शनिवार, 2 अप्रैल 2016

दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (अन्तिम भाग)



 
पति की आर्थिक कमी अथवा कम कमाई की आलोचना तो कभी करनी ही नहीं चाहिये। जहाँ तक संभव हो ऐसी-व्यवस्था रखिये कि उसका आभास कम से कम ही हो। पति की आर्थिक आलोचना करने का अर्थ है उसका मन अपनी ओर से विमुख कर देना। बाजार अथवा बाहर जाते समय अपनी फरमाइश की सूची पेश करने और आने पर उनके लिए तलाशी लेने लगने का स्वभाव पति को रुष्ट कर देने वाला होता है।

पति के प्रिय मित्रों की अनुचित आलोचना करना अथवा उनका सम्बन्ध विच्छेद कराने का प्रयत्न करना पति के एक सुन्दर सुख को छीन लेने के बराबर है। पति के मित्रों को स्वजन और शत्रु को शत्रु मानना पत्नी का प्रमुख कर्तव्य है जो पत्नियाँ अपना स्वतन्त्र अस्तित्व मान कर केवल अपने मित्र को मित्र और अपने विरोधी को विरोधी मानती हैं, वे अपने दोनों के बीच खाई खोदने की भूल करती हैं।

इसके अतिरिक्त संकट के समय में भी पति के पास मुस्काती हुई ही रहो। पति के सम्मुख गन्दी दशा में रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्रति घृणा को जन्म देती हैं। अनेक स्त्रियों का स्वभाव होता है कि पति के पीछे तो वह खूब सजी-धजी रहती है, बाहर सज-धज कर निकलती हैं लेकिन घर में खासतौर से पति के सम्मुख गंदा व पुराना कपड़ा पहन कर आती हैं। उनका ख्याल रहता है कि पति उनके पास कपड़ों की कमी समझ कर और नयी साड़ियाँ लाकर देगा।

किन्तु यह प्रयत्न उल्टा है। इससे पति उसे स्वभाव से गन्दा समझ कर कपड़े लाकर देना बेकार समझते हैं। सदा मधुर और मृदुल बोलिये। नारियों की मीठी वाणी और अनुकूल मुस्कान का जादू पुरुष पर अधिकार जमा लेता है। यदि इस प्रकार पति-पत्नी एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखते हुए अपने यह कतिपय बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों का पालन करते रहें तो उनके बीच कभी कलह-क्लेश होने की सम्भावना ही न रहे और दाम्पत्य-जीवन का अधिक से अधिक आनन्द पा सकते हैं।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1968/July.28

Team Spirit



Many individuals, even though being quite talented and capable, do not benefit society for a simple reason that they cannot harmonize with others.

Take for example a football player who happens to be so proficient in his game that if its left to him he can juggle the ball extremely well without letting it drop even once to the ground.

However, the very same talented player may not be able to make a meaningful contribution when playing in a team because he cannot work together harmoniously with other teammates, as part of a team.

Many organizations experience a similar phenomenon. They may have someone very capable who can single-handedly manage various responsibilities. However, he may shy away from playing his part when he is asked to team up with other people to accomplish some big responsibility. When a few people are given to carry out a task together, most of them may think of turning their back on their responsibility thinking that other people in the team would fulfill it.

In Buddhist literature, there is a fascinating story revealing lack of collective responsibility. It goes like this… A king once decided to organize a huge religious event. He instructed his citizens to bring milk in a pot and offer it into a pool constructed at the site of ceremony. The pool was covered up with a lid. After everyone had his or her turn, the lid was removed. The king was surprised to see that the pool was filled with water instead of milk. When he investigated its cause, he came to know that everyone had brought water in their pot instead of milk thinking that they were the only ones who poured water, the rest would surely have had poured milk!

The social skill of living together harmoniously with other people and being able to impart the benefit of our individual capabilities as a team member is a learning process that can be mastered only through living together cohesively and thereby learning to develop community spirit.

-Pt. Shriram Sharma Acharya
Jivan Devta ki sadhana aradhana Vol 2 - Page 2.20

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...