बुधवार, 2 मई 2018

👉 कमजोर लड़की

🔶 ऋतु का व्हाट्स एप्प पे कई लड़को से दोस्ती और चैटिंग पढ़कर राज का चेहरा लाल हो गया। गुस्से से आँखों से अंगारे निकलने लगे, मुट्ठियां भींच गई। क्रोध से पूरा शरीर काँपने लगा। दिमाग मे ऐसा लगा जैसे कोई हथौड़ा चला रहा हो। यद्यपि सारी चैटिंग नार्मल थी। अच्छे और मजाकिया चुटकुले और बातें थी जो फ्रेंड्स में होती है। कुछ दोस्तों ने ऋतु की खूबसूरती और उसके डीपी की तारीफ की थी इस बात पे राज और भी जल भुन गया था।

🔷 दोनों की शादी के अभी सात दिन ही हुए थे। "ऋतु!! ऋतु !! "पूरी ताकत और गुस्से से राज चिल्लाया।"क्या हुआ?" ऋतु घबराई सी कमरे में पहुँची तब तक उसके सास ससुर और ननद भी कमरे में आ गए थे।

🔶 राज ने सबके सामने चिल्लाना और अपमान करना शुरू किया। "माँ ये देखो इस लडक़ी के व्हाट्स एप्प पे कई लड़कों से दोस्ती हैं ये सही लड़की नही है?"

🔷 सासु माँ ससुर और ननद भी जलती नेत्रों से ऋतु को देखने लगे। ऋतु को अपनी गलती नही समझ आयी वो हतप्रभ खड़ी थी जो राज रात दिन उसके प्यार का दम्भ भरता था, उसकी खूबसूरती के कसीदे पढ़ता था, उसके लिए आसमान से तारे तोड़ लाने की बातें करता था उसके इस रूप की ऋतु ने कल्पना भी न की थी।

🔶 "राज मैंने भी तुम्हारा व्हाट्स एप्प देखा तुम्हारी भी कई लड़कियों से दोस्ती है। तुम्हारी बहन रानी के भी कई लड़के अच्छे दोस्त होंगें इसमें गलत क्या है?" ऋतु के बोलते ही "चुप! जबान लडाती है" सास की जोरदार आवाज़ गूँजी।

🔷 चटाक!!!! राज का जोरदार तेज थप्पड़ ऋतु के गाल पर पड़ा। गाल पे लाल लाल उँगलियो के निशान पड़ गए। आँखे पनिया गई।

🔶 चटाक!!!!!!! पहले से भी अधिक जोरदार और तेज थप्पड़ की कमरे में आवाज़ हुई। इस बार सबके सामने ऋतु का जोरदार थप्पड़ राज को पड़ा। ऐसा थप्पड़ कि राज को दिन में ही चाँद तारे ग्रह उपग्रह सब दिख गए।

🔷 "मुझे कमजोर लड़की न समझना मैं पढ़ी लिखी और अपने हक़ और अधिकार जानने वाली भारतीय आर्मी के मेजर की बेटी हूँ। किसी भी हाल में चरित्र उज्ज्वल रखना और गलत सहन नहीं करना दो बातें पापा ने सिखाई हैं। इसके बाद किसी ने मुझे किसी भी तरह से परेशान करने की कोशिश की तो फिजिकल, मेन्टल टॉर्चर और डोमेस्टिक वॉइलेन्स का केस डाल दूँगी। सासु माँ आपने बेटे को खूब पढ़ा लिखा कर बड़ा ऑफिसर तो बना दिया काश थोड़ा लड़कियों से बात करने की तमीज और उनकी इज़्ज़त करना भी सिखा देतीं।"

🔶 इसके बाद कुछ दिनों तक घर का माहौल काफी तनावपूर्ण रहने लगा। दीवारों में कान होने के कारण पड़ोसियों में भी इस नई बहू के बिगड़े तेवर की चर्चा होने लगी और पड़ोसियों की खुसर फुसर ने हवन में घी का काम किया। एक दिन पहले की आदर्श बहु अब बहुत बुरी बहु बन गयी थी।

🔷 इस घटना के कुछ दिन बाद राज अपने काम के सिलसिले में दो दिन के लिए दूसरे शहर गया हुआ था। उसके पिता जी भी गाँव के किसी रिश्तेदार की बीमारी की खबर सुनकर गाँव गए हुए थे। घर पर सिर्फ राज की माँ बहन रानी और ऋतु थीं।

🔶 माँ छत पर कपड़ा सूखने डालकर आ रही थीं कि अचानक पैर फिसलने से वह ऊपर की सीढ़ियों से लुढकते लुढकते नीचे आ गिरी। जोर से चिल्लाकर बेहोश हो गयी। सर फट गया और तेजी से खून बहने लगा। पैर फ्रैक्चर होकर थोड़ा मुड़ सा गया। रानी और ऋतु चीख सुनते हो दौड़ पड़े। रानी माँ को ऐसे हाल में देखकर नरवस हो गयी वो जोर जोर से रोने लगी।

🔷 ऋतु ने संयम रखते हुए एकपल भी देर न करते हुए सबसे पहले एक साफ कपड़े से सर पे पट्टी बंधी इससे थोड़ा खून बहना कम हो गया फिर माँ को गोद में उठाकर कार की पिछली सीट पर लिटाया और रानी को बिठाकर सीधे हॉस्पिटल ले गयी।

🔶 हॉस्पिटल में तुरंत इमरजेंसी के सारे कागजात तैयार कर माँ को ICU में भर्ती कराया और तुरंत माँ के लिए अपना ब्लड डोनेट भी की चोटें काफी गंभीर लगीं थी और ऋतु अकेले ही बहु की तरह नहीं बल्कि बेटे की तरह खाना पीना सोना जागना भूलकर सब काम कर रही थी।

🔷 रानी को माँ के पास बिठाकर कभी डॉक्टर से बात करती कभी दवाइया लाती कभी रिपोर्ट पढ़ती। राज और उसके पापा को खबर कर दी गयी थी फिर भी उनलोगों के आने में नौ दस घंटे का समय लग गया था। इन नौ घंटो में ऐसा लग रहा था जैसे ऋतु खुद यमराज से टक्कर लेने को तैयार थी।

🔶 सुबह हॉस्पिटल में जब माँ की आँख खुली तो देखा पैरों में प्लास्टर है सर पे पट्टी बंधी है सामने राज ऋतु को गले लगाए है रानी और उसके पापा की आँखों में आँसू हैं और डॉक्टर बोल रहा है थैंक्स मेरा नहीं इनका कीजिये जिन्होंने टाइम रहते हॉस्पिटल ले आये वरना हमारे हाथ भी कुछ संभव न था।

🔷 कल तक जिन आँखों मे ऋतु के लिए नफरत था आज उन्ही आँखों में कृतज्ञता के भाव थे और सवकी आँखों से आँसू निकल रहे थे।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 3 May 2018

👉 सुझाव देने से पूर्व सोचो

🔶 मनुष्यों में एक प्रवृत्ति यह पाई जाती है कि वे दूसरे के कामों में बहुत जल्दी हस्तक्षेप करने लगते हैं। यदि विचारपूर्वक देखा जाए, तो कोई अन्य मनुष्य जो कुछ कहता, करता या विश्वास करता है, उससे तुम्हारा कोई सरोकार नहीं। तुम्हें उसकी बात पूर्णतया उसी की इच्छा पर छोड़ देनी चाहिए। तुम स्वयं अपने कार्यों में जिस प्रकार की स्वतंत्रता की इच्छा करते हो, वही दूसरों को भी देनी चाहिए।

🔷 वास्तव में किसी सज्जन व्यक्ति को कभी दूसरों के कार्यों और विश्वासों में कोई हस्तक्षेप न करना चाहिए, जब तक कि उनके किन्हीं कार्यों से सर्वसाधारण की प्रत्यक्ष हानि न होती हो। यदि कोई मनुष्य ऐसा व्यवहार करता है, जिससे कि वह अपने पड़ोसियों के लिए दु:खदायी बन जाता है, तो उसे उचित सम्मति देना कभी-कभी हमारा कत्र्तव्य हो जाता है, पर ऐसा मौका आने पर भी बात को बहुत नम्रता और सरलतापूर्वक प्रकट करना चाहिए।

🔶 अगर कोई व्यक्ति तुम्हारे विचार से कोई बड़ी भूल कर रहा है, तो तुम उसे एकांत में अवसर ढूँढ़ कर यह बतला सकते हो कि ‘आप ऐसा क्यों करते हो?’ संभव है ऐसा करने से वह तुम्हारी बात पर विश्वास कर सके, किन्तु अनेक स्थानों पर तो ऐसा करना भी अनुचित रूप से हस्तक्षेप ही करना होगा। किसी तीसरे व्यक्ति के सामने तो उस बात की चर्चा कदापि नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह उसकी निंदा करना होगा, जो किसी सभ्य व्यक्ति को शोभा नहीं देता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 6)

🔶 इन तीनों का आनन्द प्राप्त करो- (1) खुला दिल (2) स्वतन्त्रता (3) सौंदर्य- ये तीनों आपके आनन्द की अभिवृद्धि करने वाले तत्व हैं।

🔷 खुला दिल सबसे उत्तम वस्तुएँ ग्रहण करने को प्रस्तुत रहता है, संकुचित हृदय वाला व्यक्तिगत वैमनस्य के कारण दूसरे के सद्गुणों को कभी प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करता। स्वतन्त्रता का आनन्द वही साधक जानता है जो रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, एवं क्षणिक आवेशों से मुक्त है।

🔶 स्वतंत्रता का अर्थ अत्यन्त विस्तृत है। सोचने, बोलने, लिखने, प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्राप्त करनी चाहिए। जो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र है, वह अनेक झगड़ों से मुक्त है। सौंदर्य-आत्मिक और चारित्रिक-दोनों ही उन्नति और प्रगति की ओर ले जाने वाले हैं। यदि सौंदर्य के साथ कुरुचि और वासना मिश्रित हो जायेंगी, तो वह अपना वास्तविक अभिप्राय नष्ट कर देगा।

🔷 सौंदर्य के साथ सुरुचि का समावेश होना चाहिए। आप सौंदर्य की जिस रूप में पूजा करें, यह स्मरण रखिये वह आप में शुभ भावनाएं प्रेरित करने वाला, सद्प्रेरणाओं को उत्पन्न करने वाला हो।

🔶 इन तीन के लिये लड़ो-इज्जत, देश, और मित्र। इनकी प्रतिष्ठा आपकी अपनी इज्जत है। यदि आप में स्वाभिमान है, तो आपको इन तीनों की रक्षा अपनी सम्पूर्ण शक्ति से करनी चाहिए। इन तीन की चाह करो-निर्मलपन, भलापन, आनन्दी स्वभाव। आन्तरिक शान्ति के लिये तीनों आवश्यक है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14

👉 Gold coins

🔶 A saint used to administer a small gurukul. One day he brought a person walking by and asked him before his scholars, “What will you do if you get a packet of three gold coins on the way?”
  
🔷 “I will locate its owner and return to him at once or submit them in the king’s treasure,” replied the man. The saint laughed, sent back the passer by and told his scholars that the man was unwise. The  scholars wondered about what the saint said. All of them were taught not to keep the others’ belongings.
  
🔶 After sometimes another man passed by, and the saint repeated the same question to him. He replied, “Do you think I am a stupid that I will go to search for the owner of the gold coins if hapen to find them on the way?” The saint told that man was a devil.
  
🔷 Now the saint brought inside a third man and put before him the same question. The man modestly replied, “It is difficult to say anything right now. Who can say of mind that deceives in a second? If there be God’s grace and intellect reigns, I will return the coins.” The saint inferred this man as rightful as he had entrusted his everything to God. Such people are never a failure.  

👉 चिन्ता पीडित व्यक्ति

🔶 मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु रोग- क्षय से पीडित रोगियों में सबसे अधिक संख्या उनकी है जिन्होंने रात दिन दुश्चिन्ताएँ करके अपने शत्रु को बुलाया है। चिन्ता पीडित व्यक्ति के लक्षण:-

🔷 (1) चिन्तित व्यक्ति हमेशा दुःखी बना रहता है। उसके पेट में और सिर में प्राय: दर्द बना रहता है। स्वास्थ्य के मुख्य आधारभूत अंग पेट और सिर ही है और यह दोनों ही दुश्चिन्ता करने से भारी बने रहते हैं।

🔶 (2) दुश्चिन्ता करने वाला व्यक्ति कायर हो जाता है और कायरता की यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन मौकों पर परिलक्षित होती है जब उसे बाह्य संसार की वास्तविकता का सामना करना पड़ता है। उसे सदैव भयंकर हानि का खतरा अनुभव हुआ करता है। कभी कभी तो वह अकारण ही भयभीत हो जाया करता है।

🔷 (3) चिन्ताशील व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है। दूसरों के प्रति उस के मन में संदेह बना ही रहता है। चाहे जितना उसका उत्साहवर्धन किया जाय, उसे असफलता ही नजर आती है।

🔶 (4) उसमें आवश्यकता से अधिक झुझलाने की आदत पैदा हो जाती है। कभी कभी उसके साथ अन्य लोगों का उठना- बैठना भी कठिन हो जाता है। वह अपनी अस्थिरता को छिपाने की चेष्टा करता है पर उसकी चेष्टा बेकार सिद्ध होती है। जरा- जरा सी बात पर उसका खून खौल उठता है।

🔷 (5) वह अत्यन्त अनुभूतिशील और आवश्यकता से अधिक सम्मान प्रिय होता है। इसलिये समाज के प्रति उसका दृष्टिकोण गलत और अतिरंजित होता है। वह अपने ही मित्रों, प्रियजनों, परिजनों और परिवारजनों के कार्यों और कथन का उल्टा अर्थ लगाता है, कभी हर बात में वह अपना ही दोष समझता है। इस प्रकार वह अपना जीवन बहुत दु:खी बना लेता है।

🔶 (6) वह प्राय: नैराश्यपूर्ण भावों से ओत- प्रोत रहता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि उसे निराशा में ही आनन्द आता है, अन्यथा वह उन तामसिक भावों से इतना लीन क्यों रहता? पर चिन्ता पीडि़त व्यक्ति उन भावों से छुटकारा पाना चाहता है, वह उनसे पीछा छुड़ाने में बिल्कुल असमर्थ हो जाता है।

🔷 (7) चिन्ता करने से बड़ी जल्दी थकावट आ जाती है। ऐसा जान पड़ता है कि शरीर और मन दोनों थक गये हों। ऐसी थकावट हर समय बनी रहती है। जहाँ चिन्ता है वहाँ थकावट अवश्य होगी।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति से

👉 गुरुगीता (भाग 99)

👉 गुरूकृपा गृहस्थ को भी विदेह बना देती है  

🔶 इसके स्वरूप को और भी अधिक स्पष्ट करते हुए भगवान् सदाशिव माँ भगवती से कहते हैं-

स्वयं सर्वमयो भूत्वा परं तत्त्वं विलोकयेत्। परात्परतरं नान्यत् सर्वमेतन्निरालयम्॥ १२३॥
तस्यावलोकनं प्राप्य सर्वसंगविवर्जितः। एकाकी निःस्पृहः शान्तः तिष्ठासेत् तत्प्रसादतः॥१२४॥
लब्धं वाऽथ न लब्धं वा स्वल्पं वा बहुलं तथा। निष्कामेनैव भोक्तव्यं सदा संतुष्टचेतसा ॥ १२५॥
सर्वज्ञपदमित्याहुर्देही सर्वमयो बुधाः। सदानन्दः सदाशान्तो रमते यत्र- कुत्रचित्॥ १२६॥
यत्रैव तिष्ठते सोऽपि स देशः पुण्यभाजनम्। मुक्तस्य लक्षणं देवि तवाग्रे कथितं मया॥ १२७॥

🔷 ऐसा मुक्त पुरूष स्वयं सर्वमय होकर परम तत्व को देखता है। वह इस सत्य को अनुभव करता है कि न तो कोई दूसरा है और न ही इस आत्मतत्त्व से बढ़कर कोई श्रेष्ठता है। ऐसा अनुभव करते हुए वह सम्पूर्ण निराश्रय होकर जीता है॥ १२३॥ श्री गुरूकृपा से इस परम तत्त्व का अवलोकन करने के बाद शिष्य -साधक सभी आसक्तियों से रहित , एकाकी, निस्पृह, शान्त और स्थिर हो जाता है॥ १२४॥ उसे अभीष्ट मिले या न मिले, उसे ज्यादा मिले अथवा थोड़ा मिले, इस चिंता को छोड़कर वह सभी कामनाओं से रहित संतुष्ट चित्त होकर जीवन यापन करता है॥ १२५॥

🔶 ज्ञानी जन इस अवस्था को ही सर्वज्ञ पद कहते हैं। इसे प्राप्त करके देहधारी सर्वात्म हो जाता है। इस अवस्था को पाने वाला साधक सदा शान्त, हमेशा ही आनन्दित एवं यत्र- तत्र रमने वाला होता है॥१२६॥ भगवान् सदाशिव कहते हैं, हे देवि! इस तरह से मैंने आपको मुक्त पुरूष के लक्षण सुनाएँ। ऐसा मुक्त पुरूष जहाँ कहीं भी निवास करता है, वह देश पुण्यभूमि हो जाता है॥ १२७॥ ऐसे व्यक्ति का दर्शन, सान्निध्य सभी कुछ दुर्लभ है। परन्तु इसे अनुभव वही कर पाता है, जो सच्चे साधक हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 151

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 5)

🔷 Types of Yajnas
A variety of Yajnas are described in scriptures. The seva Yajna, meaning service to the society, is a noble example of Yajna.  The jnana Yajna corresponds to the service of people by enlightening their lives with the glow of knowledge and education. The prana Yajna implies the selfless service of saving the lives of people from sufferings and agonies and inspiring liveliness and respect for life in them.    

🔶 Modern times and ignorance towards a great tradition
In the tides of time we lost and forgot the original purpose, relevance and importance of Yajna in our life. It won’t be an exaggeration to conclude that this negligence and aberration has been a major cause of our fallen and miserable state today. Nevertheless, there is a hope of reviving the Yajna in its original form, as we have somehow continued the tradition of Yajna as a holy custom and occasionally perform it, in some form at least, as a symbolic ritual.

🔷 Although lifeless and deformed, the feeble and hazy image of this ancient tradition is still with us. All important ceremonies, including the sodas sanskaras (sixteen rituals that are performed at various stages of life from birth till death), are conducted with Yajna. For instance, the Vedic mode of the wedding ceremony (vivaha sanskara) takes place in the presence of the sacred flames of Yajna.

🔶 As the melting heat of the fire welds and binds two metal pieces, the pious glow and the spiritual warmth of the yagyagni (the fire of Yajna) conjugate the soul of the bride and the groom through the sacred knot of marriage. The funeral process  ( daha or anityesti sanskara) is also a Yajna. The significance of Yajna in the thread ceremony (upanayana sanskara) is self-evident, as the sacred thread donned to symbolize the initiation of an enlightened life is called “yajóopavita”. This thread is always worn in the auspicious vicinity of yajnagni.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (अन्तिम भाग)

🔷 किसी के पास यदि पैसा कम है, पद छोटा है अथवा शरीर मोटा नहीं है तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि वे भाग्यहीन हैं। सच तो यह है कि यह जंजाल जितने कम होंगे आदमी उतनी ही तेजी से श्रेय पथ पर बढ़ सकेगा और वह लाभ प्राप्त कर सकेगा। जिसके कारण आत्मा की प्रसन्नता और परमात्मा की अनुकम्पा अजस्र मात्रा में बरसने लगे। ऋषियों में से प्रत्येक के पास साधन सामग्री स्वल्प थी। विवेकवानों को औसत भारतीय स्तर का निर्वाह स्वीकार करना पड़ता है और इससे अधिक यदि वे किसी प्रकार उपलब्ध कर सकें तो दूसरे हाथ से उसे सत् प्रयोजनों के लिए अविलम्ब लगा भी देते हैं। तपस्वी शक्ति संग्रह करते हैं। यह प्रक्रिया अपने साथ कठोरता बरतने और सर्वतोमुखी संयम अपनाने से ही बन पड़ती है। इस मार्ग को अपनाने वालो में से किसी को अपने दुर्भाग्य की शिकायत करते नहीं सुना गया। वरन् उनकी गरीबी की गरिमा को समझते हुए, हरिश्चन्द्र, हर्ष-वर्धन, अशोक आदि ने अपनी अमीरी को स्वेच्छापूर्वक निछावर कर दिया था।

🔶 ऊँचा उठने वालों को हलका बनाना पड़ता है, यदि किसी को कम वैभव से काम चलाने की परिस्थिति में रहना पड़ रहा है। अथवा अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने में कष्ट सहना पड़ रहा है तो उसे आन्तरिक दृष्टि से प्रसन्नता अनुभव करते ही पाया जायेगा। इसके विपरीत जिनने अनीतिपूर्वक वैभव जमा कर लिया है। अथवा उच्छृंखल विलास दम्भ पूर्ण प्रदर्शन का साधन जुटा लिया है तो उसे भीतर और बाहर से लानत ही बरसती अनुभव होगी। इस सन्तोष पर कुबेर के खजाने को निछावर किया जा सकता है।

🔷 कर्मफल सुनिश्चित है। उसके लिए किसी अन्य न्यायाधीश की या अन्य लोक में जाने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। अपने भीतर ही ऐसा स्वसंचालित तंत्र विराजमान है, जो कृतियों का प्रतिफल उपस्थित करता रहता है, इसमें थोड़ा विलम्ब लगते देखकर किसी को तनिक भी अधीर नहीं होना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 34

👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 5)

🔷 इन तीन को हासिल कीजिए- सत्यनिष्ठा, परिश्रम और अनवरतता

🔶 (1) सत्यनिष्ठ व्यक्ति की आत्मा विशालतर बनती है। रागद्वेष हीन श्रद्धा एवं निष्पक्ष बुद्धि उसमें सदैव जागृत रहती है। वह व्यक्ति वाणी, कर्म, एवं धारणा प्रत्येक स्थान पर परमेश्वर को दृष्टि में रख कर कार्य करता है। जो वाणी, कर्तव्य रूप होने पर हमारे ज्ञान या जानकारी को सही सही प्रकट करती है और उसमें ऐसी कमीवेशी करने का यत्न नहीं करती है कि जिससे अन्यथा अभिप्राय भासित हो, वह सत्यवाणी है। विचार में जो सत्य प्रतीत हो, उसके विवेकपूर्ण आचरण का नाम ही सत्य कर्म है।

🔷 (2) परिश्रम एक ऐसी पूजा है, जिसके द्वारा कर्म पथ के सब पथिक अपने पथ को, जीवन और प्राण को ऊँचा उठा सकते हैं। कार्लाइल का कथन है कि परिश्रम द्वारा कोई भी बड़े से बड़ा कार्य, उद्देश्य या योजना सफल हो सकती है।

🔶 (3) अनवरतता अर्थात् लगातार अपने उद्योग में लगे रहना मनुष्य को सफलता के द्वारा पर लाकर खड़ा कर देता है। पुनःपुनः अपने कर्तव्य एवं योजनाओं को परिवर्तित करने वाला कभी सफलता लाभ नहीं कर सकता।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 14

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 2 May 2018


👉 बेपरवाह

🔷 यदि आप पुरी तरह से बेपरवाह बन जाओगे तो वो दिन दुर नही की एक दिन संसार मे आपकी परवाह करने वाला कोई न होगा!

🔶 एक नगर मे दो भाई थे जो सहपाठी भी थे दोनो के नाम थे जगजीत और ओमनारायण! जगजीत बड़े परिवार से था तो ओमनारायण साधारण परिवार से था और जगजीत पढ़ने मे बड़ा होशियार था तो ओमनारायण साधारण बुद्धी का प्राणी था!

🔷 दोनो वर्षों तक साथ पढ़े और एक दिन जगजीत बहुत ऊँचे ओहदे पर पहुँच गया और ओमनारायण बड़ी मुश्किल से चपरासी की नौकरी तक पहुँच पाया! पर जहाँ ओमनारायण को हर कोई चाहता था पुरा गाँव उसकी परवाह करता था तो जगजीत की कोई परवाह नही करते थे!

🔶 जगजीत के जीवन की सबसे बड़ी कमी यही थी की वो किसी की भी परवाह नही करता था और ओमनारायण हर एक की परवाह करता था जहाँ जगजीत बहुत ऊँचे ओहदे पर और पूर्ण समर्थ होने के बावजुद वो जगह न बना पाया जो ओमनारायण ने अपनी संवेदना से बना ली!

🔷 मित्रों एक बात हमेशा याद रखना की यदि हम किसी की परवाह नहीं करेंगे तो एक दिन वो आयेगा की संसार मे कोई हमारी परवाह नही करेगा! जो परवाह के योग्य है उनकी परवाह करना समाज, साथी, परिवार, माँ-बाप, सद्गुरु, संत, सत्य और अन्तरात्मा इन सबकी परवाह करनी चाहिये क्योंकि यदि हम किसी के प्रति सम्वेदनशील रहेंगे तो प्रकृति भी हमारे प्रति सम्वेदनशील रहेगी और जीवन का चहुमुखि विकास तभी सम्भव है जब हम अधिकतम की परवाह करेंगे!

🔶 वैसे नीति तो यही कहती है की मानव को चींटी तक की परवाह करनी चाहिये क्योंकि यदि हम उसकी रक्षा करेंगे तो भगवान हमारी परवाह करेंगे और यदि हम उसकी रक्षा न करके राक्षसी प्रवर्ति दर्शायेँगे तो फिर भगवान भी हमारी परवाह नही करेंगे!

👉 जैसे यदि तुम समय की परवाह नही करोगे तो एक दिन समय भी तुम्हारी परवाह नही करेगा इसलिये परवाह करना!