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गुरुवार, 15 सितंबर 2022

👉 समर्थ के अवलम्बन से ही आत्मिक प्रगति

भारतीय संस्कृति में अनेकानेक विशषताएँ हैं, किन्तु एक सबसे बड़ी विशेषता है जो हम उसमें पाते हैं वह है-गुरु-शिष्य परम्परा। गुरु माँ की तरह अपनी प्राण-ऊर्जा से शिष्य के अन्तःकरण को ओत-प्रोत कर उसमें नई शक्ति का संचार करता है, उसे नया जीवन देता है। शिष्य का समर्पण और गुरु द्वारा अपना सर्वस्व उसको अर्पण, इसकी मिसाल और कहीं भी देखने को नहीं मिलती। गुरु का सहयोग लिये बिना शिष्य की आत्मिक प्रगति सम्भव नहीं। अज्ञान के अन्धकार में फँसे मानव को बहार निकालने के लिए गुरु अपनी विशिष्ट ज्ञान की शलाका से उसकी आँखों में वो अंजन लगाता है कि उसे जीवन का वास्तविक उद्देश्य और अपनी भावी भूमिका स्पष्ट नजर आने लगती है। जिस किसी के जीवन में गुरु का पदार्पण हुआ है, उसे मानकर चलना चाहिए कि उसके उच्चस्तरीय आत्मोत्थान का पथ प्रशस्त हो गया।

आज के आधुनिक युग में जब आदमी को आदमी पर विश्वास नहीं है तब शिष्य कैसे विश्वास करे-कौन सा गुरु उसके लिए सच्चा है? शास्त्रों का मार्गदर्शन है-धूर्तों-के मायाजाल से बचने के लिए लोभ-लालच में फँसाकर अपना उल्लू साधने वाले तथाकथित बाबाजियों के चंगुल में आने से बचने के लिए शिष्य को अपने अन्दर के नेत्र खुले रखने चाहिए। यह एक समयसाध्य प्रक्रिया है, परन्तु क्रमशः समझ में आने लगता है-कौन सही है? और कौन गलत?

*( अमृतवाणी:- भावी महाभारत पं श्रीराम शर्मा आचार्य Amritvanni:- Bhavi Mahabharat Pt Shriram Sharma Acharya, https://youtu.be/aLv4rXh8cmU )*

*( शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए Shantikunj WhatsApp 8439014110 )*

आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधक आज के इस मायाजाल से घिरे संसार में निश्छल स्वभाव वाले, संवेदना से अभिपूरित, तार्किक नहीं, बल्कि वास्तविक ज्ञान से भरेपूरे गुरु को पहचानने में देर नहीं करते। गुरु की पहचान के पश्चात् अपनी आत्मसत्ता का परिपूर्ण समर्पण, अहंकार का निगलन और अपनी इच्छाओं का गुरु की इच्छाओं में विलय-बस इतना ही शेष रह जाता है। समर्पण, यदि सर्वोच्च स्तर का हुआ, तो बदलें में उतना ही मिलता हुआ चला जाता है।

बंशी स्वयं को पोला कर लेती है और मुँह से लगने के पश्चात् वही स्वर बजने देती है जो बजाने वाला चाहता है। शिष्य भी यदि स्वयं को खाली कर दे और अपनी इच्छाएँ गुरु को दे दे, तो गुरुदीक्षा सम्पूर्ण हो जाती है। गुरुसत्ता अपनी प्राण ऊर्जा की कलम शिष्य के व्यक्तित्व में आरोपित कर उसे विशिष्टता से सम्पन्न बना देती है। समर्थ गुरु का अवलम्बन एक सौभाग्य है। जिसे यह मिल गया, मानो उसकी मुक्ति का द्वार खुल गया।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 31

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

👉 Rachnatmak Jeevan Ki Sadhna रचनात्मक जीवन की साधना

नया वर्ष नयी साधना के स्वरों को लेकर हम सबके द्वार-देहरी तक आया है। इन स्वरों में रचनात्मक जीवन का मधुर गीत पिरोया है। चेतो! चेतो!! जागो! जागो!! की मीठी धुन को हम सभी इस नव वर्ष के नए विहान पर सुन सकते हैं। बहुत सोये,  अब और नहीं! बहुत खोया अब और नहीं!! की प्रभाती नव वर्ष की प्रभात बेला में गायी जा रही है। प्रकृति, परमेश्वर एवं सद्गुरु की सम्मिलित चेतना से उपजे इन साधना स्वरों की अनसुनी न करें।
  
ध्यान रहे, साधना से ही जीवन संवरता है। रचनात्मकता की कोपलें फूटती हैं, नव सृजन के अंकुर निकलते हैं। साधना के अभाव में जीवन यूँ ही बंटता, बिखरता और बरबाद होता रहता है। बरबादी की इस टीस को हममें से हर एक कहीं न कहीं अपनी अन्तर्चेतना में अनुभव करता है। जिन्दगी की बरबादी का दर्द हम सभी को सालता है। रचनात्मक जीवन की साधना में ही इसका समाधान है।
  
किन्तु सावधान! यह साधना कुछ इने-गिने कर्मकाण्डों तक सीमित नहीं है। किसी तरह की पूजा-पत्री, पाठ, होम से इसे पूरा नहीं किया जा सकता। यह तो सजगता, सक्रियता एवं शुचिता से ही सधती है। इन्हीं तीन के मिलन और मिश्रण से जीवन में सार्थकता का समावेश होता है। इसी संयोग से जीवन में वैभव एवं विभूतियों के अनुदान-वरदान बरसते हैं। व्यक्ति धनवान् ही नहीं, पुण्यवान्, बलवान्, ओजवान् एवं कीर्तिवान् भी बनता है। सभी तरह की सफलताएँ स्वयं ही उसका वरण करती हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २२०

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

👉 Anubhav अनुभव

एक सुबह महर्षि रमण बोलने के लिए उठे। पर इसके पहले वे बोलते, आश्रम के वृक्ष पर बैठे विहंग गीत गाने लगे। उस शान्त सुहानी सुबह में फिर वे चुप ही रहे। सूर्य अपनी किरणों का जाल बुनता रहा और वे पक्षी गीत गाते रहे। महर्षि रमण चुप थे तो बाकी सब भी चुप बने रहे। उस मौन में, उस शून्य में वह गीत दिव्य हो गया। गीत पूरा हुआ तो शून्य और गहरा हो गया। महर्षि फिर उठ गए। उस दिन वे कुछ भी नहीं बोले। उस दिन यह मौन प्रवचन ही हुआ।
  
लेकिन इस मौन में उन्होंने जो कुछ कहा, वह किसी बड़े से बड़े शब्द समूह से बढ़कर था। इसने सभी के अन्तस् में गहरे अनुभव दिए। इस जगत् में और इस जीवन में जो भी है, सब दिव्य है। सबमें परमात्मा की छाप और छाया है। वही सब में प्रच्छन्न है, वही सब में प्रकट है। सब उसी का रूप है, सब ओर उसी की ध्वनि है। पर हम शान्त नहीं हैं, इसलिए उसे नहीं सुन पाते। और हमारी आँखें खुली नहीं हैं, इसलिए उसे निहार नहीं पाते।
  
हम सभी ओर से ओत-प्रोत हैं, इसलिए उसका अनुभव नहीं हो पाता। हम खाली हो सकें तो उसका अनुभव अभी और यहीं है। सत्य का अनुभव तो सर्वत्र है, पर अनुभव करने वाला स्व मूर्च्छा में है। पर हम स्व की बेहोशी नहीं तोड़ते, बस सत्य की खोज करते रहते हैं। आँख खोलने की कोशिश नहीं करते, बस प्रकाश की खोज अनवरत करते हैं। कोशिश करनी होगी, इस भूल को छोड़ने की। प्रयास करना होगा, अनुभव करने का।

चित्त-चिन्तन एवं चेतना गहरे मौन में डूबें तो अनुभव भी गहरे हो सकेंगे। देखने का अनुभव पाना है तो आँखें खुली रखनी होगी। अब गंगाजल की मछली, गंगा की खोज में परेशान हो, तो उससे क्या कहा जाएगा? अरे उससे यही कहना होगा कि खोज छोड़ो और देखो तुम गंगा के जल में ही हो। तुम्हें गंगाजी की खोज नहीं करनी, बस उसे पीना है और पवित्रता व शान्ति के अनुभव में डूबना है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१९

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

👉 Sadhna साधना

साधना है साधक के मन का साध्य में विसर्जन। लेकिन इस सरल-सुगम सत्य की समझ सबको नहीं हो पाती। वे मन की उलझनों में उलझे रहते हैं। मन की भटकनों में भटकते रहते हैं। मन के जाल को सुलझाने में वे खुद ही इतना उलझ जाते हैं कि उनका अपना अस्तित्त्व ही खोने लगता है। जो अनुभवी हैं उन सभी का यही कहना है कि मन ही तो अवरोध है, अड़चन है। इसके हटने, मिटने पर ही सत्य का अनुभव हो पाता है।

गृत्समद साधना में थे। अपने गुरु के आश्रम में सर्वथा एकान्त रहकर वह रात-दिन मन को साधने का अभ्यास करते रहते थे। क्योंकि उन्होंने कहीं से सुन रखा था कि साधना मन को साधने का नाम है। एक दिन उनके गुरु उनके कुटीर पर गए। गृत्समद ने उनकी ओर कोई ध्यान न दिया। बस अपने मन की गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश करते रहे।
उनके कृपावन्त गुरु ने वहीं पर बैठकर ईंट को पत्थर से घिसना शुरू किया। ऐसा करते हुए उन्हें देर हो गयी। अब गृत्समद से रहा न गया। उन्होंने उनसे पूछा आप यह क्या कर रहे हैं? गुरु ने कहा- वत्स! इस ईंट का दर्पण बनाना है। इस बात पर चकित होते हुए गृत्समद ने कहा, आप यह क्या कह रहे हैं? जीवन भर घिसते रहने पर भी ईंट दर्पण नहीं बन सकेगी।

इस पर उनके गुरु ने कहा- वत्स! यदि ईंट दर्पण नहीं बनेगी, तो मन भी दर्पण न बन सकेगा। मन ही तो धूल है जिससे दर्पण ढका है। विचारों के संग्रह के अलावा भला मन और है ही क्या? उसके हटने पर जो शेष रह जाता है वह निर्दोष चैतन्य तो सदा से निर्दोष है। निर्विचार में, अ-मन में ही उस सनातन सत्य के दर्शन होते हैं। विचारों का धुँआ न हो तो फिर चेतना की निर्धूम शिखा ही शेष रह जाती है। गुरु की इस बात को आत्मसात करके गृत्समद ने ऋषित्व को उपलब्ध किया। वह ऋषि गृत्समद कहलाए।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१८

रविवार, 19 अप्रैल 2020

👉 आध्यात्मिक जीवन

आध्यात्मिक जीवन अस्वस्थ होने में नहीं, स्वस्थ होने में है। यह रोग में नहीं आरोग्य में है, पीड़ा में नहीं प्रसन्नता में है, दमन में नहीं रूपान्तरण में है। लेकिन इस मुखर सच को समझने वाले लोग कम है। संख्या उनकी ज्यादा है जो दमन को, स्वयं के प्रति अनाचार को अध्यात्म समझते हैं। ऐसे लोग स्वयं को भले कितना ही समझदार समझें लेकिन हैं सिरे से नासमझ।
  
स्वामी विवेकानन्द के पास एक ऐसा ही अपने को समझदार समझने वाला नासमझ व्यक्ति आया। वह साधुवेश में था, बातों ही बातों में उसने बताया कि वह बाल ब्रह्मचारी है। उसकी सूखी, कृश देह, बुझा निस्तेज चेहरा यह बयान कर रहे थे कि उसने अपने शरीर पर बहुत अत्याचार किया है। स्वामी जी को उस पर बहुत दया आयी। वह बोले- अरे भाई! शरीर को इतना सताने की क्या जरूरत पड़ गयी। स्वामी जी के इस कथन पर वह कुछ चौंक सा गया। क्योंकि उसने दमन को त्याग, अस्वास्थ्य को आध्यात्मिकता, कुरूपता एवं विकृति को योग समझ रखा था। उसने असौन्दर्य साधने को ही साधना मान रखा था।
  
स्वामी विवेकानन्द उसके इस अज्ञान पर हँसे और बोले- तुमने स्वयं को शरीर तक क्यों सीमित कर रखा है। शरीर सब कुछ नहीं है। शरीर कुछ है और कुछ ऐसा भी है जो शरीर के पार और परे है। शरीर को न भोगी बनने देना है और न रोगी। न तो शरीर को उछालते फिरना है और न उसे तोड़ते फिरना है। देह तो बस गेह है, आत्मा का आवास है। उसका स्वस्थ और अच्छा होना आवश्यक है।
  
आध्यात्मिक जीवन स्वास्थ्य का विरोध नहीं है। वह तो परिपूर्ण स्वास्थ्य है। वह तो एक लय युक्त, संगीतपूर्ण सौन्दर्य की स्थिति का पर्यायवाची है। शरीर तो बस उपकरण है, अपना अनुगामी है। तुम जैसे बनते हो, वह वैसा बन जाता है। तुम वासना में हो, तो वह वहाँ साथ देता है, तुम साधना में हो तो वह साधना में साथ देता है। आध्यात्मिक जीवन का मतलब शारीरिक दमन नहीं बल्कि विचार, संस्कार और भावनाओं का परिमार्जन परिवर्तन व रूपान्तरण है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१७

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

👉 प्रश्न

प्रश्न मन की लहरों के साथ उपजते हैं। मन की हर हिलोर-प्रत्येक लहर एक नया प्रश्न खड़ा करती है। जीवन की प्रत्येक घटना जो मन को स्पन्दित करती है, अनायास ही नये प्रश्न अथवा नए प्रश्नों को जन्म दे देती है। इसी तरह परिस्थितियाँ व परिवेश की हलचलें जो विचार व भावों में लहरें पैदा करने में समर्थ हैं, स्वाभाविक ही अन्तर्चेतना में प्रश्नों को जन्म देती हैं। यह क्रम न तो रुकता है न थमता है, बस नित्य-निरन्तर-अविराम चलता रहता है।
  
प्रत्येक प्रश्न मन के मौन को तोड़ता है। मन में अशान्ति, बेचैनी व तनाव को जन्म देता है। ये प्रश्न जितने अधिक, जितने गहरे व जितने व्यापक होते हैं, मन की अशान्ति, बेचैनी व तनाव भी उतना ही ज्यादा, गहरा, घना व व्यापक होता जाता है। इसी अशान्ति, बेचैनी व तनाव में मन अपनी ही कोख में उपजे प्रश्न या प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिश करता है। उसे अपने इस प्रयास में सफलता भी मिलती है। उत्तर मिलते भी हैं, पर नए प्रश्नों के साथ। न जाने क्यों, बिना चाहे और बिना जाने हर उत्तर के साथ कोई न कोई प्रश्न चिपक ही जाता है।
  
साथ ही बढ़ जाती है, मन की बेचैनी व अशान्ति। क्योंकि जो भी घटना फिर वह चाहे प्रश्न की हो या उत्तर की मन में लहरें व हिलोरें पैदा करेंगी, मन को तनाव, बेचैनी व अशान्ति से ही भरेगी। इस समस्या का समाधान तभी है, जब मन की लहरें मिटें, हिलोरें हटें। फिर न कोई प्रश्न उभरेंगे और किसी उत्तर की खोज होगी। इसके लिए मन को मौन होना होगा। केवल तभी चेतना प्रश्नों के पार जा पाएगी। तभी यह समझ में आएगा कि पूछने को कुछ नहीं है, उत्तर पाने को कुछ नहीं है। इसी को समाधि कहते हैं। जहाँ सभी प्रश्न स्वाभाविक ही गिर जाते हैं। जहाँ बेचैनी, अशान्ति, तनाव अपने आप ही मिट जाता है। बस बनी रहती है तो केवल प्रश्न विहीन अमिट शान्ति।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१६

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

👉 पीड़ा और प्रार्थना

पीड़ा और प्रार्थना में गहरा सम्बन्ध है। पीड़ा का अनुभव सकारात्मक हो, दृष्टिकोंण रचनात्मक हो तो पीड़ा स्वतः ही प्रार्थना बन जाती है। ऐसा न हो तो हर पीड़ा- निषेध व नकारात्मक दृष्टिकोंण के जाल में उलझ-फँस कर कभी वैर बनती है तो कभी द्वेष बन जाती है। इतना ही नहीं, ज्यादातर दशाओं में यह वैर-द्वेष के साथ मन को सन्ताप देने वाला विषम-विषाद बन जाती है। जीवन को अवसन्न करने वाला अवसाद बन जाती है।
  
पीड़ा का अनुभव सकारात्मक होने का मतलब है अन्तर्मन में प्रभु प्रेम उपस्थित होना। भगवान् के मंगलमय विधान में गहरी आस्था होना। ऐसा हो तो जीवन की पीड़ाएँ-दर्द का उन्माद जगाने की बजाय प्रार्थना को जन्म देती हैं। ऐसी स्थिति में पीड़ा जितनी गहरी होती है, प्रार्थना उतनी ही घनीभूत होती जाती है। पीड़ा के क्षणों में मन स्वाभाविक रूप से भगवान् के समीप सरकने लगता है। सच तो यह है कि यदि पीड़ा दर्द है, तो प्रार्थना उसकी दवा है।
  
पीड़ा और प्रार्थना का यही मिलन तप है। तपश्चर्या का अर्थ धूप में खड़ा हो जाना नहीं है, न भूखे रहकर उपवास करना है। तपश्चर्या का सही अर्थ जीवन के पीड़ादायक क्षणों में भगवान् के भाव भरे स्मरण, सर्वस्व समर्पण व उनमें ही लीन होना है। यथार्थ तप है- जीवन के खालीपन की पीड़ा को उसकी समग्रता में अनुभव करना, जीवन की अर्थहीनता को उसकी पूरी त्वरा में अनुभव करना। जीवन की यह बेकार भागदौड़ जिसको अभी बड़ी उपयोगी समझते हैं, यदि अचानक यह निरर्थक लगने लगे तो बड़ी घबराहट होगी। गहरी पीड़ा पनपेगी। इस पीड़ा को झेलने का नाम, इसे भगवान् के प्रेम व स्मरण तथा समर्पण में भीग कर सहने का नाम है तपश्चर्या। पीड़ा व प्रार्थना का अद्भुत मिलन, जिसके भी जीवन में आता है, उसका जीवन स्वाभाविक ही रूपान्तरित हो जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१५

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

👉 शाश्वत नियम

वसन्त आती है, चली जाती है। पतझड़ आती है, चली जाती है। सुख आते हैं, चले जाते हैं। दुःख आते हैं, चले जाते हैं। सुख और दुःख का आना-जाना ठीक वसन्त व पतझड़ के आने व जाने की तरह है। आना और जाना यही इस जगत् का शाश्वत नियम है। जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है, उसका जीवन क्रमशः बन्धनों से मुक्त होने लगता है।
  
एक अँधियारी रात में कोई प्रौढ़ व्यक्ति नदी के तट से कूदकर आत्महत्या करने पर विचार कर रहा था। मूसलाधार बारिश थी, नदी पूरे बाढ़ पर थी। आकाश में घने बादल छाए हुए थे, बीच-बीच में बिजली चमक रही थी। वह उस क्षेत्र का सबसे धनी व्यक्ति था। लेकिन अचानक घाटे में उसकी सारी सम्पदा चली गयी। इसी वजह से वह आत्महत्या का निश्चय करके यहाँ आया था। लेकिन वह नदी में कूदने के लिए जैसे ही चट्टान के किनारे पहुँचने को हुआ, कि किन्हीं दो वृद्ध, परन्तु मजबूत हाथों ने उसे थाम लिया। तभी बिजली चमकी और उसने देखा कि आचार्य रामानुज उसे पकड़े हुए हैं।
  
उन्होंने उससे इस अवसाद का कारण पूछा और सारी कथा सुनकर वह हँसने लगे और बोले, तो तुम यह स्वीकार करते हो कि पहले तुम सुखी थे? वह बोला- हाँ तब मेरे सौभाग्य का सूर्य पूरे प्रकाश से चमक रहा था और अब सिवाय अंधियारे के मेरे जीवन में और कुछ भी बाकी नहीं है। यह सुनकर आचार्य रामानुज फिर से हँस पड़े और बोले, दिन के बाद रात्रि और रात्रि के बाद दिन। जब दिन नहीं टिका तो रात्रि कैसे टिकेगी? परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे। जो इस शाश्वत नियम को जान लेता है, उसका जीवन उस अडिग चट्टान की भाँति हो जाता है, जो वर्षा व धूप में समान ही बनी रहती है।

सुख व दुःख को जो समभाव से ले, समझो कि उसने जीवन के शाश्वत नियम को जान लिया। इस शाश्वत नियम की अनुभूति करने वाला, एक दिन स्वयं को भी जान लेता है। क्योंकि समत्व में ठहर जाना ही स्वयं के अस्तित्त्व में प्रतिष्ठित होना है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१४

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

👉 जीवन साधना

जीवन साधना के सत्य व तत्त्व को जान लेना जरूरी है। यह जानना अनिवार्य है कि जीवन साधना का बीज क्या है और फल क्या है? प्रारम्भ व परिणाम की पहचान हो जाना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है। कारण व कार्य के अन्तर्सम्बन्ध को बिना जाने जो चलता है, वह भूल करता है। केवल चल पड़ना और चलते चले जाना काफी नहीं है। चलने के साथ दिशा का सम्यक् ज्ञान भी होना चाहिए। इसी तरह जीवन साधना करने के साथ साधना विधि का सम्यक् बोध भी आवश्यक है।

    
जीवन साधना में परिधिगत होने के साथ कुछ केन्द्रीय भी है। प्रयास केन्द्र पर हो तो परिधि स्वयं ही सम्हल जाती है। उसे अलग से सम्हालने की कोई जरूरत नहीं है। केन्द्र ही परिधि में प्रकट होता रहता है। इस सन्दर्भ में केन्द्र क्या है? परिधि क्या है? ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं। इन सवालों का सटीक जवाब यह है कि सद्ज्ञान केन्द्र है सदाचार परिधि है। सद्ज्ञान प्रारम्भ है, सदाचरण परिणाम है। सद्ज्ञान बीज है, सदाचार फल है।
    
ध्यान रहे सदाचरण अज्ञान में पैदा नहीं किया जा सकता। पैदा किया हुआ सदाचार सही सदाचार नहीं है। यह तो बस मिथ्या आवरण है। जिसके तले दुराचार दब जाता है। अँधेरे को दबाना, छिपाना नहीं है, उसे मिटाना है। दुराचार पर सदाचार के कागजी फूल नहीं चिपकाने हैं, उसे हटाना है, मिटाना है। सदाचार नहीं सद्ज्ञान लाना है। सद्ज्ञान स्वयं ही सदाचार बनकर समूचे जीवन पर छा जाता है।

सद्ज्ञान की साधना ही यथार्थ जीवन साधना है। सद्ज्ञान सर्व को प्रकाशित करता है। सद्ज्ञान के उदय से स्वयं ही अज्ञान एवं मोह का अँधेरा मिट जाता है। उससे ही राग व द्वेष नष्ट हो जाते हैं। इसी से जीवन में सचादार के फूल खिलते हैं। जिनकी सुगन्धि का विस्तार व्यक्ति एवं व्यक्तित्व दोनों को प्रकाशित करता है। साथ ही जीवन साधना करने वाला साधक शुद्ध, बुद्ध एवं मुक्त हो जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१३

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

👉 ज्ञान

ज्ञान प्रकाश है, जबकि अज्ञान अँधियारा है। जीवन का पथ इस अज्ञान के अँधियारे से पूरी तरह आपूरित है। इस पर सफलतापूर्वक चलने के लिए ज्ञान के प्रकाश की जरूरत है। लेकिन याद रहे कि इस अँधियारे में औरों का प्रकाश काम नहीं आता, प्रकाश अपना ही हो तो भरोसेमन्द साथी है। जो किसी भी कारण दूसरों के प्रकाश पर भरोसा कर लेते हैं, वे हमेशा धोखा खाते हैं।
  
सूफियों में बाबा फरीद के कथा प्रसंग में एक कथा आती है, उन्होंने अपने शिष्य से कहा- ज्ञान को उपलब्ध करो। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है। यह सुनने पर वह शिष्य नम्र भाव से बोला; बाबा, रोगी तो हमेशा वैद्य के पास ही जाता है, स्वयं चिकित्साशास्त्र का ज्ञान अर्जित करने के फेर में नहीं पड़ता। आप मेरे मार्गदर्शक हैं, गुरु हैं। यह मैं जानता हूँ कि आप मेरा उद्धार करेंगे। तब फिर स्वयं के ज्ञान की क्या आवश्यकता है।
  
यह सुनकर बाबा फरीद ने बड़ी गम्भीरतापूर्वक एक कथा सुनायी। वह बोले, एक गाँव में एक वृद्ध रहता था। वह अंधा हो गया, तो उसके बेटों ने उसकी आँखों की चिकित्सा करवानी चाही। लेकिन वृद्ध ने अस्वीकार कर दिया। वह बोला; भला मुझे आँखों की क्या जरूरत है। तुम आठ मेरे पुत्र हो, आठ पुत्र वधुएँ हैं, तुम्हारी माँ है। ऐसे चौंतीस आँखें तो मुझे मिली हैं। मेरी दो नहीं हुई तो क्या हुआ? पिता ने पुत्रों की बात न मानी। स्थिति जस की तस बनी रही। कुछ दिनों के बाद अचानक एक रात घर में आग लग गयी। सभी अपनी जान बचाने के लिए भागे, वृद्ध की याद किसी को न रही। वह उस आग में भस्म हो गया।
  
यह कथा सुनाने के बाद शेख फरीद ने अपने शिष्य से कहा, बेटा! अज्ञान का आग्रह मत करो। ज्ञान स्वयं की आँखें हैं। इसका कोई विकल्प नहीं है। सत्य न तो शास्त्रों से मिलता है, न शास्ताओं से। इसे तो स्वयं से ही पाना होता है। स्वयं का ज्ञान ही असहाय मनुष्य का एक मात्र सहारा है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१२

मंगलवार, 31 मार्च 2020

👉 दरिद्रता

दरिद्रता इच्छाओं की कोख से पैदा होती है। जिसकी इच्छाएँ जितनी अधिक हैं उसे उतना ही दरिद्र होना पड़ेगा। उसे उतना ही याचना और दासता के चक्रव्यूह में फँसना पड़ेगा। इसी के साथ उसका दुःख भी उतना ही बढ़ेगा। इसलिए जिसे दरिद्रता निवारण के लिए कदम आगे बढ़ाने हैं, उसे इच्छाओं की ओर से अपने पाँव उतना ही पीछे हटाने होंगे। क्योंकि जो जितना अपनी इच्छाओं को छोड़ पाता है, वह उतना ही स्वतन्त्र, सुखी और समृद्ध होता है। जिसकी चाहत कुछ भी नहीं है, उसकी निश्चिंतता एवं स्वतंत्रता अनन्त हो जाती है।
  
इस सम्बन्ध में सूफियों में एक कथा कही जाती है। फकीर बालशेम ने एक बार अपने एक शिष्य को कुछ धन देते हुए कहा- इसे किसी दरिद्र व्यक्ति को दान कर देना। शिष्य अपने गुरु के पास से चल कर थोड़ा आगे बढ़ा और सोचने लगा कि उसके गुरु ने गरीब के स्थान पर दरिद्र व्यक्ति को यह धन देने के लिए कहा है। और जैसा कि उसने बालशेम के सत्संग में जाना था कि गरीब व गरीबी परिस्थितियों वश होता है। लेकिन दरिद्र व दरद्रिता मनःस्थिति जन्य है। सो उसने किसी दरिद्र व्यक्ति की तलाश करनी शुरू की।
  
अपनी इस तलाश में वह एक राजमहल के पास जाकर रुक गया। वहाँ कुछ लोग आपस में चर्चा कर रहे थे कि राजा ने अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए प्रजा पर कितने कर लगाए हैं, कितने लोगों को लूटा है। इन बातों को सुनकर उसे लगा कि उसकी तलाश पूरी हुई। बस उसने राजा के दरबार में हाजिर होकर उस राजा को अपने सारे रूपये सौंप दिए। एक फकीर के द्वारा इस तरह अचानक रूपये दिये जाने से वह राजा हैरान हुआ। इस पर बालशेम के शिष्य ने उसे अपने गुरु की बात कह सुनायी। और कहा- राजन्! इच्छाएँ हो तो दरिद्रता व दुःख बने ही रहेंगे। इसलिए जो इन इच्छाओं के सच को जान लेता है वह दुःख से नहीं अपनी चाहतों से मुक्ति खोजता है। क्योंकि जो अपनी इच्छाओं व चाहतों से छुटकारा पा लेता है, उसके जीवन से दरिद्रता, दुःख, याचना व दासता स्वतः ही हट एवं मिट जाते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २११

रविवार, 29 मार्च 2020

👉 बासन्ती रंग व उमंग

वसन्त में रंग व उमंग है। ये बासन्ती रंग व उमंग सदा ही भारतीय संस्कृति व संस्कारों से सराबोर हैं। बासन्ती बयार में ये घुले-मिले हैं। ये रंग हैं पवित्रता के, उमंग हैं प्रखरता की। इन रंगों में भगवान् का भावभरा स्मरण छलकता है, तो उमंग में सद्गुरु के प्रति समर्पण की झलक झिलमिलाती है। इस बासन्ती रंग में श्रद्धा के सजल आँसुओं के साथ इसकी उमंग में प्रज्ञा का प्रखर तेज है। इन रंगों में निष्ठा की अनूठी चमक के साथ इसकी उमंगों में अटूट नैतिकता सदा छायी रहती है।
  
वसन्त के ये रंग यदि विवेक का प्रकाश अपने में समेटे हैं, तो इसकी उमंगों में वैराग्य की प्रभा है। वसन्त के इन रंगों की अद्भुत छटा में त्याग की पुकार है और इसकी उमंगों में बलिदानी शौर्य की महाऊर्जा है। वसन्त के इन्हीं रंगों व उमंगों ने हमेशा ही भारतीय संस्कृति को संजीवनी व संस्कारों को नवजीवन दिया है। इन बासन्ती रंगों व उमंगों को अपने में धारण करके भारत माता की सुपुत्रियों व सपूतों ने हँसते-हँसते स्वयं को बलिदान करके सद्ज्ञान व सन्मार्ग को प्रकाशित किया है।
  
यदि कभी काल के कुटिल कुचक्र के कारण बासन्ती रंग व उमंग फीके पड़े हैं, तो इसी के साथ भारत की संस्कृति व संस्कारों की छवि भी धूमिल हुई है। जब कभी किसी ने बासन्ती रंग व उमंग को प्रकाशित व ऊर्जावान् करने का सत्प्रयास किए तो उसी के साथ भारत की संस्कृति व संस्कार भी अपने आप समुज्ज्वल हो गए। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने भी इसी प्रक्रिया को अपनाकर युग परिवर्तन की बासन्ती बयार प्रवाहित की। उनके द्वारा प्रेरित व प्रवाहित परिवर्तन की बयार में बासन्ती रंगों का अनूठा उनका प्यार है, तो साथ हैं बासन्ती उमंगों के तपपुञ्ज अंगार भी। जो उन्हीं के इस जन्मशताब्दी वर्ष में नव वसन्त का सन्देश सुना रहे हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१०

शनिवार, 28 मार्च 2020

👉 प्रतिभा

प्रतिभा का अर्थ है जीवन के प्रश्नों का उत्तर देने की क्षमता। जीवन सर्वथा मौलिक है। यह बँधी-बँधाई राहों, घिसी-पिटी परम्पराओं के अनुरूप नहीं चलता। इसमें घटने वाली सभी आन्तरिक एवं बाहरी घटनाएँ पूर्णतया मौलिक व अनूठा नयापन लिये होती हैं। इसके हर मोड़ पर आने वाली चुनौतियाँ, उभरने वाले प्रश्न पूरी तरह से अपनी नवीनता का परिचय देते हैं। जो इन प्रश्नों का जितना अधिक सटीक, सकारात्मक, सक्षम व सृजनात्मक उत्तर दे पाता है, समझो वह उतना ही प्रतिभाशाली है।
  
जीवन प्रवाह में प्रतिपल-प्रतिक्षण सजग व सचेष्ट रहने की जरूरत है। तभी यह जान पाना सम्भव हो पाता है कि जीवन हमसे क्या माँग रहा है? परिस्थिति की क्या चुनौती है? प्रतिभावान् व्यक्ति परिस्थिति व प्रश्न के अनुरूप व्यवहार करता है, जबकि मूढ़ व परम्परावादी व्यक्ति घिसे-पिटे उत्तरों को दुहराते रहते हैं। फिर ये पुरानी बातें किसी धार्मिक पुस्तक में लिखी हुई हों अथवा फिर ऐसी किसी अवतार, पैगम्बर द्वारा कही गयी हों। स्व-विवेक का त्याग कर इन्हें अपना लेना प्रकारान्तर से मूढ़ता ही है।
  
विवेकहीन व्यक्ति, शास्त्रों, धर्मग्रन्थों का पुरातन बोझ ढोते रहते हैं। वह अवतार, मसीहा, पैगम्बर पर अपना सारा बोझ डालकर निशिं्चत हो जाना चाहते हैं। क्योंकि उन्हें अपने ऊपर भरोसा करने से भय लगता है। जबकि अन्तदृष्टि सम्पन्न प्रतिभावान् व्यक्ति स्वयं पर भरोसा करता है। वह अवतार, मसीहा व पैगम्बर तथा धर्मग्रन्थों पर श्रद्धा-आस्था रखते हुए इनकी नए युग के अनुरूप नयी व्याख्या करता है। किसी तरह के सामाजिक-धार्मिक कारागृह उसे कैद नहीं कर पाते। क्योंकि अपनी प्रतिभा के बल पर वह इन्हें तोड़ने में सक्षम होता है। इसीलिए तो कहते हैं- प्रतिभा का अर्थ है- अन्तर्दृष्टि सम्पन्न दूरदर्शी विवेकशीलता, जो जीवन की सभी समस्याओं का सार्थक हल ढूँढने में सक्षम है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०९

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

👉 दुःख का सुअवसर

दुःख की कल्पना मात्र से कंपकपी होने लगती है। इसके अहसास से मन विकल, विह्वल, बेचैन हो जाता है। ऐसे में दुःख से होने वाले दर्द की कौन कहे? यही वजह है कि दुःख से सभी भागना चाहते हैं। और अपने जीवन से दुःख को भगाना चाहते हैं। दुःख से भागने और दुःख को भगाने की बात आम है। जो सामान्य जनों और सर्वसाधारण के लिए है। लेकिन इसकी एक खास बात भी है। जो सत्यान्वेषियों के लिए, साधकों के लिए और भगवद्भक्तों के लिए है। यह अनुभूति विरले लोग पाते हैं। ऐसे लोग दुःख से भागते नहीं, बल्कि दुःख में जागते हैं।
  
दुःख उनके लिए रोने, कलपने का साधन नहीं बल्कि परमात्मा द्वारा प्रेरित और उन्हीं के द्वारा प्रदत्त जागरण का अवसर बनता है। दुःख के क्षणों में उनकी अन्तर्चेतना में संकल्प, साहस, संवेदना, पुरुषार्थ की प्रखरता और प्रज्ञा की पवित्रता जागती है। उनकी आत्मचेतना में अनुभूतियों के नए गवाक्ष खुलते हैं, उपलब्धियों के नए अवसर आते हैं। इसीलिए तपस्वियों ने दुःख को देवों के हाथ का हथौड़ा कहा है। जो चेतना में उन्नयन के नए सोपान सृष्ट करता है। विकास और परिष्कार के नए द्वार खोलता है।
  
तभी तो सन्तों ने, साधुओं, दरवेशों और फकीरों ने भगवान् से हमेशा दुःख के वरदान मांगे हैं। सुख की चाहत तो बस आलसी, विलासी करते हैं। जो सुखों के बीच पले, बढ़े हैं, उनकी चेतना सदा-सदा से सुषुप्ति की ओर अग्रसर होती है। उनके जीवन में भला परिष्कार व पवित्रता का दुर्लभ सौभाग्य कहाँ? यह तो बस केवल उन्हीं को मिलता है, जो पीड़ाओं में पलते हैं और दुःख के दरिया में प्रसन्नतापूर्वक बहते हैं। जो बदनामी के क्षणों में प्रभु भक्ति में जीना और गुमनामी के अँधेरों में प्रभु चिन्तन करते हुए मरना जानते हैं। उन्हें ही परमात्म मिलन का अनन्त सौभाग्य मिलता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०८


यज्ञोपचार पद्धति
Yagya Upchar Paddhti
Shraddheya Dr. Pranav Pandya
👇👇👇
https://youtu.be/s9eVfFZ3ZFc

सोमवार, 23 मार्च 2020

👉 अहंकार

अहंकार विवेक का हरण कर लेता है। इसके चलते सही सोच-समझ और सम्यक् जीवन दृष्टि समाप्त हो जाती है। इसकी पीड़ा से किसी न किसी तरह हर कोई पीड़ित है। फिर भी इसे विडम्बना ही कहेंगे कि आधुनिक मनोविज्ञान और आधुनिक शिक्षा की पूरी धारणा यह है कि जब तक व्यक्ति के पास मजबूत अहंकार न हो, तब तक वह जीवन में संघर्ष न कर पायेगा। यही वजह है कि समाज की पूरी विधि-व्यवस्था और सारे शिक्षण संस्थान आक्रामक एवं अहंकारी व्यक्तित्व गढ़ने में लगे हैं।
  
बचपन से ही बच्चे को सिखाया जाता है, तुम्हें अपनी कक्षा में प्रथम आना है। जब वह बच्चा किसी तरह से कक्षा में प्रथम आ जाता है तो हर कोई उसकी प्रशंसा करना शुरू कर देता है। फिर वह भले ही जिन्दगी की सही-सोच-समझ से कितना ही वंचित क्यों न हो? बड़े होने के साथ उसमें अहंकार का रोग बढ़ता जाता है और विवेक कम होता जाता है। इस बारे में जिधर भी आँख उठा कर देखा जाता है, स्थिति एक जैसी ही मिलती है।
  
अहंकार के रोग की खास बात यह है कि यदि व्यक्ति सफल होता जाता है तो उसका अहंकार भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है और वह एक विशाल चट्टान की भाँति जीवन के सुपथ, सत्पथ या आध्यात्मिक पथ को रोक लेता है। इसके विपरीत यदि व्यक्ति असफल हुआ तो उसका अहंकार एक घाव की भाँति रिसने व दुखने लगता है। धीरे-धीरे मन में हीनता की ग्रन्थि बन जाती है, जो सदा-सर्वदा डराती रहती है।
  
सद्विवेक-सद्ज्ञान ही इस अहंकार के रोग की औषधि व उपचार है। सद्विवेक-उद्देश्य व औचित्य के अनुरूप निरन्तर कार्यरत रहने, संघर्षशील होने की प्रेरणा देता है। कार्य की सफलता या विफलता इसे प्रभावित नहीं करती। इसके पहले शान्ति और पीछे आशीर्वाद उमड़ता रहता है। जहाँ कठिन संघर्षों में भी शांति व आशीर्वाद सघन है, समझो वहाँ अहंकार का नामोनिशान नहीं केवल सद्विवेक है।  

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०७

बुधवार, 18 मार्च 2020

👉 भय

न जाने क्यों हर कोई भयभीत है, डरा हुआ है। ज्ञात में, अज्ञात में भय में जी रहा है। उठते, बैठते, सोते, जागते भय बना हुआ है। हर कर्म में, भाव में, विचार-व्यवहार में भय है। प्रेम में, घृणा में, पुण्य में, पाप में, सब में एक अनजाने भय ने अपनी पैठ बना ली है। कुछ इस तरह जैसे कि हमारी पूरी चेतना भय से बनी व गढ़ी है। हम सबके विश्वास-धारणाएँ, यहाँ तक कि धर्म और ईश्वर को हमने भय की भ्रान्ति से ढँक रखा है।
  
इस भय का मूल क्या है? इस एक प्रश्न के उत्तर यूँ तो अनेक मिल जाएँगें, लेकिन इसका मौलिक और एक मात्र सटीक उत्तर है - भय का मूल कारण है मृत्यु। हमारे मिट जाने की, न होने की सम्भावना ही सारे भय की जड़ है। भय का मतलब ही है, अपने न होने की, मिट जाने की, समाप्त हो जाने की आशंका। इस आशंका से बचने की कोशिश सारे जीवन चलती है। पर पूरे जीवन दौड़-भाग की भी स्थिति यथावत बनी रहती है। ठीक समय पर मृत्यु का पल आ ही जाता है।
  
दरअसल मृत्यु का भय भी जीवन को खोने का भय है। जो ज्ञात है, उसके खो-जाने का भय है। मेरा शरीर-मेरी सम्पत्ति, मेरा यश, मेरी प्रतिष्ठा, मेरे सम्बन्ध, मेरे संस्कार, मेरे विश्वास, मेरे विचार यही मेरे ‘‘मैं’’ के प्राण बन गए हैं। यही मैं हो गया है। मृत्यु इस ‘मैं’ को छीन लेगी, यह भय है। परन्तु यथार्थ में यह भय एक भ्रान्ति के सिवा और कुछ भी नहीं क्योंकि जिसे हम मैं कहते, सुनते और समझते हैं, वही झूठ है।
  
इस झूठ को हटा कर, सत्य को अनुभव करना हो तो सभी झूठे तादात्म्य को तोड़ना होगा। यदि हम उन सभी तथ्यों के प्रति जागरुक हो गए, जिसे अब तक मैं के रूप में समझते रहे हैं, तो तादात्म्य की भ्रान्ति टूटने लगेगी और अनुभव होगा सच्चे मैं का। जिसे कभी कोई मिटा नहीं सकता। इस सच्चे मैं की अनुभूति में ही भय से सम्पूर्ण मुक्ति है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०६

सोमवार, 16 मार्च 2020

👉 श्रद्धा

श्रद्धा- भावों का उच्छृंखल आवेग न होकर भावऊर्जा का सकारात्मक एवं समर्थ स्रोत है। एक ऐसा ऊर्जा स्रोत जो जीवन के विविध आयामों को अनूठी चैतन्य ऊर्जा से सदा ऊर्जावान् बनाए रखती है। इतना ही नहीं श्रद्धा से श्रद्धावान् की जिन्दगी के सभी पहलुओं को स्वयं ही समर्थ एवं सक्षम सुरक्षा मिलती रहती है। उसके सद्गुरु, उसके आराध्य जिनके प्रति वह श्रद्धा पूर्ण है, उसके जीवन में हमेशा सक्षम प्रहरी की भाँति डटे रहते हैं।
  
इस सम्बन्ध में बड़ी हृदयस्पर्शी घटना है। कुछ सदी पहले जब नादिरशाह ने हिन्दुस्तान पर हमला किया, उस समय दिल्ली से कुछ दूर ग्रामीण इलाके में सूफी फकीर सलीम दरवेश अपनी आत्मसाधना में लीन थे। निरन्तर तप करते हुए परवरदिगार की सच्चे हृदय से इबादत और गाँव के लोगों में श्रद्धा एवं सद्विचार का संचार यही उनका नित्य का क्रम था। नादिरशाह के हमले की खबर, उसकी क्रूरता के कारनामें इन भोले-भाले ग्रामीण जनों तक पहुँची और उनमें घबराहट फैल गयी।
  
अब क्या होगा? यही सवाल सबके होठों पर था। वे सबके सब मिल-जुलकर फकीर की झोपड़ी पर पहुँचे। इन पहुँचने वालों में एक युवा शायर भी था। उसके मन की बेचैनी औरों से ज्यादा थी। उसने दर्द भरी लरजती आवाज में कहा-
अंधेरी राज तूफाने तलातुम नाखुदा गाफिल
यह आलम है तो फिर किश्ती, सरे मौजरवां कब तक?
  
अँधेरी रात, खतरनाक तूफान और नाखुदा के रूप में हिन्दुस्तान का बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला जो हमेशा शराब में डूबा रहता है, तो फिर हमारी कश्ती का भविष्य क्या? यह सुनकर फकीर कुछ देर चुप रहे फिर बोले-
अच्छा यकीं नहीं है तो उसे कश्ती डुबोने दे,
एक वही नाखुदा नहीं बुजदिल! खुदा भी है।
और इतिहास गवाह है, उस फकीर की श्रद्धा काम आयी। खुदा के इस नेक बन्दे के समझाने पर नादिरशाह कत्लोगारद छोड़कर वापस लौट गया।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०५

शनिवार, 14 मार्च 2020

👉 संयम

परमात्मा के मार्ग पर चलने के लिए जो उत्सुक होते हैं, वे प्रायः आत्मपीड़न को साधना समझ लेते हैं। उनकी यही भूल उनके जीवन को विषाक्त कर देती है। प्रभु प्राप्ति संसार के निषेध का रूप ले लेती है। इस निषेध के कारण आत्मा की साधना शरीर को नष्ट करने का सरंजाम जुटाने लगती है। इस नकार दृष्टि से उनका जीवन नष्ट होने लगता है। और उन्हें होश भी नहीं आ पाता कि जीवन का विरोध परमात्मा के साक्षात्कार का पर्यायवाची नहीं है।
  
सच्चाई तो यह है कि देह के उत्पीड़क भी देहवादी ही होते हैं। उन्हें आत्मचिन्तन सूझता ही नहीं है। संसार के विरोधी कहीं न कहीं सूक्ष्म रूप से संसार से ही बँधे होते हैं। अनुभव यही कहता है कि संसार के प्रति भोग दृष्टि जितना संसार से बाँधती है, संसार से विरोध दृष्टि भी उससे कुछ कम नहीं, बल्कि उससे कहीं ज्यादा बाँधती है।
  
साधना-संसार व शरीर का विरोध नहीं, बल्कि इनका अतिक्रमण एवं उत्क्रान्ति है। यह दिशा न तो भोग की है और न दमन की है। यह तो इन दोनों दिशाओं से भिन्न एक तीसरी ही दिशा है। यह दिशा आत्मसंयम की है। दोनों बिन्दुओं के बीच मध्य बिन्दु खोज लेना संयम है। पूरी तरह से जो मध्य में है, वही अतिक्रमण या उपरामता है। इन दोनों के पार चले जाना है।
  
भोग या दमन की अति असंयम है, मध्य संयम है। अति विनाश है, मध्य जीवन है। जो अति को पकड़ता है, वह नष्ट हो जाता है। भोग हो या दमन दोनों ही जीवन को नष्ट कर देते हैं। अति ही अज्ञान है, यही अन्धकार है, यही विनाश है। जो इस सच को जान जाता है वह भोग और दमन दोनों को ही छोड़ देता है। ऐसा करते ही उसके सब तनाव स्वाभाविक ही विलीन हो जाते हैं। उसे अनायास ही मिल जाता है- स्वाभाविक, सहज एवं स्वस्थ जीवन। संयम को उपलब्ध होते ही जीवन शान्त व निर्भार हो जाता है। उसकी मुस्कराहट कभी मुरझाती नहीं। जिसने स्वयं में संयम की समझ पैदा कर ली वह खुशियों की खिलखिलाहट से भर उठता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०४

शुक्रवार, 13 मार्च 2020

👉 जीवन का सत्य


जीवन की नश्वरता को जो जान लेते हैं, वे सत्य को समझ लेते हैं। जिन्हें भी सत्य की अनुभूति हुई है, उन सबने यही कहा है कि जीवन झाग का बुलबुला है। जो इस घड़ी है, अगली घड़ी मिट जाएगा। जो इस नश्वर को शाश्वत मान लेते हैं, वे इसी में डूबते और नष्ट हो जाते हैं। लेकिन जो इसके सत्य के प्रति सजग होते हैं, वे एक ऐसे जीवन को पा लेने की शुरुआत करते हैं, जिसका कोई अन्त नहीं है।
  
जीवन के इस सत्य का अनुभव करने वाले एक फकीर को किसी बादशाह ने कैद कर लिया। कैद की वजह यह थी कि उसने बादशाद के सामने सत्य बातें कह दी थीं। बादशाह को फकीर का कहा हुआ सच अप्रिय लगा, सो उसने उसे कैद कर लिया। उस फकीर के एक मित्र ने उससे कहा- आखिर यह बैठे-बिठाये मुसीबत क्यों मोल ले ली। न कहते वे सब बातें, तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता। अपने मित्र की बातें सुनकर फकीर हँस पड़ा और बोला- मैं करूँ भी तो क्या? जब से खुदा का दीदार हुआ है, तब से झूठ बेमानी हो गया है। कोशिश करने पर भी झूठ बोला ही नहीं जाता।
  
परमात्मा की सत्ता ही कुछ ऐसी है कि उसे अनुभव करने के बाद असत्य का ख्याल ही नहीं आता। सत्य के अतिरिक्त अब जीवन में कोई विकल्प नहीं है। फिर-इस कैद का क्या? यह कैद तो बस घड़ी भर की है। फकीर की कही हुई यह बात  जेल के किसी सिपाही ने सुन ली और बादशाह को बता भी दी। इसे सुनकर उस बादशाह ने कहा- उस पागल फकीर से कहना कि यह कैद घड़ी भर की नहीं, बल्कि जीवन भर की है। फकीर ने जब बादशाह के इस कथन को सुना तो जोर से हँस पड़ा और बोला- अरे भाई! उस बादशाह से कहना कि उस पागल फकीर ने कहा है कि क्या जिन्दगी घड़ी भर से ज्यादा की है? सचमुच ही जो जीवन का सत्य पाना चाहते हैं उन्हें जीवन की यह सच्चाई जाननी ही पड़ती है। इसे समझकर वे अनुभव कर पाते हैं कि एक स्वप्न से अधिक न तो जीवन की कोई सत्ता है और न ही जीवन का सत्य।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०३

रविवार, 8 मार्च 2020

👉 प्रवाह

प्रवाह इसीलिए है, ताकि पूर्णता पायी जा सके। इस जगत् में जड़ हो या फिर चेतन सभी जाने-अनजाने प्रवाहित हो रहे हैं। काल के किनारों के सहारे सब के सब बहे जा रहे हैं। सृजन, स्थिति, विलय के पड़ावों को पार करता हुआ जड़ जगत् प्रवाहित है। जन्म, बचपन, यौवन, व जरावस्था के पड़ावों को पार करते हुए चेतन जगत् की चैतन्यता भी प्रवाहमान है। गहराई से देखा जाय तो ठहराव व स्थिरता कहीं दिखाई ही नहीं देती। बाबा फरीद शेख यही सोचते हुए सुबह घूम कर लौट रहे थे।
  
लौटते समय उन्होंने नदी तट पर छोटे से झरने का मिलना देखा। राह के सूखे पत्तों को हटाकर वह छोटा सा झरना भागकर नदी से मिल रहा था। उसकी दौड़ फिर नदी में उसका आनन्दपूर्ण मिलन। फिर उन्होंने देखा अरे यह नदी भी तो भाग रही है, सागर से मिलने के लिए, असीम में खोने के लिए। पूर्ण को पाने के लिए यह समस्त जीवन और जगत् राह के सूखे और मृत पत्तों को हटाता हुआ, भागा जा रहा है।
  
क्योंकि सीमा में संताप है, अपूर्णता में अतृप्ति है। बूँद में दुःख है, सुख तो सागर की सम्पूर्णता में है। मनुष्य के सभी दुःखों का कारण उसका अहं की बूंद पर अटक जाना है। इस अटकन के कारण ही वह जीवन के अनन्त प्रवाह से खण्डित हो गया है। इस भाँति वह अपने ही हाथों सूरज को खोकर दीये की धुँधली लौ में तृप्ति खोजने के चक्कर में परेशान है। यहाँ न तो उसे तृप्ति मिल सकती है, और न ही परेशानी मिट सकती है। क्योंकि बूंद- बूंद बनी रहकर कैसे तृप्त हो सकती है। तृप्ति के लिए तो उसे सागर की सम्पूर्णता की ओर बहना होगा।
  
प्रवाहित हुए बिना न तो प्रसन्नता है और न पूर्णता। प्रसन्नता और पूर्णता की अनुभूति पाने के लिए बूंद को मिटना होगा- बहना होगा। उसे सागर की ओर प्रवाहित होकर सागर में मिलना होगा। अहं में अटके-भटके मनुष्य को भी जीवन की धारा में प्रवाहित होकर अनन्त ब्रह्म बनना होगा। अहं प्रवाह में विलीन हो ब्रह्म बने, तभी संतृप्ति व सम्पूर्णता सम्भव है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०२

👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य ...