गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

👉 ‘उपासना’ की सफलता ‘साधना’ पर निर्भर है। (भाग 1)

🔷 आत्मिक प्रगति के पथ पर चलते हुए अनेक व्यक्ति एक ही मन्त्र से-एक ही पूजा विधान से-एक जितने समय तक ही उपासना करते हैं पर उनमें से कोई सफल होता है कोई असफल। किसी को तुरन्त परिणाम दिखाई पड़ता है किसी को मुद्दतें बीत जाने पर भी कोई सफलता दृष्टि-गोचर नहीं होती। इसका क्या कारण है? यह मैंने गुरुदेव से और भी स्पष्ट रूप से पूछा। कारण कि इन दिनों मुझे ही डाक का उत्तर देना पड़ता है और उनमें ऐसे पत्र भी कम नहीं होते जो बताये हुए विधान से उपासना करते हुए बहुत दिन हो जाने पर भी कुछ परिणाम न मिलने से असन्तुष्ट है। इस कठिनाई का उत्तर गुरुदेव के मुख से जो निकला उसका साराँश नीचे की पंक्तियों में प्रस्तुत किया जाता है।

🔶 ‘आत्मिक प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ा व्यवधान उन कुसंस्कारों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो दुर्भावों और दुष्कर्मों के रूप में मनोभूमि पर छाये रहते हैं। आकाश में बादल छाये हों तो फिर मध्याह्न काल का सूर्य यथावत् उदय रहते हुए भी अन्धकार ही छाया रहेगा। जप-तप करते हुए भी आध्यात्मिक सफलता न मिलने कारण एक ही है- मनोभूमि का कुसंस्कारी होना। साधना का थोड़ा-सा गंगाजल इस गन्दे नाले में गिरकर अपनी महत्ता खो बैठता है- नाले को शुद्ध कर सकना सम्भव नहीं होता। बेशक तीव्र गंगा प्रवाह में थोड़ी-सी गन्दगी भी शुद्धता में परिणत हो जाती है। पर साथ ही यह भी सच है कि सड़ांद भरी गन्दी गटर को थोड़ा-सा गंगा जल शुद्ध कर सकने में असमर्थ असफल रहेगा।

🔷 सफलता की अपनी महिमा और महत्ता है उसे गंगा-जल से कम नहीं अधिक ही महत्व दिया जा सकता है पर साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि वह सर्व समर्थ नहीं है। गंगा जल से बनी हुई मदिरा अथवा गंगा जल में पकाया हुआ माँस शुद्ध नहीं गिने जायेंगे। शौचालय में प्रयुक्त होने के उपरान्त का गंगा जल का भरा पात्र देव प्रतिमा पर चढ़ाने योग्य न रहेगा। गंगा जल की शास्त्र प्रतिपादित महत्ता यथावत बनी रहे इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि उसके संग्रह उपकरण एवं स्थान की पवित्रता भी अक्षुण्य बनी रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 7

👉 माँ बाप का कर्ज

🔷 एक बेटा पढ़-लिख कर बहुत बड़ा आदमी बन गया। पिता के स्वर्गवास के बाद माँ ने हर तरह का काम करके उसे इस काबिल बना दिया था। शादी के बाद पत्नी को माँ से शिकायत रहने लगी के वो उन के स्टेटस मे फिट नहीं है। लोगों को बताने मे उन्हें संकोच होता की ये अनपढ़ उनकी सास-माँ है।

🔶 बात बढ़ने पर बेटे ने एक दिन माँ से कहा- " माँ ”_मै चाहता हूँ कि मै अब इस काबिल हो गया हूँ कि कोई भी कर्ज अदा कर सकता हूँ। मै और तुम दोनों सुखी रहें इसलिए आज तुम मुझ पर किये गए अब तक के सारे खर्च सूद और व्याज के साथ मिला कर बता दो। मै वो अदा कर दूंगा। फिर हम अलग-अलग सुखी रहेंगे।

🔷 माँ ने सोच कर उत्तर दिया - "बेटा” हिसाब ज़रा लम्बा है, सोच कर बताना पडेगा। मुझे थोडा वक्त चाहिए।"

🔶 बेटे ना कहा - " माँ _कोई ज़ल्दी नहीं है। दो-चार दिनों मे बात देना।"

🔷 रात हुई, सब सो गए। माँ ने एक लोटे मे पानी लिया और बेटे के कमरे मे आई। बेटा जहाँ सो रहा था उसके एक ओर पानी डाल दिया। बेटे ने करवट ले ली। माँ ने दूसरी ओर भी पानी डाल दिया। बेटे ने जिस ओर भी करवट ली_माँ उसी ओर पानी डालती रही तब परेशान होकर बेटा उठ कर खीज कर बोला कि माँ ये क्या है? मेरे पूरे बिस्तर को पानी-पानी क्यूँ कर डाला...?

🔶 माँ बोली- " बेटा, तुने मुझसे पूरी ज़िन्दगी का हिसाब बनानें को कहा था। मै अभी ये हिसाब लगा रही थी कि मैंने कितनी रातें तेरे बचपन मे तेरे बिस्तर गीला कर देने से जागते हुए काटीं हैं। ये तो पहली रात है ओर तू अभी से घबरा गया...? मैंने अभी हिसाब तो शुरू भी नहीं किया है जिसे तू अदा कर पाए।"

🔷 माँ कि इस बात ने बेटे के ह्रदय को झगझोड़ के रख दिया। फिर वो रात उसने सोचने मे ही गुज़ार दी। उसे ये अहसास हो गया था कि माँ का क़र्ज़ आजीवन नहीं उतरा जा सकता।

🔶 माँ अगर शीतल छाया है पिता बरगद है जिसके नीचे बेटा उन्मुक्त भाव से जीवन बिताता है। माता अगर अपनी संतान के लिए हर दुःख उठाने को तैयार रहती है तो पिता सारे जीवन उन्हें पीता ही रहता है।

🔷 माँ बाप का कर्ज कभी अदा नहीं किया जा सकता। हम तो बस उनके किये गए कार्यों को आगे बढ़ा कर अपने हित मे काम कर रहे हैं।

🔶 आखिर हमें भी तो अपने बच्चों से वही चाहिए ना!!!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 9 Feb 2018


👉 उसे जड़ में नहीं, चेतन में खोजें

🔶 समझा जाता है कि विधाता ही मात्र निर्माता है। ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता नहीं हिलता। दोनों प्रतिपादनों से भ्रमग्रस्त न होना हो, तो उसके साथ ही इतना और जोडऩा चाहिए कि उस विधाता या ईश्वर से मिलने-निवेदन करने का सबसे निकटवर्ती स्थान अपना अंत:करण ही है। यों ईश्वर सर्वव्यापी है और उसे कहीं भी अवस्थित माना, देखा जा सकता है; पर यदि दूरवर्ती भाग-दौड़ करने से बचना हो और कस्तूरी वाले मृग की तरह निरर्थक न भटकना हो, तो अपना ही अंत:करण टटोलना चाहिए। उसी पर्दे के पीछे बैठे परमात्मा को जी भरकर देखने की, हृदय खोलकर मिलने-लिपटने की अभिलाषा सहज ही पूरी कर लेनी चाहिए।
  
🔷 ईश्वर जड़ नहीं, चेतन है। उसे प्रतिमाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता है। चेतना वस्तुत: चेतना के साथ ही, दूध पानी की तरह घुल-मिल सकती है। मानवीय अंत:करण ही ईश्वर का सबसे निकटवर्ती और सुनिश्चित स्थान हो सकता है। ईश्वर  दर्शन, साक्षात्कार, प्रभु सान्निध्य जैसी उच्च स्थिति का रसास्वादन जिन्हें वस्तुत: करना हो, उन्हें बाहरी दुनिया की ओर से आँखें बंद करके अपने ही अंतराल में प्रवेश करना चाहिए और देखना चाहिए कि जिसको पाने, देखने के लिए अत्यंत कष्टï-साध्य और श्रम-साध्य प्रयत्न किये जा रहे थे, वह तो अत्यंत ही निकटवर्ती स्थान पर विराजमान-विद्यमान है। सरलता को कठिन बनाकर रख लेना, यह शीर्षासन लगाना भी तो मनुष्य की इच्छा और चेष्टïा पर निर्भर है। अंतराल में रहने वाला परमेश्वर ही वस्तुत: उस क्षमता से सम्पन्न है, जिससे अभीष्टï वरदान पाना और निहाल बन सकना संभव हो सकता है। बाहर के लोग या देवता, या तो अंत:स्थित चेतना का स्मरण दिला सकते हैं अथवा किसी प्रकार मन को बहलाने के माध्यम बन सकते हैं।
  
🔶 मंदिर बनाने के लिए एक भक्त जन ने सूफी संत से मंदिर की रूपरेखा बना देने के लिए अनुरोध किया। उन्होंने अत्यंत गंभीरता से कहा- इमारत अपनी इच्छानुरूप कारीगरों की सलाह से बजट के अनुरूप बना लो; पर एक बात मेरी मानो, उसमें प्रतिमा के स्थान पर एक विशालकाय दर्पण ही प्रतिष्ठिïत करना, ताकि उसमें अपनी छवि देखकर दर्शकों को वास्तविकता का बोध हो सके।
  
🔷 भक्त को कुछ का कुछ सुझाने वाली सस्ती भावुकता से छुटकारा मिला। उसने एक बड़ा हाल बनाकर सचमुच ही ऐसे स्थान पर एक बड़ा दर्पण प्रतिष्ठिïत कर दिया, जिसे देखकर दर्शक अपने भीतर के भगवान्ï को देखने और उसे निखारने, उबारने का प्रयत्न करते रह सकें।
  
🔶 मन:शास्त्र के विज्ञानी कहते हैं कि मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही करता है एवं वैसा ही बन जाता है। किए हुए भले-बुरे कर्म ही संकट एवं सौभाग्य बनकर सामने आते हैं। उन्हीं के आधार पर रोने-हँसने का संयोग आ धमकता है। इसलिए परिस्थितियों की अनुकूलता और बाहरी सहायता प्राप्त करने की फिराक में फिरने की अपेक्षा, यह हजार दर्जे अच्छा है कि भावना, मान्यता, आकांक्षा, विचारणा और गतिविधियों को परिष्कृत किया जाय। नया साहस जुटाकर, नया कार्यक्रम बनाकर प्रयत्नरत हुआ जाय और अपने बोए हुए को काटने के सुनिश्चित तथ्य पर विश्वास किया जाय। बिना भटकाव का, यही एक सुनिश्चित मार्ग है।
  
🔷 अध्यात्मवेत्ता भी तर्क, तथ्य, प्रमाण और उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि मनुष्य अपने स्वरूप को, सत्ता एवं महत्ता को, लक्ष्य एवं मार्ग को भूलकर ही आये दिन असंख्य विपत्तियों में फँसता है। यदि अपने को सुधार ले, तो अपना सुधरा हुआ प्रतिबिम्ब ही व्यक्तियों और परिस्थितियों में झलकता, चमकता दिखाई पडऩे लगेगा। शालीनता सम्पन्नों को, सज्जनों को, उच्चस्तरीय प्रतिभाओं के साथ जुडऩे और महत्त्वपूर्ण सहयोग प्राप्त कर सकने का समुचित लाभ मिलता है।  

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यानयोग की सफलता शान्त मनःस्थिति पर निर्भर है (भाग 2)

🔶 मन मस्तिष्क के बारे में भी यही बात है। उसमें हलचलें चल रही होगी, तरह-तरह के विचार उठ रहे होगे तो जल में उठती हुई हिलोरों की तरह अस्थिरता ही बनी रहेगी। स्थिर जल राशि में चन्द्र, सूर्य तारे आदि का प्रतिबिम्ब ठीक प्रकार दृष्टिगोचर होता है पर हिलते हुए पानी में कोई छवि नहीं देखी जा सकती। विचारों की हड़कम्प यदि मस्तिष्क में उठती रहें-तरह तरह की कल्पनायें घुड़दौड़ मचाती रहें तो फिर ब्रह्म सम्बन्ध की प्रगाढ़ता में निश्चित रूप से अड़चन पड़ेगी। मस्तिष्क जितना अधिक रहित-खाली होगा उतनी ही तन्मयता उत्पन्न होगी और आत्मा परमात्मा का मिलन संयोग अधिक प्रगाढ़ एवं प्रभावशाली बनता चला जाएगा

🔷 आकाश में जब बिजली कड़क रही हो या आँधी-तूफान का मौसम चल रहा हो तो हमारे रेडियो में आवाज साफ नहीं आती कंकड़ जैसे व्यवधान उठते रहते हैं और प्रोग्राम ठीक से सुनाई नहीं पड़ते। अन्तरिक्ष से भौतिक शक्तियों एवं आत्मिक चेतनाओं का सुदूर क्षेत्र से मनुष्य पर अवतरण होता रहता है। ब्राह्मी चेतना एक प्रकार का ब्रोडकास्ट केन्द्र है जहाँ से मात्र संकेत, निर्देश, सूचनाएँ ही नहीं वरन् विविध प्रकार की सामर्थ्य भी प्रेरित की जाती रहती है। सूक्ष्म जगत में यह क्रम निरन्तर चलता रहता है जहाँ सही रेडियो यन्त्र लगा है- जहाँ व्यक्ति ने अपने आपको सही अन्तः स्थिति में बना लिया है वहाँ यह सुविधा रहेगी कि ब्रह्म चेतना की विविध सूचनाओं को ग्रहण करके अपनी ज्ञान चेतना को बढ़ा सकें। इतना ही नहीं प्रेरित दिव्य शक्तियों अपने को असाधारण आत्म बल सम्पन्न बना सकें।

🔶 परन्तु यह सम्भव तभी है जब मनुष्य अपने मस्तिष्क को तनाव रहित-शान्त स्थिति में रखे। आँधी-तूफान कड़क और गड़गड़ाहट की उथल-पुथल रेडियो को ठीक से काम नहीं करने देती। मनुष्य का शरीर और मन उत्तेजित-तनाव की स्थिति में रहें तो फिर यह कठिन ही होगा कि वह ब्रह्म चेतना के साथ अपना सम्बन्ध ठीक से जोड़ सके और उस सम्मिलन की उपलब्धियों का लाभ उठा सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1973 पृष्ठ 49

👉 व्यवहार में औचित्य का समावेश करें (भाग 2)

🔷 कठिनाई वहाँ आती है जहाँ अनगढ़ों से वास्ता पड़ता है। वे मात्र अनजान ही नहीं होते, अहंकार और दुराग्रह भी दृढ़तापूर्वक अपनाये होते हैं। समझाने से समझते नहीं, अनुरोध को मानते नहीं। निजी विवेक के सहारे किसी निर्णय तक पहुँचने की सूझबूझ होती नहीं। ऐसों से पाला पड़े तो क्या नीति अपनाई जाय, यह निर्णय करना टेढ़ी खीर है। आमतौर से ऐसे प्रसंगों पर कलह उत्पन्न होता है और विग्रह तू-तू मैं-मैं से बढ़कर हाथापाई और मार-काट तक जा पहुँचता है। इसी प्रसंग में कई बार गहरा मनोमालिन्य और विद्वेष जड़ पकड़ लेता है। फलतः दोनों ही पक्ष घाटे में रहते हैं। आक्रमण और प्रतिरोध का कुचक्र ऐसा है कि उसका कभी अन्त ही नहीं होता। बारूद और माचिस दोनों को ही साथ-साथ जलाना होगा। वादी और प्रतिवादी में से एक भी नफे में नहीं रहता। प्रताड़ना से सुधार की नीति शासन तन्त्र को ही शोभा देती है। सामान्य सम्पर्क में उसके बिना ही काम चलाया जाना चाहिए।

🔶 आक्रमण प्रत्याक्रमण से लेकर हत्याएँ और आत्महत्याएँ प्रायः ऐसे ही रोष-विद्वेष के वातावरण में होती है, जहाँ तर्क काम नहीं करते और सौजन्य भरे उपाय काम नहीं आते। असमंजस इस बात का है कि सुधार परिवर्तन का सुयोग बनता नहीं दीखता और विग्रह में उभयपक्ष का अहित होता है। प्रतिशोध प्रत्याक्रमण का सिलसिला अहंकार की पृष्ठभूमि पर पनपता है। उसमें कारण और औचित्य समझने और अवरोध को हटाने की दूरदर्शिता बनती नहीं। आक्रोश में मात्र नीचा दिखाने और बदला लेने की बात सूझती है। इस अर्ध विक्षिप्तता के उभरने पर उससे निपटना और भी अधिक कठिन पड़ता है। उस झंझट को खड़ा कर लेने और समाधान में असफल रहने पर कई बार यह सोचना पड़ता है कि अच्छा होता कीचड़ में ईंट डालकर छींटे न पड़ने देने वाली उपेक्षा अपनाकर काम चलाते। खैर उसमें भी नहीं, क्योंकि चुप रहने को भी कायरता माना जाता है और उद्दण्डता का हौसला बढ़ता है।

🔷 इन परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाली दुहरी हानि में से एक को आसानी से बचाया जा सकता है। जो आधी बच जाती है उससे निपटने में आधी मेहनत से भी काम चल जाता है। दुर्जनता से उलझने में सर्वप्रथम अपना मानसिक सन्तुलन बिगड़ता है। इसमें इतनी शक्ति नष्ट हो जाती है जो कदाचित झगड़े-झंझट खड़े होने पर भी न होती। संतुलन गँवा बैठने पर मनुष्य अपंग विक्षिप्त जैसी स्थिति में जा पहुँचता है। आक्रोश में कितना खून जलता है, उसकी जानकारी मनोविज्ञान के ज्ञाता विस्तारपूर्वक बता सकते हैं। एक घण्टे का क्रोध एक दिन के बुखार जितनी हानि पहुँचाता है। उससे विग्रहों द्वारा खड़े किये गये झंझट की तुलना में भी अधिक हानि पहुँचती है। इस स्व-उपार्जित उत्तेजना से बचने की समझदारी दूरदर्शी को अपनानी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Essence of Worship-Intercession. (Last Part)

🔷 A buttering person, a praising person must get all that he needs, is it possible anywhere in the world? No it is not possible. BHAGWAN! You are very cute, sweet and soft-hearted; BHAGWAN you just killed MAHISHASUR, KANS and VRITTASUR, now please fulfill my so & so desire. This is owl-like tendency. Today very this type has become the way of PUJA, UPASNA, DHYAN and JAP- just buttering the BHAGWAN either DURGA or HANUMAN or else to get in exchange something from him.

🔶 The entire world just soaked in dark, trapped in an illusionary network is wasting it time and life besides defaming spirituality. Not only this, the world also keeps complaining that it took the name of BHAGWAN, did PUJA, buttered and offered sweets, rice, incense sticks and did AARTI also but all went in vein. The world keeps complaining of no benefit out of these rituals. But tell how that is possible?
                                              
🔷 Yes, there should be some gain, but for that man should incorporate spirituality practically in his routine-life. Incorporation of spirituality in life means incorporation of essence of PUJA-UPASANA in life.
                                                                
🔶 Finished, today’s session.
                                     
====OM SHANTI====
                            
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 17)

🔶 हम अपने आदमी की निष्ठा की परख पैसे के साथ नहीं, वरन् पसीने के साथ करना चाहते हैं। इसलिए जहाँ कहीं भी जो भी कोई हो, उसमें आप यह प्रयत्न करना कि अधिक से अधिक लोगों का पसीना लग जाय और अधिक से अधिक लोगों की मेहनत लग जाय। मूलभूत सिद्धान्तों को आप ध्यान रखना कि हम विचारों का परिष्कार करने चले हैं और आपने विचारों का परिष्कार करने में किस हद तक सफलता पायी, यही आपकी सफलता की कसौटी है। यही आपकी क्रियाशीलता की कसौटी है। इसके लिए आवश्यक है कि आपकी विचारशीलता, आपकी भावना, आपकी निष्ठा और आपकी कर्तव्य परायणता इस हद तक होनी चाहिए जैसे कि ब्राह्मणों की और संतों की रही है।

🔷 मित्रो! आप ब्राह्मणत्व के प्रतीक है, आप संतत्व के प्रतीक हैं, आप शान्तिकुञ्ज के प्रतीक हैं। आप नवयुग निर्माण योजना के प्रतीक हैं। आप अपनी इन सब जिम्मेदारियों को समझना और इन सब जिम्मेदारियों को धारण करना। अगर आपने इन जिम्मेदारियों को धारण नहीं किया, तो लोग किससे अन्दाज लगायेंगे। हमारे बारे में अन्दाज, हमारे मिशन के बारे में अंदाज और हमारे क्रियाकलापों के बारे में, हमारी क्रियाशीलता के बारे में अंदाज लोग आपकी क्रियाशीलता के द्वारा ही लगायेंगे। आपके चरित्र से लगायेंगे। आपके स्वभाव से लगायेंगे, आपके कर्म से लगायेंगे, आपके गुणों से लगायेंगे।

🔶 यह सब चीजें आपको प्रतीक मानकर लगायेंगे। इसलिए आप जहाँ कहीं भी जायँ, फूँक-फूँक कर कदम रखें। आप अपने खान-पान के सम्बन्ध में, उठने-बैठने के संबंध में, चलने-फिरने के संबंध में, बोलचाल के संबंध में, व्यवहार के संबंध में, निर्लोभता के संबंध में, आपकी प्रयत्नशीलता और क्रियाशीलता के सम्बन्ध में, लोगों से मिलने-जुलने के सम्बन्ध में और लोगों से आत्मीयता बनाने के सम्बन्ध में, लोगों के अंदर श्रमशीलता पैदा करने के सम्बन्ध में, लोगों की भावनाओं को उभारने के सम्बन्ध में जो जिम्मेदारियाँ ले करके जा रहे हैं, उन्हें निभाने की कोशिश करना। बेटे, हम आपकी सहायता करेंगे। हमारा मिशन आपके साथ है। हम आपके साथ हैं और हमारा गुरु आपके साथ है। सफलता आपको जरूरत मिलेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 36)

👉 गुरु कृपा ने बनाया महासिद्ध

🔷 गुरुगीता के महामन्त्रों में अध्यात्मविद्या के गूढ़तम रहस्य सँजोये हैं। योग, तन्त्र एवं वेदान्त आदि सभी तरह की साधनाओं का सार इनमें है। महाकठिन साधनाएँ इन महामंत्रों के आश्रय में अति सुगम हो जाती हैं। ऐसा होते हुए भी सभी लोग इस सत्य को समझ नहीं पाते हैं। जिनके पास गुरुभक्ति से मिली दिव्य दृष्टि है, उन्हीं की अन्तश्चेतना में यह तत्त्व उजागर होता है। गुरुदेव भगवान् के प्रति श्रद्धा अति गहन हो, तो फिर साधक को इस बात की प्रत्यक्ष अनुभूति हो जाती है कि विश्व-ब्रह्माण्ड में यदि कहीं कुछ भी है, तो वह अपने गुरुदेव में है। इन्हीं के आश्रय में सभी तरह की साधनाएँ सिद्धिदायी होती हैं।
    
🔶 गुरु श्रद्धा की तत्त्वकथा के उपर्युक्त मंत्र में यह ज्ञान कराया गया है कि गुरुदेव साकार होते हुए भी निराकार हैं। वे परात्पर प्रभु त्रिगुणमय कलेवर को धारण करके भी सर्वथा गुणातीत  हैं। अपने वास्तविक रूप में निर्गुण व निराकार गुरुदेव की महिमा अनन्त है। वे ही सदाशिव सर्वव्यापी विष्णु एवं सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा हैं। ऐसे दयामय गुरुदेव को प्रणाम करने से जीवों को संसार से मुक्ति मिलती है। इस सत्य को विरले विवेकवान् ही समझ पाते हैं। विवेक न होने पर यह सच्चाई प्रकट होते हुए भी समझ में नहीं आती। परम कृपालु सद्गुरु के चरण जिस दिशा में विराजते हैं, उधर भक्तिपूर्वक प्रणाम करने से शिष्य का सर्वविध कल्याण होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 60