शनिवार, 31 मार्च 2018

👉 उपासना

🔷 मित्रो ! आप भगवान के अनुग्रह तक पहुँच सकते हैं और भगवान का अनुग्रह एवं जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने वालों ने जिंदगी के जो आनंद उठाए  हैं, वे उठा सकते हैं। शर्त यही है कि आप अपनी उपासना को भजन से आरंभ तो करें, पर उसे वहीं तक सीमित न करें। उसके साथ-साथ में जीवन की साधना, स्वाध्याय, विचारों  का परिमार्जन, संयम, अपनी जिंदगी के छिद्रों का निराकरण और सेवा, इनको आप मिला दीजिए, फिर देखिए कि आपकी उपासना फलित होती है कि नहीं?

🔶 आप सिद्धपुरुष बनते हैं कि नहीं? आप चमत्कृत होते हैं कि नहीं? भगवान आपके घर में सेवा-सहायता करने के लिए आते हैं कि नहीं? ऐसी है साधना, जिसको मैंने किया। मैं चाहता हूँ कि आपमें से हरेक आदमी को उसी तरीके से साधना करनी चाहिए जो कि सफल होती है और होती रहेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 क्या कहीं अर्जुन एवं हनुमान हैं?

👉 परम पूज्य गुरुदेव का एक सामयिक लेख-
👉 (चैत्र नवरात्रि 1990 की पूर्वबेला में लिखा गया एक अप्रकाशित लेख)

🔶 महाभारत युद्ध चल रहा था। आवश्यकता थी कि पाँचों पाण्डवों में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन ऐसे में अपना पराक्रम दिखाए। किन्तु उस पर तो व्यामोह सवार था। वह कर्त्तव्य युद्ध में कटिबद्ध होने से कतरा रहा था। नाना प्रकार के बहाने गढ़ रहा था। श्रीकृष्ण ने उसकी बहाने-बाजी के मूल में छिपे चोर को पकड़ा और कहा- हे समर्थ परंतप! कमर कस, आँतरिक दुर्बलता को छोड़ और युद्ध में प्रवृत्त हो। बहानेबाजी पर करारी चोट करते हुए कहा-अनाड़ियों जैसा मानस न बता। जो तुझे पतन के गर्त्त में धकेल रहा है। इस उद्बोधन ने अर्जुन की मूर्च्छना जगाई, उसे झकझोर डाला एवं वह गाण्डीव उठाकर नयी मानसिकता के साथ रथ में जा बैठा। कृष्ण उसके सारथी बने वह वह प्रयोजन पूरा हुआ जो श्रीकृष्ण अर्जुन को निमित्त बनाकर पूरा करना चाहते थे।

🔷 ऐसा ही कुछ त्रेता के अन्त में हुआ था। उस समय दो कार्य पूरे होने थे-एक अवांछनीयता का उन्मूलन, दूसरा सतयुग की वापसी वाले उच्चस्तरीय वातावरण की रामराज्य के रूप में स्थापना। इस प्रयोजन को राम की अवतारी समर्थसत्ता और लक्ष्मण की पुरुषार्थ-परायणता मिलजुल कर एकनिष्ठ भाव से पूरा कर रही थीं। राम-रावण युद्ध चल रहा था, इसी बीच एक व्यक्तिक्रम आ गया। लक्ष्मण को प्राणघातिनी शक्ति लगी, वे मरे तो नहीं पर मूर्च्छित होकर गिर पड़े।

🔶 लक्ष्मण के बिना एक पक्षीय अर्धांग के पक्षाघात जैसी स्थिति से उद्देश्य पूर्ति में व्यवधान उत्पन्न होने जा रहा था। लक्ष्मण के बिना राम सर्वसमर्थ होते हुए भी अपने को असहाय अनुभव कर रहे थे। आवश्यकता यह गुहार मचा रही थी कि लक्ष्मण की मूर्च्छा किसी प्रकार दूर हो। संजीवनी बूटी कहीं से भी तुरंत लाया जाना अनिवार्य था, पर हिमालय जाये कौन? प्रश्न जटिल था किन्तु हनुमान की साहसिकता उभरी, बीड़ा उठाया और वे राम का नाम लेकर चल पड़े। प्राण हथेली पर रखकर जैसे भी बने पड़ा। ढूँढ़-खोज करते हुए संजीवनी बूटी लेकर वापस लौटे। संकट टल गया। दोनों भाई वह करने में जुट गए जिसके लिए उनका अवतरण हुआ था। अवाँछनीयता से पीछा छूटा एवं वह बन पड़ा जो सतयुग की वापसी के लिए अभीष्ट था।

🔷 दोनों उदाहरण आज भी आधुनिक संस्करण के रूप में देखे जा सकते है। युगान्तरीय चेतना का दिव्य आलोक देवी आकाँक्षा की पूर्ति में जुटा है। प्रज्ञापुत्रों की सामूहिक संगठन शक्ति और निर्धारित क्रिया–कलापों में जुटी तत्परता को लक्ष्मण स्तर की प्रतिभा कहा जा सकता है। दोनों की समन्वित शक्ति यदि ठीक तरह काम कर रही होती तो युगसंधि के विगत कुछ ही वर्षों में ही महत्वपूर्ण कार्य संपन्न हो गया होता। फिर किसी को इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण में किसी प्रकार का संदेह करने की गुँजाइश नहीं रहती।

🔶 पर उस दुर्भाग्य का क्या किया जाय जो लक्ष्मणी रूपी परिजनों की संगठित शक्ति की तत्परता में मूर्च्छना की स्थिति में ले जा पहुँची। उसे उस मेघनाद रूपी विग्रह का मायाजाल भी कहा जा सकता है जो आड़े समय में उदासीनता-उपेक्षा के रूप में सामने आ खड़ा हुआ है। आपत्तिकाल की चुनौती सामने हो और परिजनों के समक्ष यह व्यामोह हो कि वे युगधर्म से कन्नी काट लें तो इस विडम्बना को क्या कहा जायेगा? इसे उज्ज्वल भविष्य के मार्ग आड़े आने वाला दुर्भाग्य भी कह सकते हैं एवं असुरता का आक्रमण भी। लक्ष्मण की साँसें तो चल रही हैं पर उनका धनुषबाण इन दिनों वह चमत्कार नहीं दिखा पा रहा है जिसकी महाकाल ने अपेक्षा की थी। लक्ष्मण की यह विपन्नता तपस्वी राम को खल रहा है इसका आकलन जीवन्तों की प्राण चेतना ही कर सकती है। लिप्सा-तृष्णाएँ तो केवल मूकदर्शक भर बने रहने का परामर्श दे सकती है। ऐसे में सबसे बड़ी आवश्यकता उस हनुमान स्तर की भाव चेतना की है जो अभीष्ट पुरुषार्थ प्रदर्शित करके बिगड़े काम को बनाने में संलग्न होकर अपनी वरिष्ठता और यशोगाथा को चिरकाल तक जन-जन की चर्चा का विषय बनाने। अनुकरण और अभिनंदनीय स्तर का पौरुष प्रदर्शन करने का ठीक यही समय है।

🔷 मिशन के समस्त दायित्व युगसंधि के साथ जुड़े है। इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण को इस भगीरथ की आवश्यकता है जो सूखे पड़े विशाल क्षेत्र की प्यास बुझाने के लिए भाव तरंगित हों और राजपाट का व्यामोह छोड़कर तप−साधना का मार्ग अपनाने का साहस दिखा सके।

🔶 जिनका साहस उभरे उन्हें करना इतना भर है कि युगधर्म के परिपालन में वरिष्ठों को क्या करने के लिए बाधित होना पड़ता है, इसका स्वरूप उन्हें समझाते हुए उन्हें नये सिरे से नयी उमंगों का धनी बना सकने की स्थिति उत्पन्न कर सकें। अपने समर्थ, प्रबुद्ध एवं पच्चीस लाख व्यक्तियों के परिकर के लोग ही नवसृजन में जुट सकें तो असंख्यों अनेकों को अपना सहयोगी बनाने में निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं। संयोगवश दैवी प्रवाह भी इसी दिशा में बह रहा है। उसके साथ जुड़कर रज, कण और तिनके, पत्ते भी आकाश चूमने में समर्थ हो सकते हैं। नवसृजन की, औचित्य की प्राणप्रतिष्ठा के लिए आकुल-व्याकुल युगान्तरीय चेतना अब तक के सभी महान् परिवर्तनों की तुलना में अधिक शक्तिशाली सिद्ध होगी, अगले दिनों हम उन्हीं चर्मचक्षुओं से ऐसी संरचना को सामने खड़ी देखेंगे।

🔷 प्रयोजन की पूर्ति के लिए इसी नवरात्रि से लेकर आगामी आश्विन नवरात्रि तक के प्रायः छः महीनों के लिए एक छोटी योजना सामयिक दृष्टि से बताई गई है। जिनके मनों में अनुरोधजन्य स्फुरणा उठे, उन्हें इतना छोटा निर्धारण तो पूरा कर लेना चाहिए जो इस प्रकार है-

🔶 अपने संपर्क क्षेत्र के प्रज्ञा परिजनों के घरों तक पहुँचने का योजनाबद्ध कार्यक्रम बनायें और उनसे कहें कि यह समय शिथिलता, उपेक्षा का है नहीं। अपने समय में से दो घण्टे नित्य तो युगधर्म के निर्वाह में लगना ही चाहिए। घर-घर दीपयज्ञ जन्मदिवसोत्सव मनाते हुए धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का यह समय है।

🔷 समयदान को नियोजित करने के लिये दो कार्यक्रम चलाएँ (।) झोला पुस्तकालय-जिसके अंतर्गत अपने क्षेत्र के शिक्षितों से संपर्क साधकर उन्हें युगसाहित्य पढ़ने वापस लेने का सिलसिला जारी कर देना चाहिए। वह स्वाध्याय की प्रक्रिया है (॥) साप्ताहिक सत्संग-जिसमें सप्ताह में कम से कम एक दिन प्रस्तुत विचारधारा के समर्थक मिल बैठ लिया करें। सहगान कीर्तन, अभिनव संदेशों का प्रवचन तथा दीपयज्ञों का संक्षिप्त आयोजन कर लिया करें।

🔶 अखण्ड-ज्योति, युगनिर्माण योजना एवं युगशक्ति गायत्री पत्रिका के पाठकों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहना। इसी के माध्यम से युग चेतना का संदेश जन-जन तक हर माह अपनी प्राण चेतना समेत जा पहुँचता है। जहाँ संभव हो वहाँ ज्ञानरथ स्वयं चलायें।

🔷 अपने समय की ज्ञानसत्ता को युगदेवता को गली-गली घुमाने घर-घर पहुँचाने का यह पुण्य उपक्रम है। अब तो इनमें टेपरिकार्डर, लाउडस्पीकर भी लगा दिये गये हैं जिनसे युगसंगीत भी सुनाया जा सकता है। यह कार्य नौकरों, फेरीवालों से न कराके स्वयं करें।

🔶 पुराने या नये प्रतिभावान परिजनों को शान्तिकुँज में निरन्तर चलने वाले शिक्षण सत्रों में से किन्हीं में इन्हीं दिनों सम्मिलित होने के लिए भेजना। यह बैटरीचार्ज कराने की प्रक्रिया है। युगनेतृत्व सँभालने के लिए उपयुक्त पात्रता इसी से उपलब्ध होगी। ये सत्र तारीख 1 से 9, 11 से 19, 21 से 30 में हर माह चलते हैं। किस सत्र में सम्मिलित होना है, इसका विवरण अपने विस्तृत परिचय के साथ भेजकर स्वीकृति की प्रतीक्षा करने को कहा जाय। जिनके लिये संभव हो, उन्हें हर वर्ष आने, नया संदेश, नया उत्साह प्राप्त करते रहने के लिये कहा जाय।

🔷 इन पाँचों कार्यों में किसने क्या प्रगति की, इसकी रिपोर्ट लेकर परिजन शरदपूर्णिमा किन्हीं सत्रों में शान्तिकुँज पहुँचे तथा मार्गदर्शन प्राप्त करें। इससे भावी नीति का निर्धारण करने में मदद मिलेगी।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1993 पृष्ठ 47-48

गुरुवार, 29 मार्च 2018

👉 विचारों की शक्ति

🔷 मित्रो ! मिट्टी के खिलौने जितनी आसानी से मिल जाते हैं, उतनी आसानी से सोना नहीं मिलता। पापों की ओर आसानी से मन चला जाता है, किंतु पुण्य कर्मों की ओर प्रवृत्त करने में काफी परिश्रम करना पड़ता है। पानी की धारा नीचे पथ पर कितनी तेजी से अग्रसर होती है, किंतु अगर ऊँचे स्थान पर चढ़ाना हो, तो पंप आदि लगाने का प्रयत्न किया जाता है।

🔶 बुरे विचार, तामसी संकल्प ऐसे पदार्थ हैं, जो बड़ा मनोरंजन करते हुए मन में धँस जाते हैं और साथ ही अपनी मारक शक्ति को भी ले जाते हैं। स्वार्थमयी नीच भावनाओं को वैज्ञानिक विश्लेषण करके जाना गया है कि वे काले रंग की छुरियों के समान तीक्ष्ण एवं तेजाब की तरह दाहक होती हैं। उन्हें जहाँ थोड़ा-सा भी स्थान मिला कि अपने सदृश और भी बहुत-सी सामग्री खींच लेती हैं। विचारों में भी पृथ्वी आदि तत्त्वों की भाँति खिंचने और खींचने की शक्ति होती है। तदनुसार अपनी भावना को पुष्ट करने वाले उसी जाति के विचार उड़-उड़ कर वहीं एकत्रित होने लगते हैं।

🔷 यही बात भले विचारों के संबंध में है। वे भी अपने सजातियों को अपने साथ इकट्ठे करके बहुकुटुंबी बनने में पीछे नहीं रहते। जिन्होंने बहुत समय तक बुरे विचारों को अपने मन में स्थान दिया है, उन्हें चिंता, भय और निराशा का शिकार होना ही पड़ेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ज्ञान और आस्था

🔷 एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था। पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।

🔶 नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिता के साथ रहती थी। लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी। सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दुहती, फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती, तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।

🔷 पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था। एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था। उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए। लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।

🔶 अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी। नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था। लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार करती ? फिर क्या था, लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गयी। आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे। उन्हें सिर्फ लक्ष्मी का इन्तजार था। लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।

🔷 लक्ष्मी ने भी बड़ी मासूमियत से पंडित जी से कह दिया कि- “नदी पर कोई मल्लाह नहीं था, मै नदी कैसे पार करती ? इसलिए देर हो गयी।“

🔶 पंडित जी गुस्से में तो थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है। उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा, ‘‘क्यों बहाने बनाती है। लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं, तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती?”

🔷 पंडित जी की बातों का लक्ष्मी पर बहुत गहरा असर हुआ। दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो नदी के किनारे मल्लाह नहीं था। लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया। उसने भगवान को याद किया और पानी की सतह पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली। इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देख कर पंडित जी हैरान रह गये, उन्हें पता था कि कोई मल्लाह इतनी जल्दी नहीं आता है।

🔶 उन्होंने लक्ष्मी से पूछा- “ तुमने आज नदी कैसे पार की ? इतनी सुबह तो कोई मल्लाह नही मिलता।”

🔷 लक्ष्मी ने बड़ी सरलता से कहा- ‘‘पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से नदी पार कर ली। मैंने भगवान् का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली।’’

🔶 पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा। लक्ष्मी नदी के किनारे गयी और उसने भगवान का नाम जपते-जपते बड़ी आसानी से नदी पार कर ली।

🔷 पंडित जी हैरान रह गये। उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करनी चाही। पर नदी में उतरते वक्त उनका ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था। वह पानी पर नहीं चल पाये और धड़ाम से पानी में गिर गये।

🔶 पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा- ‘‘आपने तो भगवान का नाम लिया ही नहीं, आपका सारा ध्यान अपनी नयी धोती को बचाने में ही लगा हुआ था।’’

🔷 पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था। पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी ज्ञान की जरूरत नहीं होती। उसे तो पाने के लिए सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 30 March 2018


👉 MICRO-ANALYSIS OF SPIRITUALISM

🔷 What is spiritualism? It is upside down process of our life. Do you see it as juggling or thaumaturgy? There is nothing like that. Albeit, the direction of life is flipped and turned out here. The way common persons of the world think, wish and do, on the contrary the processes of spiritualistic life is completely different.

🔶 Different types of flirtations and handiwork you perform for a glimpse of God, for worshipping, miraculous enlightenment and getting prosperity, it is better not to indulge into that, because this will be too tough to you. You’ll be shattered into pieces at the very first step. When you will be asked for celibacy and you will be directed that physical celibacy is not as necessary as mental and internal one, then you’ll start biting your finger and say, firstly we are not able to celibate physically, then what to say about going mental celibacy! Our mind and eyes remain indulged in misconduct and vices 24 hours. When whole of your power will be destroyed in this only, then how on earth your serpent power (secret centers of immense divine powers hidden in one’s spinal cord) would get awakened? When you’ll spoil whole of your power needed to awaken the serpent power in these vices and misconducts through your eyes in the form of vicious waves, then you’ve definitely ended up all of your power and energy in vain.

🔷 Similarly, the blood which is formed after you take food and which in turn creates your mind and thoughts, has got contaminated due to intake of improper, fraudulently-earned and ill gotten food. How the hell you’ll be able to make it stable and concentrated in spiritualism and Almighty?

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 अध्यात्म का सूक्ष्म-विश्लेषण

🔷 अध्यात्म क्या है? जीवन का शीर्षासन है। आप क्या इसे बाजीगरी समझते हैं कि यह कर लूँगा, वह कर लूँगा। इसमें ऐसा कुछ नहीं है, वरन इसमें जीवन की दिशा उलटी जाती है, जीवन को पलटा जाता है। दुनिया वाले लोगों के सोचने, करने का जो तरीका है, आकांक्षाओं, इच्छाओं का जो ढंग है, उससे आध्यात्मिक जीवन की प्रक्रियाएं भिन्न हैं, जिन्हें अलग ढंग से करना पड़ता है।

🔶 पूजा-उपासना के बारे में, सिद्धि-चमत्कारों के बारे में, देवताओं के दर्शन के बारे में, ऋद्धि-सिद्धि पाने के बारे में जो तरह-तरह के खेल-खिलवाड़ आप करते रहते हैं, उसमें न पड़ें तो अच्छा है, क्योंकि आपके लिए यह वह कठिन पड़ेगा। आप पहली मंजिल पर ही टक्कर खाकर चकनाचूर हो जाएँगे। जब आपसे ब्रह्मचर्य के लिए कहा जायेगा कि शारीरिक ब्रह्मचर्य उतना आवश्यक नहीं जितना कि मानसिक ब्रह्मचर्य आवश्यक है, तब आप दाँत निकाल देंगे और कहेंगे कि शारीरिक ब्रह्मचर्य तो हमसे साधता नहीं, फिर मानसिक ब्रह्मचर्य की बात ही अलग है! चौबीस घंटे हमारा दिमाग और आँखें दुराचार में लगी रहती हैं। जब आपकी सारी शक्ति इसी में खर्च हो जायेगी तब फिर आपका सहस्रार-चक्र (कुण्डलिनी-जागरण की अंतिम अवस्था) कहाँ से जगेगा? सहस्रार-चक्र में लगने वाली सारी शक्ति इसी में लय कर देंगे, तब फिर वह जागेगा कैसे? सहस्रार को जाग्रत करने वाला जो प्रकाश है, वह तो आपकी आँखों के रास्ते तरंगों के जरिये नष्ट हो जायेगा। इसके अन्दर जो गर्मी थी, ऊर्जा थी वह तो आपने ख़त्म कर दी।

🔷 इसी तरह आहार के आधार पर जो आपका रक्त बनता है और जिससे बनता है मन; तमोगुणी अन्न, अनीति-बेईमानी का कमाया हुआ अन्न, हराम का कमाया हुआ अन्न खाकर के आपने उसे तमोगुणी बना दिया है। उसे आप अध्यात्म में, भगवान में स्थिर कैसे कर पाएंगे?

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan 30 March

🔷 The path followed by great men of the time show us the right way of living. If we follow them we will also attain the same aim of life as they could. Success of our life and wisdom can be attained on their guidance. Our life should not be like depressed, pessimistic or like those who are totally materialistic. We should not be hippocratic either in our talks and actions. That is our show of life totally different then what we are.

🔶 We should work hard for our progress in life, but should not disturbed in our present situation. Money is not everything in life. If we develop our nature and behavior and create an atmosphere of happiness by sharing and caring for other. We can enjoy the bliss of life.

🔷 When one’s Soul attain oneness with super-consciousness or God, it means that beastile behavior (selflessness) gets change into divinity, the beggar becomes a donor and so on. This type of change in human nature is known as unity with God – vilay, visarjan and sharnagati or total surrender to God. At that level the devotee and God become one or adwait i.e. oneness (no two). 
                                       
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (अन्तिम भाग)

🔷 भावी जीवन की आपकी रूपरेखा क्या हो, आप केवल अपने ही लिए ही नहीं जिएँ, उसमें समाज की भी हिस्सेदारी है, लोगों की भी हिस्सेदारी है, भगवान की भी हिस्सेदारी है, आदर्शों की भी हिस्सेदारी है, धर्म और संस्कृति की भी हिस्सेदारी है—उस हिस्सेदारी को आप कैसे निभा पायेंगे? उसके बारे में शिक्षण, आपका सायंकाल का शिक्षण इस उद्देश्य के लिए है, आप इस उद्देश्य को समझिये। आप घटना को देखेंगे और यहाँ के क्रम को देखेंगे, तो ऊपर ही दृष्टि रह जाएगी। दृष्टि को भीतर ले जाइए, दर्शन समझिये यहाँ के कल्प का और यह मानकर चलिए कि यहाँ कल्प का मतलब है—बदल डालना।

🔶 अब आपको यहाँ से बदलते हुए जाना है। घर जाकर आपको अपना बदला हुआ रूप दिखाना है। घर जाकर के आपके भावी जीवन में आपका क्रिया-कलाप और आपका उपक्रम ऐसा होना चाहिए, जिसमें पिछले जीवन से कोई संगति न हो। आप एक, आपका ईमान दो, आपका भगवान तीन, तीन तो आप ही के हैं सहपाठी। इन तीनों के साथ में तो आप सारे जीवन की मंजिल पूरी कर सकते हैं। जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों के बहकावे में आएँ? जरूरी क्या है कि आप दूसरों को प्रसन्न करने की कोशिश करें? अपने ईमान को प्रसन्न कर लीजिए, बहुत है—भगवान को प्रसन्न कर लीजिए बहुत है।

🔷 आत्मा और परमात्मा को जो आदमी प्रसन्न कर सकते हैं, सारी दुनिया उनसे प्रसन्न रहती है अथवा चलिए यह मान लें—सारी दुनिया प्रसन्न न भी है, नाराज बनी है, तो उस नाराजगी से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। आपकी आत्मा नाराज हो, आपका परमात्मा नाराज और सारी दुनिया आपसे प्रसन्न बनी रहे और आरती उतारती रहे, तो उससे कुछ बनने वाला भी नहीं है। यही चिन्तन है, जो आपको एक महीने लगातार अपने मनःक्षेत्र में घुमाते रहना चाहिए। मन को बदलिए, सोचने के तरीके बदलिए, जीवन की कार्य-पद्धति बदलिये। बहुत कुछ बदलना है आपको। अगर बदल डालेंगे, तो मजा आ जाएगा! बस, आज तो मुझे इतना ही कहना था आपसे।

॥ॐ शान्ति:॥

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 76)

👉 सहस्रदल कमल पर सद्गुरु की दिव्यमूर्ति का ध्यान

🔷 सद्गुरु के ध्यान में रमी ऐसी ही एक गुरुकृपा सिद्ध महातपस्विनी माँ ज्योतिर्मयी का कथा प्रसंग बड़ा ही प्रेरक है। माता ज्योतिर्मयी का विवाह अल्पायु में उनके मायके वालों ने कर दिया था; पर देव का आघात उनके पति नहीं रहे। पति के बूढ़े माता-पिता भी इकलौते पुत्र के वियोग की वजह से स्वर्ग सिधार गए। इधर मायके वालों पर भी दुर्भाग्य की कुदृष्टि थी। वह थी भी माता-पिता की इकलौती कन्या। पुत्री की इस दारुण वेदना से विह्वल माता-पिता अधिक दिन जीवित न रह पाये। वे भी परलोकवासी हो गए। बारह-तेरह वर्ष की बालिका ज्योतिर्मयी का इस संसार में अपना कोई न रहा।
  
🔶 रोती-बिलखती, यह विधवा बालिका अपने जीवन के घने अँधेरे से घबरा गई। क्या करें? कहाँ जाएँगे? ये सवाल उसके सामने भूखे शेर की तरह गर्जने लगे। इनसे छुटकारा पाने के लिए उसके पास मात्र गंगा की गोद के सिवा और कोई भी रास्ता न था। सो उसने अपने गाँव के पास बहती हुई गंगा नदी की धारा में प्राण त्यागने की ठान ली। रात के घने अँधेरे में जब वह गंगा की गोद में छलाँग लगाने के लिए उद्यत थी, तभी किसी ने पीछे से आकर उसका हाथ पकड़ लिया। अचानक इस तरह हाथ पकड़ लेने पर वह चिहुँकी और चौंकी। पीछे मुड़कर देखा, तो गैरिक वस्त्रधारी एक वृद्ध संन्यासी खड़े थे। उनके श्वेत केश शुभ्र चाँदनी में चाँदी की तरह चमक रहे थे।
  
🔷 उन्होंने प्यार से उसका हाथ थाम कर केवल इतना कहा- बेटी! जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान् होता है। भगवान् अपने इस सबसे प्यारे बच्चे की सहायता के लिए किसी न किसी को अवश्य भेजता है। उसी ने तुम्हारे लिए मुझे भेजा है। आओ तुम मेरे साथ आओ। उन संन्यासी के स्वरों में माँ की ममता थी। बालिका ज्योतिर्मयी ने उन पर सहज विश्वास कर लिया। वही उनके गुरु हो गए और भरोसा, गुरु का ध्यान ही उसका धर्म बन गया। इसी धर्म के निर्वाह में उसके दिवस-रात्रि बीतने लगे।
  
🔶 प्रातः स्नान आदि नित्यकर्मों से निबटकर वह सद्गुरु के ध्यान में खो जाती। सहस्रदल कमल पर गुरुदेव की भव्यमूर्ति का ध्यान यही उसकी साधना थी। नियमित अभ्यास के प्रभाव से ध्यान का चुम्बकत्त्व घना होता गया और इस चुम्बकत्व ने उसके प्राण प्रवाह की गति बदल दी। निम्नगामी प्राण विद्युत् ऊर्ध्वगामी होने लगी। जो ऊर्जा निम्न केन्द्रों पर एकत्रित रहती थी। अब उसने ऊर्ध्वगामी होकर चेतना के उच्च केन्द्रों को जाग्रत् करना प्रारम्भ कर दिया। चक्रों के जागरण, बेधन एवं प्रस्फुटन की क्रिया चल पड़ी। सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, काम करते हुए ज्योतिर्मयी की भावनाएँ सहस्रदल कमल में स्थापित सद्गुरु की चेतना में विलीन होती रहती थी। समय के साथ इसमें प्रगाढ़ता आती गयी।
  
🔷 वर्षों बीत गए और गुरु ने स्थूल देह का त्याग कर दिया; पर उनकी सूक्ष्म चेतना के साथ ज्योतिर्मयी का अभिनव साहचर्य था। वह हमेशा कहती थी कि सच्चा शिष्य हमेशा अपने गुरु के साथ रहता है। वह अपने गुरु में रहता है और गुरु उसमें समाए रहते हैं। अब उसका व्यक्तित्व सभी आध्यात्मिक सिद्धियों, शक्तियों एवं विभूतियों का भण्डार बन गया। आध्यात्मिक साधना की दुर्लभ कही जाने वाली अवस्थाओं को उसने सहज प्राप्त कर लिया। हालाँकि उसके आस-पास के लोग उसकी इस उच्च स्थिति से अनजान थे। उन्हें तो इस सत्य का तब पता चला, जब हिमालय की दुर्गम कन्दराओं में तप करने वाले योगिराज महानन्द ने उन्हें बताया कि तुम्हारे गाँव के पास गंगा किनारे वास करने वाली माँ ज्योतिर्मयी परम योगसिद्ध हैं और उन्हें यह अवस्था सद्गुरु के ध्यान से मिली है। इस सच को सुनकर सभी कह उठे- सद्गुरु की महिमा अनन्त! इस अनन्त महिमा के अनन्त विस्तार का अगला आयाम इस प्रकार है

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 118

बुधवार, 28 मार्च 2018

👉 मित्रता हो वहाँ संदेह न हो

🔶 एक फकीर बहुत दिनों तक बादशाह के साथ रहा बादशाह का बहुत प्रेम उस फकीर पर हो गया। प्रेम भी इतना कि बादशाह रात को भी उसे अपने कमरे में सुलाता। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते।

🔷 एक दिन दोनों शिकार खेलने गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। बादशाह ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। बादशाह ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा फकीर को दिया। फकीर ने टुकड़ा खाया और बोला, ‘बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया।

🔶 एक टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी फकीर को मिल गया। फकीर ने एक टुकड़ा और बादशाह से मांग लिया। इसी तरह फकीर ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब फकीर ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो बादशाह ने कहा, ‘यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।’.और सम्राट ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया।

🔷 मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। राजा बोला, ‘तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?’ उस फकीर का उत्तर था, ‘जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं? सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले। दोस्तों जहाँ मित्रता हो वहाँ संदेह न हो।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 29 March 2018

👉 Only Remorse can save from the punishment of wicked acts

🔶 It is fair to say that if we had behaved badly or done something unfair to someone, we cannot just ignore it as if it never happened. It may be possible that the person who was mistreated has gone away and may not be accessible or traceable any more. In such a situation, it may not be possible to make up for what we had done to him/her. However, there is another way to accomplish it. Every person is a part of society. Hence, damage or harm caused to any individual is, in reality, damage caused to society. We can compensate damage we caused to that individual by doing as much good to society. When the amount of good done to society makes up for the amount of harm done to the individual, it can be safely said that we have atoned for the wrongdoing and have come to a point where we can free us from any sense of guilt.

🔷 It is absolutely impossible to set us free from any wrongdoing by means of observing some cheap religious rituals. Reading sacred texts and good thoughts, satasanga (staying in touch with people of great character), listening to discourses and devotional songs, going on pilgrimage, fasting, etc. help us to purify our mind and also enlighten us to restrain, from now on, our tendency to commit anything wrong. The scriptures speak about religious rites and observances having a grand ability to cleanse us from our sins. They only mean to say that the cleansing of the mind (achieved through such observances) may negate any possibility of that individual committing sinful acts in future.

🔶 The inescapable justice system of God directs that anyone who wishes to absolve them from the consequences of their wrongdoing should devote themselves to selfless services to the community that can boost up its goodness or merits. This can help anyone to cleanse him/herself from any past wrongdoings and thus, imparts peace and freedom from guilt and unworthy intentions.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP AND KARYAKRAM – Vangmay 66 Page 6.18

👉 दुष्कर्मों के दण्ड से प्रायश्चित्त ही छुड़ा सकेगा

🔶 यह ठीक है कि जिस व्यक्ति के साथ अनाचार बरता गया अब उस घटना को बिना हुई नहीं बनाया जा सकता। सम्भव है कि वह व्यक्ति अन्यत्र चला गया हो। ऐसी दशा में उसी आहत व्यक्ति की उसी रूप में क्षति पूर्ति करना सम्भव नहीं। किन्तु दूसरा मार्ग खुला है । हर व्यक्ति समाज का अंग है। व्यक्ति को पहुँचाई गई क्षति वस्तुत: प्रकारान्तर से समाज की ही क्षति है । उस व्यक्ति को हमने दुष्कर्मों से जितनी क्षति पहुँचाई है उसकी पूर्ति तभी होगी जब हम उतने ही वजन के सत्कर्म करके समाज को लाभ पहुँचाये। समाज को इस प्रकार हानि और लाभ का बैलेन्स जब बराबर हो जायेगा तभी यह कहा जायेगा कि पाप का प्रायश्चित हो गया और आत्मग्लानि एवं आत्मप्रताडऩा से छुटकारा पाने की स्थिति बन गई।

सस्ते मूल्य के कर्मकाण्ड करके पापों के फल से छुटकारा पा सकना सर्वथा असम्भव है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन, तीर्थ, व्रत आदि से चित्त में शुद्धता की वृद्धि होना और भविष्य में पाप वृत्तियों पर अंकुश लगाने की बात समझ में आती है। धर्म कृत्यों से पाप नाश के जो माहात्म्य शास्त्रों में बताये गये हैं उनका तात्पर्य इतना ही है कि मनोभूमि का शोधन होने से भविष्य में बन सकने वाले पापों की सम्भावना का नाश हो जाये।

🔶 ईश्वरीय कठोर न्याय व्यवस्था में ऐसा ही विधान है कि पाप परिणामों की आग में जल मरने से जिन्हें बचना हो वे समाज की उत्कृष्टता बढ़ाने की सेवा-साधना में संलग्न हों और लदे हुए भार से छुटकारा प्राप्त कर शान्ति एवं पवित्रता की स्थिति उपलब्ध कर लें।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम- वांग्मय 66 पृष्ठ 6.18

👉 अपने ऊपर विश्वास रखो

🔶 मित्रो ! स्मरण रखिए, रुकावटें और कठिनाइयाँ आपकी हितचिंतक हैं। वे आपकी शक्तियों का ठीक-ठीक उपयोग सिखाने के लिए हैं। वे मार्ग के कंटक हटाने के लिए हैं। वे आपके जीवन को आनंदमय बनाने के लिए हैं। जिनके रास्ते में रुकावटें नहीं पड़ीं, वे जीवन का आनंद ही नहीं जानते। उनको जिंदगी का स्वाद ही नहीं आया। जीवन का रस उन्होंने ही चखा है, जिनके रास्ते में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ आई हैं। वे ही महान् आत्मा कहलाए हैं, उन्हीं का जीवन, जीवन कहला सकता है।

🔷 उठो ! उदासीनता त्यागो। प्रभु की ओर देखो। वे जीवन के पुंज हैं। उन्होंने आपको इस संसार में निरर्थक नहीं भेजा। उन्होंने जो श्रम आपके ऊपर किया है, उसको सार्थक करना आपका काम है। यह संसार तभी तक दु:खमय दीखता है, जब तक कि हम इसमें अपना जीवन होम नहीं करते। बलिदान हुए बीज पर ही वृक्ष का उद्ïभव होता है। फूल और फल उसके जीवन की सार्थकता सिद्घ करते हैं।

🔶 सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतों का खिले चेहरे से सामना करो। आत्मा सबसे बलवान है, इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यह विश्वास ईश्वरीय विश्वास है। इस विश्वास द्वारा आप सभी कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं। कोई कायरता आपके सामने ठहर नहीं सकती। इसी से आपके बल की वृद्धि होगी। यह आपकी आंतरिक शक्तियों का विकास करेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan 29 March

🔶 The true happiness is in which mind becomes one with soul. Mind is operation of brain and soul is purest form of mind or sacred consciousness. In the language of Yoga that is when mind acts as a soul the God consciousness. This is true yoga. This union of soul and mind is known as highest bliss. Salvation, God realization, ultimate the highest pleasure and bliss beyond any imagination of material pleasure of the world.

🔷 We must love our younger and pay our respects and regards to elders. Our attitude can keep your position safe. Every man at the lowest level of society keeps an impression of highest esteem for the self-disrespect of his vices and weakness. A feeling of his own honesty, sacredness, nobility and sincerity always exists in his mind. Really that proves the concept of solid water molecule H2O is always conscious of its purity inside. Remove pollution outside the molecule configuration.

🔶 Your character is reflected in the reaction of people around you. One’s progress depends on this reaction of your sub-ordinates, officers, clients and those who get concerned to you. Because the persons and society observes your all actions and reactions. The true personality is not only your courteous behavior but the personality waves radiate both from your subtler body also, which they read.
                                        
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 8)

🔶 अगर आपने नारी के बारे में विकृत विचार बना रखे हैं, तो नारी आपको काट खायेगी डाकिन की तरह और साँपिन की तरह डस लेगी; आपका स्वास्थ्य खराब कर देगी, आपकी अक्ल को खराब कर देगी, आपके चिन्तन को भ्रष्ट कर देगी और आपको लम्पट बना देगी, अगर आपका दृष्टिकोण गलत है तब। अगर आपने दृष्टिकोण सही कर लिया तब? तब वही नारी आपको देवता की तरह वरदान दिया देगी। शिवाजी को एक नारी ने ही देवता जैसा वरदान दिया था, आपको याद होगा। आप ऐसा नहीं कर सकते? आप चिन्तन को बदलिये, नहीं तो आप यहाँ किसलिए आए हैं? यहाँ भी नहीं करेंगे, तो क्या करेंगे? केवल मात्र चिन्ह-पूजा करते रहेंगे? टाइमपास करते रहेंगे? नहीं, टाइमपास मत कीजिए, चिन्ह-पूजा मत कीजिए। अपने सारे-के चिन्तन को आमूल-चूल परिवर्तन करने की कोशिश कीजिए।

🔷 ब्रह्मचर्य के बारे में विचार और चिन्तन करते रहिए। बीच में जब कभी भी आपकी आँखें खुलें, फालतू समय हो और नारी का विचार आये, तो केवल बेटी की दृष्टि से विचार कीजिए, बहिन की दृष्टि से विचार कीजिए, माता की दृष्टि से विचार कीजिए, यहाँ तक कि अपनी धर्मपत्नी का भी सहकर्मी की दृष्टि से विचार कीजिए। सीताजी और राम वनवास में रहते थे—वह उनकी सहकर्मी थीं और गाँधीजी, कस्तूरबा रहते थे—वह भी सहकर्मी थीं, तो आप ऐसा क्यों नहीं कर सकेंगे? रामकृष्ण परमहंस और उनकी धर्मपत्नी शारदामणि जी साथ-साथ रहे, सारे जीवनभर रहे; लेकिन कभी उन्होंने एक-दूसरे को कामवासना की दृष्टि से नहीं देखा। आप उतना न कर पाएँ, तो कम-से इतना तो कीजिए कि नारियों के प्रति जो आपकी कुदृष्टि जीवनभर रही है, जिससे आपकी आँखों का तेजस् खत्म हो गया है, आप उस तेजस् को फिर से प्राप्त करने की कोशिश कीजिए और अपना चिन्तन बदल दीजिए। आपको यही सब बातें याद करनी हैं।

🔶 आपको यहाँ स्वाध्याय नियमित करने के लिए बताया गया है। आपको यहाँ सत्संग से जोड़कर रखा गया है। आपको कुछ सीखने के लिए और भावी योजनाओं को बनाने के लिए बताया गया है तथा उसके लिए मार्गदर्शन भी किया गया है; उसके लिए आपको तरह-तरह के कार्यक्रम भी दिए गए हैं। आपका यहाँ जो शिक्षण होता है, वह इसी दृष्टि से होता है। आपको रोटी कमाना आता है, नहाना-धोना भी आता है, व्यापार भी आता है, लेन-देन भी आता है, नौकरी करना भी आता है और जो काम नहीं आता, वह हम यहाँ सिखाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 75)

👉 सहस्रदल कमल पर सद्गुरु की दिव्यमूर्ति का ध्यान

🔶 ध्यान की इस भाव भरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भगवान् सदाशिव पराम्बा माँ भवानी से कहते हैं-

न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम्।
शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः॥ ९६॥

इदमेव शिवं त्विदमेवशिवं त्विदमेव शिवं त्विदमेव शिवम्।
मम शासनतो मम शासनतो मम शासनतो मम शासनतः॥ ९७॥
  
एवं विधं गुरुं ध्यात्वा ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम्।
तत्सद्गुरुप्रसादेन मुक्तोऽहमिति भावयेत्॥ ९८॥

🔷 गुरुदेव के अधिक कुछ नहीं है। गुरुदेव से अधिक कुछ नहीं है। गुरुदेव से अधिक कुछ नहीं है। गुरुदेव से अधिक कुछ नहीं है। यह शिव का आदेश है। यह शिव का आदेश है। यह शिव का आदेश है। यह शिव का आदेश है॥ ९६॥ भगवान् शिव कहते हैं- यह गुरु तत्त्व कल्याणकारी है। यह कल्याणकारी है। यह कल्याणकारी है। यह कल्याणकारी है। यह मेरा आदेश है। यह मेरा आदेश है। यह मेरा आदेश है। यह मेरा आदेश है॥ ९७॥ इस तरह (पिछली कड़ी में बतायी गयी) विधि से गुरुदेव का ध्यान करने से स्वतः ही ज्ञान उत्पन्न होता है। उन कृपालु सद्गुरु की कृपा से ‘मैं मुक्त हूँ’ ऐसा चिन्तन करना चाहिए॥ ९८॥
  
🔶 गुरुगीता के इन मंत्रों में सद्गुरु के ध्यान की फलश्रुति बतायी गयी है। यह ध्यान प्रक्रिया वही है, जिसकी कथा पिछली कड़ी में कही गयी थी। यह ध्यान अतिविशिष्ट है। इस ध्यान से सद्गुरु के सदाशिव होने का अनुभव मिलता है और यह अनुभव कहता है कि गुरु से अधिक और कुछ नहीं है। यही परम कल्याणकारी है। शिव के इस आदेश व उपदेश की सार्थकता उन्हें अनुभव होती है, जो अपने सद्गुरु के ध्यान में रमे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 117

👉 सबसे बड़ा पुण्य!

🔷 एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था. यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था।

🔶 एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए. राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा-

🔷 “महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?”

🔶 देव बोले- “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं।”

🔷 राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?”

🔶 देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया।

🔷 राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है।”

🔶 उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए।

🔷 कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी. इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी।

🔶 राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा- “महाराज ! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?”

🔷 देव ने कहा- “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं!”

🔶 राजा ने कहा- “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है?”

🔷 देव महाराज ने बहीखाता खोला, और ये क्या, पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था।

🔶 राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ?

🔷 देव ने कहा- “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं. जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है. ऐ राजन! तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है। परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं।

🔶 देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे..”

🔷 अर्थात ‘कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे.’ राजन! भगवान दीनदयालु हैं. उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है.. सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो. दीन-दुखियों का हित-साधन करो. अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है..”

🔶 राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं।

🔷 मित्रों, जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है. हमारे पूर्वजों ने कहा भी है- “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है. और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप वह ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे।

👉 आज का सद्चिंतन 28 March 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 March 2018


👉 आस्तिकता की कसौटी

🔷 सन्त प्रवर महात्मा तुलसीदास की अनुभूति है-
उमा जे रामचरन रत बिगत काम मद क्रोध। निल प्रभुमय देखहिं जगत कासन करहिं विरोध॥
🔶 जो भगवान को मानते हैं, उन पर श्रद्धा करते हैं, उनके अस्तित्व में विश्वास रखते हैं उनके न काम होता है, न मद् होता है और न क्रोध। वे संसार के अणु-अणु में प्रभु का दर्शन करते हैं तब उनका विरोध किसके साथ हो? तुलसीदास जी की आस्तिकता की इस परिभाषा पर किन किन आस्तिकों को आज परखा जा सकता है?

🔷 धर्म के नाम पर बड़े बड़े आडंबर करने वालों की आज कमी नहीं है, लेकिन उनके जीवन में प्रभु के दर्शन नहीं होते। ऐसा मालूम होता है जैसे जीवन के अन्य व्यापारों की तरह धर्म का भी वे एक व्यापार कर लेते हैं और सबसे अधिक उसकी कोई कीमत नहीं है।

🔶 भगवान पर मेरा विश्वास है ऐसे कहने वाले भी मिलते हैं लेकिन ये शब्द मुँह से निकलते हैं या हृदय से इसका निर्णय करना कठिन है। उनका व्यवहार रागद्वेष पूर्ण देखा जाता है और स्वयं भी उन्हें अपने विश्वास शब्द का विश्वास नहीं होता। प्रभु आज उपेक्षणीय हो गये हैं लेकिन तब भी हम आस्तिक हैं इसे बड़े जोर से चिल्लाकर कहते लोग पाये जाते हैं।

🔷 जिसके हृदय में प्रभु का निवास है और जो उसका दर्शन करता है उसका जीवन प्रभुमय होता है। उसके जीवन में समत्व होता है। वह संसार को प्रभु का विग्रह केवल मानता ही नहीं, अनुभव भी करता है। प्रभु उसके आचार में, प्रभु उसके जीवन में समा जाते हैं। वह व्यक्ति प्रभु की अर्चना के लिये किसी समय को अपने कार्यक्रम में अलग नहीं रखता। उसके जीवन का कार्यक्रम ही प्रभुमय होता है। उसका खाना पीना सोना जागना चलना फिरना तथा जगत के समस्त व्यवहारों में प्रभु समाये रहते हैं। ऐसे आस्तिक के लिए सम्प्रदायों के अलग नाम नहीं हैं, उसके लिए प्रत्येक घर प्रभु का मन्दिर है। और प्रत्येक शरीर प्रभु का विग्रह वहाँ भेदभाव की गुँजाइश ही नहीं रहती । वह संसार में भगवान की नित्य लीला का रसास्वादन करना है और स्वयं को भी भगवान की लीला का एक पात्र मात्र समझना है।

🔶 आस्तिक की न अपनी कोई कामना होती है, न माँग। वह न किसी से ऊंचा होता है न नीचा, न बड़ा न छोटा, न पवित्र न अपवित्र। उसको किसी प्रकार का अभाव नहीं सताता ।

🔷 आज की दुनिया रागद्वेष से पूर्ण है। ऊंच नीच के भावों से भरी हुई है। यद्यपि मन्दिर मस्जिद और गिरजाघरों की संख्या बराबर बढ़ रही है लेकिन आस्तिकता की सब ओर उपेक्षा की जा रही है। हम कहने को तो आस्तिक बनते हैं लेकिन हृदय में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। इस तरह हमारा जीवन आत्म प्रवञ्चना से भरा हुआ है। हम अपने आपको धोखा दे रहे हैं या अपनी समझ को लेकर हम धोखा खा रहें हैं धोखे का यह जीवन आस्तिक जीवन नहीं है इसे भी समझने वालो की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है।

🔶 भारत के जीवन में जब जब आस्तिकता का जमाना रहा है, वह हमेशा खुशहाल रहा है लेकिन जैसे जैसे उसकी उपेक्षा की जाती रही है उसकी खुशहाली हटती गई है। आज कलह और क्लेशों से भरा हुआ भारत हम सब की आस्तिकता का डिमडिम घोष कर रहा है और फिर भी हम अपने आपको आस्तिक समझे बैठे हैं।

🔷 आस्तिकता अनन्त शान्ति की जननी है। जहाँ आस्तिकता होगी वहाँ अशांति का कोई चिन्ह दृष्टि गोचर नहीं होना चाहिए। ईश्वर का सच्चा विश्वासी पवित्र अन्तःकरण का होता है तदनुसार उसके व्यवहार तथा कर्म परिपाक भी सुमधुर ही होते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-1950 अप्रैल पृष्ठ 10

👉 तपस्वी बने

🔷 मित्रो! तपस्वी का जीवन जीने के लिए आपको हिम्मत और शक्ति इकठ्ठी करनी चाहिए। तपाने के बाद हर चीज मजबूत हो जाती है। कच्ची मिट्टी को जब हम तपाते हैं तो तपाने के बाद मजबूत ईंट बन जाती है। कच्चा लोहा तपाने के बाद स्टेनलेस स्टील बन जाता है। पारे को जब हकीम लोग तपाते हैं तो पूर्ण चंद्रोदय बन जाता है। पानी को गरम करते हैं तो भाप बन जाता है और उससे रेल के बड़े-बड़े इन्जन चलने लगते हैं।

🔶 कच्चे आम को पकाते हैं तो पका हुआ आम बन जाता है। जब हम वेङ्क्षल्डग करते हैं तो लोहे के दो टुकड़े जुड़ जाते हैं। उस पर जब हम शान धरते हैं तो वह हथियार बन जाता है। बेटे! यह सब गलने की निशानियाँ हैं। आपको अपने ऊपर शान धरनी चाहिए और भगवान के साथ वेङ्क्षल्डग करनी चाहिए। आपको अपने आप को इतना तपाना चाहिए कि आप पानी न होकर स्टीम भाप बन जाएँ। कौन-सी वाली स्टीम? जो रेलगाड़ी को धकेलती हुई चली जाती है। यह गरमी के बिना नहीं हो सकता। आपको तपस्वी बनने के लिए यही करना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan 28 March

🔷 It is through self-discipline and self-restrain that one develops control on his treasure mind. A firm believe on the ideality of life develops courage to act on those lines. This self introspection develops respect for others and develops gentlemen ship and responsibility of a good citizen. Without constant vigilance on self. True culture can not develop; only outward show of few courteous words will not hide your true nature for a long time.

🔶 As it is said that man creates his own destiny. It means that every man have given a choice for self-growth in all dimensions. One must select his own ideal goal of life. If others don’t help he should works hard alone. This royal road may create obstructions and resistance but man have power with in to overcome that and attain excellence in any field of life.

🔷 Try to visualize your own thoughts of mind. Analyze them. It’s most sacred form is covered by some evil and polluted coats. Try to work on them. You will be able to find the sacred component and an eternal peace in it. It is something like water; any pollution in water can be separated out as it is always outside the molecule of water. H2O, the Fractional distillation will always remove pollution and clear colorless, tasteless, odorless, specific gravity on water will be collected by cooked steam. The thoughts should be directed towards God- Who is embodiment of truth and ideality. It needs constant vigilance and practice. This is true divine nature of man. Which is true spirituality, religion is sectism which we have created. 
                                       
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 7)

🔷 हमारा उदाहरण है आपके सामने। फिजूलखर्ची हमने कानी कौड़ी की भी नहीं की है। जो भी हमारे पास था, उसको बेहतरीन कामों में लगा दिया है, जिसका परिणाम आपने देखा न! देखा होगा। हमारे गाँव में स्कूल बना हुआ है, गायत्री तपोभूमि बनी हुई है, आप देख लीजिए। हमारे पास जमीदारियों के बॉण्ड आए थे; सब खत्म हो गए, सब लगा दिए। आप ऐसा नहीं कर सकते? पैसे को फिजूलखर्चियों में लगाएँगे, औलाद के लिए जमा करेंगे—आप ऐसी योजना नहीं बना सकते। आप यहाँ से जाने के बाद में जो साधन हैं, उन्हीं को बढ़ाते रहेंगे—ऐसा ही सोचते रहेंगे। बढ़ाने की बात मत सोचिए। पहली बात वहाँ से सोचिए कि हम ठीक तरह इनका कैसे इस्तेमाल कर पाएँ। जब ठीक तरीके से इस्तेमाल करेंगे, तब आप यकीन रखिए भगवान आपको दो हाथ से नहीं, चार हाथ से देगा।

🔶 भगवान के चार हाथ भी हैं, इनसान के दो हाथ ही हैं। विष्णु भगवान के देखे हैं न? चार हाथ हैं। सहस्त्रशीर्षा पुरुषः—उसके हजारों हाथ हैं और आपको हजारों हाथों से इतना देगा, जिसे आप सँभाल भी नहीं पाएँगे। हमारा उदाहरण आप देख लीजिए, हमने अपने आपको खाली कर दिया; भगवान की चीज भगवान् को सौंप दी है और भगवान ने अपनी चीजें हमको सौंप दी हैं। क्या आप ऐसी हिम्मत नहीं कर सकते? आप ऐसी दूरदर्शिता नहीं दिखा सकते? आपको ऐसी बुद्धिमानी नहीं आती? आप ऐसी अक्ल से रिश्ता नहीं जोड़ना चाहते? अगर जोड़ना चाहते हो, तो कृपा कीजिये और आप यहाँ संयमशील बनिए। पैसे के बारे में संयमशील, समय के बारे में संयमशील। आपको समय के बारे में अनुशासित किया गया है न? जब घण्टी बजती है, तब आपको आने के बारे में कहा गया है न? सुबह जब आपको प्रज्ञापेय मिलता है, तब घण्टी बजती है और आपसे यह आशा की जाती है कि आप समय पर पहुँच जाइए।

🔷 जब खाने-पीने के लिए घण्टी बजती है, तब आपसे यह आशा की जाती है कि आप बिना समय गँवाये जल्दी पहुँचेंगे। इसी तरह आपको हर टाइम-टेबिल के शिकंजे में कस दिया है। यह अभ्यास है आपका। भावी जीवन में आपको जिस शिकंजे में कसा जा रहा है, उसको आगे भी जारी रखें। केवल यहीं तक यह बातें सीमित नहीं हैं। जीभ को, आपसे संयम के लिए कहा गया है, केवल यहाँ के लिए ही नहीं, बल्कि सारे जीवन के लिए कहा गया है। आप बाहर भी जा करके रहिए। यहाँ एक कमरे में दो आदमियों को रहने की इजाजत नहीं है। अगर स्त्री-पुरुष हैं, तो भी दो कमरों में अलग-अलग रहेंगे; क्योंकि हर आदमी एकाकी बनकर रहे और दूसरी बात यह कि कभी वासनात्मक दृष्टि से एक-दूसरे को न देखें। आप वासनात्मक दृष्टि से मत देखिये। लड़कियाँ कहाँ चली जाएँगी दुनिया से? औरतें क्या मिट जाएँगी और औरतों के लिए मर्द नहीं रहेंगे क्या? मर्द रहेंगे; लेकिन उनके बीच जो जहर है, उस जहर को निकाल दीजिए। जहर निकल जाता है, तो साँप कितना सुन्दर मालूम पड़ता है! देखने में कितना अच्छा लगता है? और जहरीला होता है, तो काट खाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 74)

👉 सहस्रदल कमल पर सद्गुरु की दिव्यमूर्ति का ध्यान

🔷 गुरुगीता के महामंत्रों में सद्गुरु के ध्यान का संगीत है। इसकी सुरीली सरगम से एकाग्रता, स्थिरता, शान्ति एवं पवित्रता की धुनें रची जाती हैं। इसके प्रभाव से व्यक्तित्व की अन्तर्निहित शक्तियों को अपनी सार्थक अभिव्यक्ति मिलती है। शिष्य-साधक ज्यों-ज्यों अपने सद्गुरु के ध्यान में डूबता है, त्यों-त्यों उसकी भाव चेतना गुरुप्रेम में भीगती जाती है। वह अपने प्यारे सद्गुरु के रंग में रँगता चला जाता है। यह अनुभूति ऐसी है, जिसे केवल पाने वाला अनुभव करता है। इसे न तो कहा जा सकता है और न बताया जा सकता है। ध्यान के रूप और रंग कई हैं। इसकी विधियाँ और तकनीकें कई हैं। इनमें से सभी का अपना विशेष प्रभाव है; लेकिन सद्गुरु के ध्यान की भावदशा कुछ और ही है। इसके प्रभाव की रूप छटा के रंग ही निराले हैं।
  
🔶 इन्हीं में से कुछ रंगों की कथा पिछले मंत्रों  में कही गयी है। शिष्यों को यह बोध कराया गया कि गुरुदेव आनन्दमय रूप हैं। उनसे शिष्यों को आनन्द मिलता है। वे प्रभु प्रसन्नमुख एवं ज्ञानमय हैं। वे सदा ही आत्मबोध में निमग्न रहते हैं। योगीजन सदा उनकी स्तुति करते हैं। संसार रोग के एक मात्र वैद्य उन गुरुदेव की स्तुति मैं करता हूँ। उन गुरुदेव को मेरा नित्य नमन है, जिनकी भाव चेतना में उत्पत्ति, स्थिति, ध्वंस, निग्रह एवं अनुग्रह का सिलसिला सदा चलता रहता है। इसी समर्पण भरी भक्ति से अपने सहस्रदल कमल में गुरुदेव का स्मरण, ध्यान करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 116

सोमवार, 26 मार्च 2018

👉 जैसा अन्न वैसा मन!!

🔶 एक साधु ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए जा रहे थे और एक गांव में प्रवेश करते ही शाम हो गई। ग्रामसीमा पर स्थित पहले ही घर में आश्रय मांगा,वहां एक पुरुष था जिसने रात्री विश्राम की अनुमति दे दी। और भोजन के लिये भी कहा। साधु भोजन कर बरामदे में पडी खाट पर सो गया। चौगान में गृहस्वामी का सुन्दर हृष्ट पुष्ट घोडा बंधा था। साधु सोते हुए उसे निहारने लगा। साधु के मन में दुर्विचार नें डेरा जमाया, ‘यदि यह घोडा मेरा हो जाय तो मेरा ग्रामानुग्राम विचरण सरल हो जाय’। वह सोचने लगा, जब गृहस्वामी सो जायेगा आधी रात को मैं घोडा लेकर चुपके से चल पडुंगा। कुछ ही समय बाद गृहस्वामी को सोया जानकर, साधु घोडा ले उडा।
              
🔷 कोई एक कोस जाने पर साधु ,पेड से घोडा बांधकर सो गया। प्रातः उठकर  उसने नित्यकर्म निपटाया और वापस घोडे के पास आते हुए उसके विचारों ने फ़िर गति पकडी-‘अरे! मैने यह क्या किया? एक साधु होकर मैने चोरी की? यह कुबुद्धि मुझे क्यों कर सुझी?’ उसने घोडा गृहस्वामी को वापस लौटाने का निश्चय किया और उल्टी दिशा में चल पडा।
             
🔶 उसी घर में पहूँच कर गृहस्वामी से क्षमा मांगी और घोडा लौटा दिया। साधु नें सोचा कल मैने इसके घर का अन्न खाया था, कहीं मेरी कुबुद्धि का कारण इस घर का अन्न तो नहीं?, जिज्ञासा से उसगृहस्वामी  को पूछा- ‘आप काम क्या करते है,आपकी आजिविका क्या है?’ अचकाते हुए गृहस्वामी नें, साधु जानकर सच्चाई बता दी– ‘महात्मा मैं चोर हूँ,और चोरी करके अपना जीवनयापन करता हूँ’। साधु का समाधान हो गया, चोरी से उपार्जित अन्न काआहार पेट में जाते ही उस के मन में कुबुद्धि पैदा हो गई थी। जो प्रातः नित्यकर्म में उस अन्न के निहार हो जाने पर ही सद्बुद्धि वापस लौटी।

🔷 नीति-अनीति से उपार्जित आहार का प्रभावप्रत्यक्ष था।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 27 March 2018


👉 कहिए कम-करिये ज्यादा (अन्तिम भाग)

🔶 इसे हम बराबर देखते हैं कि केवल बातें बनाने वाला व्यक्ति जनता की नजरों से गिर जाता है। पहले तो उसकी बात का कुछ असर ही नहीं होता। कदाचित उसकी ललित एवं आकर्षक कथन शैली से कोई प्रभावित भी हो जाय तो बाद में अनुभव होने पर वह सब प्रभाव जाता रहता है। वाकशूर के पीछे यदि कर्मवीरता का बल नहीं तो वह पंगु हैं। जो बात कहनी हो उसको पहिले तोलिए फिर बोलिए। शब्दों को बाण की उपमा दी गई। एक बार बाण के छूट जाने पर उसे रोकना बस की बात नहीं। लोहे का बाण तो एक ही जन्म और शरीर को नष्ट करता है पर शब्द बाण तो भविष्य की युग युगीन परम्परा को भी नष्ट कर देता है।

🔷 यह सब ठीक होते हुए भी प्रश्न उठता है कि विश्व में वाकशूर ही क्यों अधिक दिखाई देते हैं। उत्तर स्पष्ट है-बोलना सरल है। इसमें किसी तरह का कष्ट नहीं होता। कार्य करने में कष्ट होता है अपनी रुचि वृत्ति-स्वभाव बुरी आदतों पर अंकुश लगाना पड़ता है। और यह बड़ा कठिन कार्य है इन्द्रियाँ स्वच्छंद हो रही हैं, विषय वासनाओं की ओर लपलपाकर बढ़ना चाहती हैं। इनका दमन किये बिना इच्छित और उपयोगी कार्य नहीं किया जा सकता। कष्ट एवं कठिनता होने पर भी जो हमारे व विश्व के लिये आवश्यक है वह तो करना ही चाहिये। अतः सच्चे कर्म योग का अभ्यास करने की आदत डालना आवश्यक है। अभ्यास ही सिद्धि का मूलमंत्र है।

🔶 कहना हम सब को बहुत आता है। पर करना नहीं आता या चाहते नहीं। केवल दूसरों की आलोचना एवं अपनी बातें बघारना ही हमारा मनसूबा बन गया है। हमारे पांडित्य में परोपदेश और विद्या ‘विवादाय’ चरितार्थ हो रहे हैं। इन्हें हमें आत्मसुधार और विश्व उद्धार में लगाना है। अन्यथा हमारा अध्ययन ‘आप बाबाजी बैंगन खावे औरों को प्रबोध सुनावें’ सा ही रहेगा।

🔷 कई कहते हैं- “हमारी कोई सुनता ही नहीं, कहते-कहते थक गये पर सुनने वाले कोई सुनते नहीं अर्थात् उन पर कुछ असर ही नहीं होता”। मेरी राय में इसमें सुनने वालों से अधिक दोष कहने वालों का है। कहने वाले करना नहीं जानते। वे अपनी ओर देखें। आत्मनिरीक्षण कार्य की शून्यता की साक्षी दे देगा। वचन की सफलता का सारा दारोमदार कर्मशीलता में है। आप चाहे बोलें नहीं, थोड़ा ही बोलें पर कार्य में जुट जाइये। आप थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि लोग बिना कहे आपकी ओर खिंचे जा रहे हैं। अतः कहिये कम, करिये अधिक। क्योंकि बोलने का प्रभाव तो क्षणिक होगा पर कार्य का स्थायी होता है। जैन योगी चिदानन्द जी ने क्या ही सुन्दर कहा है-
कथनी कथै कोई। रहणी अति दुर्लभ होई॥

🔶 अन्य कवियों ने भी कहा है-
कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोय।
कथनी तजि करनी करै, विष से अमृत होय।1।

कथनी बदनी छांडी के, करनी सों चितलाय।
नरहिं नीर पिये बिना, करनी प्यास न जाय।2।

करनी बिन  कथनी कथै, अज्ञानी दिन रात।
कूकर ज्यों भूँसत, फिरै, सुनी सुनाई बात।3।

📖 अखण्ड ज्योति-जून 1950 पृष्ठ 16

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/June/v1.16

👉 व्यक्तित्व को विकसित कीजिए

🔶 मित्रो ! आप अपने व्यक्तित्व को विकसित कीजिए ताकि आप निहाल हो सकें। दैवी कृपा मात्र इसी आधार पर मिल सकती है और इसके लिए माध्यम है श्रद्धा। श्रद्धा मिट्टी से गुरु बना लेती है। पत्थर से देवता बना देती है। एकलव्य के द्रोणाचार्य मिट्टी की मूर्ति के रूप में उसे तीरंदाजी सिखाते थे। रामकृष्ण की काली भक्त के हाथों भोजन करती थी। उसी काली के समक्ष जाते ही विवेकानंद नौकरी-पैसा भूलकर शक्ति-भक्ति माँगने लगे थे।

🔷 आप चाहे मूर्ति किसी से भी खरीद लें। मूर्ति बनाने वाला खुद अभी तक गरीब है। पर मूर्ति में प्राण श्रद्धा से आते हैं। हम देवता का अपमान नहीं कर रहे। हमने खुद पाँच गायत्री माताओं की मूर्ति स्थापित की हैं, पर पत्थर में से हमने भगवान पैदा किया है श्रद्धा से। मीरा का गिरधर गोपाल चमत्कारी था। विषधर सर्पों की माला, जहर का प्याला उसी ने पी लिया व भक्त को बचा लिया। मूर्ति में चमत्कार आदमी की श्रद्धा से आता है। श्रद्धा ही आदमी के अंदर से भगवान पैदा करती है। श्रद्धा का आरोपण करने के लिए ही यह गुरुपूर्णिमा का त्यौहार है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Service is Superior to Worship

🔶 A monk had two disciples. Both were totally dedicated worshippers of God. After the worship they used to help their Guru in treating the patients who visited their monastery.

🔷 One day, a patient arrived in the early morning. It was the time of worship. The monk called for his disciples for attending to the patient. The disciples replied, "Our worship is still not complete. We will come after sometime." But, the monk called them again. This time, they did come grumbling about the incomplete worship. The monk said very seriously, "I have called you to serve this suffering man. Prayers can be performed even by the angels, but only men can help other men in need. Service has higher priority over worship, since angels can not perform service." The two disciples were ashamed of their behavior and from that day they gave higher priority to service over worship."
                                       
📖 From Pragya Puran

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 6)

🔶 आप यहाँ रहिए, हम आपको पका देते हैं। आप आये थे, तब कच्चे बर्तन के रूप में थे और आप जब जाना तब हमारे अवे में पके हुए होकर जाना। मुर्गी अपने बच्चे को छाती से लगाये हुए बैठी रहती है, कछुवी अपने अण्डे को बालू में रख देती है; लेकिन देख−भाल करती रहती है। हम आपको कछुए के अण्डे की तरह कोठरी में बिठा तो गये हैं; पर आप यह मत सोचिए कि हम आपकी तरफ गौर नहीं करते और ध्यान नहीं देते। हम बराबर आपकी तरफ ध्यान दे रहे हैं। किस बात पर ध्यान दे रहे हैं? कि आपका मनःसंस्थान ऊँचा हो जाए, आपकी भावनाओं का स्तर ऊँचा हो जाए, आपके जीवन का लक्ष्य ऊँचा हो जाए, जिससे आपके व्यक्तित्व की गरिमा आगे बढ़ती हुई चली जाए।

🔷 हम केवल यही विचार करते हैं और कुछ विचार नहीं करते—आप सुन सकते हो, तो सुन लेना; नहीं सुन सकते, तो आप फिर हैं ही चिकने घड़ों की तरह; वैसे ही बने रहना, जैसे आए थे, वैसे ही चले जाना। मुर्गी अपने अण्डे को पकाने के लिए छाती से लगाये बैठी रहती है और आपको भी हम मुर्गी की तरह छाती से लगाये हुए हैं कि जब आप पकें, जब आप फूटें और जब आप फुदकना शुरू करें, चूजे की तरह, तो आपका बहुत शानदार जीवन होगा—हमारी भी महत्त्वाकांक्षा यही है। आप भी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को हमारी तरह गला पाएँ, तो मजा आ जाए! यहाँ क्या-क्या काम कराये जाते हैं? कई चीजें कराई जाती हैं—संयम करा रहे हैं, वास्तविक बात यह है।

🔶 आपको हमने कितनी बार कहा है कि आप आहार के बारे में संयम कीजिए और न सिर्फ आहार के बारे में, बल्कि विचारों के भी बारे में और न सिर्फ विचारों के बारे में, बल्कि उनके व्यवहार के बारे में भी। आपसे चार तपों का जिक्र किया था न, आपको चार तप यहाँ बराबर करते रहने चाहिए। धन के बारे में रोक है—आपको बाजार जाने की, इधर-उधर घूमने की, सैर-सपाटे करने की, मनसादेवी के पहाड़ पर चढ़ने की। पैसा खराब करने पर हमने रोक लगा दी है। जो पैसा आपको, निरन्तर जीवन के लिए नितान्त आवश्यक नहीं है, उसको खर्च मत कीजिए। कंजूसी करें, जमा करें। ना बाबा! कंजूसी के लिए कौन कहता है आपसे? अच्छे काम के लिए कोई खर्च नहीं है क्या? आप फिजूलखर्च जरा भी मत कीजिए और जो कुछ भी आपके पास धन है, उसको लगा दीजिए अच्छे कामों में।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 73)

👉 एक ही यज्ञ-अहं को भस्म कर देना
  
🔶 ऐसे ही एक सिद्ध तपस्वी हुए हैं— बाबा माधवदास। गंगा किनारे बसे गाँव वेणुपुर में उन्होंने गहन साधना की। गाँव वाले उनके बारे में बस इतना बता पाते हैं कि बाबा जब गाँव में आए थे, तब उनकी आयु लगभग ४० साल की रही होगी। सामान के नाम पर उनके पास कुछ खास था नहीं। बस आए और गाँव के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे जम गए। बाद में गाँव वालों ने उनके लिए कुटिया बना दी। बाबा माधवदास की एक ही साधना थी-गुरुभक्ति। इसी ने उन्हें साधना के शिखर तक पहुँचाया था। जब तक उनके गुरुदेव थे, उन्होंने उनकी सेवा की। उनकी आज्ञा का पालन किया। बाद में उनके शरीर छोड़ने पर उन्हीं की आज्ञा से इस गाँव में चले आए।
  
🔷 चर्चा में गाँव वालों को उन्होंने बताया कि उनके गुरुदेव कहा करते थे कि साधु पर भी समाज का ऋण होता है। सो उसे चुकाना चाहिए। क्या ही अच्छा हो कि एक-एक साधु एक-एक गाँव में जाकर ज्ञान की अलख जगाए। गाँव के लोगों को शिक्षा और संस्कार दे। उन्हें आध्यात्मिक जीवन दृष्टि प्रदान करे। अपने गुरु के आदेश  के अनुसार वे सदा इन्हीं कामों में लगे रहते थे। जब गाँव वाले उनसे पूछते कि वह इतना परिश्रम क्यों करते हैं? तो वे कहा करते कि गुरु का आदेश मानना ही उनकी सच्ची सेवा होती है। बस, मैंने सारे जीवन उनके आदेश के अनुसार ही जीने का संकल्प लिया है।
  
🔶 बाबा माधवदास वेणुपुर में लोगों से कहा करते थे, श्रद्धा का मतलब है-समर्पण। यानि कि निमित्त मात्र हो जाना। मन में इस अनुभूति को बसा लेना कि मैं नहीं तू। गुरुभक्ति का मतलब है कि हे गुरुदेव अब मैंने स्वयं को समाप्त कर दिया है, अब तुम आओ और मेरे हृदय में विराजमान हो जाओ। अब मैं वैसे ही जीऊँगा, जैसे कि तुम जिलाओगे। अब मेरी कोई मरजी नहीं, तुम्हारी मरजी ही मेरी मरजी है। माधवदास जैसा कहते थे, वैसा ही उनका जीवन भी था। उनका कहना था कि शिष्य जिस दिन अपने आप को शव बना लेता है, उसी दिन उसके गुरुदेव उसमें प्रवेश कर उसे शिव बना देते हैं।
  
🔷 जिस क्षण शिष्य का अस्तित्व मिट जाता है, उसमें सद्गुरु प्रकट हो जाते हैं। फिर सारी साधनाएँ स्वयं होने लगती हैं। सभी तप स्वयं होने लगते हैं। शिष्य को यह बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि सत्कर्म एक ही है, जिसे हमने न किया हो, बल्कि हमारे माध्यम से स्वयं गुरुदेव ने किया हो। जो भक्ति अहंकार को लेकर बहता है, वह कभी पवित्र नहीं हो सकता। उसके प्रवाह के सान्निध्य में कभी तीर्थ नहीं बन सकते। शिष्य के करने लायक एक ही यज्ञ है- अपने अहं को भस्म कर देना। समझने की बात यह है कि धूप में खड़े होना अथवा भूखे मरने का नाम तपस्या नहीं है, यह तो स्वयं को मिटाने का साहस है। यही तपस्या करना है। शिष्य धर्म को निभाने वाले बाबा माधवदास सारे जीवन यही तप करते रहे। इसी महातप से उनका अस्तित्व जन-जन के लिए वरदान बन गया। पर यदि कोई उनसे उनकी उपलब्धियों की बात करते, तो वे हँस पड़ते और कहते और मैं हूँ ही कहाँ, ये तो गुरुदेव हैं, जो इस शरीर को चला रहे हैं और अपने कर्म कर रहे हैं। इस सत्य के नूतन आयामों को अगले मंत्रों में स्पष्ट किया गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 115

👉 तीन बातें भक्त के जीवन में जरूर होनी चाहिएं:--

👉  प्रतीक्षा, परीक्षा और समीक्षा।
🌷 प्रतीक्षा - भक्ति के मार्ग में प्रतीक्षा बहुत आवश्यक है। प्रभु जरूर आयेंगे, कृपा करेंगे, ऐसा विश्वास रखते हुए प्रतीक्षा करें। बहुत बड़ी प्रतीक्षा के बाद शबरी की कुटिया में प्रभु आये थे।

🌹 परीक्षा - संसार की परीक्षा करते रहें। इस संसार में सब अपने कारणों से जी रहे हैं। किसी के भी महत्वाकांक्षा के मार्ग पर बाधा बनोगे वही तुम्हारा अपना, पराया हो जायेगा। संसार का तो प्रेम भी छलावा है। संसार को जितना जल्दी समझ लो तो अच्छा है ताकि प्रभु के मार्ग पर तुम जल्दी आगे बढ़ो।

💐 समीक्षा - अपनी समीक्षा रोज करते रहो, आत्मचिन्तन करो। जीवन उत्सव कैसे बने ? प्रत्येक क्षण उल्लासमय कैसे बने? जीवन संगीत कैसे बने, यह चिन्तन जरूर करना। कुछ छोड़ना पड़े तो छोड़ने की हिम्मत करना और कुछ पकड़ना पड़े तो पकड़ने की हिम्मत रखना। अपनी समीक्षा से ही आगे के रास्ते दिखेंगे।

👉 आज का सद्चिंतन 26 March 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 March 2018


👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (अन्तिम भाग)

🔷 दहेज की समस्या कोई स्वतंत्र समस्या नहीं, नारी की अयोग्यता की ही समस्या है। दहेज वे लोग माँगते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है। उनका कहना है कि हमारे घर की अच्छी आर्थिक स्थिति का लाभ तुम्हारी लड़की उपयोग करे इसके बदले में हमें दहेज की कीमत मिलनी चाहिए। इस माँग का दूसरा उत्तर यह हो सकता है कि दहेज का पैसा लड़की की योग्यता बढ़ाने में खर्च कर दिया जाए और उसे किसी गरीब किन्तु योग्य लड़के के साथ ब्याह दिया जाए।

🔶 लड़की अपनी योग्यता से कुछ उपार्जन करके उस लड़के की आय को बढ़ा सकती है और उससे अधिक आनन्द में रह सकती है जितनी किसी अमीर घर में-केवल उन लोगों के अनुग्रह और अपनी दीनता के बल पर सुखी रहती है। यदि लड़कियाँ सुशिक्षित हो जाएं तो माँगने वालों को सौदा पटाने की हिम्मत ही न पड़े। फिर भी यदि दहेज का राक्षस न मरे तो लड़कियाँ अपनी शिक्षा के बल पर आर्थिक स्वावलम्बन प्राप्त करके अविवाहित जीवन भी व्यतीत कर सकती हैं।

🔷 किसी भी दृष्टिकोण से विचार किया जाए यह नितान्त आवश्यक है कि नारी को वर्तमान दुरावस्था में न पड़ा रहने देकर उसे ऊपर उठाया जाए, आगे बढ़ाया जाए। उसकी शक्ति और सामर्थ्य बढ़ने से हानि किसी की नहीं, लाभ सभी का है। पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर प्रत्येक क्षेत्र में उसे सहयोग देने वाली नारी, इस वंचित, अशिक्षित, अनुभवहीन, अयोग्य एवं भार रूप नारी की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होगी। विवेक की पुकार यही है कि स्वार्थ और परमार्थ की दृष्टि से, न्याय और कर्त्तव्य की दृष्टि से, नारी के विकास में सहयोग दें- बाधक न बनें

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.29

👉 The Spirituality & its Reality. (Last Part)

🔷 The dirty and dry berries soaked in spittle of a sweeper were eaten by BHAGWAN, why, why he ate those berries? BHAGWAN said, ‘‘I do not eat berry but the soul, the soul and the honesty. The thinking-style, the greatness is the only things I eat. I feel obliged to receive this dose from anyone. I only eat and drink love and love.’’
                                
🔶 Where is love with humans? Soaked in attachments, lust and avarice and where is shame with such humans? Had there been the shame, their souls would have been saturated; they would have been felt coolness, merriment would have taken place in their life. They would have given merriment to others. O helpless! O man engulfed in fire! Where is shame with them? Girls of BRIJ offered one cup of buttermilk to compel KRISHAN to dance over the whole courtyard.
                                         
🔷 Friends! Very this is the story of my life; very this is the spirituality of my life. Very this is how I do my UPASANA. Very this is the impressions of SADHANA. Finished, today’s session.
                                       
===OM SHANTI===

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 5)

🔷 आप एक और अनुभव कर लीजिए कि आप गुरुजी के अवे में बैठे हुए हैं। अवा क्या? कुम्हार अपने बर्तन बनाता है और बर्तन बना करके उन बर्तनों को अवे के भीतर कैद कर देता है। बस, सब बर्तन चुपचाप बैठे रहते हैं और पकते रहते हैं। आप भी चुपचाप बैठे रहिए और पकते रहिए। हम आपको प्रेरणा भेजेंगे, हम आपको विचार भेजेंगे, उसको भी तो सुनिए! बस, अपनी-अपनी ही बकते रहते हैं, हमारी नहीं सुनेंगे क्या? हमारी प्रेरणा पर आप ध्यान नहीं देंगे? हम क्या कहना चाहते हैं, उस पर गौर नहीं करेंगे? उसकी कोई उपयोगिता नहीं है? अपने आपको ही हमारे ऊपर हावी रखेंगे? हमारी मनोकामना पूरी कर दीजिए। ऐसे कौन आपकी मनोकामना पूरी कर देगा, बताइए?

🔶 रावण की मनोकामना पूरी करने में कौन समर्थ हो गया? सिकन्दर की मनोकामना कही पूरी हुई? नेपोलियन बोनापोर्ट की कहीं पूरी हुई? हिरण्यकश्यपु ने अपनी मनोकामना पूरी कर पाई? न कर पाई। आप तो बेकार आदमी हो, बार-बार बच्चों की तरह मनोकामना, मनोकामना माँगते रहते हैं? यहाँ तो आप बड़ों की तरह रवैया अख्यियार कीजिए। बच्चे ही बने रहेंगे जिन्दगी भर बड़े भी होंगे! अगर यहाँ आप बड़े हो गए हैं, तो मनोकामना वाले जंजाल को छोड़ दीजिए। मनोकामना तो भगवान ने आपकी पूरी कर दी है। हाथ-पाँव दिए हैं, आप पेट भर के रोटी कमा सकते हैं। अक्ल भगवान ने दी है आपको, आप तन ढकने के लिए कपड़े या पारिवारिक जो छोटी-मोटी जिम्मेदारियाँ हैं, भली प्रकार पूरी कर सकते हैं। यह कौन-सी मनोकामना है सिवाय हविश के! बताइए?

🔷 हविश के अलावा कोई मनोकामना नहीं है। हविश को आप हल्की नहीं कर सकते। हविश को जिस दिन आप हल्की कर लेंगे, आपकी कोई भी मनोकामना बाकी नहीं रह जाएगी, यह आप देखेंगे कि आप कितने खुश और प्रसन्न रह सकते हैं। इसलिए आप इस डायन को मार भगाइये न? दुनिया भर का माँगते फिरते हैं—नाक रगड़ते-फिरते हैं—वासनाओं के लिए, तृष्णाओं के लिए, अहंकार के लिए। इसके आगे पल्ला पसारना, उसके आगे पल्ला पसारना, इसके आगे नाक रगड़ना, उसके आगे नाक रगड़ना। आप अपने आप में हेर-फेर कीजिए, अपने आप में हेर-फेर करेंगे, तो आपको इस कायाकल्प-शिविर में आने का मानसिक लाभ मिल जाएगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 72)

👉 एक ही यज्ञ-अहं को भस्म कर देना
  
🔷 ध्यान की इस पवित्र प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ माता जगदम्बा से कहते हैं-

आनन्दमानन्दकरं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजबोधयुक्तम्। योगीन्द्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमद््गुरुंनित्यमहम् नमामि॥९३
यस्मिन् सृष्टिस्थितिध्वंसनिग्रहानुग्रहात्मकम्। कृत्यं पञ्चविधं शश्वद्भासते तं नमाम्यहम्॥ ९४॥
प्रातः शिरसि शुक्लाब्जे द्विनेत्रं द्विभुजं गुरुम्।     वराभययुतं शान्तं स्मरेत्तं नामपूर्वकम्॥ ९५॥

🔶 गुरुदेव आनन्दमय रूप हैं। वे शिष्यों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं। वे प्रभु प्रसन्नमुख एवं ज्ञानमय हैं। वे सदा आत्मबोध में निमग्न रहते हैं। योगीजन सदा उनकी स्तुति करते हैं। संसार रूपी रोग के वही एक मात्र वैद्य हैं। मैं उन गुरुदेव का नित्य नमन करता हूँ॥ ९३॥ जिनकी चेतना में उत्पत्ति, स्थिति, ध्वंस, निग्रह एवं अनुग्रह ये पाँच कार्य सदा होते रहते हैं, उन गुरुदेव को मेरा नमन है॥ ९४॥ इस भाव से गुरुदेव को नमन करते हुए प्रातःकाल सहस्रारदल कमल में शान्त, वराभय मुद्रा वाले, कृपा-करुणा रूपी दोनों नेत्रों वाले, रक्षण-पोषण रूपी दो भुजाओं वाले गुरुदेव का नाम सहित स्मरण करना चाहिए॥ ९५॥
  
🔷 गुरुगीता के इन मंत्रों में सद्गुरु स्मरण एवं उनके ध्यान की महिमा है। गुणों के बिना स्मरण एवं रूप के बिना ध्यान आसान नहीं है। इसलिए शिष्यों को अपने गुरुदेव के नाम का स्मरण उनके गुणों के चिन्तन के साथ करना चाहिए। इसी तरह उन प्रभु का ध्यान उनके स्वरूप को याद करते हुए भक्तिपूर्वक करना चाहिए। शिष्य के जीवन में यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहनी चाहिए। ऐसा होते रहने पर शिष्य का अस्तित्व स्वयं ही गुरुदेव की चेतना में घुलता रहता है। जिन्होंने ऐसा किया है या फिर कर रहे हैं, वे इससे होने वाली अनुभूतियों व उपलब्धियों के स्वाद से परिचित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 114

शनिवार, 24 मार्च 2018

👉 जटायु व गिलहरी चुप नहीं बैठे

🔶 पंख कटे जटायु को गोद में लेकर भगवान् राम ने उसका अभिषेक आँसुओं से किया। स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए भगवान् राम ने कहा-तात्। तुम जानते थे रावण दुर्द्धर्ष और महाबलवान है, फिर उससे तुमने युद्ध क्यों किया ?

🔷 अपनी आँखों से मोती ढुलकाते हुए जटायु ने गर्वोन्नत वाणी में कहा-' प्रभो! मुझे मृत्यु का भय नहीं है, भय तो तब था जब अन्याय के प्रतिकार की शक्ति नहीं जागती?

🔶 भगवान् राम ने कहा- तात्! तुम धन्य हो! तुम्हारी जैसी संस्कारवान् आत्माओं से संसार को कल्याण का मार्गदर्शन मिलेगा।

🔷 गिलहरी पूँछ में धूल लाती और समुद्र में डाल आती। वानरों ने पूछा-देवि! तुम्हारी पूँछ की मिट्टी से समुद्र का क्या बिगडे़गा। तभी वहाँ पहुँचे भगवान् राम ने उसे अपनी गोद में उठाकर कहा 'एक-एक कण धूल एक-एक बूँद पानी सुखा देने के मर्म को समझो वानरो। यह गिलहरी चिरकाल तक सत्कर्म में सहयोग के प्रतीक रूप में सुपूजित रहेगी। '

🔶 जो सोये रहते हैं वे तो प्रत्यक्ष सौभाग्य सामने आने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते। जागृतात्माओं की तुलना में उनका जीवन जीवित-मृतकों के समान ही होता है।

👉 कहिए कम-करिये ज्यादा (भाग 1)

🔶 मानव स्वभाव की एक बड़ी कमजोरी प्रदर्शन प्रियता है। बाहरी दिखावे को वह बहुत ज्यादा पसन्द करता है। यद्यपि वह जानता और मानता है कि मनुष्य की वास्तविक कीमत उसकी कर्मशीलता, कर्मठता है। ठोस और रचनात्मक कार्य ही स्थायी लाभ, प्रतिष्ठा का कारण होता है। दिखावा और वाक शूरता नहीं। यह जानते हुये भी उसे अपनाता नहीं। इसीलिये उसे एक कमजोरी के नाम से सम्बोधित करना पड़ता है।

🔷 प्रकृति ने मनुष्य को कई अंगोपाँग दिये हैं और उनसे उचित काम लेते रहने से ही मनुष्य एवं विश्व की स्थिति रह सकती है। पर मानव स्वभाव कुछ ऐसा बन गया है कि सब अंगों का उपयोग ठीक से न कर केवल वाक्शक्ति का ही अधिक उपयोग करता है। इससे बातें तो बहुत हो जाती हैं, पर तदनुसार कार्य कुछ भी नहीं हो पाता। हो भी कैसे वह करना भी नहीं चाहता और इसीलिये दिनों दिन वाक्शक्ति का प्रभाव क्षीण होता जाता है। कार्य करने वाले को बोलना प्रिय नहीं होता, उसे व्यर्थ की बातें बनाने को अवकाश ही कहाँ होता है? वह तो अपनी वाक्शक्ति का उपयोग आवश्यकता होने पर ही करता है। अधिक बोलने से वाक्शक्ति का महत्व घट जाता है। जिसकी जबान के पीछे धर्म शक्ति का बल होता है उसी का प्रभाव पड़ता है।

🔶 वस्तुतः कार्य करना एक साधना है। इससे साधित वाक्शक्ति मंत्रवत् बलशाली बन जाती है। साधक के प्रत्येक वाक्य में अनुभव एवं कर्म साधना की शक्ति का परिचय मिलता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में मौन का बड़ा महत्व है। जैन तीर्थंकर अपनी साधना अवस्था में प्रायः मौनावलम्बन करते हैं। इसी से उनकी वाणी में शक्ति निहित रहती है।

🔷 वर्तमान युग के महापुरुष महात्मा गाँधी के जबरदस्त प्रभाव का कारण उनका कर्मयोग ही है। वे जो कुछ कहते उसे करके बताते थे। इसी में सचाई का बल रहता है। इस सचाई और कर्मठता के कारण ही गाँधी जी के हजारों लाखों करोड़ों अनुयायी विश्व में फैले हुये हैं। गाँधी जी अपने एक क्षण को भी व्यर्थ न खोकर किसी न किसी कार्य में लगे रहते थे। और आवश्यकता होने पर कार्य की बातें भी कर लेते थे। इसी का प्रभाव है कि बड़े-बड़े विद्वान-बुद्धिमान एवं श्रीमान् उनके भक्त बन गये।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति-जून 1950 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/June/v1.15

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 March 2018


👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (भाग 6)

🔶 हमारा व्यक्तिगत और राष्ट्रीय भविष्य इस बात पर निर्भर है कि भावी पीढ़ियाँ सुसंस्कृत हों। स्कूली शिक्षा से आजीविका उपार्जन करने तथा विविध क्षेत्रों की साधारण जानकारी मिलने की बात पूरी हो सकती है, पर वे सद्गुण जो मानव की प्रधान सम्पत्ति हैं और जिनके ऊपर व्यक्ति तथा राष्ट्र की श्रेष्ठता निर्भर करती है, स्कूलों में नहीं सीखे जा सकते। उनके शिक्षण का सही स्थान है- घर का वातावरण और उसका निर्माण करती है- गृहिणी व्यक्ति और राष्ट्र की उन्नति के लिए हो रहे अनेकों प्रयत्नों में सुगृहिणी निर्माण कार्य अत्यधिक आवश्यक है। उपेक्षा करने पर बड़ी से बड़ी प्रगति भी व्यर्थ सिद्ध होगी। क्योंकि जब आगामी पीढ़ियों का व्यक्तित्व ही विकसित न हो सका तो बढ़ी हुई समृद्धि का भी कुछ लाभ न उठाया जा सकेगा वरन् बन्दर के हाथ में पड़ी हुई तलवार की तरह उसका दुरुपयोग एवं दुष्परिणाम ही हाथ लगेगा।

🔷 56 लाख साधुओं एवं भिखारियों का प्रश्न राष्ट्रीय प्रश्न है। इतने लोगों की उपार्जन क्षमता कुण्ठित पड़ी रहे और उनका निर्वाह भार जनता को वहन करना पड़े तो यह अर्थ संतुलन को बिगाड़ने वाली बात है। उससे भी बढ़कर चिंता की बात यह है कि हमारी आधी आबादी-नारी, कैदियों की भाँति घरों की चार-दीवारी में कलंकियों की तरह मुँह पर पर्दा डाले, घर वालों के लिए एक भार बनी बैठी रहे। इससे भी हमारा पारिवारिक एवं राष्ट्रीय अर्थ तंत्र असंतुलित ही होगा। यदि उनकी सामर्थ्य को विकसित किया जाए तो राष्ट्र के अर्थ तंत्र को समुन्नत बनाने में इतना योग मिल सकता है जितना कितनी ही विशालकाय योजनाएं भी नहीं दे सकती। इस समस्या के सामने भिखारियों की समस्या तुच्छ है। यदि हम नारी के विकास की समस्या को हल कर लें तो भिखारियों से भी अनेकों गुनी समस्या का हल हुआ समझना चाहिए।

🔶 जिन नारियों को हम माता, पत्नी, बहिन या पुत्री के रूप में प्यार करते हैं, जिन्हें सुखी बनाने की कुछ चिन्ता करते हैं उनके लिये रूढ़िवादी मान्यताओं द्वारा हम अपकार भी पूरा-पूरा करते है। किसी स्त्री का जब सूर्य अस्त हो जाता है और घर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं होती तो उस बेचारी पर कैसी बीतती है इसे हममें से हर कोई जानता है। पर्दा प्रथा के कारण जो नारी बाजार से साग खरीदकर लाना भी नहीं सीख सकी, किसी के बात करना भी जिसे नहीं आता वह मुसीबत के समय पति या बच्चों के लिये दवा खरीदने या चिकित्सक को बुलाकर लाने में भी समर्थ नहीं हो सकती।

🔷 ऐसी स्त्रियों को जब अपने और अपने बच्चों के गुजारे की समस्या सामने आती है तब आगे केवल अंधकार ही दीखता है। किसी के दरवाजे पर भिखारी की तरह अपमान पूर्वक टुकड़ों से पेट भरते हुए उन्हें जिस व्यथा का सामना करना पड़ता है उसकी कल्पना यदि नारी को बन्धन में रखने वाले करें तो उनकी छाती पसीजे बिना न रहेगी। मानवता का दृष्टिकोण अपनाया जाए तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि नारी का भविष्य अंधेरे में लटकता हुआ छोड़ना अभीष्ट न हो तो उसे स्वावलंबी, अपने पैरों पर खड़ी होने योग्य बनाना ही चाहिये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 28

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.28

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...