शनिवार, 18 जनवरी 2020

👉 "विवेकशीलता का स्वर्ग"

एक सेनापति चीन के दार्शनिक नानुशिंगें के पास जिज्ञासा लेकर गया। उसने जाते ही पूछा-स्वर्ग और नरक के बारे में बताइए।

नानुशिंगे ने उसका परिचय पूछा तो अतिथि ने अपने को सेनापति बताया। सुनकर सन्त हँसे और बोले-शक्ल तो आपकी भिखारी जैसी है। सेनापति तो आप लगते नहीं।

सुनते ही वह लाल पीला हो गया और अपने अपमानों से उत्तेजित होकर तलवार खींच ली और सिर काटने पर उतारू हो गया।

नानुशिंगे ने फिर हँसते हुए कहा-तो तुम्हारे पास तलवार भी है? क्या सचमुच लोहे की है? क्या इस पर धार भी चढ़ी है और अगर है तो तुम्हारी कलाइयों में इतना दम-खम भी है कि मेरी गर्दन काट सको?

सेनापति आपे से बाहर हो गया। हाथ काँपने लगे। प्रतीत हुआ कि उसका वार होकर ही रहेगा।

नानुशिंगे गम्भीर हो गये। उनने कहा-योद्धा, यही है नरक, जिसकी बात तुम पूछ रहे थे।

योद्धा ठंडा पड़ गया। उसने तलवार म्यान में कर ली। इस पर नानुशिंगें ने ठंडी साँस खींचते हुए कहा-देखा, यही है विवेकशीलता का स्वर्ग।

जिज्ञासु का समाधान हो गया। वह घर वास लौट गया।

अखण्ड ज्योति जनवरी, 1987 

👉 पाप का फल भोगना पड़ता है।


👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए (भाग १)

मन का भाव दब कर मन की एक ग्रन्थि बन जाता है। जो व्यक्ति अनेक मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हैं उसका कारण यह दबे हुए नाना प्रकार के कुँठित भाव ही हैं। बचपन की किस कटु अनुभूति के कारण ये दलित भाव दुःख और व्याधि के कारण बनते हैं और मनुष्य को परेशान किए रहते हैं।

क्रोधी, चिड़चिड़ी, बात बात में झगड़ने वाली कर्कशा नारी के बिगड़े हुए स्वभाव का कारण बचपन में उस पर नाना प्रकार के दमन हैं। कठोर व्यवहार भी विकसित होकर गुप्त भावना ग्रन्थि का रूप धारण कर लेता है। जो नारी या पुरुष बच्चों को घृणा करता है, उसका कारण यह है कि उसमें मातृत्व या पितृत्व के सहज स्वाभाविक भाव पनपने नहीं पाये हैं। अनेक पाश्चात्य अविवाहित नारियाँ पालतू कुत्तों तथा बिल्लियों को अपने पास रखती हैं, उनका प्रेम से चुम्बन करती हैं और अपने मातृत्व के सहज वात्सल्य का माधुर्य लूटती हैं। जो कोमल स्नेह नारी की प्राकृतिक सम्पदा है जिससे मानव शिशु पलता - पनपता है, वह कुत्ते बिल्लियों पर न्यौछावर कर के तृप्त किया जाता है। वात्सल्य और प्रेम की इन भावनाओं को निकालने से पाश्चात्य नारियाँ कृत्रिम मातृत्व के सुख का अनुभव करती हैं तथा मन में आह्लादित रहती हैं।

जिन पुरुषों तथा नारियों में इस प्रकार की अन्य अनेक इच्छाएँ कुँठित पड़ी हैं, वे समाज के भय से दलित होकर मन में कुण्ठा उत्पन्न कर सकती हैं। महत्वाकाँक्षा, प्रसिद्धि, महत्ता आदि न मिलने से मनुष्य चोर, डाकू या शैतान बन सकता है। नारियों की सेक्स भावना अतृप्त रहने से उनमें हिस्टीरिया, प्रमाद, चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो सकते हैं। अतः मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक स्वस्थ स्त्री पुरुष का अवरुद्ध भावनाओं को निकालने के मार्ग ढूँढ़िये। ऐसी नारियाँ समाज सेवा में तन मन लगा कर अपने हृदय का भार हलका कर सकती हैं अथवा यतीम खाने के अनाथ बच्चों की देख रेख, प्यार, सेवा, पालन, पोषण, सेवा, सुश्रूषा कर मातृत्व की सहज वृत्ति की तृप्ति कर सकती हैं। उन्हें चाहिए कि वे गरीबों की बस्तियों की ओर निकल जाया करें। वहाँ के अर्द्धनग्न और भूखे बच्चों की देख रेख किया करें। उन्हें स्नान करायें और स्वच्छ वस्त्र धारण करायें, उनके साथ खेलें, गायें, बातचीत करें। इस प्रेम से गुप्त भावनाओं को निकालने का स्वस्थ मार्ग मिलता है जो मानसिक स्वास्थ्य और सुख के लिए अमृत तुल्य है। आपके मन की कोई भी भावना, यदि अतृप्त है तो मानसिक संस्थान में भावना ग्रन्थि (काम्लेक्त) उत्पन्न करेंगी और नाना मनोविकारों में प्रस्फुटित होंगी। वह हमारे गुप्त प्रदेश में बाहर निकलने और तृप्ति प्राप्त करने के अवसर देखा करती हैं। जो उसे निर्दयता से कुचल डालते हैं, वे मानसिक रोगों के शिकार बनते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1960 पृष्ठ 21

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/March/v1.21

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 4)

Q.9. On what should one concentrate during Upasana?

Ans. Those believing in Divinity ‘with form’ (Sakar) are advised to concentrate on an idol or picture of Gayatri, whereas those having faith in formless God (Nirakar) may concentrate in the central, part of the sun, all the while imagining that the ethereal solar energy is permeating and purifying the trio of, physical (Sthool) subtle (Sooksham)  and causal (Karan) bodies of the Sadhak). During Upasana, it is necessary to concentrate one’s thoughts exclusively on the deity. Persistent attempts should be made to restrain thoughts from wandering. Extraneous thoughts should not be allowed to enter the mind.

Q.10. How does one meditate on Savita?

Ans. Spiritual tradition in India considers Gayatri as the most powerful medium for invocation of Savita, the omnipresent cosmic energy of God operating the natural functions in the animate beings (flora and fauna) and in the inanimate objects (e.g. as fission and fusion, magnetism and gravity in planets and stars). Since this energy is manifestly (visibly) received all over this planet through solar (and invisible stellar) radiations, it is logical to consider the Sun as the representative of Savita. Experience shows that there is maximum absorption of this energy at dawn.

While meditating on the rising Sun, the devotee has the advantage of interacting with Savita with each of his/her three bodies. The physical body (Sthul Sharir) is conceptualised as being purified by permeation of solar energy through the millions of pores in the body. The process of conceptualisation as Savita interacting with the subtle body (Sukcham sharir), purifies the “Ideosphere” and deeply meditating about integrating one’s individual identity with the cosmic existence of Savita, the devotee interacts through the causal Body (Karan Sharir). (Ref. Upasana Ke Do Charan - Jap Aur Dhyan).

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 53

👉 लौकिक सफलताओं का आधार

तात्पर्य केवल इतना है कि नीति और अनीति के आधार पर प्रतिष्ठा−अप्रतिष्ठा, प्रेम, द्वेष, शान्ति−अशान्ति, दंड पुरस्कार, स्वर्ग−नरक मिलते हैं, पर लौकिक सफलताओं का आधार जागरुकता, पुरुषार्थ, लगन, साहस आदि गुण ही हैं। यह सभी गुण शरीर के नहीं, मन के हैं। मन को उपयोगी, अनुकूल, उचित आदतों का, विचार पद्धति का अभ्यस्त बना लेने से ही नाना प्रकार के उन गुणों का आविर्भाव होता है जो लौकिक एवं पारलौकिक सफलताओं के मूल आधार हैं।

शरीर को आलस, असंयम, उपेक्षा एवं दुर्व्यसनों में पड़ा रहने दिया जाय तो उसकी सारी विशेषताएँ नष्ट हो जायेंगी। इसी प्रकार मन को अव्यवस्थित पड़ा रहने दिया जाय, उसे कुसंस्कार−ग्रस्त होने से संभाला न जाय तो निश्चय ही वह हीन स्थिति को पकड़ लेगा। पानी का स्वभाव नीचे की तरफ बहना है, ऊपर उठाने के लिए बहुत प्रयत्न करते हैं तब सफलता मिलती है। मन का भी यही हाल है यदि उसे रोका, संभाला, समझाया, बाँधा और उठाया न जाय तो उसका कुसंस्कारी दुर्गुणी, पतनोन्मुखी, आलसी एवं दीन−दरिद्र प्रकृति का बन जाना ही निश्चित है। आज इसी प्रकार का मानसिक अवसाद चारों ओर फैल रहा है। शरीर की दुर्बलता और बीमारी जिस प्रकार व्यापक रूप से फैली दिखाई देती है वैसी ही हमारी मानसिक दुर्बलता एवं रुग्णता भी कम शोचनीय नहीं है। कलह प्रिय, क्रोधी, तुनक-मिज़ाज, असहिष्णु, ईर्ष्यालु, छिद्रान्वेषी, अहंकारी, उद्दण्ड, प्रकृति के लोगों से हमारा समाज भरा पड़ा है। इन दुर्गुणों के कारण पारस्परिक प्रेम−भावना, आत्मीयता एवं घनिष्ठता दिन−दिन नष्ट होती जाती है और एक आदमी दूसरे से दिन−दिन दूर पड़ता जाता है। प्रेम, सहयोग, प्रसन्नता, मुस्कान, नम्रता, उदारता, सहिष्णुता, शिष्टता, कृतज्ञता के गुणों से यदि मनोभूमि परिष्कृत हो तो परस्पर का प्रेम−भाव कितना बढ़े, कितना सुदृढ़ रहे और फलस्वरूप कितनी प्रगति एवं प्रसन्नता का वातावरण बन जाय?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 23

👉 हम बदलेंगे-युग बदलेगा

जैसा हम औरों को बनाना-बदलना चाहते हैं, वैसा ही स्वयं को बनाना- बदलना होगा। दूसरों को बदलने के लिए स्वयं में बदलाव जरूरी है। अपने में आने वाले बदलाव से आसपास के लोग-वातावरण अपने आप ही बदलने लगते हैं। बिना स्वयं में परिवर्तन लाये औरों में परिवर्तन सम्भव नहीं।
  
जो स्वयं जाग्रत् है केवल वही दूसरों के जागरण में सहायक बन सकता है। स्वयं सोया हुआ भला औरों को किस तरह से जगा पाएगा? सच भी यही है कि जिनके भीतर स्वयं ही अंधकार का आवास है, वह कभी भी दूसरों के लिए प्रकाश का स्रोत नहीं हो सकता। दूसरों की सेवा केवल तभी सम्भव है, जब हम स्वयं का सृजन प्रारम्भ करें। लोक निर्माण-आत्म निर्माण के बिना असम्भव है।
  
किसी ने सन्त तिरुवल्लुवर से पूछा-मैं सेवा करना चाहता हूँ। वह मुस्कराकर बोले-‘पहले साधना-तब सेवा, क्योंकि जो तुम्हारे पास नहीं है, उसे तुम दूसरों को कैसे दोगे? साधना से जब पाया जा चुका हो-तभी उसे सेवा में बाँटा जा सकता है।’ हालाँकि उलटबासी यही है कि सेवा की चाहत बहुतों में होती है, पर स्व-साधना और आत्म सृजन की नहीं। यह तो वैसा ही हुआ कि जैसे कोई बीज तो न बोना चाहे, लेकिन फसल काटना चाहे, परन्तु यह प्रकृति के विधान के विपरीत है।
  
किसी अत्यन्त दीन-दुर्बल-दरिद्र व्यक्ति ने भगवान् महावीर से कहा-भगवन्! मैं मानवता की सेवा कैसे करूँ? वह व्यक्ति शरीर से नहीं आत्मा से दुर्बल था, वह दरिद्र धन से नहीं जीवन से था। भगवान् महावीर ने उसे बड़े ही करुण भाव से देखा और बड़ी दयाभाव से उससे बोले-क्या कर सकोगे तुम? उनका यह वचन बहुत छोटा था, परन्तु बड़ा गहरा मर्म था इसमें। अच्छा हो कि इसे हम सब अपने मन में दुहरावें? यह वचन हममें से हर एक को कहा गया है। सब करना स्वयं पर और स्वयं से प्रारम्भ होता है। स्वयं से पहले जो दूसरों के लिए कुछ करना चाहता है, वह भूल में है। स्वयं का जो कल्याण कर लेता है, वही औरों का कल्याण कर पाता है। अपने परिवर्तन में ही युग परिवर्तन का बीज निहित है। तभी तो युगऋषि की वाणी कहती है-‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६३