सोमवार, 15 जुलाई 2019

👉 कृपया समय पर दें

एक भिखारी एक दिन सुबह अपने घर के बाहर निकला। त्यौहार का दिन है। आज गांव में बहुत भिक्षा मिलने की संभावना है। वह अपनी झोली में थोड़े से दाने डालकर चावल के, बाहर आया। चावल के दाने उसने डाल दिये हैं अपनी झोली में। क्योंकि झोली अगर भरी दिखाई पड़े तो देने वाले को आसानी होती है। उसे लगता है किसी और ने भी दिया है। सब भिखारी अपने हाथ में पैसे लेकर अपने घर से निकलते हैं, ताकि देने वाले को संकोच मालूम पड़े कि नहीं दिया तो अपमानित हो जाऊंगा और लोग दे चुके हैं।

आपकी दया आपकी दया काम नहीं करती भिखारी को देने में। आपका अहंकार काम करता है.और लोग दे चुके हैं, और मैं कैसे न दूं। वह डालकर निकला है थोडे से दाने। थोड़े से दाने उसने डाल रखे हैं चावल के। बाहर निकला है।

सुरज निकलने के करीब है। रास्ता सोया है। अभी लोग जाग रहे हैं। देखा है उसने,राजा का रथ आ रहा है। स्वर्ण रथ—सूरज की रोशनी में चमकता हुआ। उसने कहा, धन्य भाग्य मेरे! भगवान को धन्यवाद। आज तक कभी राजा से भिक्षा नहीं मांग पाया, क्योंकि द्वारपाल बाहर से ही लौटा देते। आज तो रास्ता रोककर खड़ा हो जाऊंगा! आज तो झोली फैला दूंगा। और कहूंगा, महाराज!

पहली दफा भिक्षा मांगता हूं। फिर सम्राट तो भिक्षा देंगे। तो कोई ऐसी भिक्षा तो न होगी। जन्म—जन्म के लिए मेरे दुख दूर हो जायेंगे। वह कल्पनाओं में खोकर खड़ा हो गया।
रथ आ गया। वह भिखारी अपनी झोली खोले, इससे पहले ही राजा नीचे उतर आया। राजा को देखकर भिखारी तो घबड़ा गयाऔर राजा ने अपनी झोली अपना वस्त्र भिखारी के सामने कर दिया।तब तो वह बहुत घबड़ा गया।

उसने कहा आप! और झोली फैलाते हैं? राजा ने कहा, ज्योतिषियों ने कहा है कि देश पर हमले का डर है। और अगर मैं जाकर आज राह पर भीख मांग लूं तो देश बच सकता है। वह पहला आदमी जो मुझे मिले, उसी से भीख मांगनी है। तुम्हीं पहले आदमी हो। कृपा करो। कुछ दान दो। राष्ट्र बच जाये।

उस भिखारी के तो प्राण निकल गए। उसने हमेशा मांगा था। दिया तो कभी भी नहीं था। देने की उसे कहीं कल्पना ही नहीं थी। कैसे दिया जाता है, इसका कोई अनुभव नहीं था। मांगता था। बस मांगता था। और देने की बात आ गई, तो उसके प्राण तो रुक ही गये! मिलने का तो सपना गिर ही गया। और देने की उलटी बात! उसने झोली में हाथ डाला। मुट्ठी भर दाने हैं वहां। भरता है मुट्ठी, छोड़ देता है। हिम्मत नहीं होती कि दे दें।

राजा ने कहा, कुछ तो दे दो। देश का खयाल करो। ऐसा मत करना कि मना कर दो। बहुत मुश्किल से बहुत कठिनाई से एक दाना भर उसने निकाला और राजा के वस्त्र में डाल दिया! राजा रथ पर बैठा। रथ चला गया। धूल उड़ती रह गई। और साथ में दुख रह गया कि एक दाना अपने हाथ से आज देना पडा। भिखारी का मन देने का नहीं होता।
दिन भर भीख मांगी। बहुत भीख मिली। लेकिन चित्त में दुख बना रहा एक दाने का, जो दिया था।

कितना ही मिल जाये आदमी को, जो मिल जाता है, उसका धन्यवाद नहीं होता;
जो नहीं मिल पाया, जो छूट गया, जो नहीं है पास, उसकी पीड़ा होती है।

लौटा सांझ दुखी, इतना कभी नहीं मिला था! झोला लाकर पटका। पत्नी नाचने लगी। कहा, इतनी मिल गयी भीख! नाच मत पागल! तुझे पता नहीं, एक दाना कम है, जो अपने पास हो सकता था। फिर झोली खोली। सारे दाने गिर पड़े। फिर वह भिखारी छाती पीटकर रोने लगा, अब तक तो सिर्फ उदास था। रोने लगा। देखता कि दानों की उस कतार में, उस भीड़ में एक दाना सोने का हो गया!

तो वह चिल्ला—चिल्लाकर रोने लगा कि मैं अवसर चूक गया। बड़ी भूल हो गयी। मैं सब दाने दे देता, सब सोने के हो जाते। लेकिन कहां खोजूं उस राजा को? कहां जाऊं? कहा वह रथ मिलेगा? कहां राजा द्वार पर हाथ फैलायेगा? बडी मुश्किल हो गयी। क्या होगा? अब क्या होगा? वह तड़पने लगा।उसकी पत्नी ने कहा, तुझे पता नहीं, शायद जो हम देते हैं, वह स्वर्ण का हो जाता है। जो हम कब्जा कर लेते हैं, वह सदा मिट्टी का हो जाता है।

जो जानते हैं, वे गवाही देंगे इस बात की; जो दिया है, वही स्वर्ण का हो गया।
मृत्यु के क्षण में आदमी को पता चलता है, जो रोक लिया था, वह पत्थर की तरह छाती पर बैठ गया है।
जो दिया था, जो बांट दिया था, वह हलका कर गया। वह पंख बन गया। वह स्वर्ण हो गया।
वह दूर की यात्रा पर मार्ग बन गया।

👉 आज का सद्चिंतन 15 July 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 July 2019


👉 इन ग्रन्थों में मंत्रों में छिपे पड़े हैं अति गोपनीय प्रयोग (भाग 29)

आध्यात्मिक चिकित्सा की जितनी सूक्ष्मता व व्यापकता, सैद्धान्तिक सच्चाई एवं प्रायोगिक गहराई वेदों में है, उतनी और कहीं नहीं। यह सुदीर्घ अनुभव का सच है। जिसे समय- समय पर अनेकों ने खरा पाया है। वेद मंत्रों में आध्यात्मिक चिकित्सा के सिद्धान्तों का महाविस्तार बड़ी पारदर्शिता से किया गया है। इसमें मानव जीवन के सभी गोपनीय, गहन व गुह्य आयामों का पारदर्शी उद्घाटन है। साथ में बड़ा ही सूक्ष्म विवेचन है। यहाँ आध्यात्मिक चिकित्सा का सैद्धान्तिक पथ जितना उन्नत है, उसका प्रायोगिक पक्ष उतना ही समर्थ है। ऋग्, यजुष एवं सामवेद के मंत्रों के साथ अथर्ववेद के प्रयोग तो अद्भुत एवं अपूर्व हैं। इनके लघुतम अंश से अपने जीवन में महानतम चमत्कार किए जा सकते हैं। यह विषय इतना विस्तृत है कि इसके विवेचन के लिए इस लघु लेख का अल्प कलेवर पर्याप्त नहीं है। जिज्ञासु पाठकों का यदि आग्रह रहा तो बाद में इसके विशिष्ट प्रायोगिक सूक्तों में वर्णित चिकित्सा विधि को बताया जाएगा।

अभी तो यहाँ इतना ही कहना है कि वेद में मुख्य रूप से आध्यात्मिक चिकित्सा की दो ही धाराएँ बही हैं। इनमें से पहली है यौगिक और दूसरी है तांत्रिक। ये दोनों ही धाराएँ बड़ी समर्थ, सबल एवं सफल हैं। इनके प्रभाव बड़े आश्चर्यकारी एवं विस्मयजनक हैं। बाद के दिनों में महर्षियों ने इन दोनों विधियों के सिद्धान्त एवं प्रयोग को श्रीमद्भगवद्गीता एवं श्री दुर्गासप्तशती में समाहित किया है। हमारे जिज्ञासु पाठकों को हो सकता है थोड़ा अचरज हो, परन्तु यह सच है कि इन दोनों ग्रन्थों में से प्रत्येक में मूल रूप से ७०० मंत्र हैं। इस सम्बन्ध में आध्यात्मिक चिकित्सकों के प्रायोगिक अनुभव कहते हैं कि इन दोनों पवित्र ग्रन्थों में कथा भाग से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण इनके मंत्र प्रयोग हैं। जिन्हें यदि कोई सविधि सम्पन्न कर सके तो जिन्दगी की हवाएँ और फिजाएँ बदली जा सकती हैं।

इस सम्बन्ध में एक घटना उल्लेखनीय है। यह घटना महर्षि अरविन्द के जीवन की है। उन दिनों वे अलीपुर जेल की काल कोठरी में कैद थे। पुस्तकों के नाम पर उनके पास वेद की पोथियाँ, श्रीमद्भगवद्गीता एवं दुर्गासप्तशती ही थी। इन्हीं का चिन्तन- मनन इन दिनों उनके जीवन का सार सर्वस्व था। वह लिखते हैं कि साधना करते- करते ये महामंत्र स्वयं ही उनके सामने प्रकट होने लगे। यही नहीं इन ग्रन्थों में वर्णित महामंत्रों ने स्वयं प्रकट होकर उन्हें अनेकों तरह की योग विधियों से परिचित कराया। यह त्रिकाल सत्य है कि श्रीमद्भगवद्गीता के प्रयोग साधक को योग के गोपनीय रहस्यों की अनुभूति देते हैं। वह अपने आप ही आध्यात्मिक चिकित्सा के यौगिक पक्ष में निष्णात हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 43

👉 अन्त का परिष्कार, प्रखर उपासना से ही संभव (भाग 3)

यही बात प्रशंसनीय कार्य करने के सम्बन्ध में भी है। सत्कर्म करने वाला अपने वंश, परिवार, क्षेत्र, देश, युग सभी को प्रतिष्ठित करता है। यह सामूहिकता का उत्तरदायित्व जिन दिनों ठीक तरह निबाहा जाता है उन दिनों प्रकृति के अनुग्रह की वर्षा सभी पर होती हैं। और जिन दिनों संकीर्ण स्वार्थपरता का बोलबाला होता है तो दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती है, वातावरण बिगड़ता है और दण्ड उनको भी भुगतना पड़ता है, जो प्रत्यक्षतः तो निर्दोष दिखाई पड़ते हैं, पर समूचे मानव समाज की दुष्प्रवृत्तियों को रोकने और सत्प्रवृत्तियों में संलग्न होने के प्रयास की जिम्मेदारी न निभाने से अनायास ही अपराधी वर्ग में सम्मिलित हो जाते है।

युग परिवर्तन के लिए व्यक्ति और समाज में उत्कृष्टता के तत्वों का अधिकाधिक समावेश करने के लिए प्रबल प्रयत्नों का किया जाना आवश्यक है। व्यक्ति को चरित्रनिष्ठ ही नहीं समाजनिष्ठ भी होना चाहिए। मात्र अपने आपको अच्छा रखना ही पर्याप्त नहीं। अपनापन भी विस्तृत होना चाहिए।

आस्थाओं की पृष्ठभूमि वस्तुतः एक अलग धरातल है। उसका निर्माण मस्तिष्कीय संरचना की तुलना में कहीं अधिक जटिल और कहीं अधिक कठोर है। अंतःकरण की अपनी स्वतन्त्र रचना है। उस पर बुद्धि का थोड़ा बहुत ही प्रभाव पड़ता है। सच तो यह है कि अंतःकरण ही बुद्धि की कठपुतली को अपने इशारे से नचाता है। आन्तरिक आस्थाओं और आकांक्षाओं की जो अभिरुचि होती है उसी को पूरा करने के लिए चतुर राजदरबारी की भूमिका मस्तिष्क को निभानी पड़ती है। उसका अपना अभिमत जो भी हो, उसे करना वही पड़ता है जो अधिपति का निर्देश है। हो सकता है कि मस्तिष्क वस्तुतः भौतिकता का पक्षधर हो, किन्तु व्यवहार में लाते समय वह तब तक समर्थ न हो सकेगा जब तक अन्तःकरण भी अनुकूल न हो जाये। किसी भी नशेबाज से वार्तालाप किया जाय तो वह समझाने वाले से भी अधिक ऐसे तथ्य प्रस्तुत कर देगा जिससे नशा पीने की हानियों का प्रतिपादन होता है। इतनी जानकारी होते हुए भी वह उस लत को छोड़ने के लिए तत्पर न हो सकेगा। उसका कारण एक ही है कि नशे के पक्ष में उसके अन्तःकरण में इतनी गहरी अभिरुचि जम गयी है, जिसे विचारशीलता मात्र के सहारे पलट सकना सम्भव नहीं हो पाता। शराबी आये दिन अपने को धिक्कारता है, शपथे लेता है किन्तु जब अन्दर से लत भड़कती है तो असहाय की तरह शराब खाने की ओर इस प्रकार घिसटता चला जाता है मानों कोई बल पूर्वक उसे अपनी पीठ पर लाद कर लिये जा रहा हो। रास्ते में संकल्प विकल्प भी उठते है। लौटने को मन भी करता है। पर सारे तर्क एक कोने पर रखे रह जाते हैं। आदत अपनी जगह स्थिर रहती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 व्यक्तित्व का विकास कैसे करें

(१) प्रातः उठने से लेकर सोने तक की व्यस्त दिनचर्या निर्धारित करें। उसमें उपार्जन, विश्राम, नित्य कर्म, अन्यान्य काम- काजों के अतिरिक्त आदर्शवादी परमार्थ प्रयोजनों के लिए एक भाग निश्चित करें। साधारणतया आठ घण्टा कमाने, सात घण्टा सोने, पाँच घण्टा नित्य कर्म एवं लोक व्यवहार के लिए निर्धारित रखने के उपरान्त चार घण्टे परमार्थ प्रयोजनों के लिए निकालना चाहिए। इसमें भी कटौती करनी हो, तो न्यूनतम दो घण्टे तो होने ही चाहिये। इससे कम में पुण्य परमार्थ के, सेवा साधना के सहारे बिना न सुसंस्कारिता स्वभाव का अंग बनती है और न व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय विकास सम्भव होता है।

(२) आजीविका बढ़ानी हो तो अधिक योग्यता बढ़ायें। परिश्रम में तत्पर रहें और उसमें गहरा मनोयोग लगायें। साथ ही अपव्यय में कठोरता पूर्वक कटौती करें। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त समझें। अपव्यय के कारण अहंकार, दुर्व्यसन, प्रमाद बढ़ने और निन्दा, ईर्ष्या, शत्रुता पल्ले बाँधने जैसी भयावह प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगायें। सादगी प्रकारान्तर से सज्जनता का ही दूसरा नाम है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ही अभीष्ट है। अधिक कमाने वाले भी ऐसी सादगी अपनायें जो सभी के लिए अनुकरणीय हो। ठाट- बाट प्रदर्शन का खर्चीला ढकोसला समाप्त करें।

(३) अहर्निश पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाले विचार ही अन्तराल पर छाये रहते है। अभ्यास और समीपवर्ती प्रचलन मनुष्य को वासना, तृष्णा और अहंकार की पूर्ति में निरत रहने का ही दबाव डालता है। सम्बन्धी मित्र परिजनों के परामर्श प्रोत्साहन भी इसी स्तर के होते हैं। लोभ, मोह और विलास के कुसंस्कार निकृष्टता अपनाये रहने में ही लाभ तथा कौशल समझते हैं। ऐसी ही सफलताओं को सफलता मानते हैं। इसे एक चक्रव्यूह समझना चाहिये। भव- बन्धन के इसी घेरे से बाहर निकलने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना चाहिये। कुविचारों को परास्त करने का एक ही उपाय है- प्रज्ञा साहित्य का न्यूनतम एक घण्टा अध्ययन अध्यवसाय। इतना समय एक बार न निकले तो उसे जब भी अवकाश मिले, थोड़ा- थोड़ा करके पूरा करते रहना चाहिये।

(४) प्रतिदिन प्रज्ञायोग की साधना नियमित रूप से की जाय। उठते समय आत्मबोध, सोते समय तत्त्वबोध। नित्य कर्म से निवृत्त होकर जप, ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन- मनन में उपयोग। यही है त्रिविधि सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त- व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिये। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है। प्रज्ञा परिजनों के लिए सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम योगाभ्यास ‘प्रज्ञा योग’ की साधना है। उसे भावनापूर्वक अपनाया और निष्ठा पूर्वक निभाया जाय।

(५) दृष्टिकोण को निषेधात्मक न रहने देकर विधेयात्मक बनाया जाय। अभावों की सूची फाड़ फेंकनी चाहिये और जो उपलब्धियाँ हस्तगत है, उन्हें असंख्य प्राणियों की अपेक्षा उच्चस्तरीय मानकर सन्तुष्ट भी रहना चाहिये और प्रसन्न भी। इसी मनःस्थिति में अधिक उन्नतिशील बनना और प्रस्तुत कठिनाइयों से निकलने वाला निर्धारण भी बन पड़ता है। असन्तुष्ट, खिन्न, उद्विग्न रहना तो प्रकारान्तर से एक उन्माद है, जिसके कारण समाधान और उत्थान के सारे द्वार ही बन्द हो जाते है।

कर्तृत्व पालन को सब कुछ मानें। असीम महत्त्वाकांक्षाओं के रंगीले महल न रचें। ईमानदारी से किये गये पराक्रम से ही परिपूर्ण सफलता मानें और उतने भर से सन्तुष्ट रहना सीखें। कुरूपता नहीं, सौन्दर्य निहारें। आशंकाग्रस्त, भयभीत, निराश न रहें। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखें। याचक नहीं दानी बने। आत्मावलम्बन सीखें। अहंकार तो हटायें पर स्वाभिमान जीवित रखें। अपना समय, श्रम, मन और धन से दूसरों को ऊँचा उठायें। सहायता करे पर बदले की अपेक्षा न रखें। बड़प्पन की तृष्णाओं को छोड़े और उनके स्थान पर महानता अर्जित करने की महत्वाकांक्षा सँजोये। स्मरण रखें, हँसते- हँसाते रहना और हल्की- फुल्की जिन्दगी जीना ही सबसे बड़ी कलाकारिता है।