शनिवार, 14 मई 2016

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 2) 14 May 2016


👉 पात्रता की अनिवार्यता
🔴 मित्रो! जो विवेकवान् लोग अपने रास्ते पर चले हैं, वे संसार के इतिहास में उज्ज्वल तारे की तरह टिमटिमाते रहे हैं और टिमटिमाते रहेंगे। यह परम्पराएँ पहले भी चलीं थीं और आगे भी चलती रहेंगी। मैंने आपको मन की, मस्तिष्क की, सूक्ष्म शरीर की उपासना के साथ साधना करने की विधि पहले भी बताई थी और विवेकशीलता को उसका एक अंग बताया था। एक दूसरा अंग है, पात्रता का विकास, व्यक्तित्व का विकास। इसके अभाव में सारी साधना, उपासना निष्फल चली जाती है।

🔵 एक बड़े सम्भ्रान्त व्यक्ति ने सुन रखा था कि संसार में सबसे बड़ा लाभदायक काम भगवान् का प्यार प्राप्त करना है। भगवान् सारी दुनिया का स्वामी है, मालिक है। सारी संपदाएँ और सारी सुविधाएँ उसके एक इशारे पर चलती रहती हैं। मनुष्य को भी जिन सुविधाओं की आवश्यकता है, जिन लाभों की जरूरत है, जिन वस्तुओं की जरूरत है, वह भगवान् के एक कृपांश के ऊपर, भगवान् के एक इशारे के ऊपर, इशारे की एक किरण के ऊपर टिके हुए हैं। भगवान् अगर हमसे नाराज हो जाये, तो हमारा अच्छा भला शरीर देखते ही देखते बरबाद हो जाये। गठिया आदि लग जाये, लकवा आदि हो जाये। हमारा सारा खाना- पीना भी बट्टे खाते में चला जाये। हमारी पढ़ाई- लिखाई सब बेकार चली जाये। सोलह वर्ष तक पढ़ाई की। एम.ए. की पढ़ाई की और डिवीजन खराब हो जाये, थर्ड डिवीजन पास हो जाये और नौकरी के लिए जगह न मिले। चपरासी के लिए मारा- मारा फिरना पड़े, तब? भगवान् की एक कृपा का कण यदि हमारे विरुद्ध हो जाये, तो हमारा सब कुछ चौपट हो जायेगा।

👉 कैसे मिले भगवान् का प्यार
🔵 उस व्यक्ति को मालूम था कि भगवान् का प्यार पाना और भगवान् का अनुग्रह प्राप्त करना मनुष्य के लिए जीवन का सबसे बड़ा लाभ है। उस लाभ को प्राप्त करने के लिए अपने समय के सबसे बड़े उदार संत और भगवान् के सबसे बड़े भक्त सुकरात के पास वह व्यक्ति गया और कहने लगा कि भगवन्! मुझे ऐसा उपाय बताइये, जिससे मैं भगवान् की कृपा प्राप्त कर सकूँ और भगवान् का साक्षात्कार कर सकूँ। भगवान् तक पहुँच सकूँ। सुकरात चुप हो गये। उन्होंने कहा कि फिर कभी देखा जायेगा। कई दिनों बाद वह व्यक्ति फिर आया। उसने कहा- ‘‘भगवन्! आपने भगवान् को देखा है और भगवान् का प्यार पाया है। क्या आप मुझे भी प्राप्त करा सकेंगे?’’ क्या भगवान् का अनुग्रह मेरे ऊपर न होगा? सुकरात ने कहा- ‘अच्छा तुम कल आना और मेरी एक सेवा करना, फिर मैं तुम्हें उसका मार्गदर्शन करूँगा।’ दूसरे दिन वह व्यक्ति सुकरात के पास पहुँचा। सुकरात ने मिट्टी का कच्चा वाला एक घड़ा पहले से ही मँगाकर रखा था। वह पकाया नहीं गया था, वरन् मिट्टी का बना हुआ कच्चा था। सुकरात ने कहा- ‘ बच्चे जाओ मेरे लिए एक घड़ा पानी लाओ और मैं उससे स्नान कर लूँ, पानी पी लूँ, पीछे मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करूँगा।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.1

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 48) :-- गुरु के स्वर को हृदय के संगीत में सुनें

🔴  बाबा कबीर के एक शिष्य थे- शेख रसूल। साधना करने की प्रगाढ़ चाहत लिए हुए वे कबीर बाबा के पास आए। उनकी चाहत थी कि बाबा उन्हें मंत्र दें। जप की कोई विधि बताएं। अक्कड़- फक्कड़ कबीर के निराले जीवन की विधियाँ भी निराली थी। उन्होंने शेख रसूल को देखा फिर हंसे और हंसते हुए उन्होंने कहा- देख मैं तुझे मंत्र तो दूंगा, पर तब जब तू सुनने लायक हो जाएगा। अभी तो तू बहरा है, पहले अपने बहरेपन को ठीक कर। अपनी उलटबासियों के लिए विख्यात कबीर की यह उलटबांसी रसूल को समझ में न आयी। क्योंकि उनके कान तो ठीक थे। उन्हें सुनायी भी सही देता है।

🔵  समझने के फेर में पड़े शेख रसूल को बाबा कबीर ने चेताया, अरे भाई ये जो कान है, वे तो दुनियां की बातों को सुनने के लिए हैं। गुरु की बातों को दिल से सुना जाता है। दिल कहे और दिल सुने। ऐसा हो तो गुरु और शिष्य के बीच संवाद पनपता है। बात रसूल को समझ में आ गयी। उसी क्षण से उन्होंने कानों की सुनी पर मन की हटाकर दिल की गहराइयों में प्रवेश करने की तैयारी करने लगे। गुरु के लिए उफनता प्रेम, सच्ची श्रद्धा, वे ही मेरा उद्धार करेंगे, यह वे ही एक मात्र आशा उनकी चेतना की गहराइयों में सघन होने लगी। इस सघनता को लिए वह जीवन के उथलेपन से गहरेपन में प्रविष्ट होने लगे।

🔴  दिन गुजरे, रातें बीतीं। पहले तो सांसारिक कोलाहल ने उनकी राह रोकी। सतही पथरीलापन उनकी राहों में आड़े आया, पर श्रद्धा उनका सम्बल थी, उनके हृदय में आशा का प्रदीप था। सद्गुरु के प्रति अथाह प्रेम उनका पाथेय था। शेख रसूल अपनी गहराइयों में उतरते गए। उन्हें अचरज तब हुआ, जब उन्होंने पाया कि अन्तस की गहराइयों में न तो कोलाहल का अस्तित्व है और न पथरीली ठोकरों का। वहाँ तो बस पवित्र जीवन संगीत प्रवाहित है। यही गहराइयों में उन्होंने अपने सद्गुरु बाबा कबीर की मुस्कराती छबि देखी।

🔵  इस अन्तरदर्शन ने उन्हें जीवन की सार्थकता दे दी। उन्होंने अपने सद्गुरु की प्रेममयी परावाणी को अपने हृदय में सुना- बेटा! जो अपने गुरु के स्वर को हृदय के संगीत में पहचान लेता है, वही सच्चा शिष्य है। इस घटना के बाद शेख रसूल कबीर के पास काफी दिनों तक नहीं आए। जब किसी ने उन्हें यह बात कही, तो वे जोर से हंस पड़े। उनकी इस हंसी में गुरु की कृपा, और शिष्य साधना का सम्मिलित संगीत था। इस स्वर माधुर्य की स्मृति कैसे बनी रहे? इसकी चर्चा, इसका मनन उन्हें जीवन संगीत का नया बोध देगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/gurua