सोमवार, 13 नवंबर 2017

👉 आत्मोन्नति के चार आधार (भाग 4)

🔶 साधना—साधना का अर्थ है कि अपने गुण, कर्म, स्वभाव को साध लेना। वस्तुतः मनुष्य चौरासी लाख योनियों को घूमते-घूमते उन सारे के सारे प्राणियों के कुसंस्कार अपने भीतर जमा करके ले आया है, जो मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक नहीं हैं, बल्कि हानिकारक है। तो भी वे स्वभाव के अंग बन गए हैं और हम मनुष्य होते हुए भी पशु-संस्कारों से प्रेरित रहते हैं और पशु-प्रवृत्तियों को बहुधा अपने जीवन में कार्यान्वित करते रहते है। इस अनगढ़पन को ठीक कर लेना, सुगढ़पन का अपने भीतर से विकास कर लेना ,, सुगढ़पन का अपने भीतर से विकास कर लेना, कुसंस्कारों को जो पिछली योनियों के कारण हमारे भीतर जमे हुए हैं, उनको निरस्त कर देना और अपना स्वभाव इस तरह का बना लेना जिसको हम मानवोचित कह सकें—साधना है।
         
🔷 साधना के लिए हमको वही क्रियाकलाप अपनाने पड़ते हैं, जो कि कुसंस्कारी घोड़े व बैल को सुधारने के लिए उसके मालिकों को करने पड़ते हैं—हल में चलने के लिए और गाड़ी में चलने के लिए। कुसंस्कारों को दूर करने के लिए हमको लगभग उसी तरह के प्रयत्न करने पड़ते हैं जैसे कि सरकस के पशुओं को पालते हुए उन्हें इस लायक बनाते हैं कि वे सरकस में तमाशा दिखा सकें ।। इसी तरह के प्रयत्न हमको अपने गुण, कर्म, स्वभाव के विकास के, परिष्कार के लिए करने पड़ते हैं।
 
🔶 कच्ची धातुओं को जिस तरीके से आग में तपा करके उनको शुद्ध-परिष्कृत बनाया जाता है, जेवर-आभूषण बनाए जाते हैं, उसी तरीके से हमारा कच्चा जीवन, कुसंस्कारी जीवन को ढाल करके ऐसा सभ्य और ऐसा सुसंस्कृत बनाया जाए कि हम ढली हुई धातु के आभूषण के तरीके से, औजार-हथियार के तरीके से दिखाई पड़े। जंगली झाड़ियों को काटकर के माली लोग अच्छे-अच्छे झाड़ और खूबसूरत पार्क बना देते हैं। हमको भी अपने झाड़-झंखाड़ जैसे जीवन को परिष्कृत करके, काट-छाँट करके, समुन्नत करके इस लायक बनाना चाहिए कि जिसको कहा जा सके कि वह सभ्य और सुसंस्कृत जीवन है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Prepare Yourself to Receive God's Grace

🔶 Someone had left two tubs out in the open. One was facing up, the other was facing down. Rains came and filled the tub with its face up. The other one, facing down remained totally empty. The empty tub was furious. He cursed the other tub as well as the rain. The rain told him, "Don't be upset. I am not prejudiced. I provide water everywhere. The fault is entirely yours. If you turn your face up, I will fill you with water as well."  

🔷 The tub got the point and accepted his mistake. Telling this story to his disciples a monk said, "Just like rains, God's grace is showering down everywhere. We must prepare ourselves to receive it by performing Upasana. Worship is not begging for alms, it is about preparing oneself to receive the grace of God.

📖 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Nov 2017

🔶 अच्छे वस्त्रों का आदर होता है, अपनी अवस्था और हैसियत के अनुसार साफ -सुन्दर कपड़े पहनने उचित और न्याय संगत हैं। इनसे आपका व्यक्तित्व निखर उठता है, गुप्त शक्तियाँ जाग्रत हो उठती हैं, मनुष्य अपने आपको दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, पहला प्रभाव अच्छे कपड़ों का ही पड़ता है। अज्ञात स्थान में, जहाँ कोई नहीं जानता कि आप क्या है, आपके वस्त्र ही आपके सहायक होते हैं। सफर में अच्छे कपड़े पहनने की सलाह इसी लिए दी जाती है। वेशभूषा और वस्त्र आपके चरित्र की विषय सूची की भाँति हैं।

🔷 स्वर्ग एक उपलब्धि मानी गई है। जिसे प्राप्त करने की इच्छा प्रायः हर मनुष्य को रहती है। कई लोग उसे संसार से अलग भी मानते हैं और विश्वास करते हैं कि मरने के बाद वहाँ पहुँचा जाता है या पहुँचा जा सकता है। इस मान्यता के अनुसार लोग स्वर्ग प्राप्त करने के लिए जप, तप, पूजा,पाठ, पुण्य, परमार्थ और साधना, उपासना भी करते हैं। वैसे इस पृथ्वी से अलग अन्यान्तर लोक में स्वर्ग जैसे किसी स्थान का अस्तित्व है अथवा नहीं, यह विवाद का विषय है। पर उसे प्राप्त करने की इच्छा मनुष्य के आगे बढ़ने की आकांक्षा का द्योतक है, जिसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।

🔶 हमारे भोगों, उपलब्धियों और प्रवृत्तियों के एकमात्र सूत्र संचालक हमारे स्वयं के कर्म ही हैं। तब फिर देवताओं और विधाता को प्रसन्न करने की चिन्ता करते रहना कहाँ की बुद्धिमत्ता है? हमारा साध्य और असाध्य तो कर्म ही है। वही वन्दनीय-अभिवन्दनीय है, वही वरण और आचरण के योग्य है। दैवी विधान भी उससे भिन्न और उसके विरुद्ध कुछ कभी नहीं करता। कर्म ही सर्वोपरि है। परिस्थितियों और मनःस्थितियों का वही निर्माता है। उसी की साधना से अभीष्ट की उलपब्धि सम्भव है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...