बुधवार, 4 अप्रैल 2018

👉 विचारणीय

🔷 मुफ्त में अनुदान-वरदान पाने की अपेक्षा, किसी को भी, किसी से भी नहीं करनी चाहिए। देवताओं से वरदान और धन-कुबेरों से अनुदान प्राप्त करने के लिए अपनी पात्रता का परिचय देना पड़ता है। मुफ्तखोरों के लिए तो वे भी गूँगे-बहरे बनकर बैठे रहते हैं। सौभाग्य अनायास ही कहीं से आ नहीं टपकते। उस उपलब्धि के लिए बहुत पहले से ही अपनी धारण कर सकने की क्षमता अर्जित करनी पड़ती है। अक्षमों, दुर्बलों के तो हाथ में आयी सम्पदा भी चोर-उचक्कों द्वारा ठग ली या झपट ली जाती है। उपलब्ध भविष्य, यों बनता तो स्रष्टा की इच्छा, निर्धारण और व्यवस्था के अनुरूप ही है, पर उससे लाभान्वित होने के लिए इच्छुकों और उत्सुकों को भी कुछ असाधारण बनना पड़ता है।

🔶 क्या लोक, क्या परलोक, क्या मनुष्य, क्या देवता, सर्वत्र सत्पात्रों को ही उपहार-वरदानों से निहाल करने की प्रथा-परंपरा काम आती देखी जाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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