गुरुवार, 26 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 27 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 20) 27 Jan

🌹 सार्थक, सुलभ एव समग्र साधना

🔴 प्रज्ञायोग एक ऐसी ही विधा है। इसे बोलचाल की भाषा में जीवन साधना भी कहा जा सकता है। इसमें जप, ध्यान, प्राणायाम, संयम जैसे विधानों की व्यवस्था है। पर सब कुछ उतने तक ही सीमित नहीं है। उपासना में ध्यान धारणा स्तर के सभी कर्मकाण्ड आ जाते हैं। इसके साथ ही जीवन के हर क्षेत्र में मानवी गरिमा को उभारने और रुकावटें हटाने जैसे सभी पक्षों को जोड़कर रखा गया है। शरीरसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम, विचारसंयम इस धारा के अलग न हो सकने वाले अंग हैं।               

🔵 दुर्गुणों के, कुसंस्कारों के निराकरण पर जहाँ जोर दिया गया है, वहाँ यह भी अनिवार्य माना गया है कि अब की अपेक्षा अगले दिनों अधिक विवेकवान, चरित्रवान और पुरुषार्थ परायण बनने के लिये चिन्तन तथा अभ्यास जारी रखा जाये। वास्तव में यह समग्रता ही जीवन साधना की विशेषता है। साधक को कर्तव्य क्षेत्र में धार्मिकता, मान्यता क्षेत्र में आत्मपरायणता और अध्यात्म क्षेत्र में दूरदर्शी विवेकशीलता उत्कृष्ट आदर्शवाद को अपनाने के लिये कहा जाता है। इन सर्वतोमुखी दिशाधाराओं में समुचित जागरूकता बरतने पर ही वह लाभ मिलता है, जिसे आत्म परिष्कार के नाम से जाना जाता है। यह हर किसी के लिये सरल, सम्भव और स्वाभाविक भी है। 

🔴 आत्मपरिष्कार के अन्य उपाय भी हो सकते हैं। पर जहाँ तक प्रज्ञा परिवार के प्रयोगों का सम्बन्ध है, वहाँ यह कहा जा सकता है कि वह अपेक्षाकृत अधिक सरल, तर्कसंगत और व्यवस्थित हैं। इस सन्दर्भ में अनेक अभ्यासरत अनुभवियों की साक्षी भी सम्मिलित है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मरम्मत करो !

🔴 एक साधक ने श्री रामकृष्णदेव से पूछा कि : “महाशय, मै इतना प्रभु नाम लेता हूँ, धर्म चर्चा करता हूँ, चिंतन-मनन करता हूँ, फिर भी समय-समय पर मेरे मन में कुभाव क्यों उठते है?”

🔵 श्री रामकृष्णदेव साधक को समझाते हुए बोले : “एक आदमी ने एक कुत्ता पाला था। वह रात-दिन उसी को लेकर मग्न रहता, कभी उसे गोद में लेता तो कभी उसके मुँह में मुँह लगाकर बैठा रहेता था।

🔴 उसके इस मूर्खतापूर्ण आचरण को देख एक दिन किसी जानकार व्यक्ति ने उसे यह समझाकर सावधान किया कि कुत्ते का इतना लाड-दुलार नहीं करना चाहिए, आखिर जानवर की ही जात ठहरी, न जाने किस दिन लाड करते समय काट खाए।

🔵 इस बात ने उस आदमी के मन में घर कर लिया। उसने उसी समय कुत्ते को गोद में से फेंक दिया और मन में प्रतिज्ञा कर ली कि अब कभी कुत्ते को गोद में नहीं लेगा। पर भला कुत्ता यह कैसे समझे! वह तो मालिक को देखते ही दौड़कर उसकी गोद पर चढ़ने लगता। आखिर मालिक को कुछ दिनों तक उसे पीट-पीट कर भगाना पड़ा तब कही उसकी यह आदत छूटी।

🔴 तुम लोग भी वास्तव मे ऐसे ही हो। जिस कुत्ते को तुम इतने दीर्घ – काल तक छाती से लगाते आये हो उससे अब अगर तुम छुटकारा पाना भी चाहो तो वह भला तुन्हें इतनी आसानी से कैसे छोड़ सकता है?

🔵 अब से तुम उसका लाड करना छोड़ दो और अगर वह तुम्हारी गोद में चढाने आए तो उसकी अच्छी तरह से मरम्मत करो। ऐसा करने से कुछ ही दिनों के अन्दर तुम उससे पूरी तरह छुटकारा पा जाओगे।”

👉 आत्म निर्माण की ओर (भाग 3)

🔵 यदि तुम्हें किसी व्यक्ति का व्यवहार संकीर्ण मालूम पड़े और तुम उसका तिरस्कार करना चाहो तो पहले विचार कर लो- तुममें उसका तिरस्कार करने की प्रेरणा क्यों हो रही है? उसमें जो संकीर्णता और बुराई है, क्या वह हममें नहीं है? यदि हममें भी वही बात है तो पहले स्वयं आत्मशुद्धि की आवश्यकता है तभी दूसरे पर दोष लगाने का अधिकार होगा। जब तक तुममें वही बुराई है तब तक तुम दोनों बराबरी की श्रेणी में हो। यदि तुममें वह संकीर्णता और बुराई नहीं है तो तुम शुद्ध हो परन्तु उसका तिरस्कार करने से तुममें हीनता आ जायगी। उसको शुद्ध करो। फूल मिट्टी में पड़ कर उसे भी सुगंधित कर देता है। उसे मत कहो, “तुम निकृष्ट और नीच हो, दुष्ट बेईमान हो।” वरन् उसे इन शब्दों की कल्पना ही न होने दो। उससे महानता और ईमानदारी की बात करो।

🔴 “अमुक व्यक्ति ने ऐसा नहीं किया”, “अमुक बात अब तक नहीं हुई”, “अमुक कार्य हो जाय तब हम दूसरा काम करें”, “ऐसा हो जाता हो हम भी ऐसा करते”, इत्यादि बातें आलसी व्यक्ति किया करते हैं। जो कुछ तुम्हें करना है उसके लिए दूसरी भूमिकाओं पर ठहरने की क्या आवश्यकता? भूतकाल की अपूर्णताओं पर कुढ़ते रहने की अपेक्षा वर्तमान को पूर्ण कर भविष्य का निर्माण किया जा सकता है। भूतकाल की घटना तो  मुर्दा हो गयी, उसकी कब्र खोदकर हड्डियाँ निकालने से क्या लाभ? चेतन तत्व का आविष्कार करो जिससे तुम्हारा और संसार का निर्माण हो।

🔵 जब तुम किसी व्यक्ति के व्यवहार में संकीर्णता पाओ, किसी से किसी की चुगली सुनो तो उसके अनुसार कोई काम मत कर डालो और न वह बात लोगों में जाहिर करो। इससे तो वह दुर्गुण फैलता है- दुर्गंध की भाँति और सब सुनने देखने वालों के मन को दूषित करता है। इसके बदले उस दुर्गुण को कम करो। दुर्गुण की चर्चा करने से दिन दूना रात चौगुना बढ़ता है। रोग तो औषधि से शान्त होता है, गरम लोहे को ठण्डा लोहा काटता है। आग पानी से बुझती है। क्रोध नम्रता से शान्त होता है। अतः दुर्गुण से दुर्गुण उसी प्रकार बढ़ता है जैसे क्रोधी व्यक्ति से क्रोधपूर्ण बर्ताव करने से और आग में आग डालने के समान होता है। अतएव दुर्गुण की औषधि है सद्गुण।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 24

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/August.24

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 Jan 2017

🔴 आज दहेज का असुर भाषण-लेखों और प्रस्तावों की मार खाकर भी दहेज का असुर मरता नहीं। रक्तबीज की तरह वह चोट खाकर और भी अधिक विकराल बनता चला जा रहा है। इसका अंत ऐसे होगा कि युग निर्माण योजना के सदस्य बच्चे यह प्रतिज्ञा करेंगे कि वे विचारशील साथी से ही विवह करेंगे। दहेज और विवाहोन्माद में होने वाले भारी अपव्यय को हटाकर बिना खर्च की विधि से विवाह करेंगे। यदि अभिभावक इस निश्चय को मान्यता न देंगे तो वे आजीवन कुमार या कुमारी ही रहकर पवित्र जीवन व्यतीत करेंगे।

🔵 हम गायत्री उपासक भगवान् की सर्वश्रेष्ठ सजीव प्रतिमा नारी के रूप में ही मानते हैं। नारी में भगवान् की अनन्त करुणा, पवित्रता और सदाशयता का दर्शन करना हमारी भक्ति-भावना का दार्शनिक आधार है। उपासना में ही नहीं, व्यावहारिक जीवन में भी हमारा दृष्टिकाण यही रहना चाहिए। नारी मात्र को हम पवित्र दृष्टि से देखें, वासना की दृष्टि से न उसे सोचें, न उसे देखें और न उसे छुएँ।

🔴 नारी को वासना के उद्देश्य से सोचना या देखना उसकी महानता का वैसा ही तिरस्कार करना है जैसे किसी देव मंदिर की प्रतिमा को चुराकर पत्थर को अपनी किसी आवश्यकता को पूर्ण करने के उद्देश्य से देखना। यह दृष्टि जितनी निन्दनीय और घृणित है उतनी ही हानिकारक और विग्रह उत्पन्न करने वाली भी। हमें उस स्थिति को अपने भीतर से और सारे समाज से हटाना होगा और नारी को उस स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित करना होगा। जिस की एक दृष्टि मात्र से मानव प्राणी धन्य होता रहा है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 36) 27 Jan

🌹 साधना का स्तर ऊंचा उठाएं

🔴 यों शुभ कार्य के लिए सभी दिन शुभ हैं। फिर भी किसी पर्व से यह साधना आरम्भ की जाय तो अधिक उत्तम है। बसन्त पंचमी, गुरुपूर्णिमा, गायत्री जयन्ती आदि पर्वों से अथवा तिथियों में पंचमी, एकादशी और पूर्णिमा या वारों में रविवार अथवा गुरुवार से अधिक उत्तम है। यों बुरा या निषिद्ध, कोई भी दिन नहीं है। सामान्य नियम यह है कि जब से आरम्भ किया जाय तभी एक वर्ष पूरा होने पर, समाप्त किया जाय। पर्व दिन कुछ आगे-पीछे हों तो उस अवसर पर भी पूर्णाहुति की जा सकती है और शेष जप संख्या को थोड़ी-बहुत घटा-बढ़ाकर सन्तुलन बिठाया जा सकता है।

🔵 वैसे पन्द्रह माला और 24 हजार के दो लघु अनुष्ठानों का नियम भी इस प्रकार बनाया गया है कि इस क्रम से उपासना करने में प्रायः 11 महीनों में ही यह संख्या पूरी हो जाती है। चांद वर्ष पूरे तीन सौ साठ दिन का होता भी नहीं है। तिथियों को घट-बढ़ प्रायः होती रहती है इसलिए पांच लाख की संख्या सरलता पूर्वक हो सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 30) 27 Jan

🌹 साहस का शिक्षण—संकटों की पाठशाला में
🔵 पैराशूट द्वारा रंगरूट को हिमाच्छादित प्रदेश में अज्ञात शिखर पर छोड़ दिया जाता है। साथ में भोजन पानी तथा अन्य आवश्यक साधन अत्यल्प मात्रा में उसके साथ होते हैं। सर्दी, गर्मी, तूफान, हिमपात तथा वन्य प्राणियों जैसे संकटों का उसे सामना करना पड़ता है। अल्प साधनों के सहारे उसे प्रस्तुत होने वाले हर संकट से जूझना पड़ता है। प्रमुख समस्या सामने आती है प्रकृति विपदाओं से अपनी सुरक्षा किस प्रकार की जाय, आहार की व्यवस्था कैसे जुटाई जाय? थोड़ी भी असतर्कता उसे मृत्यु के मुंह में धकेल सकती है। अस्तु उसे पूरी जागरूकता का परिचय देना पड़ता है।

🔴 प्रशिक्षण में कितने ही प्रकार के अभ्यास कराये जाते हैं। अल्प आहार में अधिक से अधिक दिन तक कैसे जीवित रहा जा सकता है, यह कष्ट साध्य अभ्यास हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में करना पड़ता है। जल के अभाव में कुछ दिनों तक जीवित रहने की क्षमता के विकास के लिए चालक को भीषण ताप क्रम वाले रेगिस्तान इलाकों में छोड़ दिया जाता है। थोड़ी सी पानी की मात्रा उसके साथ होती है। उसके सहारे उसे अधिक से अधिक दिनों तक मरु प्रदेशों में गुजारा करना पड़ता है। पैदल ही उसे तपते हुए सैकड़ों मील की दूरी तय करके सेना के पड़ाव तक पहुंचना पड़ता है।

🔵 बीहड़ जंगलों में उसे प्रशिक्षण काल में छोड़ दिया जाता है, यह परखने के लिए कि अविज्ञात क्षेत्रों से वह अपनी रक्षा करते हुए किस प्रकार निकल सकता है। थोड़े से खाद्यान्न और पानी के सहारे वह बीहड़ों में कई दिनों तक भटकता हुआ सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के लिए मार्ग ढूंढ़ता है। उसे कितनी बार शेर, बाघ तथा जंगली हाथी जैसे हिंसक जीवों का सामना करना पड़ता है। वनों की बीहड़ता से निकलने के लिए उसे अपने मनोबल एवं साहस का पूरा-पूरा परिचय देना पड़ता है। हिमाच्छादित प्रदेश में रहने का अभ्यास और भी अधिक कष्ट साध्य है। शून्य डिग्री से भी नीचे तापक्रम में शरीर को रहने के लिए अभ्यस्त करना एक कठोर परीक्षा की अवधि होती है। शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को निखारने एवं समर्थ बनाने वाली शिक्षण की इन प्रक्रियाओं से होकर गुजारने के बाद शिक्षार्थी को उत्तीर्ण घोषित किया जाता है। इस अवधि में उसकी मनोभूमि इतनी दृढ़ बन जाती है कि हर प्रकार के संकट चुनौतियों का सामना वह कर सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 8)


 👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 अगर आप इस खुमारी में जिस स्थिति में अभी है आप उसी स्थिति में बने रहेंगे हमेशा तो आप विश्वास रखिये आप एक ऐसा मौका गवा देंगे जैसा कि मौका फिर कभी नहीं आने वाला। फिर कभी नहीं आयेगा यह मौका। यह मौका आप मानकर चलिये एक अभूतपूर्व मौका है ऐसा मौका है जिसमें ५०० करोड़ आदमी का भाग्य बिगड़ सकता है या बन सकता है दो का दोराहा है। यदि हम सब मिलकर काम करे तो हम ५०० करोड़ आदमी का भाग्य बना भी सकते हैं। और हम लोग सब मिलकर लापरवाही करें और अपने अपने स्वार्थों में लगे रहें और अपने- अपने मतलब की बात सोचे तो ५०० करोड़ आदमी के साथ विश्वासघात भी कर सकते हैं। बड़ा एक इस तरह का मौका है जिसमें चौराहे पर खड़े है एक जीवन का चौराहा है एक मरण का चौराहा है। मरण का चौराहा कौन सा है आपको कितनी बार बता चुके हैं कितनी भविष्यवाणियाँ बता चुके हैं हमने आपको इस्लाम धर्म की भविष्यवाणियाँ बताई, चौदहवीं सदी वाली बात बताई, सेवन टाइम की ईसाइयों वाली बात बताई।

🔵   भविष्य पुराण की बात बताई और वैज्ञानिकों की बात बताई ज्योतिषों की बात बताई सबकी बात बता चुके हैं। कि यह बड़ा खराब समय है और वैसे भी दिखाई पड़ता है आपको ।। आपको दिखाई नहीं पड़ता जो अगर स्टार वार शुरू हो गया तो तो फिर आप समझिये मंगल और बृहस्पति के बीच में पृथ्वी से बड़ा एक गृह था वहाँ भी बड़ी विज्ञान की उन्नति हो गई थी और वहाँ विज्ञान की उन्नति को गलत इस्तेमाल किया और वह चूरा चूरा हो गये चूरा चूरा होकर वह गृह कही एक टुकड़ा कहीं जा पड़ा, एक टुकड़ा कहीं जा पड़ा एक कही चला गया एक कही चला उसका नामोनिशान खतम हो गया यह भी ऐसा मौका है कि यदि स्टार वार शुरू हो और परमाणु युद्ध शुरू हो तो हमारी और आपकी जिंदगी की बात तो अलग, हमारे आपके जमीन जायदाद खेत, मकान, दुकान, नौकरी की बात तो अलग हम जिस जमीन पर बैठे हुये हैं इसका नाम निशान का भी पता नहीं चलेगा यह ऐसा समय है।

🔴  क्यों साहब ऐसा समय नहीं ऐसा भी नहीं ऐसा भी समय है कि अगर लंका के रावण का राज्य बना रहे तो न कोई ऋषि बचेगा, न कोई मुनि बचेगा, न कोई जनता बचेगी सबको राक्षसों का वंश जो एक लख पूत सवा लख नाती यह सब मिलकर के सबको खा जायेंगे और सबका खेत छीन लेंगे सबका पैसा छीन लेंगे सबकी औरतें छीन लेंगे और हा−हाकार मचा देंगे। ऐसा भी समय है कि अगर आप थोड़ी सी हिम्मत दिखायें कम से कम इतनी दिखा दें जितनी की रीछ बंदरों ने दिखा दी थी। रीछ बंदर आपसे बेअकल थे कि आपसे बुद्धिमान थे। रीछ बंदरों ने देखा कि फिर ऐसा मौका फिर कभी नहीं आयेगा इसलिये इस मौके पर हमको अपने छोटे लाभों के बारे में विचार नहीं करना चाहिये बल्कि बड़े लाभों के बारे मे विचार करना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.2

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 84)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 18. बारात की संख्या कम ने कम रहे:-- केवल अत्यन्त आवश्यक एवं निजी व्यक्ति ही बारात में जावें। इसमें कुटुम्बी, रिश्तेदारों या अत्यन्त आवश्यक व्यक्तियों के अतिरिक्त फालतू लोग न हों।

🔵 अक्सर बड़े आदमियों या उजले कपड़े वालों को बारात की शोभा बढ़ाने के लिए खुशामदें करके मिन्नत करके ले जाया जाता है। इसमें उनका अहसान होता है, अपना खर्चा पड़ता है और बेटी वाले की परेशानी बढ़ती है। इन सब असुविधाओं का ध्यान रखते हुये, इस अन्न संकट तथा महंगाई के जमाने में बारात की संख्या बढ़ाना सर्वथा अनुचित है। साधारणतया 20-20 आदमी की बारात पर्याप्त होगी। अधिकतम संख्या 51 तक हो सकती है।

🔴 19. बारात चढ़ाई सादगी के साथ:-- बारात चढ़ाने और उसकी शोभा बनाने में ढेरों निरर्थक पैसा बर्बाद होता है और उसका स्वरूप दम्भ, अहंकार एवं नकली अमीरी जैसा उपहासास्पद बन जाता है। इसे बदल कर सादगी एवं सौम्यता बरती जाय।

🔵 वर की सवारी घोड़े पर निकले जैसा कि बड़े शहरों में रिवाज है। बारात वर के पीछे पैदल शोभा यात्रा में चलें। गांव और कस्बों में भी यही तरीका उचित है। बारातियों के बैठने के लिये जो सवारियां ली गई हों, उनको इस शोभा यात्रा में न रखा जाय। बाजे में 10 से अधिक व्यक्ति न हों। आतिशबाजी, फूलटट्टी, कागज के घोड़े-हाथी, परियां, लड़की लड़के के ऊपर पैसों की बखेर जैसे बेकार खर्च बिलकुल भी न किये जांय। गोधूलि का विवाह रहने से बारात दिन में ही चढ़ेगी इसलिये रात में ही अच्छी लगने वाली इन बेकार चीजों की जरूरत भी न पड़ेगी। बारात के साथ रोशनी का प्रबन्ध भी न करना पड़ेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 35)

🌞 दिए गए कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह

🔴 काँग्रेस अपनी गायत्री गंगोत्री की तरह जीवनधारा रही। जब स्वराज्य मिल गया, तो हमने उन्हीं कामों की ओर ध्यान दिया जिनसे स्वराज्य की समग्रता सम्पन्न हो सके। राजनेताओं को देश की राजनैतिक आर्थिक स्थिति सँभालनी चाहिए, पर नैतिक क्रांति, बौद्धिक क्रांति, और सामाजिक क्रांति उससे भी अधिक आवश्यक है, जिसे हमारे जैसे लोग ही सम्पन्न कर सकते हैं। यह धर्म-तंत्र का उत्तरदायित्व है।

🔵 अपने इस नए कार्यक्रम के लिए अपने सभी गुरुजनों से आदेश लिया और काँग्रेस का एक ही कार्यक्रम अपने जिम्मे रखा ‘‘खादी धारण।’’ इसके अतिरिक्त उसके सक्रिय कार्यक्रमों से उसी दिन पीछे हट गए जिस दिन स्वराज्य मिला। इसके पीछे बापू का आशीर्वाद था, दैवी सत्ता का हमें मिला निर्देश था। प्रायः २० वर्ष लगातार काम करते रहने पर जब मित्रों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते निर्वाह राशि लेने का फार्म भेजा, तो हमने हँसकर स्पष्ट मना कर दिया। हमें राजनीति में श्रीराम मत्त या मत्तजी के नाम से जाना जाता है। जो लोग जानते हैं उस समय के मूर्धन्य जो जीवित हैं उन्हें विदित है कि आचार्य जी (मत्त जी) काँग्रेस के आधार स्तंभ रहे हैं और कठिन से कठिन कामों में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे हैं, किन्तु जब श्रेय लेने का प्रश्न आया, उन्होंने स्पष्टतः स्वयं को पर्दे के पीछे रखा।

🔴 तीनों काम यथावत पूरी तत्परता और तन्मयता के साथ सम्पन्न किए और साथ ही गुरुदेव जब-जब हिमालय बुलाते रहे, तब-तब जाते रहे। बीच में दो आमंत्रणों में उनने छः-छः महीने ही रोका। कहा ‘‘काँग्रेस का कार्य स्वतंत्रता प्राप्ति की दृष्टि से इन दिनों आवश्यक है, सो इधर तुम्हारा रुकना छः-छः महीने ही पर्याप्त होगा। उन छः महीनों में हमसे क्या कराया गया एवं क्या कहा गया, यह सर्वसाधारण के लिए जानना जरूरी नहीं है। दृश्य जीवन के ही अगणित प्रसंग ऐसे हैं, जिन्हें हम अलौकिक एवं दैवी शक्ति की कृपा का प्रसाद मानते हैं, उसे याद करते हुए कृतकृत्य होते रहते हैं।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/diye.4

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 35)

🌞  हिमालय में प्रवेश

बादलों तक जा पहुंचे

🔵 आज प्रातःकाल से ही वर्षा होती रही। यों तो पहाड़ों की चोटी पर फिरते हुए बादल रोज ही दीखते पर आज तो वे बहुत ही नीचे उतर आये थे। जिस घाटी को पार किया गया वह भी समुद्र तल से 10 हजार फुट की ऊंचाई पर थी। बादलों को अपने ऊपर आक्रमण करते, अपने को बादल चीर कर पार होते देखने का दृश्य मनोरंजक भी था और कौतूहल वर्धक भी। धुनी हुई रुई के बड़े पर्वत की तरह भाप से बने ये उड़ते हुए बादल निर्भय होकर अपने पास चले आते। घने कुहरे की तरह चारों ओर एक सफेद अंधेरा अपने चारों ओर फिर जाता। कपड़ों में नमी आ जाती और शरीर भी गीला हो जाता। जब वर्षा होती तो पास में ही दीखता कि किस प्रकार रुई का बादल गल कर पानी की बूंदों में परिणित होता जा रहा है।

🔴 अपने घर गांव में जब हम बादलों को देखा करते थे तब वे बहुत ऊंचे लगते थे, नानी कहा करती थी कि जहां बादल हैं वहीं देवताओं का लोक है। यह बादल देवताओं की सवारी हैं इन्हीं पर चढ़ कर वे इधर उधर घूमा करते हैं और जहां चाहते हैं पानी बरसाते हैं। बचपन में कल्पना किया करता था कि काश मुझे भी एक बादल चढ़ने को मिल जाता तो कैसा मजा आता, उस पर चढ़ कर चाहे जहां घूमने निकल जाता। उन दिनों मेरी दृष्टि में बादल की कीमत बहुत थी। हवाई जहाज से भी अनेक गुनी अधिक। जहाज चलाने को तो उसे खरीदना, चलाना, तेल जुटाना सभी कार्य बहुत ही कठिन थे पर बादल के बारे में तो कुछ करना ही न था, वैसे कि चाहे जहां चल दिये।

🔵 आज बचपन की कल्पनाओं के समन बादलों पर बैठ कर उड़े तो नहीं पर उन्हें अपने साथ उड़ते तथा चलते देखा तो प्रसन्नता बहुत हुई। हम इतने ऊंचे चढ़े कि बादल हमारे पांवों को छूने लगे। सोचता हूं बड़े कठिन लक्ष जो बहुत ऊंचे और दूर मालूम पड़ते हैं, मनुष्य इसी तरह प्राप्त कर लेता होगा, पर्वत चढ़ने की कोशिश की तो बादल की बराबर पहुंच गया। कर्त्तव्य कर्म का हिमालय भी इतना ही ऊंचा है। यदि हम उस पर चढ़ते ही चलें तो साधारण भूमिका से विचरण करने वाले शिश्नोदर परायण लोगों की अपेक्षा वैसे ही अधिक ऊंचे उठ सकते हैं जैसे कि निरन्तर चढ़ते-चढ़ते दस हजार फुट की ऊंचाई पर आ गये।

🔴 बादलों को छूना कठिन है। पर पर्वत के उच्च शिखर के तो वह समीप ही होता है। कर्त्तव्य परायणता की ऊंची मात्रा हमें बादलों जितना ऊंचा उठा सकती है और जिन बादलों तक पहुंचना कठिन लगता है वे स्वयं ही खिंचते हुए हमारे पास चले आते हैं। ऊंचा उठाने की प्रवृत्ति हमें बादलों तक पहुंचा देती है, उन्हें हमारे समीप तक स्वयं उड़कर आने के लिए विवश कर देती है। बादलों को छूते समय ऐसी-ऐसी भावनाएं उनसे उठती रहें। पर बेचारी भावनाएं अकेली क्या करें। सक्रियता का बाना उन्हें पहनने को न मिले तो वे एक मानस तरंग मात्र ही रह जाती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...