बुधवार, 31 जनवरी 2018

👉 परोपकारः पुण्याय:-

🔶 फारस में एक बादशाह बड़ा ही न्याय प्रिय था। वह अपनी प्रजा के दुख-दर्द में बराबर काम आता था। प्रजा भी उसका बहुत आदर करती थी। एक दिन बादशाह जंगल में शिकार खेलने जा रहा था, रास्ते में देखता है कि एक वृद्ध एक छोटा सा पौधा रोप रहा है।

🔷 बादशाह कौतूहलवश उसके पास गया और बोला, ‘‘यह आप किस चीज का पौधा लगा रहे हैं?’’ वृद्ध ने धीमें स्वर में कहा, ‘‘अखरोट का।’’ बादशाह ने हिसाब लगाया कि उसके बड़े होने और उस पर फल आने में कितना समय लगेगा। हिसाब लगाकर उसने अचरज से वृद्ध की ओर देखा, फिर बोला, ‘‘सुनो भाई, इस पौधै के बड़े होने और उस पर फल आने मे कई साल लग जाएंगे, तब तक तु कहॉं जीवित रहोगे ’’ वृद्ध ने बादशाह की ओर देखा। बादशाह की आँखों में मायूसी थी। उसे लग रहा था कि वह वृद्ध ऐसा काम कर रहा है, जिसका फल उसे नहीं मिलेगा।

🔶 यह देखकर वृद्ध ने कहा, ‘‘आप सोच रहें होंगे कि मैं पागलपन का काम कर रहा हूँ। जिस चीज से आदमी को फायदा नहीं पहुँचता, उस पर मेहनत करना बेकार है, लेकिन यह भी सोचिए कि इस बूढ़े ने दूसरों की मेहनत का कितना फायदा उठाया है? दूसरों के लगाए पेड़ों के कितने फल अपनी जिंदगी में खाए हैं? क्या उस कर्ज को उतारने के लिए मुझे कुछ नहीं करना चाहिए? क्या मुझे इस भावना से पेड़ नहीं लगाने चाहिए कि उनके फल दूसरे लोग खा सकें? जो अपने लाभ के लिए काम करता है, वह स्वार्थी होता है।’’ बूढ़े की यह दलील सुनकर बादशाह चुप रह गया।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 1 Feb 2018

👉 समग्र अध्यात्म

🔶 अध्यात्म की त्रिवेणी प्रेम, ज्ञान और बल इन तीन धाराओं में प्रवाहित होती है। इन तीनों का संतुलित अभिवर्धन करने से ही कोई समग्र आध्यात्मवादी हो सकता है। प्रेम हमारे अन्त:करण का अमृत है। जिस प्रकार हम अपने स्वार्थ, सुख, यश, वैभव और उत्सर्ग को चाहते हैं उसी प्रकार दूसरों के लिए भी चाह उठने लगे, तो उसे प्रेम का प्रकाश कहना चाहिए। अपनापन ही सबसे अधिक प्रिय है। अपने शरीर, मन, यश, सुख की चाहत सभी को रहती है। यह अपना आपा जितना विस्तृत होता जाता है, वह उतना ही प्रिय लगता जाता है और उसे सुखी समुन्नत बनाने की परिधि विस्तृत होती जाती है और अपना ‘प्रिय’ क्षेत्र बढ़ता चला जाता है। उसके लिए सेवा सहायता करने की इच्छा होती है और जो सत्कर्म ही बनते हैं। अपनों के साथ दुष्टता कौन करता है? प्रेम भावना की वृद्धि मन में से सभी दुष्प्रवृत्तियों को हटा देती है और मनुष्य सज्जन और सच्चरित्र एवं सहृदय बनता चला जाता है। प्रेम असंख्य सदगुणों का स्रोत है इसलिए उसे अध्यात्म का प्रथम चरण माना गया है।
  
🔷 दूसरा घटक है- ज्ञान। यथार्थ को समझना ही सत्य है। इसी को विवेक कहते हैं। जीवन के लक्ष्य को हम भूल जाते हैं। आत्मकल्याण की बात विस्तृत हो जाती है और कत्र्तव्य धर्म का पालन करने की गरिमा समझ में नहीं आती। इन्द्रियों की वासना और मन की तृष्णा पूरी करने के लिए अहंकार की पूर्ति के लिए निरर्थक कार्य करते हुए जीवन बीत जाता है और पाप की गठरी सिर पर लद जाती है। यह सब अज्ञान का फल है। अपने को शरीर नहीं आत्मा मानकर चलें। आत्मकल्याण की दृष्टिï से जीवन क्रम निर्धारित करें और वासना, तृष्णा को अनियन्त्रित न होने दें। स्कूली शिक्षा या धर्म की पुस्तकें पढ़ लेने का नाम ज्ञान नहीं है। यह तो एक आस्था है जो अन्त:करण में प्रकाशवान होकर हमें सही और गलत का विवेक कराती है। यह ज्ञान जो जितना प्राप्त कर लेता हैं वह उतना ही सफल आत्मवादी कहा जाता है।
  
🔶 तीसरा चरण है- बल। निर्बल को न सांसारिक सुख मिलता है न आत्मिक। हमें बलवान बनना चाहिए। मनोबल के आधार पर ही आपत्तियों से निपटना-प्रगति के पथ पर बढ़ चलना सम्भव होता है। लोभ, मोह जैसे शत्रुओं को परास्त करते हुए-प्रलोभनों से बचते हुए आदर्शवादिता के मार्ग पर अपनी प्रवृत्तियों को मोड़ सकना साहसी और पराक्रमी व्यक्ति के लिए ही सम्भव है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र सामथ्र्यवान और सशक्त बनाना पड़ता है। आत्मिक, मानसिक, शारीरिक सभी दुर्बलताएँ दूर करनी पड़ती हैं और आर्थिक क्षेत्र में इतना स्वावलम्बी रहना पड़ता है कि किसी के आगे न हाथ पसारना पड़े।
  
🔷 मनुष्य की सत्ता तीन भागों में विभक्त है- अन्त:करण, मस्तिष्क और शरीर। इसी विभाजन को अध्यात्म की भाषा में कारण शरीर और स्थूल शरीर कहते हैं। अन्त:करण का वैभव है-प्रेम। मस्तिष्क का धन है-ज्ञान। शरीर का वर्चस्व है-बल। चूँकि शरीर से ही आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्ध है इसलिए धन, व्यवहार कौशल और संगठन को भी इसी क्षेत्र में गिना जाता है। इन तीनों के समन्वय से ही समग्र अध्यात्म बनता है। एकांगी से काम नहीं चलता। अन्न, जल और वायु के त्रिविध आहार पर जीवन निर्भर है। आध्यात्मिक जीवन की यह तीनों प्रवृत्तियाँ समान रूप से आवश्यक हैं। इनका समन्वय ही त्रिवेणी का संगम है। इस तीर्थराज प्रयाग में स्नान करके ही हम जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन को बालक्रीड़ाओं में भटकने न दें (भाग 3)

🔷 किसी विचारवान की दृष्टि से देखा जाये तो इस प्रकार जिया जाना कृमि-कीटकों से, पशु-पक्षियों से ऊँचे स्तर का तनिक भी नहीं है। सभी जीवधारी ऐसा ही करते एवं इसी मार्ग पर चलते रहते हैं। भवन बनाने में दीमक, और दाने जमा करने में, श्रम करने में चींटी की मेहनत को सराहा ही जा सकता है। जमाखोरी के लिए खटने वालों में मधुमक्खी का जीवन इसी गोरख-धन्धे में बीतता है। दिन भर वह श्रम करती है और उस संचय का लाभ कोई दूसरे उठाते हैं। मनुष्य भी अपनी क्षमताओं का उपयोग इन्हीं प्रयोजनों के लिए करते रहते हैं। सब ओर जो होता दिखता है उसी की नकल वे स्वयं भी करने लगते हैं। मस्तिष्क में समझ तो बहुत होती है। शिक्षा और चतुरता तो बहुत अर्जित कर ली जाती है। पर उनका उपयोग भी इन्हीं तुच्छ प्रयोजनों के लिए होता रहता है। इसी कोल्हू में चलते पिलते वह दिन आ खड़ा होता है जिसके उपरान्त और कुछ करने को शेष नहीं रह जाता।

🔶 मन को समझाया जाना चाहिए कि जिस प्रकार एकाकी स्वार्थ चिन्तन में अपनी बुद्धि लगाई जाती है, उसी प्रकार यह भी देखा जाना चाहिए कि जीवन सम्पदा का उपयोग मानवोचित रीति से हुआ या नहीं? मनुष्य को अतिरिक्त बुद्धिमत्ता, अतिरिक्त क्षमता और प्रतिभाओं से भरा-पूरा जीवन दिया गया है। वह शरीर यात्रा भर के लिए खर्च नहीं हो जाना चाहिए जिस प्रकार कीड़े-मकोड़ों का होता है।

🔷 अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए मोर नाचता है, जुगनूँ चमकता है, भौंरा गूँजता है, पर इस विडंबना से क्या तो उन्हें मिलता है और क्या कोई और कुछ पता या सीखता है। वैभव बढ़ाकर ठाठ-बाट रोपने में हमें भी मिथ्या अभिमान के अतिरिक्त और क्या मिल पाता है। उपभोग की एक सीमा है। उसके बाद जो बचता है, उसे दूसरे मुफ्तखोर ही हड़प जाते और हराम की कमाई को फुलझड़ी की तरह जलाते हैं। हो सकता है यह मुफ्तखोर तथाकथित कुटुम्बी सम्बन्धी ही क्यों न हों?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1986 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/February/v1.3

👉 Amrit Chintan 1 Feb

🔷 As long as man is totally materialistic in life, he will grow roots of evil in himself. It is only spiritual way of life. That man starts hating sins of his own when he become his own soul conscious. The worldly atmosphere always put one down and resists ideal growth of life. Only spiritual life can save a person from the bad effect of the prevailing atmosphere.
 
🔶 You all my loving soul! I wish that you strictly follow the path of truth. Truth must be follow at the cost of all hurdles and difficulties of life. Voice of the soul should always be followed. Truth itself is such a great power, which gives tremendous power and courage to stick to the right path and object of life.
 
🔷  The beauty of life is not its external appearance but it is his changed life. The changed life must radiate love for all and they appreciate his virtues. To earn all these one will have to develop his character behavior and make his actions ideal for others.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 10)

🔷 मित्रो! यही हमारे मिशन का संदेश है और यही मिशन का संदेश है। यही हमारे युग निर्माण योजना का संदेश है और यही हमारे गायत्री परिवार का संदेश है। यही हमारे अध्यात्म का संदेश है और यही हमारी गुरु परम्परा का संदेश है। आप जाना और हमारे कार्यकर्ताओं को हमारा संदेश सुनाना। आप जनता को ज्यादा जोर मत देना। आपके रथयात्रा के लिए कितनी भीड़ आ गयी, कितनी नहीं, इसके ऊपर जोर देने की जरूरत नहीं है। आपके यज्ञ में कितने आदमी हवन करने वाले आये कितने नहीं आये इस पर भी बहुत जोर देने की आवश्यकता नहीं है। जितना बन जाय-उतना अच्छा ही है। हम कब मा करते हैं कि जनता को आपको इकट्ठा नहीं करना चाहिए।

🔶 जनता इकट्ठी हो तो अच्छी बात है। आपका पंडाल अच्छा बन गया, तो अच्छी बात है। उससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। परन्तु हमको शुरुआत वहाँ से करनी पड़ेगी कि जो हमारा बगीचा लगाया हुआ था, वह सूख तो नहीं रहा है, कुम्हला तो नहीं रहा है। कहीं वह जानवरों द्वारा खाया तो नहीं जा रहा है? जिसके लिए हमने इतना परिश्रम किया, उतना वह विकसित होना चाहिए था पर विकसित नहीं हो रहा है। हमको ज्यादा ध्यान वहाँ देना है। इसलिए हम जहाँ कहीं भी आपको भेजते हैं, आप यह प्रयत्न करना कि जो आदमी हमारे कर्मठ कार्यकर्ता हैं, जो भी हमसे संबंधित व्यक्ति हैं, उनके अंदर मिशन की प्रेरणा, मिशन का संदेशा पहुँचाने में आप समर्थ हों।

🔷 इसके लिए मित्रो! करना क्या पड़ेगा? आपको ज्यादातर उनके संपर्क में रहना पड़ेगा। आपको उनसे दूर नहीं रहना चाहिए। नेता और जनता के बीच जो खाई पैदा हो गयी है, वह खाई आपको पैदा नहीं करना चाहिए। हमने जो संगठन किया है, उसका नाम सभा या सम्मेलन नहीं रखा है। हमारा यह मठ नहीं है और हमारे यहाँ उतनी गुरु-शिष्य परम्परा भी नहीं है। हमारे यहाँ तो परिवार प्रणाली है। कुटुम्ब में किस तरीके से भाई-बहन एक साथ रहते हैं, माँ-बाप एक साथ रहते हैं, बेटे और भतीजे एक साथ रहते हैं। उसी प्रणाली का, उसी परंपरा को हमने जन्म दिया है। आप भी उसी प्रणाली में अपने को फिट करने की कोशिश करना।

🔶 जहाँ कहीं भी आप जायँ और वहाँ गायत्री परिवार के लोग और युग निर्माण परिवार के लोग मिलें, तो उन पर आपको ज्यादा ध्यान देना है और उन लोगों के साथ में आत्मीयता का विस्तार करना है और वह भी चापलूसी के द्वारा नहीं, लम्बी-चौड़ी लच्छेदार बात के साथ नहीं, क्योंकि आप उनके कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वालों में से हैं। हमारी आत्मीयता का तरीका हमेशा से यही रही है। लच्छेदार बातें कभी किसी आदमी को आत्मीय नहीं बनाती हैं। आत्मीयता तब बनती है जब हम और आप कंधे से कंधा मिला करके, हाथ में हाथ मिला करके और पाँव से पाँव मिला करके साथ-साथ चलना शुरू करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 28)

👉 शंकर रूप सद्गुरु को बारंबार नमन्

🔶 गुरु महिमा के साथ गुरु नमन की महिमा ही अपरिमित है। इसे गुरुगीता के अगले महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् भोलेनाथ आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

यत्सत्येन जगत्सत्यं यत्प्रकाशेन भाति तत्। यदानन्देन नन्दन्ति तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ३६॥
यस्य स्थित्या सत्यमिदं यद्भाति भानुरूपतः। प्रियं पुत्रादि यत्प्रीत्या तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ३७॥
येन चेतयते हीदं चित्तं चेतयते न यम्। जाग्रत्स्वप्न सुषुप्त्यादि तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ३८॥
यस्य ज्ञानादिदं विश्वं न दृश्यं भिन्नभेदतः। सदेकरूपरूपाय तस्मै श्री  गुरवे नमः॥ ३९॥
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अनन्यभावभावाय तस्मै श्री गुरवे नमः॥ ४०॥

🔷 सद्गुरु नमन के इन महामंत्रों में गहन तत्त्वचर्चा है। गुरुतत्त्व, परमात्मतत्त्व और प्रकृति या सृष्टि तत्त्व अलग-अलग नहीं है। यह सब एक ही है- भगवान् शिव के वचन शिष्य को समझाते हैं, जिस सत्य के कारण जगत् सत्य दिखाई देता है अर्थात् जिनकी सत्ता से जगत् की सत्ता प्रकाशित होती है, जिनके आनन्द से जगत् में आनन्द फैलता है, उन सच्चिदानन्द रूपी सद्गुरु को नमन है॥ ३६॥

🔶 जिनके सत्य पर अवस्थित होकर यह जगत् सत्य प्रतिभासित होता है, जो सूर्य की भाँति सभी को प्रकाशित करते हैं। जिनके प्रेम के कारण ही पुत्र आदि सभी सम्बन्ध प्रीतिकर लगते हैं, उन सद्गुरु को नमन है॥ ३७॥

🔷 जिनकी चेतना से यह सम्पूर्ण जगत् चेतन प्रतीत होता है, हालांकि सामान्य क्रम में मानव चित्त को इसका बोध नहीं हो पाता। जाग्रत्-स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्था को जो प्रकाशित करते हैं, उन चेतनारूपी सद्गुरु को नमन है॥ ३८॥

🔶 जिनके द्वारा ज्ञान मिलने से जगत् की भेददृष्टि समाप्त हो जाती है और वह शिव स्वरूप दिखाई देने लगता है। जिनका स्वरूप एकमात्र सत्य का स्वरूप ही है, उन सद्गुरु को नमन है॥ ३९॥

🔷 जो कहता है कि मैं ब्रह्म को नहीं जानता, वही ज्ञानी है। जो कहता है कि मैं जानता हूँ, वह नहीं जानता। जो स्वयं ही अभेद एवं भावपूर्ण ब्रह्म है, उस सद्गुरु को नमन है॥ ४०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 50

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...