बुधवार, 6 जून 2018

👉 गुरुगीता (भाग 125)

👉 गुरूगीता के पाठ की महिमा न्यारी
🔶 ऐसा ही अनुभव दक्षिण भारत में कृष्ण नदी के किनारे बसे गाँव त्र्यंगम के निवासी मुरली कृष्णन को हुआ। मुरली कृष्णन जन्म से ब्राह्मण थे। उनकी शिक्षा सामान्य ही हो पायी थी। परिवार में गरीबी थी, उस पर शत्रुओं का आतंक। पिताजी बचपन में ही चल बसे थे। घर में अकेली माँ और दो बहनें थीं, जिन पर गाँव के जमीदार की कुदृष्टि थी। असहाय, अकेलापन, न कोई मार्गदर्शन और न कोई राह बताने वाला। कहाँ जायें, किसके पास जायें। जो राह मिली भी, वे दुष्कर थी। किसी ने उन्हें किसी ज्योतिषी के पास जाने को कहा, किसी ने तांत्रिकों के पते बताए। मुरली कृष्णन की माँ काफी समय तक इधर- उधर भटकती फिरीं। परन्तु मिला कुछ नहीं उलटे घर की हालत और बिगड़ती गई और शत्रुओं का आतंक बढ़ता गया।

🔷 एक दिन शाम के समय मुरली कृष्णन ने अपनी माँ से कहा- माँ भगवान् सद्गुरू हैं, वे सभी का मार्गदर्शन करते हैं- क्यों न हम उन्हीं की शरण में जायें? प्रभु जो चाहेंगे- वही अच्छा होगा। ऐसा निश्चय करके मुरली कृष्णन ने पूर्णिमा की तिथि से गायत्री महामंत्र के जप के साथ गुरूगीता के पाठ का निश्चय किया। नियमित सन्ध्योपासना, अल्पाहार, अस्वादव्रत के साथ मुरली कृष्णन की साधना चलने लेगी। गायत्री महामंत्र के जप की ग्यारह मालाएँ पूरी करने में उसे लगभग एक घण्टे का समय लगता। पूजा के विधान सहित गुरूगीता के पाठ में भी लगातार एक घण्टा लग जाता।

🔶 इस क्रम से प्रातः सायं उसकी साधना चलने लगी। प्रारम्भ में तो कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। शत्रु और शत्रुता ज्यों के त्यों बने रहे। लेकिन तीन महीने के बाद गुरूगीता की पाठ- साधना के प्रभाव स्पष्ट दिखने लगी। लोगों की बढ़ती उपेक्षा कम होने लगी। गाँव के कई प्रभावी लोग उनके पक्ष में खड़े हो गए । माँ की मेहनत एवं पुरखों के खेती में आय से घर का सामान्य खर्च चलने लगा। आतंक की छाया, शान्ति की शीतलता में बदलने लगा। अब तक मुरली कृष्णन का मन भी साधना में रमने लगा।

🔷 साधना के तीन वर्ष पूरे होते- होते न केवल स्थितियों में सुखद परिवर्तन हुआ, बल्कि मनः स्थितियों में भी आध्यात्मिक भाव उभरने लगा। अन्तश्चेतना में भगवान् सदाशिव एवं जगदम्बा पार्वती की झलकियाँ मिलने लगी। एक दिन ध्यान की गहनता में उसने स्वयं को भगवान् भोलेनाथ के समीप पाया। उसने अनुभव किया कि प्रभु स्वयं उसे स्वीकार करते हुए कह रहे हैं, वत्स ! मैं ही वह गुरूतत्त्व हूँ जो जगती पर भिन्न- भिन्न नाम रूपों में प्रकट होता है। भगवान् की यह वाणी सुनकर मुरली कृष्णन के अन्तस् से बस यह स्वर निकले- मुझे अपना लें प्रभु ! और उसे लगा- भगवान् कह रहे हैं कि गुरूगीता को जो अपनाता है, उसे मैं स्वभावतः अपना लेता हूँ। प्रभु का यह आश्वासन प्रत्येक साधक के साथ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 188

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