बुधवार, 6 जून 2018

👉 गुरुगीता (भाग 124)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी

🔷 गुरूगीता के विगत क्रम में कुछ ऐसे ही मांत्रिक महत्त्व की चर्चा की गयी है। इसमें बताया गया है कि गुरूपुत्र सब तरह से वरण के योग्य है गुरूगीता के महामंत्र संसार के मलों को धोकर भवपाशों से छुटकारा दिलाते हैं। जो गुरूगीता के जल से स्न्नान करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ होता है। वह जहाँ भी रहता है, वह स्थान पवित्र हो जाता है। यही नहीं वहाँ पर सभी देवशक्तियाँ निवास करती हैं। गुरूगीता का पाठ करने वाला पवित्र ज्ञानी पुरूष प्रत्येक अवस्था में विशुद्ध होता है, किसी भी अवस्था मे उसका दर्शन कल्याणकारी है।

🔶 इस तत्त्वकथा का विस्तार करते हुए भगवान् भोलेनाथ कहते हैं-

समुद्रे च यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम्। भिन्ने कुम्भे यथाकाशः तथात्मा परमात्मनि॥ १६२॥
तथैव ज्ञानी जीवात्मा परमात्मनि लीयते। ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र तत्र दिवानिशम् ॥ १६३॥
एवंविधो महामुक्तः सर्वदा वर्त्तते बुधः। तस्य सर्वप्रयत्नेन भावभक्तिं करोति यः॥१६४॥
सर्वसंदेहरहितो मुक्तो भवति पार्वति। भुक्तिमुक्तिद्वयं तस्य जिह्वाग्रे च सरस्वती॥१६५॥

🔷 समुद्र में जिस तरह से जल ,दुग्ध में दुग्ध ,घृत में घृत, घड़े का आकाश घड़े के फूट जाने से बाह्याकाश में मिल जाता है, उसी तरह से आत्मा परमात्मा में मिल जाती है॥ १६२॥ इसी तरह से ज्ञानी जीवात्माएँ परमात्मा चेतना में लीनता का अनुभव करती हैं। इस एकता के कारण ही ज्ञानी दिन- रात आनन्द में निमज्जित रहता है॥ १६३॥ इस तरह सक ज्ञानी सदा जीवन मुक्त होकर वास करता है, जो साधक प्रयत्नपूर्वक उसकी भावभक्ति करता है, वह सन्देह रहित होकर मुक्त होता है। उसे भोग एवं मोक्ष दोनों ही मिलते हैं, उसकी जिह्वा पर सरस्वती निवास करती है॥ १६४- १६५॥

🔶 भगवान् सदाशिव के इन वचनों में न केवल गुरूगीता के पाठ का महत्त्व है, बल्कि पाठ करने वाले को भी महत्त्वपूर्ण बताया गया है। जो गुरूगीता की शरण में है, उसे किसी अन्य की आवश्यकता नहीं रहती। बस सद्गुरू की मूर्ति, चित्र के सामने पंचोपचार पूजन के पश्चात् पाठ करने की आवश्यकता है। इस पाठ से सभी संकटों का नाश होता है। आपत्तियाँ दूर होती हैं। सद्गुरू की कृपा मिलती है एवं चित्त में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रकाश होता है। यह कथन केवल शाब्दिक नहीं है, बल्कि इसमें अर्थ की गहनता समायी है। जो भी गुरूगीता की साधना करते हैं, अथवा करेंगे, उन्हें इसकी अनुभूति होने में कोई सन्देह नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 187

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 4)

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