बुधवार, 4 अप्रैल 2018

👉 अपना अपना महत्त्व

🔷 एक समुराई जिसे उसके शौर्य ,निष्ठा और साहस के लिए जाना जाता था, एक जेन सन्यासी से सलाह लेने पहुंचा।  जब सन्यासी ने ध्यान पूर्ण कर लिया तब समुराई ने उससे पूछा, “ मैं इतना हीन क्यों महसूस करता हूँ ? मैंने कितनी ही लड़ाइयाँ जीती हैं, कितने ही असहाय लोगों की मदद की है। पर जब मैं और लोगों को देखता हूँ तो लगता है कि मैं उनके सामने कुछ नहीं हूँ, मेरे जीवन का कोई महत्त्व ही नहीं है।”

🔶 “रुको; जब मैं पहले से एकत्रित हुए लोगों के प्रश्नों का उत्तर दे लूँगा तब तुमसे बात करूँगा।”, सन्यासी ने जवाब दिया।

🔷 समुराई इंतज़ार करता रहा, शाम ढलने लगी और धीरे -धीरे सभी लोग वापस चले गए। “ क्या अब आपके पास मेरे लिए समय है ?”, समुराई ने सन्यासी से पूछा। सन्यासी ने इशारे से उसे अपने पीछे आने को कहा, चाँद की रौशनी में सबकुछ बड़ा शांत और सौम्य था, सारा वातावरण बड़ा ही मोहक प्रतीत हो रहा था। “ तुम चाँद को देख रहे हो, वो कितना खूबसूरत है! वो सारी रात इसी तरह चमकता रहेगा, हमें शीतलता पहुंचाएगा, लेकिन कल सुबह फिर सूरज निकल जायेगा, और सूरज की रौशनी तो कहीं अधिक तेज होती है, उसी की वजह से हम दिन में खूबसूरत पेड़ों, पहाड़ों और पूरी प्रकृति को साफ़ –साफ़ देख पाते हैं, मैं तो कहूँगा कि चाँद की कोई ज़रुरत ही नहीं है….उसका अस्तित्व ही बेकार है !!”

🔶 “अरे! ये आप क्या कह रहे हैं, ऐसा बिलकुल नहीं है ”- समुराई बोला, “ चाँद और सूरज बिलकुल अलग -अलग हैं, दोनों की अपनी-अपनी उपयोगिता है, आप इस तरह दोनों की तुलना नहीं कर सकते”,  समुराई बोला। “तो इसका मतलब तुम्हे अपनी समस्या का हल पता है. हर इंसान दूसरे से अलग होता है, हर किसी की अपनी -अपनी खूबियाँ होती हैं, और वो अपने -अपने तरीके से इस दुनिया को लाभ पहुंचाता है; बस यही प्रमुख है बाकि सब गौण है”,  सन्यासी ने अपनी बात पूरी की।

🔷 मित्रों! हमें भी स्वयं के अवदान को कम अंकित कर दूसरों से तुलना नहीं करनी चाहिए, प्रायः हम अपने गुणों को कम और दूसरों के गुणों को अधिक आंकते हैं, यदि औरों में भी विशेष गुणवत्ता है तो हमारे अन्दर भी कई गुण मौजूद हैं।

🌹 परम पूज्य गुरुदेव का प्रवचन
🌹 स्वयं को ऊँचा उठायें - व्यक्तित्ववान ब

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 April 2018


👉 सुगंधित जीवन

🔷 मित्रो ! विद्वान पुरुष सुगंधित पुष्पों के समान हैं। वे जहाँ जाते हैं, वहीं आनंद साथ ले जाते हैं। उनका सभी जगह घर है और सभी जगह स्वदेश है। विद्या धन है। अन्य वस्तुएँ तो उसकी समता में बहुत ही तुच्छ हैं। यह धन ऐसा है जो अगले जन्मों तक भी साथ रहता है। विद्या द्वारा संस्कारित की हुई बुद्घि आगामी जन्मों में क्रमश: उन्नति ही करती जाती है और उससे जीवन उच्चतम बनते हुए पूर्णता पाता है।
  
🔶 कुएँ को जितना गहरा खोदा जाए, उसमें से उतना ही अधिक जल प्राप्त होता जाता है। जितना अधिक अध्ययन किया जाए उतना ही ज्ञानवान बना जा सकता है। विश्व क्या है और इसमेंं कितनी आनंदमयी शक्ति भरी हुई है, इसे वही जान सकता है, जिसने विद्या पढ़ी है। ऐसी अनुपम संपत्ति का उपार्जन करने में न जाने क्यों लोग आलस्य करते हैं? आयु का कोई प्रश्न नहीं है, चाहे मनुष्य वृद्ध हो जाए या मरने के लिए चारपाई पर पड़ा हो तो भी विद्या प्राप्त करने में उसे उत्साहित होना चाहिए क्योंकि ज्ञान तो जन्म-जन्मांतरों तक साथ जाने वाली वस्तु है।
  
🔷 वे मनुष्य बड़े अभागे हैं, जो विद्या पढऩे में जी चुराते हैं। भिखारी को दाता के सामने जैसे तुच्छ बनना पड़ता है, ऐसे ही यदि तुम्हें शिक्षकों के सामने तुच्छ बनना पड़े तो भी शिक्षा प्राप्त करना ही कत्र्तव्य है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 THINK OVER IT

🔷 The expectation to get grants and blessings for free, no one should have from anybody. One has to show his worthiness to get blessings from God and grants from fat cats. They too remain dumb and deaf for parasites and free-seekers. Good lucks and fortunes do not fall from sky in fluke. For this achievement, one has to earn his attaining capacity from the very beginning. The property in the hands of incapable and worthless people is looted and snatched by looters and thieves. Though the available future is created as per the desire, determination and management of that Creator (Almighty), but to avail them the wishers and curious ones have to become a bit extra-ordinary.

🔶 What to say about this world or the next world, the humans or the gods; everywhere the tradition and rule of blessing the capable and worthy ones only is seen working.                

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 विचारणीय

🔷 मुफ्त में अनुदान-वरदान पाने की अपेक्षा, किसी को भी, किसी से भी नहीं करनी चाहिए। देवताओं से वरदान और धन-कुबेरों से अनुदान प्राप्त करने के लिए अपनी पात्रता का परिचय देना पड़ता है। मुफ्तखोरों के लिए तो वे भी गूँगे-बहरे बनकर बैठे रहते हैं। सौभाग्य अनायास ही कहीं से आ नहीं टपकते। उस उपलब्धि के लिए बहुत पहले से ही अपनी धारण कर सकने की क्षमता अर्जित करनी पड़ती है। अक्षमों, दुर्बलों के तो हाथ में आयी सम्पदा भी चोर-उचक्कों द्वारा ठग ली या झपट ली जाती है। उपलब्ध भविष्य, यों बनता तो स्रष्टा की इच्छा, निर्धारण और व्यवस्था के अनुरूप ही है, पर उससे लाभान्वित होने के लिए इच्छुकों और उत्सुकों को भी कुछ असाधारण बनना पड़ता है।

🔶 क्या लोक, क्या परलोक, क्या मनुष्य, क्या देवता, सर्वत्र सत्पात्रों को ही उपहार-वरदानों से निहाल करने की प्रथा-परंपरा काम आती देखी जाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan 5 April

🔷 Man is bound to progress either by way of enjoying pleasure, social service or for realization of soul. If we keep our aim to develop all of above, we will be able to progress and walk on the royal – path of successful life.

🔶 Dear readers,
We got a direct physical guidance of the sacred soul of this era for such a long time. It is no doubt a great gift of our life. But to develop our life under such an affectionate and radiant personality, our devotion to Revered Guru will change our life if we follow his guidance with full obedience and discipline.

🔷 If you want to progress and achieve success in life, don’t envy to other. Others progress should be taken as a guidance of successful achievement in life and thus on one side you will not be hurt by jealousy and on other – you will be encouraged to progress like him.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 4)

🔷 आप ध्यान दीजिए और गौर कीजिए। पात्रता का विकास किये बिना न संसार में रास्ता है और न पात्रता का विकास किए बिना आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई रास्ता है। आपको अफसर बनना है? बल्कि सर्विस कमीशन के सामने जाइये और अपनी पात्रता साबित कीजिये; अच्छा डिवीजन लाइये और अच्छे नम्बर लीजिये। आपको अच्छा स्थान मिल सकता है। नहीं साहब! हम तो परीक्षा से दूर रहेंगे; हम तो भगवान जी की आरती गाएँगे; हमको अफसर बना दीजिए। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। पात्रता विकसित करना बहुत जरूरी है। पात्रता का इससे क्या मतलब है? पात्रता का अर्थ होता है—जीवन को परिष्कृत करना। जीवन को परिष्कृत करने के लिए साधना करनी पड़ती है। भगवान को प्राप्त करने के लिए उपासना और अपने आपको पात्र बनाने के लिए साधना।

🔶 साधना किसकी? अपनी। अपनी से क्या मतलब? अपनी से मतलब यह है कि जो हमारे भीतर जन्म-जन्मांतरों के कुसंस्कार जमे पड़े हैं, उनका परिशोधन करना पड़ेगा, बचकानापन दूर करना पड़ेगा। बच्चे को तो कोई कह नहीं सकता। बच्चा कहीं भी पेशाब कर देता है, कहीं भी खड़ा हो जाता है, कुछ भी करने लगता है, कुछ भी चीज फैला देता है; लेकिन बड़ा आदमी तो न केवल स्वयं सँभल के रहता है, वरन् दूसरों की चीजों को भी सँभालकर रखता है। ये बड़प्पन की निशानियाँ हैं। पात्रता से मेरा मतलब उसी से है। चिन्तन की दृष्टि से सुसंस्कृत और व्यवहार की दृष्टि से सज्जन और सभ्य—इन दो विशेषताओं को अपने भीतर पैदा करे आदमी, तो ये माना जाएगा कि उसने पात्रता का विकास कर लिया।

🔷 पात्रता का विकास अगर कर लिया है, तो संसार में भी इज्जत और भगवान के यहाँ भी इज्जत। पात्रता का अगर आपने विकास नहीं किया तो संसार में भी उपहास और तिरस्कार और भगवान के यहाँ भी नाराजगी। आप कहीं भी, कुछ भी नहीं पा सकते। पात्रता की ओर ध्यान एकाग्र कीजिए। पात्रता आपके हाथ की बात है। उपासना भगवान का अनुग्रह, भगवान के हाथ की बात है; पर साधना तो आपके हाथ की बात है। अपने आपको सुसंस्कारी बनाने के लिए जो भी मुमकिन हो, आप पूरी शक्ति से और पूरी ईमानदारी से मेहनत कीजिए।  आपको अनगढ़ और सुगढ़ बनाना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 81)

👉 सबसे सच्ची सिद्धि : गुरुभक्ति

🔷 गुरुगीता के भक्तिगीत अन्तस् में गुरुभक्ति का अंकुरण-स्फुरण करते हैं। इन भक्ति गीतों के पठन-मनन-गायन से अन्तःकरण गुरुभक्ति से आप्लावित होता है। चित्त की गहराइयों में गुरुदेव के प्रति अनुराग प्रगाढ़ होता है। यह प्रगाढ़ अनुराग ही तो अध्यात्म साधना की घनीभूत ऊर्जा है। जिसके अन्तस् में इस महाऊर्जा का घनत्व जितना अधिक है, वह अध्यात्म पथ पर उतनी ही अधिक तीव्रता से गतिशील होता है। इसके विपरीत जिसके अन्तस् में गुरुभक्ति की ऊर्जा का घनत्व अविकसित, अल्प अथवा शून्य है, उसका आध्यात्मिक जीवन भी शून्य बना रहता है। उसके आध्यात्मिक लक्ष्य उससे हमेशा दूर बने रहते हैं। फिर भले ही वह कितना जप-तप अथवा कर्मकाण्ड करता रहे। जो विज्ञ हैं, विवेकी हैं वे जानते हैं कि साधना के सभी कर्मकाण्ड स्थूल देह के कलेवर का निर्माण भर करते हैं। इसमें प्राण का संचरण केवल गुरुभक्ति से ही होता है।
    
🔶 पिछले मंत्रों में भगवान् सदाशिव के यही वचन थे कि गुरुदेव जो भी राह दिखाएँ, उसी राह पर चलते हुए मन की शुद्धि करना शिष्य का कर्त्तव्य है। शिष्य का यही कर्त्तव्य है कि मन व इन्द्रियों से भोगे जाने वाले सभी भोगों को और सभी नाशवान् पदार्थों को त्याग दे। सम्पूर्ण जगत् को अपनी आत्मा के विस्तार के रूप में अनुभव करे। गुरुकृपा से यदि यह अनुभूति निरन्तर होती रहे, तो शिष्य, साधक अपने परम गन्तव्य तक, जीवन के चरम आध्यात्मिक लक्ष्य तक पहुँच जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 123

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...