, समाज की रीति-नीतियों का उल्लंघन कर सकना उसके वश की बात नहीं है।

🔷 किसी अमीर आदमी की बात तो छोड़ दीजिए। वह अपने मरों के नाम पर कुछ भी खर्च कर सकते हैं, बांट सकते हैं, लुटा सकते हैं। उनमें सामर्थ्य होती है। ‘‘समरथ को नहीं नहीं दोष गुसाईं’’ के अनुसार उन्हें तो कोई भी प्रदर्शन एवं शोन-शेखी जेवा देती है। प्रश्न उन साधारण व्यक्तियों का है जो दोनों छाक अपने बच्चों के लिये भोजन भी कठिनता से जुटा पाते हैं और जिनकी संख्या समाज में अस्सी-नब्बे प्रतिशत से कम नहीं होती। इस प्रकार की आर्थिक आत्म–हत्या का प्रश्न उन्हीं सामान्य लोगों के लिये ही है।
समाज में जब तक मृतक-भोज जैसी विनाश कारी प्रथा प्रचलित ही है तब उसको किस प्रकार रोका जाये—इस पर विचार करने से इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि मृतक-भोज खाने वालों को ही इसका प्रचलन रोकने के लिये उदारतापूर्वक तत्पर होना चाहिये।

🔶 जब किसी का कोई स्वजन मर जाता है तब सामाजिक नियम उसे मृतक भोज देने के लिए तकाजा करता है। इस तकाजे में परोक्ष रूप से उस जातीय बहुमत का दबाव रहता है जो उसके यहां खाने के लिए जाने वाला होता है। यद्यपि यह बहुमत मृतक व्यक्ति के घर जाकर उसके सम्बन्धी से सीधे-साधे भोज की मांग नहीं करता तब भी उसकी यह मांग जातीय बहिष्कार के रूप में नग्न हो उठती है जब कोई आर्थिक कठिनाइयों के कारण मृतक भोज नहीं दे पाता अथवा देने में आना-कानी करता है। इस प्रकार यह दबाव खाने वालों की ओर से ही पड़ा करता है। यदि भोजन का लोभ छोड़ कर जातीय बन्धु थोड़ी उदारतापूर्वक काम लें तो यह समस्या सहज ही हल हो सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 82

👉 गुरुगीता (भाग 125)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी
🔶 ऐसा ही अनुभव दक्षिण भारत में कृष्ण नदी के किनारे बसे गाँव त्र्यंगम के निवासी मुरली कृष्णन को हुआ। मुरली कृष्णन जन्म से ब्राह्मण थे। उनकी शिक्षा सामान्य ही हो पायी थी। परिवार में गरीबी थी, उस पर शत्रुओं का आतंक। पिताजी बचपन में ही चल बसे थे। घर में अकेली माँ और दो बहनें थीं, जिन पर गाँव के जमीदार की कुदृष्टि थी। असहाय, अकेलापन, न कोई मार्गदर्शन और न कोई राह बताने वाला। कहाँ जायें, किसके पास जायें। जो राह मिली भी, वे दुष्कर थी। किसी ने उन्हें किसी ज्योतिषी के पास जाने को कहा, किसी ने तांत्रिकों के पते बताए। मुरली कृष्णन की माँ काफी समय तक इधर- उधर भटकती फिरीं। परन्तु मिला कुछ नहीं उलटे घर की हालत और बिगड़ती गई और शत्रुओं का आतंक बढ़ता गया।

🔷 एक दिन शाम के समय मुरली कृष्णन ने अपनी माँ से कहा- माँ भगवान् सद्गुरू हैं, वे सभी का मार्गदर्शन करते हैं- क्यों न हम उन्हीं की शरण में जायें? प्रभु जो चाहेंगे- वही अच्छा होगा। ऐसा निश्चय करके मुरली कृष्णन ने पूर्णिमा की तिथि से गायत्री महामंत्र के जप के साथ गुरूगीता के पाठ का निश्चय किया। नियमित सन्ध्योपासना, अल्पाहार, अस्वादव्रत के साथ मुरली कृष्णन की साधना चलने लेगी। गायत्री महामंत्र के जप की ग्यारह मालाएँ पूरी करने में उसे लगभग एक घण्टे का समय लगता। पूजा के विधान सहित गुरूगीता के पाठ में भी लगातार एक घण्टा लग जाता।

🔶 इस क्रम से प्रातः सायं उसकी साधना चलने लगी। प्रारम्भ में तो कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। शत्रु और शत्रुता ज्यों के त्यों बने रहे। लेकिन तीन महीने के बाद गुरूगीता की पाठ- साधना के प्रभाव स्पष्ट दिखने लगी। लोगों की बढ़ती उपेक्षा कम होने लगी। गाँव के कई प्रभावी लोग उनके पक्ष में खड़े हो गए । माँ की मेहनत एवं पुरखों के खेती में आय से घर का सामान्य खर्च चलने लगा। आतंक की छाया, शान्ति की शीतलता में बदलने लगा। अब तक मुरली कृष्णन का मन भी साधना में रमने लगा।

🔷 साधना के तीन वर्ष पूरे होते- होते न केवल स्थितियों में सुखद परिवर्तन हुआ, बल्कि मनः स्थितियों में भी आध्यात्मिक भाव उभरने लगा। अन्तश्चेतना में भगवान् सदाशिव एवं जगदम्बा पार्वती की झलकियाँ मिलने लगी। एक दिन ध्यान की गहनता में उसने स्वयं को भगवान् भोलेनाथ के समीप पाया। उसने अनुभव किया कि प्रभु स्वयं उसे स्वीकार करते हुए कह रहे हैं, वत्स ! मैं ही वह गुरूतत्त्व हूँ जो जगती पर भिन्न- भिन्न नाम रूपों में प्रकट होता है। भगवान् की यह वाणी सुनकर मुरली कृष्णन के अन्तस् से बस यह स्वर निकले- मुझे अपना लें प्रभु ! और उसे लगा- भगवान् कह रहे हैं कि गुरूगीता को जो अपनाता है, उसे मैं स्वभावतः अपना लेता हूँ। प्रभु का यह आश्वासन प्रत्येक साधक के साथ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 188

👉 कौन क्या कहता है?

🔶 लोग क्या कहते हैं? इसके आधार पर किसी कार्य की भलाई-बुराई का निर्णय नहीं किया जा सकता। क्योंकि कई बार लोग अच्छे कार्यों की बुराई करते हैं और बुरों की भलाई। कारण भले बुरे की वास्तविक पहिचान हर किसी को नहीं होती। हम जो काम करें, उसके लिए यह न देखें कि कौन क्या कहता है? वरन् यह सोचें कि हमारी आत्मा इसके लिये क्या कहती है। यदि आत्मा गवाही दे कि हम जो कार्य कर रहे हैं उत्तम है और हमारी बुद्धि निस्वार्थ है, तो बिना किसी की परवाह किये हुए हमें अपने कार्य में प्रवृत्त रहना चाहिए।

🔷 यदि शुभ मार्ग में बाधाएं आती हों और लोग विरोध करते हों तो घबराये मत और न ऐसा सोचिए कि हमारे साथ कोई नहीं, हम अकेले हैं। शुभ कार्य करने वाला कभी अकेला नहीं है। अदृश्य लोक में महान पुरुषों की प्रबल शक्तियाँ विचरण करती रहती हैं, वे हमें उत्तम पथ दिखती हैं, तथा हमारी सहायता के लिए दौड़ पड़ती हैं और इतना साहस भर देती हैं कि एक बड़ी सेना का बल उसके सामने तुच्छ है। चोर घर के लोगों के खाँस देने से ही डर कर भाग जाता है, किन्तु धर्मात्मा मनुष्य मृत्यु के सामने भी छाती खोल कर अड़ा रहता है। सत्यनिष्ठ की पीठ पर परमेश्वर है। धर्मात्मा मनुष्य किसी भी प्रकार न तो अकेला है और न निर्बल। क्योंकि अनन्त शक्ति का भण्डार तो उसके हृदय में भरा पड़ा है।

🔶 हम किसी की परवाह क्यों करें? यदि हम सत्य और धर्म के मार्ग पर आरुढ़ हैं, यदि हमारा आत्मा पवित्र है, तो हमें निर्भयतापूर्वक अपने पथ पर आगे बढ़ते जाना चाहिए और इस बात की ओर कुछ चिन्ता न करनी चाहिए कि कौन क्या कहता है।

📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1941/October/v1.23

👉 विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन (भाग 2)

🔶 हिन्दू समाज में विवाहों का आरम्भ आज जिस ढंग से, जिस विचारधारा के साथ आरम्भ किया जाता है, उसे अत्यन्त निराशाजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए। उपयुक्त जोड़ी ढूँढ़ने से लेकर दोनों कुटुम्बों में परस्पर अगाध स्नेह सहानुभूति रहने तक जो उल्लासपूर्ण वातावरण रहना चाहिए और दो आत्माओं के आत्मसमर्पण यज्ञ की जो परम पवित्र धार्मिक सद्भावना पूर्ण परिस्थितियाँ रहनी चाहिए, उनका कहीं ढूँढ़े भी दर्शन नहीं होता। सच तो यह है कि सब कुछ इससे विपरीत होता है। छोटे-छोटे अबोध बालकों को गृहस्थ निर्माण का भार वहन करने के लिए विवाह वेदी पर प्रस्तुत कर दिया जाता है।

🔷 युवावस्था आने से पूर्व विवाह करना, अबोध बालकों का बाल विवाह भी भला कोई विवाह है। उसे तो एक श्रेष्ठ परम्परा का थोथा प्रदर्शन मात्र कहा जा सकता है। इसी प्रकार अनमेल विवाह भर्त्सना के योग्य है। अधेड़ एवं बूढ़े आदमी यदि अपनी बेटी, पोतियों की आयु की बच्चियों से विवाह करें तो उसमें क्या तो नैतिकता मानी जायगी और क्या मानवता एवं क्या सामाजिकता? कई-कई बच्चे होते हुए भी पुरुष एक के बाद दूसरे कई-कई विवाह करते चले जायें, पर स्त्री यदि अल्पायु में भी विधवा हो जाय तो उसे उस प्रकार की सुविधा न मिले। इस तरह के पक्षपात एवं अन्याय युक्त कानून जिस समाज में प्रचलित हों और उसके लोग इस अनीति का समर्थन भी करते हों, तो उसे अपने को धर्मवान कहलाने का भला क्या अधिकार हो सकता है?

🔶 आज जिस ढंग से, जिस आडम्बर, अहंकार और तामसी वातावरण में विवाह-शादियाँ होती हैं, उन्हें देखकर किसी भी प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि यह दो आत्माओं के आत्म-समर्पण के लिए आयोजित सर्वमेध यज्ञ का धर्मानुष्ठान है। उन दिनों तमोगुण की ही घटायें छाई रहती हैं। अश्लील गीत, गन्दे नाच, ओछे मखौल, पान, बीड़ी, भाँग शराब की धूम, देखकर उसकी संगति यज्ञ से कैसे बिठाई जाय?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1965 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/July/v1.44

👉 बुरे विचारों का निवारण

🔷 जीव पूर्व जन्मों में अनेक प्रकार के शुभ अशुभ कार्य कर चुका होता है और भले बुरे दोनों ही प्रकार के संस्कार उसके गुप्त मन पर अंकित रहते हैं, तदनुसार दोनों प्रकार के विचार मन में उठा करते हैं। ऐसे मनुष्य मिलना कठिन है, जिनके मन में कभी बुरे विचार उत्पन्न ही न होते हों। बुरे विचार उठें, तो निराश न होना चाहिए, वरन् उन्हें काबू में करने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि विवेक का बल हो, तो बुरे विचारों के अनुसार कार्य नहीं होने पाता और वे मन में उत्पन्न होकर वहीं नष्ट हो जाते हैं। किन्तु यदि विवेक निर्बल हो और इन्द्रियों की लालसा बढ़ी हुई हो, तो उस कुसंग के साथ वे बुरे विचार बढ़ जाते हैं और छोटे से बड़ा रूप धारण कर लेते हैं।

🔶 तरंग स्वयं बहुत छोटी वस्तु है, पर संगति से समुद्र बन जाती है। इसी प्रकार एक छोटा सा बुरा विचार यदि अनियंत्रित होकर कुसंग में पड़ जाय, तो समुद्र हो सकता है और मनुष्य को अपने में डुबा कर नष्ट कर सकता है। बुरे विचारों को बाह्य परिस्थितियाँ भी बड़ा सहारा देती हैं। बुरे स्थान, दृश्य, साहित्य, चित्र और जीव यह सभी कुविचारों को उत्तेजित करने में सहायक होते हैं।

🔷 जो मनुष्य अपने जीवन को ऊंचा उठाना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि सतर्कतापूर्वक ‘आत्मनिरीक्षण’ करते रहें, जब कोई बुरा विचार उत्पन्न हो रहा हो, तो उसे तुरन्त ही यहाँ से हटा कर उसके स्थान पर शुभ संकल्प आरोपित करना चाहिए। जिस प्रकार बिच्छू के कपड़े पर चढ़ते ही उसे हटाने का अविलम्ब प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार बुरे विचार को मन में उत्पन्न होते ही हटा देना चाहिए, तभी हम जीवन लक्ष तक पहुँच सकेंगे।

📖 अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1941 पृष्ठ 20

👉 गुरुगीता (भाग 124)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी

🔷 गुरूगीता के विगत क्रम में कुछ ऐसे ही मांत्रिक महत्त्व की चर्चा की गयी है। इसमें बताया गया है कि गुरूपुत्र सब तरह से वरण के योग्य है गुरूगीता के महामंत्र संसार के मलों को धोकर भवपाशों से छुटकारा दिलाते हैं। जो गुरूगीता के जल से स्न्नान करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ होता है। वह जहाँ भी रहता है, वह स्थान पवित्र हो जाता है। यही नहीं वहाँ पर सभी देवशक्तियाँ निवास करती हैं। गुरूगीता का पाठ करने वाला पवित्र ज्ञानी पुरूष प्रत्येक अवस्था में विशुद्ध होता है, किसी भी अवस्था मे उसका दर्शन कल्याणकारी है।

🔶 इस तत्त्वकथा का विस्तार करते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

समुद्रे च यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम्। भिन्ने कुम्भे यथाकाशः तथात्मा परमात्मनि॥ १६२॥
तथैव ज्ञानी जीवात्मा परमात्मनि लीयते। ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र तत्र दिवानिशम् ॥ १६३॥
एवंविधो महामुक्तः सर्वदा वर्त्तते बुधः। तस्य सर्वप्रयत्नेन भावभक्तिं करोति यः॥१६४॥
सर्वसंदेहरहितो मुक्तो भवति पार्वति। भुक्तिमुक्तिद्वयं तस्य जिह्वाग्रे च सरस्वती॥१६५॥

🔷 समुद्र में जिस तरह से जल ,दुग्ध में दुग्ध ,घृत में घृत, घड़े का आकाश घड़े के फूट जाने से बाह्याकाश में मिल जाता है, उसी तरह से आत्मा परमात्मा में मिल जाती है॥ १६२॥ इसी तरह से ज्ञानी जीवात्माएँ परमात्मा चेतना में लीनता का अनुभव करती हैं। इस एकता के कारण ही ज्ञानी दिन- रात आनन्द में निमज्जित रहता है॥ १६३॥ इस तरह सक ज्ञानी सदा जीवन मुक्त होकर वास करता है, जो साधक प्रयत्नपूर्वक उसकी भावभक्ति करता है, वह सन्देह रहित होकर मुक्त होता है। उसे भोग एवं मोक्ष दोनों ही मिलते हैं, उसकी जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है॥ १६४- १६५॥

🔶 भगवान् सदाशिव के इन वचनों में न केवल गुरूगीता के पाठ का महत्त्व है, बल्कि पाठ करने वाले को भी महत्त्वपूर्ण बताया गया है। जो गुरूगीता की शरण में है, उसे किसी अन्य की आवश्यकता नहीं रहती। बस सद्गुरू की मूर्ति, चित्र के सामने पंचोपचार पूजन के पश्चात् पाठ करने की आवश्यकता है। इस पाठ से सभी संकटों का नाश होता है। आपत्तियाँ दूर होती हैं। सद्गुरू की कृपा मिलती है एवं चित्त में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश होता है। यह कथन केवल शाब्दिक नहीं है, बल्कि इसमें अर्थ की गहनता समायी है। जो भी गुरूगीता की साधना करते हैं, अथवा करेंगे, उन्हें इसकी अनुभूति होने में कोई सन्देह नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 187

👉 भारत को ईसाई बनाने का षडयन्त्र (अन्तिम भाग)

🔷 इसाइयों से अपने को सुरक्षित समझने वाले बौद्ध, सिक्ख, पारसी, मुसलमान और यहूदी आदि को इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिए कि भारत की धर्म-निरपेक्षता तथा हिन्दुओं की उपेक्षापूर्ण धार्मिक सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाते हुए यदि ईसाई मिशनरी इसी तेजी से हिन्दुओं को अपने जाल में फंसाने में सफल होते रहे तो शीघ्र ही उनकी जनसंख्या भारत में बहुत अधिक हो जायगी और तब ऐसी स्थिति में भारत के सारे गैर ईसाई उनकी तुलना में अल्पसंख्यक हो जायेंगे।

🔶 क्या ईसाइयों का यह बहुमत तब शक्ति पाकर सम्पूर्ण भारत को ईसाई देखने के लिए व्यग्र पोप, पादरियों तथा प्रचारकों को अल्पसंख्यक गैर ईसाइयों को अपने में आत्मसात् करने के प्रपंचों के लिए साहस, अवसर तथा प्रोत्साहन नहीं देगा? इसलिए भारत की धर्म-निरपेक्ष नीति, धार्मिक सहिष्णुता तथा राष्ट्रीय स्वरूप को सुरक्षित रखने और लोकतन्त्र की गरिमा बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि भारत के सारे गैर ईसाई जन-समुदाय एक साथ होकर ईसाइयों के इस बढ़ते हुए धार्मिक साम्राज्य को रोकने का प्रयत्न करें।

🔷 हिन्दुओं का तो यह धार्मिक कर्तव्य है कि वे ईसाइयों के षडयन्त्र से आत्मरक्षा में अपना तन-मन-धन लगा दें और गैर ईसाई मिशनरियों की अराष्ट्रीय गतिविधियों को रोकने में अपना नैतिक समर्थन देकर हिन्दुओं की हिमायत को आगे बढ़ें और आज जो हिन्दुओं को लपेटती हुई ईसाइयत की लपट परोक्ष रूप से उनकी ओर बढ़ रही है, उसे यहीं पर बुझा दें। ऐसा करने से ही भारत में धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक बन्धुत्व तथा सच्चे लोकतन्त्र की रक्षा हो सकेगी, अन्यथा पुनः आजादी को खतरा की सम्भावना हो सकती है।

🔶 यह स्पष्ट है कि पाश्चात्य देशों की सरकारें तथा संस्थायें भारत में मिशनरियों को एजेन्ट रूप में भेज कर ईसाइयत को बढ़ावा दे रही हैं और एक प्रकार से वे धर्म का आधार लेकर उन देशों का साम्राज्य ही भारत में स्थापित करने का प्रयत्न कर ही हैं। विदेशों के इस धर्मधारी साम्राज्यवाद से बचाव हेतु सम्पूर्ण गैर ईसाइयों को एक मंच पर आकर ईसाइयों के मलीन मन्तव्यों को सफल होने से रोकने के लिए भरसक प्रयत्न करना ही चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 36

👉 शान्त विचारों की शक्ति (भाग 2)

🔷 हम जो कुछ सोचते हैं उसका स्थायी प्रभाव हमारे ऊपर तथा दूसरों के ऊपर पड़ता है। शान्त विचार धीरे−धीरे हमारे मन को ही बदल देते हैं। जैसी हमारे मन की बनावट होती है वैसे ही हमारे कार्य होते हैं और हमारी सफलता भी उसी प्रकार की होती है। हम अनायास ही उन कार्यों में लग जाते हैं जो हमारी प्रकृति के अनुकूल हैं, और उन कामों से डरते रहते हैं जो हमारी प्रकृति के प्रतिकूल हैं। अपने स्वभाव को बदलना हमारे हाथ में है। यह अपने शान्त विचारों के कारण बदला जा सकता है। स्वभाव के बदल जाने पर मनुष्य को किसी विशेष प्रकार का कार्य करना सरल हो जाता है।

🔶 जिस काम को मनुष्य अपने आन्तरिक मन से नहीं करना चाहता, पर दिखावे के रूप में उसे करने के लिए बाध्य होता है तो उसे अनेक प्रकार की रुकावटें उसे दर्शाती हैं कि तुम्हारा आन्तरिक मन उक्त काम के प्रतिकूल है। शान्त होकर यदि मनुष्य अपनी किसी प्रकार की भूल अथवा कार्य की विफलता पर विचार करे तो वह इसका कारण अपने आप में ही पावेगा। जो काम अनुद्विग्न मन होकर किया जाता है, उससे आत्म विश्वास रहता है और उसमें सफलता अवश्य मिलती है। शान्त मन द्वारा विचार करने से स्मृति तीक्ष्ण हो जाती है और इन्द्रियाँ स्वस्थ हो जाती हैं।

🔷 शान्त विचारों का चेतन मन नहीं होता। शान्त विचार ही आत्मनिर्देश की शक्ति हैं। इन विचारों को प्राप्त करने के लिये वैयक्तिक इच्छाओं का नियंत्रण करना पड़ता है। जिस व्यक्ति की इच्छायें जितनी ही नियंत्रित होती है, जिस मनुष्य में जितनी वैराग्य की अधिकता होती है उसके शान्त विचारों की शक्ति उतना ही अधिक प्रबल होती है। जो मनुष्य अपने भावों के वेगों को रोक लेता है वह उन वेगों की शक्ति को मानसिक शक्ति के रूप में परिणत कर लेता है। इच्छाओं की वृद्धि से इच्छा शक्ति का बल कम होता है और उसके विनाश से उसकी शक्ति बढ़ती है। इच्छाओं की वृद्धि शाँत विचारों का अन्त कर देती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1955 पृष्ठ 6

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 June 2018

👉 आज का सद्चिंतन 6 June 2018

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...