सोमवार, 18 दिसंबर 2017

👉 आदेश की विचित्र पालना, एक उलझन मे एक सुलझन मे

🔷 एक बार एक महात्मा जी के दरबार मे एक राहगीर आया और उसने पुछा की हॆ महात्मन सद्गुरु की आज्ञा का पालन कैसे करना चाहिये?

🔶 महात्मा जी ने कहा की बहुत समय पहले की बात है की दो राज्य बिल्कुल पास पास मे थे एक राज्य बहुत बड़ा और एक राज्य छोटा था! बड़े राज्य के पास अच्छीखासी सेना थी और छोटे राज्य के पास ठीक ठाक सेना थी!

🔷 बड़े राज्य के राजा विजय प्रताप के मन मे पाप आया की क्यों न इस छोटे राज्य को अपने राज्य मे शामिल कर लिया जायें और उसने छोटे राज्य पर आक्रमण करने की तैयारी शुरू कर दी इधर छोटे राज्य के राजा धर्मराज अपने गुरुवर के पास गये!

🔶 और उधर विजयप्रताप को उनके गुरू ने समझाया की बेटा युध्द से पहले एक बार अपना दूत वहाँ भेजकर धर्मराज जी को समझा दो की वो आत्मसमर्पण कर दे तो बड़ी जनहानी रुक जायेगी और बिना युध्द के आपका काम हो जायेगा और एक बात का ध्यान रखना की वहाँ उसे भेजना जो आपके लिये सबसे अहम हो और वहाँ की पलपल की जानकारी आपको दे सके!

🔷 राजा ने सोचा मेरे लिये सबसे अहम तो मैं ही हुं और विजयप्रताप स्वयं भेश बदलकर गये! राजा धर्मराज और राजा विजयप्रताप एक ऊँची पहाडी पर माँ काली के मन्दिर मे मिले राजा विजयप्रताप ने अपना प्रस्ताव रखा तो राजा धर्मराज ने कहा हॆ देव पहले आप मेरी एक बात सुनिये फिर आप कहोगे तो मैं आपका प्रस्ताव मान लूँगा और राजा धर्मराज जी ने ताली बजाई एक सैनिक आया धर्मराज जी ने कहा जाओ उस पहाडी से नीचे कुद जाओ सैनिक भागकर गया और पहाडी से नीचे जा कुदा फिर धर्मराज ने ताली बजाई एक सैनिक आया और राजा ने वही कहा और सैनिक पहाडी से नीचे जा कुदा हॆ वत्स इस तरह धर्मराज जी ने तीन बार ताली बजाई सैनिक आये और इस तरह सैनिक बिना कुछ कहे पहाडी से जा कुदे!

🔶 विजयप्रताप ने कहा अरे ये कैसा पागलपन तो धर्मराज जी ने कहा हॆ मित्र जब तक ऐसे स्वामी भक्त योद्धा हमारे पास है तब तक हम कभी हार स्वीकार नही कर सकते और राजा विजयप्रताप तत्काल उठे अपने राज्य पहुँचे और उन्होंने भी वैसे ही किया पर कोई भी पहाडी से न कुदा सब तर्क-कुतर्क करने लगे फिर राजा तत्काल धर्मराज जी के पास पहुँचे और उन्होंने धर्मराज जी के आगे अपना मस्तक झुका दिया!

🔷 राहगीर - ऐसे स्वामी-भक्त सैनिक बड़े ही आदरणीय और दुर्लभ है देव!

🔶 महात्मा - हाँ वत्स यही तो मैं आपसे कह रहा हुं की जब सद्गुरु कुछ कहे तो बिना कुछ बोले उसकी पालना कर लेना बड़े लाभ मे रहोगे! महात्मा जी ने आगे कहा की ये तीन सैनिक और कोई नही है ये तीन तन, मन और धन जब भी सद्गुरु कुछ कहे तो रणभूमि मे तन मन धन से कुद पड़ना और हॆ वत्स ये कभी न भुलना की सद्गुरु के समान कोई हितेषी नही है! और सद्गुरु और सच्चे सन्त से तर्क वितर्क कभी मत करना क्योंकि जो तर्क वितर्क मे उलझते है वो फिर उलझते ही चले जाते है और जो नही करते है वो सुलझ जाते है!

🔷 उलझन के लिये अपनी बुद्धि लगाओ और सुलझन के लिये सद्गुरु की बुद्धि से चलो अर्थात जो भी सद्गुरु कहे उसे तत्काल मान लो! और सद्गुरु वही है जो तुम्हारा तार हरि से जोड़कर हरि को आगे करके स्वयं पिछे हट जायें ऐसे सद्गुरु का आदेश परमधर्म है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 19 Dec 2017

👉 सत्य की चाह

🔷 सत्य की चाह है, तो चित्त को किसी ‘आग्रह’ से मत बाँधो। जहां आग्रह है, वहाँ सत्य नहीं आता। आग्रह और सत्य में गहरा विरोध है। मुक्त-जिज्ञासा सत्य की खोज के लिए पहली सीढ़ी है। जो व्यक्ति सत्य की अनुभूति से पहले ही अपने चित्त को किन्हीं सिद्धान्तों, मतवादों एवं आग्रहों से बोझिल कर लेते हैं, उनकी जिज्ञासा कुंठित और अवरुद्ध हो जाती है।

🔶 जिज्ञासा- खोज की गति और प्राण है। इसी के माध्यम से विवेक जाग्रत् होता है और चेतना ऊर्ध्व बनती है। लेकिन, जिज्ञासा आस्था से नहीं, आश्चर्य से पैदा होती है। आश्चर्य-स्वच्छ चित्त का लक्षण है। उसके सम्यक अनुगमन से सत्य के ऊपर पड़े हुए परदे क्रमशः गिरते जाते हैं और एक क्षण सत्य का दर्शन होता है।     

🔷 यहाँ यह बता देना जरूरी है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों ही आस्थावान् होते हैं। हाँ इतना अवश्य है कि आस्तिक की आस्था विधेयात्मक होती है तो नास्तिक की आस्था निषेधात्मक या नकारात्मक। जबकि आश्चर्य चित्त की एक अलग ही अवस्था है। जहाँ अविश्वास नहीं है और न ही विश्वास है। वह तो इन दोनों से मुक्त खोज के लिए स्वतंत्र है। यहाँ किसी भी आग्रह या मत के लिए कोई स्थान नहीं है।

🔶 और भला वे सत्य की खोज कर भी कैसे सकते हैं? जो कि पहले से ही किन्हीं मतों से बँधे हैं। मतों अथवा आग्रहों के खूँटों से विश्वास या अविश्वास की जंजीरों को जो खोल देता है, उसी की ही नाव सत्य के महासागर में यात्रा करने में समर्थ हो पाती है।

🔷 सत्य के आगमन की अनिवार्य शर्त हैः चित्त की पूर्ण स्वच्छता, स्वतन्त्रता एवं स्थिरता। जिसका चित्त पूर्ण स्वच्छ नहीं है, जो किन्हीं सिद्धान्तों या आग्रहों से बँधे हैं अथवा जिनका चित्त अस्थिर या चंचल है, वे सत्य के महासूर्य के दर्शन से वंचित रह जाते हैं। इसलिए सत्य की चाह को पूरा करने के लिए चित्त को पूर्ण स्वच्छ, स्वतंत्र एवं स्थिर बनाना ही होगा।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 97

👉 दुःखों का कारण और निवारण (भाग 1)

🔷 सन्त फ्रांसिस का कथन है—‘दुःखी रहना शैतान का काम है।’ इस कथन का तात्पर्य इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि दुःखी रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है। यह एक निकृष्ट प्रवृत्ति है जो मनुष्य को शोभा नहीं देती। तथापि, अधिकतर लोग दुःखी ही दिखलाई पड़ते हैं।

🔶 अब प्रश्न यह उठता है कि जब दुःखी रहना मानवीय प्रवृत्ति नहीं है, तब आखिर मनुष्य दुःखी क्यों रहते हैं? क्या कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है जो मनुष्य को उसकी प्रवृत्ति के विरुद्ध दुःखी रहने को विवश करती है?

🔷 इस विषय में एक नहीं अनेक ऐसे प्रश्न और शंकायें उठ सकती हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि कोई बाह्य कारण अथवा अदृश्य शक्ति मनुष्य को दुःखी नहीं रखती है, मनुष्य अपने स्वयं के अज्ञान और दुर्बलता के कारण, अकारण ही दुःखी रहता है। वैसे न सुख का और न दुःख का, अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है। ये मनुष्य की अपनी निर्बल अनुभूतियां ही हैं जो सुख-दुःख के रूप में आभासित होती हैं।

🔶 अदृश्य शक्ति को इस प्रसंग के बीच से निकाल ही दिया जाये, यही ठीक होगा। क्योंकि अदृश्य शक्ति तटस्थ और निरपेक्ष शक्ति होती है। वह चेतना प्रदान करने के सिवाय मनुष्य के जीवन में अधिक हस्तक्षेप नहीं करती। उसको इस प्रसंग में खींच लाने पर मानवीय धरातल पर सुख-दुःख और उसके कारणों का विवेचन कर सकना कठिन हो जायेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 10

👉 The Roar Of Self Reliance

🔶 “I am pure, immortal & unattached Atma.”  As soon as man accepts this great truth, he reaches immortality. He who respects his soul & takes his existance as excellent, pure, great& reliable, he becomes actually so. The yoga scriptures proclaim loudly that he who thinks himself as ‘Shiva’ is ‘Shiva’ & he who thinks himself as jiva is jiva. If you want to make yourself great, see your greatness, feel it & begin imbibing it in yourself speedily.

🔷 He who will entertain evil thoughts again & again regarding himself, will have thoughts of inferiority & pettiness and will undoubtedly become so after some time. The obvious result of entertaining such thoutghts, as I am mean, sinful, petty, a slave, incapable, unable, indolent, unfortunate, down-trodden & afflicted, is that our subconscious mind takes the same mould. Don’t take yourself as small. The immortal prince man cannot be mean in any way. All the powers of his Father are inherent in him. All that is necessary, is that he should feel his greatness & try to make his life great in every way. He who adopts this practice, soon realizes his greatness.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 2)

🔶 यही बात मन के संबंध में भी है समस्त संसार में शून्यता संव्याप्त है। प्रलय काल की तरह नीचे अथाह नील जल राशि और ऊपर नीले आकाश है। सर्वत्र परम शांति दायिनी नीलिमा एवं नीरवता संव्याप्त है। कहीं कोई व्यक्ति या पदार्थ नहीं। मन को आकर्षित करने वाली कहीं कोई स्थिति परिस्थिति शेष नहीं। उस परम शून्यता में बालक की तरह अपनी निर्मल चेतना कमल पत्र पर लेटी हुई तैर रही है। अपने पैर का अँगूठा अपने मुँह में लगा हुआ है और आत्मा स्वरस का पान कर रही है। प्रलय काल का ऐसा चित्र बाज़ार में बिकता भी है। मनःस्थिति को उसी स्तर का बनाने का प्रयत्न किया जाय ता शून्यता की मानसिक स्थिति बनती और बढ़ती चली जाती है। शारीरिक शिथिलता और मानसिक रिक्तता की - उपरोक्त स्थिति भजन साधना की उपयुक्त पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।
                  
🔷 शिथिल शरीर एवं मनःस्थिति में ही भजन ठीक प्रकार हो सकता भाव परक ध्यानयोग का यही पूर्वार्ध। आपरेशन करते-इंजेक्शन लगाते समय हिलने-जुलने पर प्रतिबंध रहता है। एक का रक्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करते समय दोनों व्यक्ति अपने हाथों को हिलाते डुलाते नहीं है। भजन को समय भी मानसिक संस्थान को इसी प्रकार शांत रहना चाहिए। भजन का उत्तरार्ध यह है कि उस सर्व शक्तिमान्- सर्व वैभववान्-सर्व उत्कृष्टताओं से संपन्न-सर्वाधिक प्रेमी परमेश्वर को अपनी सत्ता में प्रविष्ट होते हुए- घुलते हुए अनुभव किया जाय। ब्रह्माण्ड व्यापारी दिव्य प्रकाश को सागर में अपने आपको मछली की तरह निमग्न अनुभव किया जाय।
    
🔶 जिस प्रकार मिट्टी के ऊपर जल गिरने से दोनों के मिश्रण का एक नया रूप “कीचड़” बनता है वैसे ही भावना की जानी चाहिए कि परम प्रकाश अपने रोम-रोम में संव्याप्त हो रहा है। (1)शरीर के अंग प्रत्यंग में विष संयम एवं बलिष्ठता का रूप धारण कर रहा है। (2) मस्तिष्क में विवेक और प्रखर प्रतिभा-परख तेजस् बनकर बिखर रहा है। अंतरात्मा के हृदय संस्थान में वह देवत्व और आनंद रूप बना बैठा है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और तीनों शरीरों में परमात्मा की परम ज्योति को ज्वलंत अग्नि की तरह समाविष्ट देखना अपने को उस आलोक से आलोकित अनुभव करना भजन साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 3
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/12/1_17.html

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 167)

🌹  आत्मीय जनों से अनुरोध एवं उन्हें आश्वासन

🔷 कहने को गायत्री परिवार, प्रज्ञा परिवार आदि नाम रखे गए हैं और उनकी सदस्यता का रजिस्टर तथा समयदान, अंशदान का अनुबंध भी है, पर वास्तविकता दूसरी ही है, जिसे हम सब भली-भाँति अनुभव भी करते हैं। वह है जन्म-जन्मांतरों से संग्रहीत आत्मीयता। जिसके पीछे जुड़ी हुई अनेकानेक गुदगुदी उत्पन्न करने वाली घटनाएँ हमें स्मरण हैं। परिजन उन्हें स्मरण न रख सके होंगे। फिर वे विश्वास करते हैं कि परस्पर आत्मीयता की कोई ऐसी मजबूत डोरी बँधी है, जो कई बार तो हिलाकर रख देती है। एक दूसरे के अधिक निकट आने, परस्पर कुछ अधिक कर गुजरने के लिए आतुर होते हैं। यह कल्पना नहीं वास्तविकता है जिसकी दोनों पक्षों को निरंतर अथवा समय-समय पर अनुभूति होती रहती है।

🔶  यही तीसरा वर्ग है- बालकों का। इनकी सहायता से मिशन का कुछ काम भी चला है, पर वह बात गौण है। प्रमुख प्रश्न एक ही है कि इन्हें हँसता-हँसाता, खिलता-खिलाता देखने का आनंद कैसे मिले? अब तक भेंट, परामर्श, सत्संग, सुविधा सान्निध्य से भी इस भाव संवेदना की तुष्टि होती थी, पर अब तो नियति ने वह सुविधा भी हाथ से छीन ली है। अब परस्पर भेंट मिलन का अध्याय ही समाप्त होता जा रहा था। इसमें समय की कमी या कोई व्यवस्था सम्बन्धी कठिनाई कारण नहीं है। बात इतनी भर है कि इससे सूक्ष्मीकरण में बाधा पड़ती है। चित्त भटकता है और जिस स्तर का अंतराल पर दबाव पड़ना चाहिए वह बिखर जाता है। फलतः उस लक्ष्य की पूर्ति में बाधा पड़ती है जिसके साथ समस्त मनुष्य समुदाय का भाग्य-भविष्य जुड़ा हुआ है। अपनी निज की मुक्ति, सिद्धि या स्वर्ग उत्कर्ष जैसा कारण रहा होता तो उसे आगे कभी के लिए टाला जा सकता था, पर समय तो ऐसा विकट है जो एक क्षण की भी छूट नहीं देता। ईमानदार सिपाही की तरह मोर्चा संभालने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं। इसलिए सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में परिजनों को हमें अपनी साधना हेतु एकाकी छोड़ देना चाहिए।

🔷 बच्चों के, प्रज्ञा परिजनों के सम्बन्ध में चलते-चलाते हमारा इतना ही आश्वासन है कि यदि वे अपने भाव-सम्वेदना क्षेत्र को थोड़ा और परिष्कृत कर लें तो निकटता अब की अपेक्षा भी अधिक गहरी अनुभव करने लगेंगे। कारण कि हमारा सूक्ष्म शरीर सन् 2000 तक और भी अधिक प्रखर होकर जिएगा। जहाँ उसकी आवश्यकता होगी, बिना विलम्ब लगाए पहुँचेगा। कठिनाइयों में सहायता करने और बालकों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की हमारी प्रकृति में राई-रत्ती भी अन्तर नहीं होने जा रहा है। वह लाभ पहले की अपेक्षा और भी अधिक मिलता रह सकता है।

🔶 हमारे गुरुदेव सूक्ष्म शरीर से हिमालय में रहते हैं। विगत ६१ वर्षों में हमने निरन्तर उसका सान्निध्य अनुभव किया है। यों आँखों से देखने की बात मात्र जीवन भर में तीन बार ही, तीन-तीन दिन के लिए सम्भव हुई है। भाव-सान्निध्य में श्रद्धा की उत्कृष्टता रहने से उसकी परिणति एकलव्य के द्रोणाचार्य, मीरा के कृष्ण, रामकृष्ण के काली-दर्शन जैसी होती है। हमें भी वे भविष्य में हमारी निकटता अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह अनुभव करते रहेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.194

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.23

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...