शनिवार, 28 अप्रैल 2018

👉 मान बड़ाई का परित्याग

🔷 स्वामी रामतीर्थ की विद्वत्ता तथा ओजस्वी वाणी से प्रभावित होकर अमेरिका की 18 युनिवर्सिटियों ने मिलकर उन्हें एल. एल. डी. की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा। जिस उन्होंने सधन्यवाद अस्वीकार करते हुए कहा स्वामी और ‘एम. ए.’ ये दो कलंक पहले ही नाम के आगे पीछे लगे हुए है अब तीसरे कलंक को कहाँ रखूँगा?

🔶 यश कीर्ति, लोकेषणा, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, पूजा, मान बड़ाई के फेर में पड़कर सत्ता और लोक सेवियों का अहंकार उभरता है। इसलिए सच्चे सत मान बड़ाई से सदा बचते रहते है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 पक्का बनना कच्चा मत रहना

🔷 एक बार एक साधक ने अपने गुरुदेव से पुछा की गुरुदेव हम पक्के साधक कैसे बने! गुरुदेव ने शिष्य को एक कहानी सुनाई

🔶 एक नगर मे एक सेठ जी की हलवाई की दुकान थी वहाँ कई लोग काम करते थे! उस नगर मे हलवाई तो बहुत थे पर प्रतिस्पर्धा बहुत थी इसलिये जो भी सेठ के यहाँ नौकरी करता वो बड़ी सावधानी से चलता था की कही गलती हुई तो सेठ जी तत्काल नौकरी से बाहर कर देते!

🔷 एक बार हलवाई के साथ एक छोटा बालक दुकान पर आ गया हलवाई हलवा बना रहा था बालक आकर हलवाई से पूछे की हलवा बन गया हलवाई ने कहा ठहरो अभी, थोड़ी देर बाद बनेगा फिर थोड़ी देर बाद वो वापिस आया और पूछे की हलवा बन गया तो हलवाई ने कहा ठहरो अभी!

🔶 थोड़ी देर बाद फिर आकर पूछे हलवाई जी खुशबू तो आ रही है हलवा बन गया क्या? हलवाई को जब बार बार परेशान किया तो हलवाई ने कहा की खुशबू आ रही है तो ले खा! और उसे हलवा रखा पर उसने कहा की ये तो अच्छा नही लग रहा है हलवाई जी ने कहा अच्छा नही लग रहा है तो चुपचाप बैठ जाओ और थोड़ा इंतजार करो!

🔷 थोड़ी देर बाद हलवाई ने पुनः उसे हलवा रखा तो इस बार वो खुशी से उछल पड़ा अब बहुत अच्छा लगा! बालक ने हलवाई से पुछा की हलवाई जी अब ये अच्छा कैसे लगा? और पहले क्यों नही लगा?

🔶 तो हलवाई जी ने उसे बड़े प्यार से समझाया बेटा पहले ये कच्चा था इसलिये अच्छा नही लगा अब ये पक गया इसलिये अब ये अच्छा लग रहा है! फिर बालक ने पूछा की इसे आग से नीचे क्यों उतारा है? तो हलवाई ने उसे प्यार से समझाया बेटा अब ये पक गया इसलिये इसे नीचे उतार दिया गया!

🔷 इतने मे एक मजदूर ने आकर हलवाई जी से कहा की हलवाई जी आपने दुध को गरम नही किया इसलिये वो सारा दुध फट गया! और इतने मे सेठ जी आ गये और वो बड़ा नाराज हुये और चिल्लाने लगे उसे नौकरी से बाहर निकालने लगे पर हलवाई गिड़गिड़ाया सेठ जी आप जो चाहो वो सजा दे दो पर नौकरी से मत निकालो कल मेरी सगाई है यदि आपने नौकरी से बाहर निकाल दिया तो सगाई टूट जायेगी!

🔶 फिर सेठ जी ने दया तो की पर दंड के तौर पे एक महीने की पगार काट ली!

🔷 गुरुदेव ने अपने शिष्य को आगे समझाते हुये कहा की कच्चे दूध को गर्म नही करोगे तो फट जायेगा! हलवा कितना भी मीठा क्यों न हो उसमे कितना भी घी क्यों न हो पर यदि कच्चा है तो कोई मतलब नही! कच्ची सगाई कभी भी टूट सकती है, कच्ची नौकरी मे हमेशा एक तनाव रहता है की कभी भी बाहर हो सकते है!

🔶 अरे साधक बनो तो पक्का बनना कच्चा मत रहना और पक्का साधक बनने के लिये रोज साधना और सत्संग करना! हॆ वत्स साधक वही जो हर पल सावधान रहे! हे वत्स माया बड़ी ठगनी है जिस तरह से रोटी पकने के बाद आग से उतारी जाती है और जब वो पक जाती है तभी वो मूल्यवान है कच्ची रोटी नही खाई जा सकती है!

🔷 उसी तरह जब तक साधक आग पर न जल जायें अर्थात मृत्यु को प्राप्त न कर ले तब तक उसे हर क़दम पर सावधानी बरतनी पड़ती है! इसलिये सावधान वत्स सावधान साधक का पहला कर्तव्य की वो हर कदम पर सावधान होकर चले!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 29 April 2018


👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 2)

🔷 इन तीनों को झिड़को :- निर्दयता, घमण्ड और कृतघ्नता-

🔶 ये मन के मैल हैं। इनसे बुद्धि प्राप्त करने में फंस जाती है। निर्दयी व्यक्ति अविवेकी और अदूरदर्शी होता है। वह दया और सहानुभूति का मर्म नहीं समझता।

🔷 घमण्डी हमेशा एक विशेष प्रकार के नशे में मस्त रहता है, धन, बल, बुद्धि में अपने समान किसी को नहीं समझता। कृतघ्न पुरुष दूसरों के उपकार को शीघ्र ही भूल कर अपने स्वार्थ के वशीभूत रहता है। वह केवल अपना ही लाभ देखता है। वस्तुतः उस अविवेकी का हृदय सदैव मलीन और स्वार्थ-पंक में कलुषित रहता है।

🔶 दूसरे के किए हुए उपकार को मानने तथा उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने में हमारे आत्मिक गुण-विनम्रता, सहिष्णुता और उदारता प्रकट होते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13

👉 आपका जीवन किधर जा रहा है?

🔷 मानवी जगत् में आकर आपने क्या किया है? क्या कोई ऐसा कार्य किया है जिससे आपको मनः शान्ति का चरम सुख प्राप्त हो? क्या आपकी मनोवृत्ति सात्विक वस्तुओं पर एकाग्र होती है, या वह अब भी निंद्य एवं वासनामय पदार्थों की ओर मारी-मारी फिरती है? संसार में जिन दो स्थानों पर रह कर आपको आत्म विकास करना पड़ा, उन स्थानों पर रह कर क्या आपने कुशलता और चातुर्य का परिचय दिया है? क्या आप उस परिपक्वता में आ गये हैं कि आपकी राय दूसरे लेते हैं? निर्णय करते समय क्या भावावेश, या जल्दबाजी में आ जाते हैं, या ‘करूं या न करूं’ की स्थिति में पड़े रहते हैं? जीवन में क्या आपके कोई निश्चित या अनिश्चित उद्देश्य हैं? उस तक पहुँचने के लिए क्या आपने कुछ प्रयत्न किया है?

🔶 एक संतुलित और विवेकशील व्यक्ति के मन में इस प्रकार के अनेक प्रश्न आते हैं। वासना या क्षणिक आवेश से मुक्त होकर जब वह जीवन की जटिलताओं पर विचार करता है, तो उसे ज्ञान होता है कि वास्तव में अभी उसमें कुछ नहीं किया है। यों ही निरुद्देश्य जीवन-यात्रा चली जा रही है।

🔷 यह अनिश्चित प्रवृत्ति मानव की सबसे बड़ी निर्बलता है। मनुष्य अपने आपको बड़ा बुद्धिमान समझता है किन्तु वास्तव में उसके जीवन का 50 प्रतिशत जीवन यों ही आलस्य और बेकारी में नष्ट होता है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 13

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 3)

🔷 Scientific aspects of Yajna
The four Vedas signify the philosophy of the eternity and absolute compatibility of Gayatri and Yajna in the divine creations.  Further, the Atharvaveda also deals with the sound therapy aspects of the mantras. They can be used for the treatment of the ailing human system at the physical, psychological and spiritual levels. The Samaveda focuses on the musical chanting patterns of the mantras and the subtle form of Yajna by defining the latter as the process of mental oblation on the surface of internal emotions through the cosmic radiations of the omnipresent subtle energy of sound. The Yajurveda contains the knowledge of the principles and the methods of performing Yajnas as a part of the spiritual and scientific experiments for global welfare.

🔶 The effects of Yajna include treatment of various diseases and the removal of atmospheric pollution (discussed in detail in the coming issues). Another prominent effect is parjanya.

🔷 Parjanya implies sublime showers of vital energy and spiritual strength from the cosmic layers (higher space). As the natural fertilizers add to the fertility of soil, the unique confluence of the power of mantra, thermal force and sublimated herbal energy in Yajna increases the vital energy (prana) in the atmosphere while purifying the air. This prana is inherent in the air. The sadhaka, having prepared himself through pranayama is able to inhale this parjanya along with oxygen through inner determination (sankalpa). The flow of fresh air in the morning is found be rich in pr³ña. The larger the scale of Yajnas and the longer their duration, the greater would be these effects.    

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 4)

🔷 कुकर्मों की आदत डालते ही अपने भीतर एक असुर उत्पन्न होता है। स्वाभाविक प्रकृति दैवी है। जगह एक के रहने लायक ही है पर मनःक्षेत्र में दो व्यक्तित्व परस्पर विरोधी प्रकृति के घुसते हैं तब निरन्तर संघर्ष करते हैं। देवासुर संग्राम की स्थिति बना देते हैं। एक आगे धकेलता है दूसरा पीछे घसीटता है। दो साँड जिस खेत में लड़ते हैं उसकी हरी-भरी फसल को रौंद कर रख देते हैं। कोई उपयोगी सामान उधर रखा हो वह भी बिखर जाता है। एक म्यान में दो तलवारें ठूंसने पर म्यान फटता है और तलवारों को भी खरोंच आती है। दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्व गढ़ लेने पर उनका द्वन्द्व युद्ध देखते ही बनता है। आत्म हनन इसी स्थिति को कहते हैं।

🔶 संसार में पागलपन तेजी से बढ़ रहा है। आँकड़े बताते हैं कि शारीरिक रोगियों की तुलना में मानसिक रोगियों की संख्या कई गुनी है। सनकी एवं अर्ध विक्षिप्तों की संख्या गिनी जाय और उनके द्वारा हानियों का लेखा जोखा लगाया जायेगा तो प्रतीत होगा कि मानव समाज की सबसे बड़ी समस्या यही है। गरीबी से भी बड़ी। गरीब की समझदारी तो कायम रहती है पर अधपगले तो आये दिन ऐसा सोचते और करते रहते हैं जिससे उन्हें स्वयं भी नहीं, मित्र-शत्रुओं, परिचितों तक को पग-पग पर त्रास सहने पड़ें।

🔷 मनोविज्ञान शास्त्र में मस्तिष्क की श्रेष्ठता को खा जाने वाला दो व्यक्तित्वों का उपजना, परस्पर अन्तर्द्वन्द्व करना ही प्रधान कारण है। यह दूसरा असुर अपने ही अचिन्त्य चिन्तन और कुकर्म करने से उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं तो सदा बेचैन रहते ही हैं, जिनके भी संपर्क में आते हैं उन्हें भी सताते रहते हैं। कुकर्मी, दुर्व्यसनी भी होते हैं। उन्हें नशेबाजी, व्यभिचार, चोरी, छल, ठगी, शेखीखोरी जैसी कितनी ही कुटेवें पीछे लग लेती हैं। और उनकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं पारिवारिक स्थिति दयनीय बना देती हैं। ऐसे लोगों पर से दूसरों का विश्वास उठ जाता है। अविश्वासी के साथ कोई आदान-प्रदान नहीं करता। सहयोग देना तो दूर। साथियों का अविश्वास पात्र बना हुआ व्यक्ति मरघट के भूत की तरह एकाकी रह जाता है। समय पर काम आने वाला उसका एक भी मित्र नहीं रहता। चाटुकार ही स्वार्थ सिद्धि के लिए पीछे लगे रहते हैं और जब उन्हें उसमें कमी दिखती है तो छिटक कर अलग हो जाते हैं। यह हानि साधारण नहीं समझी जानी चाहिए, व्यक्तित्व गँवा बैठने के उपरान्त फिर आदमी के पास बचता ही क्या है। वह जीवित रहते हुए भी मृतकों में गिना जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1985/January/v1.33

👉 गुरुगीता (भाग 98)

👉 सद्गुरू की कृपा से ही मिलती है मुक्ति

🔷 कुण्डलिनी के जागृत होते ही कीचड़ धुलने लगती है, कुसंस्कारों की काई छटने लगती है और तब उसे अनुभव होता है कि देह से परे भी उसकी सत्ता है। इस तरह ऐसा साधक कुण्डलिनी के जागरण एवं ऊर्घ्वगमन के साथ ही पिण्ड से मुक्त हो जाता है; परन्तु यह मुक्ति का पहला चरण है। इसके आगे की यात्रा तब सम्भव होती है, जब वह पद को पहचानता है। प्राण रूप हंस की सूक्ष्मताओं एवं विचित्रताओं से परिचित होता है। देह में जितने बन्धन है, वे सब के सब स्थूल हैं, परन्तु प्राण की प्रकृति देह की तुलना में सूक्ष्म है। इस प्राण को भलीभाँति जान लेने पर, इसे अपनी साधना से स्थिर कर लेने पर उसे पद मुक्ति के रूप में मुक्ति के दूसरे चरण का अनुभव होता है।

🔶 इस अवस्था में पहुँचे हुए योगी को वासनाएँ नहीं सताती, कुसंस्कारों की कीचड़ उसे कलुषित नहीं करती। वह भय से सर्वथा मुक्त हो जाता है। परन्तु यहीं से उसके जीवन में ऋद्धियों का, सिद्धियों का सिलसिला प्रारम्भ होता है। परिष्कृत प्राण एवं पारदर्शी मन उसमें अनेक अलौकिक विभूतियों को जन्म देते हैं। हालाँकि इसमें स्थूल जैसा कुछ भी नहीं होता। परन्तु इनके प्रयोग एवं परिणाम से सूक्ष्म अभिमान तो जगता ही है। इनसे छुटकारा इतना आसान नहीं है। यह तो योग साधक को परिष्कृत प्राण एवं पारदर्शी मन उसमें अनेक अलौकिक विभूतियों को जन्म देते हैं। हालाँकि इसमें स्थूल जैसा कुछ भी नहीं होता। परन्तु इनके प्रयोग एवं परिणाम से सूक्ष्म अभिमान तो जगता ही है। इनसे छुटकारा इतना आसान नहीं है। यह तो योग साधक को के वल आत्म साक्षात्कार के बाद ही उपलब्ध होता है।

🔷 किन्तु यह तभी होता है, जब इसे बिन्दु रूप आत्मज्योति का दर्शन हो। यह दर्शन ही आत्म साक्षात्कार है। जो योग साधक इस आत्मरूप का साक्षात्कार करता है, वही मुक्ति के अगले चरण यानि कि रूप मुक्ति का आनन्द उठा सकता है। योग साधक की यह अवस्था पूर्णतः द्वन्द्वातीत होती है। न यहाँ सुख होता है और न दुःख। किसी तरह के सांसारिक- लौकिक कष्ट उसे कोई पीड़ा नहीं देते। गुण गुणों में बसते हैं, इस सत्य का अनुभव उसे इसी अवस्था में होता है। उपनिषदों में इसी को अंगुष्ठ मात्र आत्मज्योति का साक्षात्कार कहा गया है। इस ज्योति के दर्शन मात्र से योग साधक को स्वयं का ज्ञान एवं आत्मरूप में स्थिति की प्राप्ति हो जाती है। इस अवस्था का सच एक ऐसा सच है, जिसे अवुभवी ही जानते हैं। वही इसका सुख एवं आनन्द भोगते हैं।

🔶 मुक्ति की यह अवस्था पाने के बाद भी भेद बना रहता है। जीव सत्ता एवं परमात्म सत्ता के बीच पारदर्शी दीवार बनी रहती है। कुछ वैसा ही, जैसा कि लैम्प की ज्योति एवं देखने वाले के बीच शीशा आ खड़ा होता है। देखने वाला ज्योति को देखता है, परन्तु इसे छू नहीं सकता, इसमें समा नहीं सकता। कुछ इसी तरह आत्मज्योति में स्थिर हो जाने के बाद जीव सत्ता को परमात्मा की अनुभूति तो होने लगती है, परन्तु भेद करने वाली पारदर्शी दीवार नहीं ढहती। यह अवस्था आनन्ददायक होते हुए भी बड़ी पीड़ादायक एवं तड़पाने वाली है।

🔷 अनुभवी जनों को ही इसका अनुभव होता है। इस पारदर्शी दीवार को भेदना किसी साधनात्मक पुरूषार्थ से सम्भव नहीं है। कोई भी योग साधना, किसी तरह की तकनीक से यह कार्य नहीं हो सकता। इसके लिए तो बस भक्त की पुकार और भगवान् की कृपा का मेल चाहिए। शिष्य की तड़पन एवं सद्गुरु की कृपा से ही यह दीवार ढहती है- गिरती है। बड़ी कठिन एवं मार्मिक बात है यह ।। जो यहाँ लिखा और कहा जा रहा है, उसे पता नहीं कौन किस तरह से समझ सकेगा। पर यही सच है, यही सच है। जिसे अपने गुरू की यह कृपा मिल जाती है, उसी को रूपातीत निरूपित हो जाता है। यही सम्पूर्ण मुक्ति है। सद्गुरू की अपने शिष्य पर अनूठी कृपा है। इस कृपा को पाने वाला कौन होता है? इसे भगवान् सदाशिव अगले क्रम में बताते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 148

👉 जीवन का एक रहस्य.....

🔶 एक औरत बहुत महँगे  कपड़ो में अपने मनोचिकित्सक के पास जाती है और उसे कहती है कि उसे लगता है कि उसका पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। वे उसकी खुशियाँ ढूँढने में मदद करें।

🔷 मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं मैरी से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।"

🔶 तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसेमें मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।

🔷 मैं खुद का जीवन लेने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन, एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।

🔶 उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई । तब मैंने सोचा अगर इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करना मुझे ख़ुशी दे सकता है, तो हो सकता है दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी, जो कि बीमार था, उसके लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।

🔷 हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी। आज, मैं किसी को नहीं जानती जो मुझसे बेहतर खाता-पीता हो और चैन से सोता हो। मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को ख़ुशी देकर।

🔶 यह सब सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी पर उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती। हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।

ख़ुशी मंजिल नहीं, यात्रा है..,वह कल नहीं, आज है..
निर्भरता नहीं, निर्णय है..,यह नहीं कि हम कौन है,
अपितु हमारे पास क्या है

👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 1)

🔶 उत्पादन की जड़:- इन तीनों को सदैव अपने अधिकार में रखिये- अपना क्रोध, अपनी जिह्वा और अपनी वासना। ये तीनों ही भयंकर उत्पादक की जड़ हैं।

🔷 क्रोध:- क्रोध के आवेश में मनुष्य कत्ल करने तक नहीं रुकता। ऊटपटाँग बक जाता है और बाद में हाथ मल मल कर पछताता है।

🔶 स्वाद:- जीभ के स्वाद के लालच में भक्ष्य अभक्ष्य का विवेक नष्ट हो जाता है। अनेक व्यक्ति चटपटे मसालों, चाट पकौड़ी और मिठाइयाँ खा खाकर अपनी पाचन शक्ति सदा के लिये नष्ट कर डालते हैं।

🔷 सबसे बड़े मूर्ख वे हैं जो अनियंत्रित वासना के शिकार हैं।  विषय-वासना के वश में मनुष्य का नैतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पतन तो होता ही है, साथ ही गृहस्थ सुख, स्वास्थ्य और वीर्य नष्ट होता है। समाज ऐसे भोग विलासी पुरुष को घृणा की दृष्टि से अवलोकता है। गुरुजन उसका तिरस्कार करते हैं। ऐसे पापी मदहोश को स्वास्थ्य लक्ष्मी और आरोग्य सदा के लिये त्याग देते हैं। इन तीनों ही शत्रुओं पर पूरा पूरा नियंत्रण रखिये।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13

👉 आज का सद्चिंतन 28 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 April 2018


👉 त्यागमय जीवन

🔶 महात्मा ईसा ने अपने शिष्यों से कहा था कि-“जो बहुत जोड़ता है वह बहुत खोयेगा। जो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहता है वह सब कुछ छोड़कर मेरे साथ चले।” भगवान बुद्ध ने राज सिंहासन छोड़ा था पर वे किसी प्रकार घाटे में नहीं रहे। राजा विश्वामित्र से महर्षि विश्वामित्र का पद ऊंचा था, बैरिस्टर गाँधी से महात्मा गाँधी कुछ बुरे नहीं रहे। अकबर का दरबारी प्रताप सिंह बनने की अपेक्षा जंगलों में भटकने वाला राणाप्रताप क्या मूर्ख कहलाया ? भामा शाह अपना सब कुछ लुटा गये, क्या वे घाटे में रहे ? सिकन्दर अपनी दौलत को देख देखकर मरते वक्त बुरी तरह फूट फूट कर रोता था, मरने के बाद उसने अपने दोनों हाथ अर्थी से बाहर निकले रहने देने का आदेश किया था ताकि लोग यह जान सकें कि विपुल सम्पत्ति जमा करने वाला सिकन्दर अपने साथ कुछ भी न ले जा सका था उसके दोनों हाथ बिल्कुल खाली थे।

🔷 त्याग का अर्थ जिम्मेदारियों का कर्तव्य का त्याग नहीं है जैसा कि आजकल कितने ही नासमझ लोग अपने कठोर कर्तव्यों से विमुख होकर कायरतापूर्वक घर छोड़कर भाग खड़े होते हैं और विचित्र वेष बनाकर आलस्य में समय बिताते हुए दूसरों पर भार बनते हैं। त्याग का वास्तविक अर्थ है- अपनी दुर्भावना दुर्वासना स्वार्थपरता, ममता एवं लोभवृत्ति का त्याग। वेद भगवान ने कहा दे--“सौ हाथों से कमा, हजार हाथों से दान कर” हम तत्परतापूर्वक अपने श्रम का शक्ति का योग्यता का समय का पूरा पूरा उपयोग करते हुए आत्मिक और साँसारिक उत्पादन बढ़ावे और उस उत्पादन का आवश्यक अंश जीवन निर्वाह के लिए उपयोग करते हुए शेष को निर्लोभ भाव से परमार्थ में लगावें। यही गीता का कर्म योग हैं। यह त्यागमय जीवन बिताने की नीति मानव जीवन के सदुपयोग की सर्वोत्तम नीति है, आत्मोन्नति की सर्वोत्तम साधना है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 24

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 2)

🔶 The brilliance and purity of agni (fire) appears to be a universal symbol for worship.  The rituals of different religions affirm this fact. The first mantra of Rigaveda – the most ancient scripture of knowledge on Earth, quotes “agnimide purohitam”, signifying agni as a sacred idol of God. This is what is referred to in different religious and spiritual scriptures as Brahmateja, Divine Flame, Sacred Glow, Divine Light, Latent Light, etc. The Vedic hymn “agne supatha raye” prays to this omnipotent, supreme power to enlighten and ennoble us towards the righteous path. The same is inspired in the phrase “dhiyo yonah pracodayat” of the great Gayatri Mantra.

Meaning of Yajna
🔷 In its gross form, Yajna is a spiritual experiment of sacrificing and sublimating the havana samagri (herbal preparations) in the fire accompanied by the chanting of Vedic mantras.  This is only the physical process or ritual of Yajna, which has scientific importance and beneficial effects. This agni-Yajna when performed on a small scale is also known as havan, homam or agnihotra.

🔶 The meaning of Yajna is not confined to this sacrificial fire process. It has a much wider and deeper meaning. The word Yajna is derived from the Sanskrit verb yaj, which has a three-fold meaning: worship of deities (devapujana), unity (sangatikarana) and charity (dana). The philosophy of Yajna teaches a way of living in the society in harmony and a lifestyle which promotes and protects higher human values in the society, which is indeed the basis of an ideal human culture.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 3)

🔶 चिकित्सा विज्ञान की नवीनतम खोज यह है कि शारीरिक और मानसिक बीमारियों का प्रधान उद्गम केन्द्र मस्तिष्क है। क्योंकि सारे शरीर पर मूल नियंत्रण उसी का है। मनः क्षेत्र उद्विग्न होगा तो शरीर की स्थिति सामान्य होने पर भी कोई न कोई रोग आये दिन घेरे रहेंगे। विकृति रहने तक औषधि उपचार में कोई स्थायी निराकरण न हो सकेगा। यदि मन प्रफुल्ल और हलका हो तो शारीरिक कारणों से उठने वाले रोग तो प्रकृति ही समयानुसार अच्छे कर देती है या फिर मामूली उपचार से दूर हो जाते हैं। पर एक के बाद एक उठते रहने का सिलसिला मनोविकारों के कारण ही होता है।

🔷 मानसिक दृष्टि से कितने ही व्यक्ति बड़े बेतुके, अविचारी, उद्धत, सनकी, शेख चिल्ली लोकाचार का ध्यान न रखने वाले होते हैं। उन्हें पागल तो नहीं कह सकते पर अधपगले से कम भी उनकी स्थिति नहीं होती। ऐसे लोग अपने लिए और दूसरों के लिए भारभूत ही सिद्ध होते हैं। वे किसी को नहीं सम्भाल पाते उल्टे उन्हीं को दूसरों के द्वारा सम्भालना पड़ता है। ऐसे लोगों को विकृत व्यक्तित्व कहते हैं। उनकी उपयोगिता, प्रगति एवं सफलता निरन्तर घटती ही जाती है। बुढ़ापा आने पर तो ऐसे लोगों की स्थिति और भी अधिक दयनीय हो जाती है।

🔶 मानवी चेतना का मौलिक स्वभाव सज्जनता सद्भावना से जुड़ा हुआ है। उसमें जब अनाचार घुसते पड़ते हैं तो काँटे की तरह चुभते रहते हैं और बेचैनी उत्पन्न करते हैं। दुष्टता बरतने से दूसरों की जो हानि होती है उसकी तुलना में अपनी हानि कहीं अधिक होती है। दूसरे तो चोट खाते समय ही हैरान होते हैं पर अपने भीतर आत्म प्रताड़ना का एक ऐसा राक्षस घुस बैठता है जो आजीवन त्रास देता रहता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 33

👉 गुरुगीता (भाग 97)

👉 सद्गुरू की कृपा से ही मिलती है मुक्ति

🔶 इस साधना रहस्यों को अपने श्रीमुख से उद्घाटित करते हुए भगवान् महादेव कहते हैं-
श्री महादेव उवाच-
पिण्डं कुण्डलिनीशक्तिः, पदं हंसमुदाहतम्। रूपं बिन्दुरितिज्ञेयं रूपातीतं निरञ्जनम् ॥ १२१॥
पिण्डे मुक्ता पदे मुक्ता, रूपे मुक्ता वरानने। रूपातीते तु ये मुक्तास्ते मुक्तानामसंशयः॥ १२२॥

🔷 हे देवि! कुण्डलिनी शक्ति पिण्ड है। हंस पद है, बिन्दु ही रूप है तथा निरञ्जन, निराकार रूपातीत है, ऐसा कहते हैं॥ १२१॥ जो पिण्ड से मुक्त हुआ, पद से मुक्त हुआ, रूप से मुक्त हुआ और जो रूपातीत से मुक्त हो सका, हे श्रेष्ठ मुखवाली! उसी को मुक्त कहते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है॥१२२॥

🔶 गुरूगीता के उपरोक्त दो महामंत्रों में योगीजनों की समस्त योगसाधना का सार है। विरले ही इसकी अनुभूति कर पाते हैं। भगवान् शिव बड़े क्रम से माता भवानी को इन रहस्यों की जानकारी देते हैं। वे कहते हैं कि कुण्डलिनी शक्ति ही पिण्ड है। इसका तात्पर्य यह है कि जब तक योग साधक में कुण्डलिनी शक्ति सुप्त रहती है, तब तक वह देह बोध और देहाभिमान से बँधा रहता है। ऐसा व्यक्ति कितनी ही पुस्तकें पढ़ डाले, भले कितनी ही शास्त्रों का अध्ययन कर ले, पर उसे देह बोध से मुक्ति नहीं मिलती। इनके पास तर्क तो होते हैं, पर बोध नहीं होता है। ये बातें कितनी ही ऊँची क्यों न करें, पर वह वासनाओं की कीचड़ और कलुष से मुक्त नहीं हो पाता। उसे यह मुक्ति मिलती है- कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 146