रविवार, 14 जनवरी 2018

👉 कुत्ते में भगवान्

🔷 पढरपुर में कातिकी का मेला लगा। भक्त नामदेव भी वहाँ पधारे वे भोजन बना रहे थे कि एक कुत्ता उनकी रोटियाँ उठाकर भागा। नामदेव उसके पीछे-पीछे घी की कटोरी भी लेकर भागे कि- भगवान्, रूखी रोटी मत खाओ मेरे पास यह घी बचा है इससे उन्हें चुपड़ भी लो, कुत्ता रुका, नामदेव ने उसकी रोटियाँ चुपड़ दी और उसने उन्हें प्रेम पूर्वक खाया। भक्तों ने अपने दिव्य चक्षुओं से स्पष्ट देखा कि कुत्ते के रूप में भगवान पढरीनाथ ही विराजमान थे। सच्चा भक्त वह है जो प्राणिमात्र में भगवान् का दर्शन करे।

👉 'आप दीपक बनो'

🔶 भगवान बुद्ध जब मृत्युशय्या पर अंतिम सांसें गिन रहे थे कि किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। गौतम बुद्ध ने अपने नजदीक बैठे शिष्य आनंद से पूछा, 'आनंद कौन रो रहा है।'

🔷 आनंद ने कहा, 'भंते! भद्रक आपके अंतिम दर्शन के लिए आया है।' बुद्ध ने कहा, 'तो उसको मेरे पास बुला लो। आते ही भद्रक फूट-फूट कर रोने लगा, उसने कहा आप नहीं रहेंगे तो हमें ज्ञान का प्रकाश कौन दिखाएगा।'

🔶 बुद्ध ने भद्रक से कहा, 'भद्रक प्रकाश तुम्हारे भीतर है, उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। जो अज्ञानी है इसे देवालयों, तीर्थों, कंदराओं या गुफाओं में भटकते हुए खोजने का प्रयत्न करते हैं। वे अंत में निराश होते हैं। इसके विपरीत मन, वाणी और कर्म से एकनिष्ठ होकर जो साधना में निरंतर लगे रहते हैं।'

🔷 उनका अंतः करण स्वयं दीप्त हो उठता है। इसलिए भद्रक, 'आप दीपक बनो।' यही मेरा जीवनदर्शन है जिसे मैं आजीवन प्रचारित करता रहा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 15 Jan 2018


👉 साधना की असफलता के कारण

🔶 किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए जो मंजिल तय करनी पड़ती है, उसे साधना कहा जाता है। इस साधना में यदि विघ्र-बाधाएँ उपस्थित हो जायें, तो प्राय: मंजिल बीच में ही अधूरी छूट जाती है। जीवन का भौतिक पहलू हो या आध्यात्मिक, कोई भी निरापद नहीं है। सांसारिक कार्यों में सफलता पाने के इच्छुक व्यक्ति मार्ग में पडऩे वाली आर्थिक, तकनीकी, प्रतिस्पद्र्धात्मक आदि बाधाओं से छुटकारा पाने का मार्ग भी पहले से ही निर्धारित कर लेते हैं अथवा उनका सामना करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाते हैं। अध्यात्म मार्ग में भी कम विघ्र बाधाएँ नहीं होती हैं। आध्यात्मिक एवं सांसारिक उपलब्धियों की बाधाओं में अंतर मात्र इतना ही है कि भौतिक प्रगति के मार्ग में बाह्यï विघ्र बाधाएँ अधिक होती हैं, जबकि आत्मिकी क्षेत्र में मनुष्य की स्व उपार्जित विघ्र बाधाएँ ही प्रधान होती है। आत्मिक मार्ग के प्रत्येक पथिक को महान् कार्यों, ईश्वर प्राप्ति आदि के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं से परिचित होना आवश्यक है।
  
🔷 साधक यदि बीमार रहता हो, तो उसके लिए नियमित रूप से साधना, उपासना, स्वाध्याय, सत्संग का लाभ उठा पाना कठिन होता है। तामसी एवं असंयम पूर्ण भोजन से चित्त में चंचलता तथा दोष पूर्ण विचार उत्पन्न होते हैं, जिससे चिंतन विकृत होता चला जाता है। इसीलिए साधना काल में साधक को सात्विक, पौष्टिïक तथा प्राकृतिक रसों से परिपूर्ण सादा आहार ही ग्रहण करना चाहिए। बड़े और महान्ï कार्य समय एवं श्रम साध्य होते हैं। इसमें शंका-आशंका करने वालों को सफलता नहीं मिलती। इसके लिए दृढ़ विश्वासी, संकल्प के धनी व्यक्ति ही सफल हो पाते हैं। बार-बार संदेह किसी भी कार्य को असफल ही करता है। गुरु बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह उस विषय विशेष का पूर्ण ज्ञाता हो। अनभिज्ञ, अल्पज्ञ व्यक्ति को अपना गुरु या मार्गदर्शक बनाना अनुचित है। सच्चे साधक को प्रसिद्धि के विपरीत ठोस कार्यों द्वारा साधना को महत्त्व देना चाहिए। पूर्ण सफलता मिल जाने पर यश छाया के रूप में पीछे-पीछे दौडऩे लगता है। किसी भी कार्य को ठीक एक ही समय पर नियमपूर्वक करते रहने से उस कार्य की आदत बन जाती है।

🔶 नियमितता के अभाव में कोई भी साधना सफल नहीं होती। कुतर्कों को त्याग कर साधक को आत्मा की आवाज सुनना और उसका अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि सामाजिक रीति-रिवाज, मर्यादा, धर्म, ईश्वर, अस्तित्व यह सब विषय ऐसे हैं, जिन्हें तर्क द्वारा हल नहीं किया जा सकता। आलस्य एक भयंकर बीमारी के समान है। आलस्य के वशीभूत होकर मनुष्य अपनी कार्य कुशलता को ही खो डालता है। आलस्यवश कार्य न करना, तो पतन पराभव का कारण ही बनता है। अध्यात्म मार्ग के पथिक को बुरे कर्म, बुरे विचारों वाले लोगों से दूर ही रहना चाहिए, अन्यथा किसी न किसी रूप में उसके विचार आप पर प्रभावी हो ही जाएँगे। दूसरों के दोषों को देखने में अपनी शक्ति खर्च न करें, आपके अंत:करण में लगी अचेतन की फिल्म भी दूसरों के दुर्गुणों को अपने अंदर आत्मसात कर लेती है। हम सभी सत्य की खोज में दौड़ रहे हैं। कोई भी पूर्ण सत्य को प्राप्त नहीं कर सका। यह मानकर दूसरों के धर्म, उनकी मान्यताओं के प्रति उदार दृष्टिïकोण अपनाएँ। कट्टïरता की संकीर्णता साधना मार्ग का सबसे बड़ा अवगुण है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Jan 2018

🔶 अनन्य भाव से परमात्मा की उपासना शरणागति का मुख्य आधार है। ईश्वर के समीप बैठने से वैसे ही दिव्यता उपासक को भी प्राप्त होती है साथ ही उसके पाप- सन्ताप गलकर नष्ट होने लगते हैं। नित्य- निरन्तर यह अभ्यास चलाने से ही जीवन में वह शुद्धता आ पाती है, जो पूर्ण शरणागति के लिये आवश्यक होती है।

🔷 संगठन, सामूहिकता, एकता, कौटुम्बिकता और मिल- जुलकर रहने की अभिरुचि जितनी अधिक विकसित होगी, समाज की समर्थता, सभ्यता उसी क्रम में बढ़ती जायेगी। आज इन स्वस्थ परम्पराओं का भारी अभाव है। हमें समाज का नया निर्माण करने के लिये प्रचलित अवांछनीय प्रथाओं के विरुद्ध विरोध, संघर्ष का झंडा खड़ा करना पड़ेगा और स्वस्थ परम्पराओं को प्रतिष्ठापित करने का भागीरथी प्रयत्न करना पड़ेगा, तभी हम अपने समाज को देवोपम और सुख- शान्ति का केन्द्र- बिेन्दु बना सकने में समर्थ हो सकेंगे।

🔶 जीवात्मा सत्य है- शिव है और सुन्दरता से युक्त भी। उसी के शक्ति एवं प्रकाश की छाया से बहिर्जगत यथार्थ लगता है। सत्य और शिव से, सुन्दरता से युक्त जीवात्मा की प्रतिच्छाया मात्र से यह संसार इतना यथार्थ सुन्दर एवं आनंद दायक लगता है, फिर उसका शाश्वत स्वरूप कितना सुन्दर, चिरन्तन आनन्द देने वाला होगा, इसकी कल्पना मात्र से मन एक अनिवर्चनीय आन्द से पुलकित हो उठता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 3)

🔶 इस सत्य का यदि पाश्चात्य मनोवेत्ताओं के पास कोई उत्तर हो सकता है तो केवल यह है कि मन को प्रसन्न करने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं कि उसकी लालसाओं की पूर्ति करने का यथासाध्य प्रयत्न किया जाये। जो जिस सीमा तक इस प्रयत्न में सफल होता रहेगा वह उस सीमा तक सुखी एवं सन्तुष्ट रहेगा और जो जितनी सीमा तक असफल होगा वह उस सीमा तक दुःखी एवं अशांत रहेगा। उसे सुखी एवं सन्तुष्ट कर सकने का अन्य कोई उपाय नहीं है।

🔷 क्या पाश्चात्य मानस-वेत्ताओं का यह उत्तर उपयुक्त माना जा सकता है? इसका तो ठीक-ठीक आशय यह है कि जो अधिक शक्तिशाली, साधन सम्पन्न तथा चतुर है वह वांछाओं को किसी प्रकार भी पूरी कर सुखी एवं सन्तुष्ट रह सकता है और जो सामान्य जन जिनके पास शक्ति, साधन तथा चातुर्य की कमी है वे दुःख की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में ही पड़े-पड़े रोते-कलपते रहेंगे। सुखी होने का यह उपाय शाश्वत, सार्वजनिक तथा सभ्यतापूर्ण नहीं है। निःसन्देह इसी प्रकार के दृष्टिकोण ने संसार में स्वार्थ, संघर्ष, शोषण तथा साम्राज्यवाद को जन्म दिया और बढ़ाया है। संसार में फैले अन्याय, अत्याचार तथा अनैतिकता का उत्तरदायी भी यही दूषित दृष्टिकोण ही है।

🔶 इसके अतिरिक्त इस पाश्चात्य कथन में सत्य का अंश भी नहीं है। यदि धन, धाम, वैभव-विभूति, साधन-सुविधा, वस्तुयें एवं उपादान संचय कर लेने से कोई सुख का अधिकारी बन सकता होता तो संसार का कोई भी साधन सम्पन्न व्यक्ति दुःखी अथवा असन्तुष्ट नहीं दिखाई देता। उसका जीवन शांतिपूर्वक शरद-सरिता की तरह निर्विकार रूप से आनन्द कलरव के साथ कल्लोल करता हुआ बहता चला जाता। इसके विपरीत असाधनवानों का कभी मानसिक समाधान ही न होता। वे सर्वदा क्षण-प्रतिक्षण अशान्ति एवं असुख के अनुपात में जलते मरते रहते। जबकि ऐसा देखने में नहीं आता। एक से एक बढ़कर सम्पन्न व्यक्ति दुःखी और एक से एक असम्पन्न व्यक्ति सुखी एवं असन्तुष्ट देखे जा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.9

👉 Sacrifice-Dedication (Last Part)

🔷 A little story of Ravindra Nath Tagore, listen. R N Tagore sang a song, a poem,’ I tapped each door to beg, I filled my bag with grains. One beggar came to me and asked me to give him something from that bag.’’ R N Tagore in that important poet has written, ‘‘I gathering great courage drew one seed of grain to place the same in the palm of that beggar who went back smiling and I came back to my home.’’  R N Tagore sang, ‘‘I overturned the bag but was surprised to see that it contained one seed of gold also. Seeing that bead of gold I burst into tears. I said, had I given all the seeds of grain to that beggar, my bag would have been full of golden beads.’’ Well, this is the net outcome of my life; this is the conclusion of my austere-measures; this is the culmination of my UPASANA, SADHANA and ARADHANA.

🔶  I offered all my bag, time, money, brain, mind and power in the feet of BHAGWAN. This led BHAGWAN also to make all his RIDDHI, SIDDHI available for my use. I continued to say, ‘‘I don’t need your RIDDHIs.’’ He in turn kept saying, I don’t need your money.’’ I kept saying, I don’t need you’re your SIDDHIs.’’ He in turn kept saying, I don’t need your glory.’’ Thus went on this Give and Take between me and my BHAGWAN. I am sure you too do like that but then what goes wrong with you is the technique, the method and the mechanism of doing all that. Friends, I am sure by now you are not in position to identify your BHAGWAN, whereas I have found it in the form of Resonance (PRATID-DHWANI) & Reflection (PRATICH-CHCHAYA).
                                      
🔷 Friends! This is how jostling has been taking place between us (me & BHAGWAN). Had I been approaching the life in a different way to say, ‘‘O BHAGWAN, tell what you have to give me, do you have what I need?’’ in turn BHAGWAN would have said to me, ‘‘No, I will not give you a bit. First you tell me what you have to give me.’’ Had I been doing like this, I too would have been jostling like all of you that would have led me to nowhere.
                              
🔶  I wish such a clash to be necessarily initiated between you and BHAGWAN so that you too start enjoying spirituality like I have been. I wish you to be blessed in very this birth as I am departing after having enjoyed for 60 years my life led by spirituality. 

Finished, today’s session.
================OM SHANTI==============

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 9)

🔶 प्यार, मित्रो किसे कहते हैं, आप जानते नहीं हैं। प्यार एक ही चीज का नाम है, जिसमें आदमी को दिया जाता है। प्यार का अर्थ देना होता है। जिसको भी हम प्यार करते हैं उसको हम कुछ दिए बिना नहीं रह सकते। हम बच्चे को प्यार करेंगे तो उसको कुछ देंगे। जिस किसी को भी प्यार करेंगे उसको हम देंगे। भक्तियोग का अर्थ है-दया, भक्तियोग का अर्थ है-करुणा, भक्तियोग का अर्थ है-प्रेम, भक्तियोग का अर्थ है सेवा। नहीं महाराज जी सेवा का अर्थ होता है-मूर्ति पर टन-टन घंटी बजा दी, बस हो गई नवधा भक्ति। तो यही है तेरी नवधा भक्ति-कौन सी-'पाद सेवनम् पंखाझलनम्'-पाद सेवन और पंखा झलने को ही नवधा कहता है। जो बातें भक्ति की हैं उनसे तो हजारों मील दूर भागते रहते हैं और स्वांग करते रहते हैं, खेल-खिलौने बनाते रहते हैं। दंड-कमंडल पेलते हैं और भगवान को भी धोखा देते हैं और अपने को भी धोखा देते हैं और कहते हैं कि नवधा भक्ति करते हैं। बेटे, इसे नवधा भक्ति नहीं कहते।
 
🔷 मित्रो, क्या करना पड़ेगा? भक्तियोग के उस वास्तविक स्वरूप को समझना पड़ेगा जिसके लिए हमने आपको बताया था कि आप प्रकाश का ध्यान किया कीजिए। प्रकाश का ध्यान करेंगे तब फिर आपको वहाँ चलने का मौका मिल जाएगा, जहाँ कि 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की बात बताई थी। एकाग्रता ध्यान का एक उद्देश्य है। बिखराव को रोकना भी कह सकते हैं, क्योंकि हमने अपने आप को सब जगह बिखेर दिया है। यदि हमने अपने आप को एक लक्ष्य पर केंद्रीभूत किया होता तो बंदूक की नली में से बारूद जिस तरीके से एक दिशा में चली जाती है और लक्ष्य भेद करने में सफल होती है, हम भी अपने जीवनलक्ष्य में सफल हो गए होते।

🔶 अर्जुन ने अपने बिखराव को एक केंद्र पर इकट्ठा कर लिया था। द्रौपदी-स्वयंवर में जब वह गया था तो द्रोणाचार्य ने लोगों से पूछा था कि क्या दिखाई पड़ता है? किसी ने कहा-मछली की पूँछ, तो किसी ने कहा-मछली की टाँग, मछली का पेट। तो आचार्य द्रोण ने कहा-आप मछली का निशाना नहीं बेध सकते, भागिए यहाँ से। फिर अर्जुन से पूछा कि आपको क्या दिखाई पड़ता है? अर्जुन ने कहा-हमें एक ही चीज दिखाई पड़ती है और वह है मछली की आँख। तो मारिए निशाना और सफलता का वरण कीजिए। मित्रो, असंख्य दिशाओं में फैला हुआ हमारा मस्तिष्क कभी सफलता नहीं सा सकता। इसे एक दिशा में इकट्ठा कीजिए।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 17)

👉 साक्षात् भगवान् विश्वनाथ होते हैं—सद्गुरु

🔷 श्रद्धालुजनों में काशीवास के प्रति गहरी आस्था है। लोग वृद्धावस्था में घर-परिवार के मोह को छोड़कर काशी जाकर रहा करते थे। क्योंकि शास्त्र-पुराण सभी एक स्वर से कहते हैं कि काशीवास करने से काशी में जाकर शरीर छोड़ने से फिर से जीवन भवबन्धनों में नहीं पड़ता। भगवान् भोलेनाथ उसे मुक्ति प्रदान करते हैं। वही सभी जनों के मुक्तिदाता कृपालु भोलेनाथ माता पार्वती से गुरुगीता में कहते हैं कि गुरुधाम किसी भी तरह से काशी से कम नहीं है। गुरु जहाँ भी रहते हैं, वहीं काशी है। इस काशी के विश्वनाथ स्वयं गुरु हैं। वही साक्षात् तारक ब्रह्म का स्वरूप है। उनकी कृपा से शिष्य को अनायास और अप्रयास ही मुक्ति लाभ होता है। गुरुचरणों का जल ही इस काशी में गंगा की जलधारा है। जिसका एक कण भी जीवों को त्रिविध तापों से छुटकारा देता है।

🔶 भगवान् सदाशिव इस प्रकरण को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि गुरुदेव का चरणोदक काशी तीर्थ तो है ही, गयातीर्थ भी है। सनातन धर्म को मानने वाले सभी जन गया की महिमा से परिचित हैं। गया वह पवित्र क्षेत्र है, जहाँ प्रेतात्माओं को मुक्ति मिलती है। पुराणों में कथा है कि भगवान् विष्णु ने यहाँ पर गयासुर का वध किया था। असुर होने के बावजूद गयासुर के मन में भगवान् के प्रति भक्ति भी थी। इस भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उससे वरदान माँगने के लिए कहा। तब गयासुर ने सृष्टि के पालनहार विष्णु से यह वर माँगा कि प्रभु यहाँ जो भी अपने पितरों का श्राद्ध करे अथवा प्रेतयोनि में किसी भी आत्मा के लिए कोई यहाँ श्राद्ध संकल्प करे, तो उन पितर और प्रेत आत्माओं की मुक्ति हो जाए।

🔷 गुरुचरणों और चरण जल का प्रभाव भी कुछ ऐसा ही है। गुरुचरण केवल गुरुभक्त शिष्य के लिए ही  कल्याणकारी नहीं है; बल्कि उनके लिए भी कल्याणकारी है, जिनके कल्याण की कामना उस शिष्य के मन में उठती है। अपने गुरु का सच्चा शिष्य जिस किसी के लिए भी कल्याण की प्रार्थना करेगा, उसका कल्याण हुए बिना नहीं रहेगा। गुरुदेव के चरणों का सान्निध्य अक्षय वट एवं तीर्थराज प्रयाग की भाँति है, जहाँ की गयी थोड़ी सी भी साधना अनन्त गुना फलवती हो जाती है। यहाँ थोड़े से भी शुभकर्म अपरिमित एवं असीम फलदायी होते हैं। ऐसे कृपालु गुरुदेव के चरणों में साधक-शिष्यों का बार-बार नमन कल्याणकारी है।

🔶 कृपालु गुरुदेव की महिमा का अथ-इति से रहित अनन्त स्वरूप भगवान् भोलेनाथ के सिवा और कौन जान सकता है। सद्गुरु का स्मरण-चिन्तन ही शिष्य के लिए महासाधना है। जिससे जीवन में सभी सुफल अनायास ही मिल जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 31