बुधवार, 18 मार्च 2020

👉 भय

न जाने क्यों हर कोई भयभीत है, डरा हुआ है। ज्ञात में, अज्ञात में भय में जी रहा है। उठते, बैठते, सोते, जागते भय बना हुआ है। हर कर्म में, भाव में, विचार-व्यवहार में भय है। प्रेम में, घृणा में, पुण्य में, पाप में, सब में एक अनजाने भय ने अपनी पैठ बना ली है। कुछ इस तरह जैसे कि हमारी पूरी चेतना भय से बनी व गढ़ी है। हम सबके विश्वास-धारणाएँ, यहाँ तक कि धर्म और ईश्वर को हमने भय की भ्रान्ति से ढँक रखा है।
  
इस भय का मूल क्या है? इस एक प्रश्न के उत्तर यूँ तो अनेक मिल जाएँगें, लेकिन इसका मौलिक और एक मात्र सटीक उत्तर है - भय का मूल कारण है मृत्यु। हमारे मिट जाने की, न होने की सम्भावना ही सारे भय की जड़ है। भय का मतलब ही है, अपने न होने की, मिट जाने की, समाप्त हो जाने की आशंका। इस आशंका से बचने की कोशिश सारे जीवन चलती है। पर पूरे जीवन दौड़-भाग की भी स्थिति यथावत बनी रहती है। ठीक समय पर मृत्यु का पल आ ही जाता है।
  
दरअसल मृत्यु का भय भी जीवन को खोने का भय है। जो ज्ञात है, उसके खो-जाने का भय है। मेरा शरीर-मेरी सम्पत्ति, मेरा यश, मेरी प्रतिष्ठा, मेरे सम्बन्ध, मेरे संस्कार, मेरे विश्वास, मेरे विचार यही मेरे ‘‘मैं’’ के प्राण बन गए हैं। यही मैं हो गया है। मृत्यु इस ‘मैं’ को छीन लेगी, यह भय है। परन्तु यथार्थ में यह भय एक भ्रान्ति के सिवा और कुछ भी नहीं क्योंकि जिसे हम मैं कहते, सुनते और समझते हैं, वही झूठ है।
  
इस झूठ को हटा कर, सत्य को अनुभव करना हो तो सभी झूठे तादात्म्य को तोड़ना होगा। यदि हम उन सभी तथ्यों के प्रति जागरुक हो गए, जिसे अब तक मैं के रूप में समझते रहे हैं, तो तादात्म्य की भ्रान्ति टूटने लगेगी और अनुभव होगा सच्चे मैं का। जिसे कभी कोई मिटा नहीं सकता। इस सच्चे मैं की अनुभूति में ही भय से सम्पूर्ण मुक्ति है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०६

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ७)

पिता के प्रति पुत्र के तीन कर्त्तव्य हैं - 1-स्नेह, 2-सम्मान तथा आज्ञा पालन। जिस युवक ने पिता का, प्रत्येक बुजुर्ग का आदर करना सीखा है, ...