मंगलवार, 2 जनवरी 2018

👉 आकर्षक व्यक्तित्व बनाइये

🔷 सद्भावनायुक्त नागरिक ही आपको सामाजिक प्रतिष्ठा और मान-सम्मान देने वाले हैं। उनके दृष्टिकोण एवं विचारधारा पर आपकी सफलता अवलम्बित है। जैसा आपके आसपास वाले समझते हैं, वैसे ही वास्तव में आप हैं। समाज में आपके प्रत्येक कार्य की सूक्ष्म अलक्षित तरंगें निकला करती हैं, जो दूसरों पर प्रभाव डालती हैं।

🔶 भलाई, शराफत आदि सद्व्यहार वह धन है जो रात-दिन बढ़ता है। यदि दैनिक व्यवहार में आप यह नियम बना लें कि हम जिन लोगों के सम्पर्क में आयेंगे, उनके साथ सद्भावनायुक्त व्यवहार करेंगे, तो स्मरण रखिये आपके मित्र और हितैषियों की संख्या बढ़ती ही जायेगी। आप दूसरों को जितना प्रेम उदारता और सहानुभूति दिखलायेंगे, उनसे दस गुनी उदारता और सहानुभूति प्राप्त करेंगे। सद्व्यवहार दूसरे के अहं भाव की रक्षा करना वह आकर्षण है, जो दूर तक अपना प्रभाव डालता है। धीरे-धीरे उदारता मनुष्य के चरित्र का एक आवश्यक गुण बन जाती है। उदार मनुष्य दूसरों से प्रेम अपने स्वार्थ साधन के हेतु नहीं करता वरन् उनके कल्याण के लिए करता है। उदार व्यक्ति में प्रेम सेवा का रूप धारण कर लेता है। उदार व्यक्ति दूसरे के दु:ख से स्वयं दु:खी होता है। उसे अपने दु:ख-सुख की उतनी अहं की रक्षा करना चाहता है। सभी में कुछ न कुछ मात्रा में गर्व, मान अपने आप को बहुत श्रेष्ठ समझने की उच्च भावना है। अपने को सज्जन, उच्चतम, पवित्र, ईमानदार, सच्चा, बहादुर, कुलीन समझता है। अपनी समझदारी तर्क शक्ति, ज्ञान, पूर्णता उच्चता में नगण्य से नगण्य व्यक्ति को विश्वास है।
  
🔷 किसी से यह न कहिए कि तुम नीच हो, तुममें  समझदारी, ज्ञान, सतर्कता, नहीं है। तुम कठोर, कमजोर, दुर्बल, डरपोक हो और सोचने-समझने की भी शक्ति नहीं है। इस तरह के नकारात्मक अभावयुक्त शब्द अपने विषय में कोई भी सुनना पसन्द नहीं करता। दूसरों के गर्व को चूर्ण करने वाले ऐसे अनेक शब्द पारस्परिक वैमनस्य, कटुता, शत्रुता और लड़ाई के कारण बनते हैं। दूसरों से इस प्रकार चर्चा करनी कीजिए कि जिससे उसके सम्मान और गर्व की रक्षा होती चले। वह यह अनुभव करे कि आप उसकी इज्जत करते हैं, उसकी राय की कद्र व इज्जत करते हैं, उससे कुछ सीखना चाहते हैं। यदि किसी व्यक्ति के मन पर अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से यह बात बैठ जाय कि आप उसका सम्मान करते हैं, तो वह सदैव आपकी प्रतिष्ठा करता रहेगा।
  
🔶 आप लोगों की प्रशंसा, अभिवादन करना सीखें। प्रशंसा इस प्रकार से की जाय कि दूसरा यह न समझ सके कि उसे बनाया जा रहा है। प्रशंसा से दूसरा अत्यन्त उत्साहित होता है तथा अपना हृदय खोलकर रख देता है। जितना ही मनुष्य दूसरे की प्रशंसा करता है, उतनी ही उसमें अच्छा काम करने की शक्ति आती है, यहाँ तक कि कुछ समय के पश्चात् आपको अप्रत्यक्ष रूप से वह प्रेम करने लगता है। गुण-ग्राहक बनिए। दूसरों में जो उत्तम बातें हैं, उसे व्यवहार में लाने के लिए अवसर ताकिए। तनिक-सी गुण-ग्राहकता से दूसरा व्यक्ति एकदम आपकी ओर आकर्षित हो जाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक नियम है कि जब दूसरा देखता है, आप उसमें दिलचस्पी व उसकी महत्ता स्वीकार कर रहे हैं, गुणों की तारीफ कर रहे हैं, तो वह अनायास ही आपसे प्रभावित हो जाता है। सम्भव है कि कोई किसी समय हतोत्साहित हो रहा हो और आपकी गुण ग्राहकता से उसका टूटता साहस पुन: जाग्रत्ï हो जाय और इस कारण वह आपकी ओर आकर्षित हो। जब हम लोगों को गुणग्राहक दृष्टि से निरीक्षण करने लगते हैं तो हर प्राणी में कितनी ही अच्छाइयाँ, उत्तमताएँ और विशेषताएँ दीख पड़ती हैं।  गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 2 Jan 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Jan 2018

👉 बड़ा बनना है तो बड़ा सोचो

🔶 एक बार एक बहुत गरीब परिवार का बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में किसी दूसरे शहर जाने के लिए रेलगाड़ी से सफ़र कर रहा था। घर में कभी-कभार ही सब्जी बनती थी, इसलिए उसने रास्ते में खाने के लिए सिर्फ रोटियां ही रखी थी।

🔷 आधा रास्ता गुजर जाने के बाद उसे भूख लगने लगी, और वह टिफिन में से रोटियां निकाल कर खाने लगा। उसके खाने का तरीका कुछ अजीब था, वह रोटी का एक टुकड़ा लेता और उसे टिफिन के अन्दर कुछ ऐसे डालता मानो रोटी के साथ कुछ और भी खा रहा हो, जबकि उसके पास तो सिर्फ रोटियां ही थीं!

🔶 उसकी इस हरकत को आस पास के और दूसरे यात्री देख कर हैरान हो रहे थे। वह युवक हर बार रोटी का एक टुकड़ा लेता और झूठमूठ का टिफिन में डालता और खाता। सभी सोच रहे थे कि आखिर वह युवक ऐसा क्यों कर रहा था। आखिरकार एक व्यक्ति से रहा नहीं गया और उसने उससे पूछ ही लिया कि भैया तुम ऐसा क्यों कर रहे हो, तुम्हारे पास सब्जी तो है ही नहीं, फिर रोटी के टुकड़े को हर बार खाली टिफिन में डालकर ऐसे खा रहे हो मानो उसमे सब्जी हो।

🔷 तब उस युवक ने जवाब दिया, “भैया , इस खाली ढक्कन में सब्जी नहीं है लेकिन मै अपने मन में यह सोच कर खा रहा हूँ कि इसमें बहुत सारा आचार है, मै आचार के साथ रोटी खा रहा हूँ।”

🔶 फिर व्यक्ति ने पूछा, “खाली ढक्कन में आचार सोच कर सूखी रोटी को खा रहे हो तो क्या तुम्हे आचार का स्वाद आ रहा है?”

🔷 “हाँ, बिलकुल आ रहा है, मै रोटी के साथ अचार सोचकर खा रहा हूँ और मुझे बहुत अच्छा भी लग रहा है।”, युवक ने जवाब दिया।

🔶 उसकी इस बात को आसपास के यात्रियों ने भी सुना, और उन्ही में से एक व्यक्ति बोला, “कि भाई! जब तुम्हे सोचना ही था तो तुम आचार की जगह पर कुछ अच्छी सी सब्जी सोचते जैसे, मटर पनीर, शाही पनीर, मलाई कोफ्ता आदि ….तुम्हे इनका स्वाद भी मिल जाता। तुम्हारे कहने के मुताबिक तुमने आचार सोचा तो तुम्हे आचार का स्वाद आया तो अगर तुम और स्वादिष्ट चीजों के बारे में सोचते तो उनका स्वाद भी तुम्हे आता। जब सोचना ही था तो भला छोटा क्यों सोचो बड़ा क्यों नहीं, तुम्हे तो बड़ा सोचना चाहिए था।”

🔷 मित्रों, ये बात हमारी ज़िंदगी के हर पल में लागू होती है। हम जैसा सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं और फिर हमें वैसे ही आनंद आने लगता है। कभी कभी हम बहुत छोटा सोचते हैं और हम उसी के अनुसार कार्य करने लग जाते हैं। बाद में जब वक़्त गुजर जाता है तो हमें एहसास होता है कि अगर हमने थोड़ा और बड़ा और बेहतर सोचा होता तो शायद ज़िंदगी बदल भी सकती थी।

🔶 इसलिए मित्रों, हमेशा बड़े सपने देखो , बड़ा सोचो , बड़े लक्ष्य बनाओ। जब हमारी सोच बड़ी होगी तभी हम कुछ बड़ा कर सकते हैं और तभी हमें कुछ बड़ा मिलेगा।

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...