गुरुवार, 4 जुलाई 2019

Hey Guruwar Hey Jagjanani Maa | हे गुरुवर हे जग जननी माँ | Pragya Geet



Title

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 4 July 2019


👉 आज का सद्चिंतन 4 July 2019




👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 21)

👉 चित्त के संस्कारों की चिकित्सा
इसी दौर में उनके कुछ शुभ संस्कार जगे, कुछ पुण्य बीज अंकुरित हुए और उनकी मुलाकात एक महापुरुष से हुई। ये महापुरुष संन्यासी थे और नाम था स्वामी सोमदेव। इनकी साधना अलौकिक थी। इनका तप बल प्रबल था। वे पं. रामप्रसाद को देखते ही पहचान गए। उन्होंने अपने परिचित जनों से कहा कि यह किशोर एक विशिष्ट आत्मा है। इसका जन्म भारत माता की सेवा के लिए हुआ है। पर विडम्बना यह है कि इसके उच्चकोटि के संस्कार अभी जाग्रत् नहीं हुए। और किसी जन्म के बुरे संस्कारों की जागृति ने इसे भ्रमित कर रखा है। क्या होगा महाराज इसका? इन संन्यासी महात्मा के कुछ शिष्यों ने इनसे पूछा। वे महापुरुष पहले तो मुस्कराए फिर हंस पड़े और बोले- इस बालक की आध्यात्मिक चिकित्सा करनी पड़ेगी। और इसे मैं स्वयं सम्पन्न करूँगा। बस तुम लोग इसे मेरे समीप ले आओ।

ईश्वरीय प्रेरणा से यह सुयोग बना। पं. रामप्रसाद इन महान् योगी के सम्पर्क में आए। इस पवित्र संसर्ग में पं. रामप्रसाद का जीवन बदलता चला गया। वह यूं ही अचानक एवं अनायास नहीं हो गया। दरअसल उन महान् संन्यासी ने अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रयोग करके इनके बुरे संस्कारों वाली परत हटानी शुरू की। एक तरह से वह अदृश्य ढंग से अपनी आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति का प्रयोग करते रहे। तो दूसरी ओर दृश्य रूप में उन्होंने रामप्रसाद को गायत्री महामंत्र का उपदेश दिया। उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ के लिए तैयार किया। दिन मास वर्ष के क्रम में युवक रामप्रसाद में नया निखार आया।

उनकी अन्तर्चेना में पवित्र संस्कार जाग्रत् होने लगे। पवित्र संस्कारों ने भावनाओं को पवित्र बनाया, तदानुरूप विचारों का ताना- बाना बुना गया। और एक नये व्यक्तित्व का उदय हुआ। एक भ्रमित- भटके हुए किशोर के अन्तराल में भारत माता के महान् सपूत पं. रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ। इस नव जन्म ने उनके जीवन में सर्वथा नए रंग भर दिए। यह सब चित्त के संस्कारों की आध्यात्मिक चिकित्सा के बलबूते सम्भव हुआ। जिसने पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों को जाग्रत् कर एक नया इतिहास रचा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (अन्तिम भाग)

संन्यास के आदर्श बहुत ऊँचे हैं। उन्हें निबाहना पूरा समय देने वाले शिथिल प्रकृति मनुष्यों के लिए सम्भव नहीं। इसके प्रतिबन्ध बड़े हैं। भिक्षाटन आज की स्थिति के उपयुक्त नहीं रहा। जिस-तिस का जैसा-तैसा अपमान अवज्ञा और उपेक्षा पूर्वक मिला कुधान्य किसी संन्यासी की बुद्धि को सतोगुणी एवं सन्तुलित नहीं रहने देता। ऐसी-ऐसी अनेक कठिनाइयों के कारण आज की परिस्थितियों में संन्यास से प्रति हम असहमति प्रकट करते रहें हैं और यही कहते रहें है कि परमार्थ प्रयोजन के लिए जीवन समर्पण करने वालों के लिए वानप्रस्थ ही उपयुक्त है। उसमें घर परिवार के साथ सम्बन्ध बनाये रहने की सुविधा है। साथ ही प्रतिबन्ध में उतने कड़े नहीं है। हरिजन शब्द की तरह आज संन्यास भी निठल्ले, अकर्मण्य लोगों का पर्यायवाची बन गया है। इसलिए भी हम वानप्रस्थ को ही इन दिनों साधु और ब्राह्मण का सम्मिश्रित स्वरूप मानते रहे हैं और उसी में उत्तरार्द्ध परम्परा के दोनों आश्रमों का समावेश करते रहे है। आज की स्थिति में युग-धर्म के अनुरूप यही हल सर्वोत्तम है।

अपनी योजना के अनुसार ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के प्रबुद्ध परिजनों को थोड़े-थोड़े समय के लिए वानप्रस्थ लेने का साहस करना चाहिए और नियत अवधि पूरी करके अपने घरों को लौट जाना चाहिए। जब-जब उन्हें अवकाश मिले, तब-तब ऐसे कदम बार-बार उठा सकते हैं। नियत समय पर नियत अवधि के लिए पहले से भी ऐसा व्रत ले लिया जाय तो उससे अपने ऊपर एक बन्धन, उत्तरदायित्व बँधता है। इस दृष्टि से वैसा साहस कर गुजरता वैसा ही है-जैसा कि परीक्षा का फार्म भर देने पर पढ़ने की गति एवं चेष्टा में गतिशीलता का आना। यह प्रक्रिया यदि उत्साह पूर्वक अपनाई जा सके तो साधु-संस्था के मरणासन्न होने के कारण विश्व-मानव के सिर पर विनाश की जो काली घटाएँ छा रही हैं, उन्हें सुविधा पूर्वक हटाया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 24

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/January/v1.24

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 30)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

Take the venerated seat of the mother, who feeds the infant by the extract of her own blood; who suffers in cold but shields the child in her bosom. Like a learned teacher, distribute the wisdom acquired by you amongst the immature, ignorant and way lost people. The glorious path of reformation is not easy to follow. People may make you suffer, insult you, make fun of you. They may even regard you as a crackbrain, may oppose you and create hurdles in your work for no rhyme or reason. Be least apprehensive about such persons. Do not deviate from your path. The number of such habitual faultfinders is always insignificant. Against hundreds of appreciators of your good work, the number of denunciators will be very small. Their antagonism, too, will come to you as a token of Divine Grace. It would provide you opportunities for introspection and corrective action. This will charge you with higher potency energy for speedy progress.

You might have understood that significance of persons, events and objects, which come in our lives in this ever-changing materiel world, is momentary and illusory. Therefore material objects and relationships are not worthy of blind pursuit for their acquisition or attachment thereto. Such detached attitude would in no way discourage us in performance of our duties. On the contrary, only on being detached to the material world, we can pay attention to our progress without worry. It is a great misconception to regard this world as full of misery. World is full of things of beauty and joy. Had it not been so, the free, spotless, illumined blissful soul, which is spark of the Supreme, would not have chosen it as its abode.

Unhappiness is nothing but absence of happiness. Unhappiness means abandoning a highway and wandering waylost through the thicket of thorny bushes. As discussed earlier, mostly the unhappiness, antagonism, enmity, distress and conflict faced by us is illusory and people are not so wicked as we assume them to be. If we clean our minds of prejudices and throw away our coloured glasses, things will appear in their true colours.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 51

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression 4 July 2019

■  लोगों की दृष्टि में स्वार्थ बुरा समझा जाता है, परन्तु स्वार्थ बुरा नहीं है। स्वार्थ का तात्पर्य है ‘अपना लाभ-अपना भला-अपना हित करना।’ दूसरे शब्दों में कहें तो यह हो सकता है कि ‘अपना हित करने की भावना से प्रेरित होकर किसी प्रकार का शारीरिक अथवा मानसिक श्रम करना।’ यदि हम शब्दकोष को उठाकर देखें तो हमें विदित होगा कि उसमें भी स्वार्थ अभिप्राय उपरोक्त ही बताया गया है। हम स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें, हमारा जीवन सुख-शान्तिमय व्यतीत हो-ऐसा कौन नहीं चाहता? यह भावना हमारे भले की, हित की है और अपना भला या हित करना कोई पाप नहीं है, बल्कि यह कहा जाए कि ‘हमारा धर्म है’ तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इस बात का स्पष्टीकरण कर दिया है-’उद्धरेद त्मनात्मानं नात्मान मवसादयेत्।’ अर्थात् ‘मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार (भला) करे।’

◇ स्वार्थ का दुरुपयोग करने से अनेकों प्रकार के रोग मनुष्य को घेरे रहते हैं और मनुष्य जीवन भर बेचैनी का अनुभव करता हुआ दुर्गति को प्राप्त होता है। इतिहास के क्षेत्र में देखिए, सिकन्दर ने स्वार्थ का दुरुपयोग किया और छोटे-बड़े सभी राज्यों को पराजित कर सम्राट बन बैठा। इस स्वार्थ में सिकन्दर को क्या मिला? हत्या, शाप, परपीड़न और पाप! इसी पाप ने अन्त में सन्ताप का रूप धारण कर उसे दुर्गति के हवाले कर दिया और सिकन्दर के हाथ कुछ न आया। उसकी धन-दौलत माल-असबाब और उसकी सेना उसे निर्दयी काल के पंजे से न छुड़ा सकी। इसीलिए कहा है :-
“सिकन्दर जब गया दुनिया से, दोनों हाथ खाली थे।”

★ यदि हम सचमुच अपना हित साधन करना चाहते हैं तो हमें अपना दृष्टिकोण परिवर्तित करना होगा, निम्न-कोटि के स्वार्थ से ऊँचे उठकर उच्च कोटि का स्वार्थ अपनाना होगा। चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते, खाते-पीते, तात्पर्य यह है कि प्रत्येक कार्य करते समय हमें यही ध्यान रखना होगा कि हमारा हित, हमारा भला, हमारा स्वार्थ, हमारा सुख, हमारी शान्ति कहाँ निहित है? हमें अपने भीतर से उत्तर-मिलेगा, अन्य का भला करने में! इसलिए हर कार्य हमें अपनी भलाई करने के लिये ही करना चाहिए और प्रत्येक में हमारे स्वार्थ की छाप लगा देना चाहिए। हम जिधर दृष्टि फेरें, बस हमें अपना स्वार्थ ही स्वार्थ नजर आए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Maya - know it to know It

To obtain sense pleasures we spend away our riches, because we value this experience of pleasure more than the possession of material wealth. We are so driven by these desires, running after these sense pleasures that we forget that there exists an entity even greater than our gross body. In reality Atman (soul) is even greater, more special than our body. When compared to the bliss we can experience in our soul all other sense pleasures appear inferior and trivial.

In our day-to-day life we follow the motto of - "give up as little as possible and get as much as possible", but when presented with the ultimate test, we abandon it. We are ready to give up our hard earned wealth when it is for the sake of sense pleasures, but we hesitate to give up our sense pleasures (which are little things) for the bliss of our soul (which is the greatest joy there is) - This is MAYA.

It is a well established fact that any one can obtain wealth, amass material possessions, give the senses some temporary satisfaction by indulging in tyranny, immorality, selfishness, oppression, adultery, theft, violence, deceit, arrogance, hypocrisy, lies, ego, etc. But one can never taste the bliss of self-satisfaction this way.

-Pt. Shriram Sharma Acharya
Dharma Tatwa ka Darshan aur Marm Vangmay 53 Page -3.14

👉 माया क्या है? Maya Kya Hai?

शरीर सुख के लिए अन्य मूल्यवान पदार्थों को खर्च कर देते हैं कारण यही है कि वे मूल्यवान पदार्थ शरीर सुख के मुकाबले में कमतर जँचते हैं। लोग शरीर सुख की आराधना में लगे हुए हैं परन्तु एक बात भूल जाते हैं कि शरीर से भी ऊँची कोई वस्तु है। वस्तुत: आत्मा शरीर से ऊँची है। आत्मा के आनन्द के लिए शरीर या उसे प्राप्त होने वाले सभी सुख तुच्छ हैं। अपने दैनिक जीवन में पग- पग पर मनुष्य 'बहुत के लिये थोड़े का त्याग' की नीति को अपनाता है, परन्तु अन्तिम स्थान पर आकर यह सारी चौकड़ी भूल जाता है। जैसे शरीर सुख के लिए पैसे का त्याग किया जाता है वैसे ही आत्म - सुख के लिए शरीर सुख का त्याग करने में लोग हिचकिचाते हैं, यही माया है।

पाठक इस बात को भली भाँति जानते हैं कि अन्याय, अनीति, स्वार्थ, अत्याचार, व्यभिचार, चोरी, हिंसा, छल, दम्भ, पाखण्ड, असत्य, अहंकार, आदि से कोई व्यक्ति धन इकट्ठा कर सकता है, भोग पदार्थों का संचय कर सकता है, इन्द्रियों को कुछ क्षणों तक गुदगुदा सकता है, परन्तु आत्म-सन्तोष प्राप्त नहीं कर सकता।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म वांग्मय 53 पृष्ठ- 3.14

👉 ऊंचा क़द

चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह कोई ...