गुरुवार, 4 मई 2017

👉 एक भयानक घटना टली

🔵 दिसम्बर २००८ की बात है। उन दिनों मैं नए वर्ष के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ एवं ‘युग निर्माण योजना’ के सदस्य बनाने में व्यस्त थी। उसी समय मेरे साथ एक भयानक किन्तु आश्चर्यजनक घटना घटी। मैं नया सिलेण्डर भरवाकर बाजार से लाई थी, शायद वह कहीं से लीकेज था। पास में रखे लैम्प से उसमें आग लग गई। मैंने बुझाने का बहुत प्रयास किया परन्तु लपटें बढ़ती ही गईं। किसी तरह रसोई से घसीट कर सिलेण्डर को मैं बरामदे तक ले आयी। आगे खुले स्थान पर ले जाना संभव न था, क्योंकि लपटें अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थीं। मैंने अपनी माँ को घर से बाहर ले जाकर बैठा दिया।

🔴 बाहर निकलकर पड़ोसियों से सहायता के लिए चिल्लाई। सारे पड़ोसी एकत्र होकर अपनी- अपनी राय देने लगे और अपनी तरह से आग बुझाने का प्रयास करने लगे, पर किसी को कोई भी कामयाबी नहीं मिली। किसी ने फायर ब्रिगेड को सूचना भी दे दी, लेकिन स्टेशन पास न होने के कारण शीघ्र सहायता न मिल सकी। मेरे सामने विषम परिस्थिति थी। सामने साक्षात् तबाही का दृश्य था। देखने वालों की भीड़ लगी थी। सभी त्राहि- त्राहि कर रहे थे। परन्तु सहानुभूति के अलावा किसी के पास कोई उपाय न था। मैं बहुत घबराई हुई थी। जाड़े की शाम जल्दी ही गहरा जाती है। सायं पाँच बजे का समय था, अँधेरा छाने लगा था। लपटें अपना उग्र रूप धारण करती जा रही थीं। सिलेण्डर पूरा भरा होने के कारण देर तक जलता रहा। मैंने भीड़ की ओर एक बार फिर देखा कि शायद कोई कुछ उपाय कर सके, परन्तु इस भौतिक संसार में इतनी सामर्थ्य कहाँ जो किसी का कष्ट हर ले।

🔵 कुछ ही पलों में एक भयानक दुर्घटना होने वाली थी, सभी विवश थे, उस भयानक स्थिति में सहसा मुझे गुरुदेव याद आये। मैं आर्त स्वर में रो पड़ी, गुरुदेव मेरी रक्षा करो, आप ही इस तबाही से मेरी रक्षा कर सकते हैं। गुरुदेव! यदि कुछ अनिष्ट हुआ तो मन टूट जाएगा, मैं इस समय आपका कार्य कर रही हूँ। उसमें व्यवधान आ जाएगा। इतना परिपक्व नहीं हूँ जो इतनी बड़ी घटना को सह सकूँ। गुरुदेव! क्षति मेरी नहीं आपकी होगी। लोग कहेंगे कि लोगों को गायत्री उपासना की सलाह देती हैं और कहती हैं गायत्री मंत्र सबका कल्याण करने वाला अनिष्ट निवारक मंत्र है। अपना ही अनिष्ट नहीं रोक पाई। इस घटना से बहुत लोगों की आस्था टूट जाएगी। लोग कहेंगे कि गायत्री उपासना में कोई शक्ति नहीं है। ज्यों- ज्यों लपटें बढ़ रही थीं मेरी प्रार्थना और आर्त होती जा रही थी। परन्तु गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास था कि अब कुछ नहीं होगा। जब गुरुदेव याद आ गए तो निश्चित है कि परोक्ष में वे साथ दे रहे हैं। मन में विश्वास जागा कि गुरुदेव आ गए, अब कोई अनिष्ट नहीं होगा।

🔴 बहनों ने कहा- सिलेण्डर से तेज आवाज होने लगी है, घर से बाहर निकल आओ, बस फटने ही वाला है। घर की छत उड़ जाएगी, दरवाजे दीवारें गिर जाएँगी। बड़ा भयानक विस्फोट होगा। सामान का नुकसान हो जाएगा कोई बात नहीं, जान तो बच जाएगी। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे यह आभास हो रहा था कि मेरी करुण पुकार सुनकर मेरे गुरुदेव आ गए हैं अब कुछ नहीं होगा। मैंने उनसे यही बात कही भी। भीड़ से कुछ लोग व्यंग्यात्मक हँसी हँसकर बोले- यह विज्ञान का सत्य है कि सिलेण्डर फटेगा तो दीवार दरवाजे टूट जाएँगे, भयानक हादसा होगा। विज्ञान के नियमों में कच्ची श्रद्धा न रखो, इसमें तुम्हारे गुरु क्या कर पायेंगे। मेरा मन शांत था जैसे सब कुछ सामान्य हो। सहसा मेरे मन में विचार आया- जैसे किसी ने आदेश दिया हो कि तुम गायत्री मंत्र का जप शुरू करो। मैंने तुरंत आँखें बंद करके जप शुरू कर दिया। मेरे इस क्रिया- कलाप को सभी देख रहे थे और यह कह रहे थे कि मानती नहीं है। अंधी श्रद्धा भक्ति इसको ले डूबेगी।

🔵 एक बुजुर्ग हितैषी बाहर ले जाने के लिए मेरा हाथ पकड़कर घसीटने लगे। मैंने कहा- मामा जी चिन्ता न करें मेरा मन शांत है। यहाँ पर अदृश्य में गुरुदेव उपस्थित हैं। अब मुझे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। मैंने पुनः आँखें बंद कर गायत्री मंत्र का जप शुरू कर दिया। अभी ११ मंत्र ही हुए होंगे कि सिलेण्डर से साँय- साँय की तेज आवाज आने लगी। लोग चिल्लाने लगे कि अब सिलेण्डर फटने वाला है, ये बाहर निकल नहीं रही है। इसके बाद मैं भीड़ के कोलाहल से बेखबर, आँखें बंद किए, ध्यानावस्थित होकर मंत्र जप करती रही। एक भयानक धमाके के साथ सिलेण्डर फट गया। घर की दीवारें, छत व पृथ्वी हिल गई। साथ ही मैं भी डगमगा गई। मन मस्तिष्क को धमाके ने हिला दिया। सिलेण्डर फटने का दृश्य मैंने नहीं देखा, क्योंकि मैं आँखें बंद किए हुए थी। धमाके की आवाज सुनकर सभी रोने लगे। मेरी माँ का रोते- रोते बुरा हाल था, लोग समझ रहे थे कि मेरा अंत हो चुका है। धमाके से मेरी आँखें खुलीं तो देखा पूरा घर धूल से भर गया है। चारों तरफ धूल ही धूल थी। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने अपने शरीर को स्पर्श किया कि कहीं मुझे चोट वगैरह तो नहीं आई! अपने को सुरक्षित पा मैं जोर से चिल्लाई- परेशान मत होओ मुझे कुछ नहीं हुआ। जब मैं घर से बाहर निकली तो मुझे सुरक्षित देख मेरी माँ मुझसे लिपट गई। सबकी आँखों में आँसू आ गए।

🔴 मेरा मन गुरु के प्रति कृतज्ञ हो उठा। लगभग १ घंटे तक चर्चा चलती रही। धमाके की आवाज सुनकर दूर- दूर के लोग भी एकत्रित हो गए। एक घंटे बाद जब घर की धूल बैठ गई तो कुछ लोगों के साथ घर के अन्दर गई। देखा टमाटर, संतरे, अंगूर, कपड़े सभी धमाके से छत पर चिपक गए थे। अलमारी से बरतन नीचे गिर गए थे। इधर- उधर बिखर गए थे। सारे घर में धूल ही धूल थी, सभी कुछ आश्चर्यचकित कर देने वाला था। सबसे अधिक आश्चर्य तो लोगों को तब हुआ जब उन्होंने देखा कि बरामदे में रखा सिलेण्डर धरती में १ फुट नीचे धँस गया, और उसके ऊपर का हिस्सा टूटकर मात्र १ से २ फुट की दूरी पर बिखरे हुए थे, जैसे किसी ने उन्हें जान बूझकर समेट दिया हो। सिलेण्डर के पास रखी चारपाई, दरवाजे बॉक्स, सब सुरक्षित थे और कहीं भी कुछ नुकसान नहीं हुआ। छत दीवार सब सही सलामत थे, जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। रात्रि हो गई थी, घर को वैसी स्थिति में छोड़कर हम सब सो गए। दूसरे दिन जब सवेरा हुआ तो लोगों का जमावड़ा होने लगा। इस अद्भुत घटना को देखने के लिए जन समूह उमड़ पड़ा। लोगों ने कई सिलेण्डर फटते देखे, जिसमें छत दीवारें, दरवाजों के काफी नुकसान हुए, सिलेण्डर को जमीन में धँसते किसी ने नहीं देखा था। सभी लोग कह रहे थे कि यह अद्भुत लीला तो सर्वोच्च सत्ता की ही हो सकती है, जो असंभव को संभव कर दे। यह तो विज्ञान को अध्यात्म की जबरदस्त चुनौती है। गुरु पर श्रद्धा विश्वास का फल देखकर सभी परम पूज्य गुरुदेव और माँ गायत्री के चरणों में नतमस्तक हो गए। 
  
🌹 ममता सिंह रायबरेली (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/bha.1

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 93)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 मथुरा का कार्य सुचारु रूप से चल पड़ने के उपरांत हिमालय से तीसरा बुलावा आया, जिसमें अगले चौथे कदम को उठाए जाने का संकेत था। समय भी काफी हो गया था। इस बार कार्य का दबाव अत्यधिक रहा और सफलता के साथ-साथ थकान बढ़ती गई थी। ऐसी परिस्थितियों में बैटरी चार्ज करने का यह निमंत्रण हमारे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक था।

🔵 निर्धारित दिन प्रयाण आरम्भ हो गया। देखे हुए रास्ते को पार करने में कोई कठिनाई नहीं हुए। फिर मौसम भी ऐसा रखा गया था जिसमें शीत के कड़े प्रकोप का सामना न करना पड़ता और एकाकीपन की प्रथम बार जैसी कठिनाई न पड़ती। गोमुख पहुँचने पर गुरुदेव के छाया पुरुष का मिलना और अत्यंत सरलतापूर्वक नंदन वन पहुँचा देने का क्रम पिछली बार जैसा ही रहा। सच्चे आत्मीयजनों का पारस्परिक मिलन कितना आनंद-उल्लास भरा होता है, इसे भुक्त-भोगी ही जानते हैं। रास्ते भर जिस शुभ घड़ी की प्रतीक्षा करनी पड़ी वह आखिर आ ही गई। अभिवादन आशीर्वाद का क्रम चला और पीछे बहुमूल्य मार्गदर्शन का सिलसिला चल पड़ा। 

🔴 अब की बार मथुरा छोड़कर हरिद्वार डेरा डालने का निर्देश मिला और कहा गया कि ‘‘वहाँ रहकर ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित करने का कार्य आरम्भ करना है। तुम्हें याद है न, जब यहाँ प्रथम बार आए थे और हमने सूक्ष्म शरीरधारी इस क्षेत्र के ऋषियों का दर्शन कराया था। हर एक ने उनकी परम्परा लुप्त हो जाने पर दुःख प्रकट किया था और तुमने यह वचन दिया था कि इस कार्य को भी सम्पन्न करोगे। इस बार उसी निमित्त बुलाया गया है।’’

🔵 भगवान अशरीरी है। जब कभी उन्हें महत्त्वपूर्ण कार्य कराने होते हैं, तो ऋषियों के द्वारा कराते हैं। महापुरुषों को वे बनाकर खड़े कर देते हैं। स्वयं तप करते हैं और अपनी शक्ति देवात्माओं को देकर बड़े काम करा लेते हैं। भगवान राम को विश्वामित्र अपने यहाँ रक्षा के बहाने ले गए और वहाँ बला-अतिबला विद्या (गायत्री और सावित्री) की शिक्षा देकर उनके द्वारा असुरता का दुर्ग ढहाने तथा रामराज्य, धर्मराज्य की स्थापना का कार्य कराया था। कृष्ण भी संदीपन ऋषि के आश्रम में पढ़ने गए थे और वहाँ से गीता गायन, महाभारत निर्णय तथा सुदामा ऋषि की कार्य पद्धति को आगे बढ़ाने का निर्देशन लेकर वापस लौटे थे। समस्त पुराण इसी उल्लेख से भरे पड़े हैं कि ऋषियों के द्वारा महापुरुष उत्पन्न किए गए और उनकी सहायता से महान कार्य सम्पादित कराए। स्वयं तो वे शोध प्रयोजनों में और तप साधनाओं में संलग्न रहते ही थे। इसी कार्य को तुम्हें अब पूरा करना है।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3

👉 बहुमूल्य वर्तमान का सदुपयोग कीजिए

🔴 मृत्यु और निर्माण के बीच में हम ठहरे हुए हैं। वर्तमान बड़ी तेजी से भूत की ओर दौड़ता है। भूत और मृत्यु एक ही बात है। कहते हैं कि मरने के बाद मनुष्य भूत बनता है। मनुष्य ही नहीं हर चीज मरती है और वह भूत बन जाती है। जब किसी वस्तु की सत्ता पूर्णत: समाप्त हो जाती है तो उसकी पूर्ण मृत्यु कही जाती है, पर आंशिक मृत्यु जन्म के साथ ही आरंभ हो जाती है। बालक जन्म के बाद बढ़ता है, विकास करता है, उसकी यह यात्रा मृत्यु की ओर ही है।

🔵 संसार की हर वस्तु का, मनुष्य शरीर का भी निर्माण उन्हीं तत्त्वों से हुआ है, जो हर क्षण बदलते हैं। उनका चक्र भूत को पीछे छोड़ता हुआ, भविष्य को पकड़ता हुआ प्रतिक्षण तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। विश्व एक पल के लिए भी स्थिर नहीं रहता। अणु-परमाणु से लेकर विशालकाय ग्रह-पिंड तक अपनी यात्रा विश्रांत गति से कर रहे हैं।

🔴 हमारा जीवन भी हर घड़ी थोड़ा-थोड़ा करके मर रहा है। इस दीपक का तेल शनै: शनै चुकता चला जा रहा है। भविष्य की ओर हम चल रहे हैं और वर्तमान को भूत की गोदी में पटकते जाते हैं। यह सब देखते हुए भी हम नहीं सोचते कि क्या वर्तमान का कोई सदुपयोग हो सकता है। जो बीत गया सो गया, जो आने वाला है, वह भविष्य के गर्भ में है। वर्तमान हमारे हाथ में है। यदि हम चाहे तो उसका सदुपयोग करके इस नश्वर जीवन में से कुछ अनश्वर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति-जनू-1947 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1947/June/v1

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 5 May 2017


👉 MANAN (Part 4)

(motivating the self-being for present & future period) & its Significance.
🔴 As ‘CHINTAN’ is comprised of two stages of ‘SELF-INSEPCTION/REVIEW’ & ‘SELF-RECTIFICATION’ so is the ‘MANAN’. The first stage of it is ‘SELF-INCULCATION’ whereas the second one is ‘SELF-DEVELOPMENT’. What is meant by SELF-DEVELOPMENT? The very meaning of SELF-DEVELOPMENT is enlarging/developing the Ego-Circle. People’ circle happens to be very small like that of a frog of the well. They assume that only their bodies are their own. They do not treat themselves as a component of the society. You tell what can be the value of an isolated particle of blood. 

🔵 The blood works only when all the particles of it bind together otherwise where is counted is one particle taken out of blood. That is why do not limit your circle. Just keep trying to move above the timidity of selfishness. Try to address yourself as ‘We’ in place of ‘I’ like we all. If you continue with ‘MAI’,’MAI’,’MAI’ ( I,I,I) then you will be confined to  a area like a he-goat  and encircled like a well-frog in which only and your family will be present. You will have no contact with society and BHAGWAN; therefore kindly broaden your base.

🔴 ‘We are for all’; ‘all are for us’ think like this. You think like-‘ATMAVAT SARVBHUTESHU’. This whole world is like us. We are alive due to helps pouring in from different quarters and so our help must be given to all. This thinking-style will lead you to become society-oriented and a responsible citizen. You will start expressing your affection for country, religion, society and culture and not only this you will also start treating social problems as your own problems. What is this all about? It is about widening the base of soul or expansion of ego-circle. You feel happy with things you treat as yours’.

🔵 But if you start treating all as yours’ then, you will find your level of pride and pleasure grown. Yours’ will be the sun, the moon, the stars, the rivers, the mountains too, the earth too, all the men and even the whole of world will be yours’. The day you begin treating yourself as of all and all as yours’, you will see how happy and glorious your life becomes, how is transformed your activities and life and how your happiness scales new peaks? Just be competent like that. Well, only it was to be told to you.

🌹  Finish
🌹 ~Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 हिम्मत इंसान की मदद भगवान् की

🔵 सन् १९३९ तब रूस के मुखिया स्टालिन थे। फिनलैंड के कई बंदरगाह रूस के लिए सामरिक महत्त्व के थे, इसलिये उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर फिनलैंड को धमकी दी-यह बंदरगाह रूस को दे दिये जाएँ? यदि फिनलैंड ने बात न मानी तो रूस शक्ति प्रयोग करना भी जानता है।''

🔴 वह वैसा ही अपराध था जैसे चोरी, डकैती, अपहरण या लूटपाट। यदि संसार में शक्ति और सैन्यबल ही सब कुछ हो तो फिर न्याय-नीति आदि सद्भावनाओ को प्रश्रय कहॉ मिले? पर किया क्या जाए? ऐसे लोग भी इस दुनिया में हैं, जो केवल शक्ति और उद्दंडता की भाषा समझते हैं। इनसे रक्षा भी हिम्मत से ही करनी पडती है। स्वल्प क्षमता के लोग साहसपूर्वक संघर्ष कर बैठते हैं तो उनकी मदद भगवान् करता है। बाहर से दिखाई देने वाला राक्षसी बल तब जीतता है, जब अच्छाई की शक्तियॉ भले ही सीमित सही-संघर्ष करने से भय खा जाती है।

🔵 फिनलैण्ड़ की कुल २ लाख सेना रूस की ४० लाख की विशाल सेना और आधुनिक शस्त्र सज्जा के सामने जा डटी। रूसियों को अनुमान था- प्रात: होते देर है, फिनलैंड को जीतना देर नहीं, उनको यह आशा महंगी पडी।

🔴 एक स्थान पर फिनलैंड के एक सेनाधिकारी लेफ्टिनेंट हीन सारेला को नियुक्त किया गया। साथ में कुल ४९ सिपाही थे। हथियार भी उस समय के जब बंदूके बनना प्रारभ हुईं थीं। रात से ही रूसी टैंको की गडगडा़हट सुनाई देने लगी। रूसी सेना मार्च करती हुई बढी चली आ रही थी।

🔵 ४९ सैनिकों के आगे हजारों की सेना। सैनिकों ने हाथ ढीले कर दिए और कहा- भेड़िये-भेड का युद्ध नहीं होता। लडाना है तो हमें आप ही मार डालिये। युद्ध के मोर्चे पर आगे बढ़ना तो एक प्रकार से जानबूझकर हमारी हत्या कराना है। लेफ्टिनेंट सारेला का माथा ठनक गया। यह बात उसके अपने मन में आई होती तो वह गोली मार लेता-उसने कडककर कहा-सैनिको! यह मत भूलो संसार में वही जातियाँ जीवित रहती है, जो संघर्ष से नहीं घबडातीं। जो बाह्य आक्रमण का मुकाबला नहीं कर सकते वह अपने सामाजिक जीवन में दृढ़ नही हो सकते। प्रतिरोध से घबडाने वाले लोगों में अपने से ही उद्दंड और अभद्र लोग पैदा हो जाते हैं और सामाजिक शांति एवं व्यवस्था को चौपट कर डालते हैं। पाप, दुर्भाव, उद्दंडता और उच्छृंखलता मुर्दा जातियों के जीवन में पाई जाती है। साहसी शूर-वीरो के राज्य में चोर, उठाईगीर क्या-डकैत, आतताई लोग भी मजदूरी करते है। उनमें अंधविश्वास और रूढिवादिता नहीं, पौरुष और पराक्रम का विकास होता है, इसलिये वे थोड़े-से भी हों तो भी संसार में छाए रहते हैं। निश्चय करो, तुम्हें पराधीनता का जीवन जीना है या फिर शानदार जीवन की प्राप्ति के लिए संधर्ष की तैयारी करनी है।

🔴 सैनिको के हृदयों में सारेला का तेजस्वी भाषण सुनकर विद्युत् कौंध गई। हथियार उठा-उठाकर उन्होंने प्रतिज्ञा की लडे़ंगे और रक्त की आखिरी बूंद तक संघर्ष करेंगे।

🔵 मुट्ठी-मर जवान विकराल दानवी सेना से जूझ पडे। ४९ जवान दिन भर कुछ खाए-पिए बिना जमीन में रैंगते शत्रुओ को मारते हुए आगे बढते गए और जब उस दिन का युद्ध समाप्त हुआ तो संसार के अखबारो ने बडे़ बडे़ अक्षरों में छापा-मुट्ठी भर फिनलैण्ड़ के सिपाहियो ने रूसी सेना की अग्रिम पंक्ति के बीस हजार सैनिकों को कुचलकर रख दिया। ५० गाडियों और १२० टेंकों को भी उन्होंने ध्वस्त करके रख दिया था।

🔴 सच है जिंदा दिल कौमें बुराइयों और अपराधों के आगे घुटने नही टेकती, उनसे लड पडती है और विजय पाती हैं। हिम्मत करने वाले इंसान की मदद भगवान् करता है। स्टालिन जैसे सशक्त व्यक्ति ने भी इस पराजय को चमत्कार ही माना था।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 149, 150

👉 सद्गुरु को बना ले अपना नाविक

🔵 एक था यात्री, दूर देश की यात्रा पर निकला था वह। अभी कुछ दूर ही चला था कि एक नदी आ गयी, किनारे पर नाव लगी थी। उसने सोचा-यह नदी भला मेरा क्या बिगाड़ लेगी? पाल उसने बाँधा नहीं, डाँड उसने खोले नहीं, न जाने कैसी जल्दी थी उसे? मल्लाह को उसने पुकारा नहीं। बादल गरज रहे थे। घना अँधेरा आस-पास के वातावरण को भयावह बना रहा था। तेज कड़क के साथ जब बिजली चमकती है, तो नदी का पानी भी दहशत से थर्रा जाता। फिर भी वह माना नहीं, नाव को लंगर से खोल दिया और स्वयं भी उसमें सवार हो गया। किनारा जैसे-तैसे निकल गया, पर नाव जैसे ही मझधार में आयी, वैसे ही उसे भँवरों और उत्ताल तरंगों ने आ घेरा। लहरों के थपेड़े मजबूत नाव को चकनाचूर करने लगे। उत्ताल तरंगें बार-बार नाव को ऊपर तक उछाल देतीं और जब नाव लहरों के साथ नीचे गिरती, तो भँवरों का चक्रव्यूह उसे मझधार में डुबो देने में जुट जाता। यात्री विकल और बेबस था। मल्लाह के अभाव में वह असहाय था। आखिरकार नाव ऊपर तक उछली और यात्री समेत जल में समा गयी।

🔴 एक दूसरा यात्री आया। कुछ दूर चलने के बाद उसे भी नदी मिली। नदी किनारे लगी नाव टूटी-फूटी थी,डाँड कमजोर थे, पाल फटा हुआ था, तो भी उसने युक्ति से काम लिया। नाविक को बुलाया और बड़ी विनम्रतापूर्वक उससे कहा-मुझे उस पार तक पहुँचा दो। नाविक यात्री को लेकर चल पड़ा। किनारा छोड़ते ही वातावरण भयानक हो उठा। आसमान के सूरज को बादलों ने ढँक लिया। भयानक गरज के साथ मूसलाधार बारिश होने लगी। रह-रहकर जब बिजली कड़कती, तो यात्री का हृदय सूखे पत्ते की तरह काँप उठता। नाविक हर बार व्याकुल और भयभीत यात्री के मन को सान्त्वना देता। वह हर बार नाव को बचा लेता और यात्री के मनोबल को टूटने न देता। लहरों ने संघर्ष किया, तूफान टकराए, हवा ने पूरी ताकत लगाकर नाव को भटकाने का प्रयत्न किया, पर नाविक एक-एक को सँभालता हुआ यात्री को सकुशल दूसरे पार तक ले आया।
   
🔵 मनुष्य जीवन भी एक यात्रा है जिसमें पग-पग पर कठिनाइयों के महासागर पार करने पड़ते हैं। इन्द्रियों की लालसाएँ-मन में पनपते भ्रमों की बहुतायत जीवन को पल-पल पर भटकाने की कोशिश करते हैं, फिर संसार में भयावह संकटों, विघ्नों, परेशानियों की कमी कहाँ है? संसार का हर थपेड़ा जीवन-नौका को नेस्तनाबूद कर देने के लिए प्रयत्नशील रहता है। यहाँ के चित्र-विचित्र आकर्षणों का हर भँवर समूचे जीवन को डुबो देने के लिए आतुर-व्याकुल रहता है। जो जीवन-यात्रा की शुरुआत से ही सद्गुरु को अपना नाविक बना लेते हैं, उनके हाथों में अपने को सौंप देते हैं, गुरु स्वयं उनकी यात्रा को सरल बना देते हैं, क्योंकि जीवनपथ की सभी कठिनाइयों के वही ज्ञाता और हम सबके वही सच्चे सहचर हैं। अपने अहंकार और अज्ञान में डूबे मनुष्यों की स्थिति तो उस पहले यात्री जैसी है, जो नाव चलाना न जानने पर भी उसे तूफानों में छोड़ देता है और बीच में ही नष्ट हो जाता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 55

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 May

🔴 समर्पण का अर्थ है-  दो का अस्तित्व मिटाकर एक हो जाना। पति-पत्नी की तरह ही गुरु व षिश्य की आत्मा में भी परस्पर ब्याह होता है। दोनों एक दूसरे से घुल-मिलकर एक हो जाते हैं। तुम भी अपना अस्तित्व मिटाकर हमारे साथ मिला दो व अपनी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षाओं को हमारी अनन्त आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दो। जिसका अहम् जिन्दा है, वह वेष्या है। जिसका अहम् मिट गया, वह पवित्र आत्मा है। देखना है कि हमारी भुजा, आँख, मस्तिश्क बनने के लिए तुम सब कितना अपने अहम् को गला पाते  हो?              

🔵 श्रम का सम्मान करो। यह भौतिक जगत् का देवता है। मोती-हीरे श्रम से ही निकलते हैं। हमारे राश्ट्र का दुर्भाग्य यह है कि श्रम की महत्ता हमने समझा नहीं। हमने कभी उसका मूल्यांकन किया ही नहीं। हमारा जीवन निरन्तर श्रम का ही परिणाम है। बीस-बीस घण्टे तन्मयतापूर्वक श्रम हमने किया है। तुम भी कभी श्रम की उपेक्षा मत करना। मालिक बारह घण्टे काम करता है, नौकर आठ घण्टे तथा चोर चार घण्टे काम करता है। तुम सब अपने आपसे पूछो कि हम तीनों में से क्या हैं? जीभ चलाने के साथ-साथ कठोर परिश्रम करो। अपनी योग्यताएँ बढ़ाओ व निरन्तर प्रगति पथ पर बढ़ते जाओ।                                                  

🔴 बेटा ! मैं तुम लोगों के लिए बहुत कुछ करना चाहता हूँ, पर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता, क्योंकि तुम सबने अपने द्वार-दरवाजे बन्द कर रखे हैं। जिधर से घुसने की कोशीश करो उधर ही अहम् का पहरा नजर आता है। हर तरफ क्षुद्रताएँ एवं संकीर्णताएँ रास्ता घेरे हैं। जब कभी सूक्ष्म रूप से तुम लोगों की बातें सुनता हूँ तो हल्केपन के सिवाय कुछ नजर नहीं आता है। यदि तुम यह चाहते हो कि तुम्हारी जिन्दगी में भी वैसे ही चमत्कार हों, जैसे कि मेरी जिन्दगी में हुए तो फिर तुम ‘शिष्य’ बनो। संसार की वासनाओं, कामनाओं के पीछे मत भागो। यों पास बैठना, मिलना भी कोई पास होना या मिलना है! सच्चा मिलन तो वह है, जब
शिष्य की अन्तर्चेतना अपने गुरु की अन्तर्चेतना से मिलती है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 21)

🌹 समय के सदुपयोग का महत्व समझिए

🔴 हर मनुष्य को वक्त का, छोटे से छोटे क्षण का मूल्य एवं महत्व समझना चाहिये। जीवन का वक्त सीमित है और काम बहुत है। आने से लेकर परिवार, समाज एवं राष्ट्र के दायित्वपूर्ण कर्त्तव्यों के साथ मुक्ति की साधना तक कामों की एक लम्बी शृंखला चली गई है। कर्त्तव्यों की इस अनिवार्य परम्परा को पूरा किये बिना मनुष्य का कल्याण नहीं। इसी कर्म-क्रम को इसी एक जीवन के सीमित वक्त से ही पूरा कर डालना है क्योंकि आत्मा की मुक्ति मानव-जीवन के अतिरिक्त अन्य किसी जीवन में नहीं हो सकती और मुक्ति का प्रयास तभी सफल हो सकते है जब वह उसके सहायक पूर्व प्रयासों को पूरा करता है। अस्तु जीवन के चरम लक्ष्य मुक्ति पाने के लिए उसकी साधना के अतिरिक्त सारे कर्त्तव्य-क्रम को इसी जीवन के सीमित वक्त में ही पूरा करना होगा।

🔵 इतने विशाल कर्त्तव्य-क्रम को मनुष्य पूरा तब ही कर सकता है जब वह जीवन के एक-एक क्षण, एक-एक पल और एक-एक विशेष को सावधानी के साथ उपयोगी एवं उपयुक्त दिशा में प्रयुक्त करे। नहीं तो किसने देखा है कि उसके जीवन का अन्तिम छोर कितनी दूरी पर ठहरा हुआ है। जीवन की अवधि सीमित होने के साथ अनिश्चित एवं अज्ञात भी है। जो क्षण हमारे पास है, हृदय के जिस स्पन्दन में गति है, वही हमारा है। श्वास का एक आगमन ही हमारा है बाकी सब पराये हैं, न जाने दूसरे क्षण हमारे बन पायेंगे या नहीं। अतएव हर बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि जो क्षण, जो श्वास उसके अधिकार में है उसे भगवान की महती कृपा और जीवन का उच्चतम अन्तिम अवसर समझकर इस सावधानी एवं संलग्नता से उपयोग करे कि मानों इसी एक क्षण में सब कुछ दक्षता है। अपने वर्तमान क्षण को छोड़कर भविष्य की युगीन अवधि पर विश्वास करना विवेक का बहुत बड़ा अपमान है। जिस भविष्य पर आप अपने जीवन विकास के कार्यों, अपने विकास कर्त्तव्यों को स्थगित करने की सोच रहे हैं वह आ ही जायेगा, यह जीवन निश्चित अनिश्चितता के बीच निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता।

🔴 कर्त्तव्यों के विषय में आने वाले कल की कल्पना एक अन्ध-विश्वास है। उसकी प्रतीक्षा करने वाले नासमझ इस दुनिया में पश्चाताप करते हुए ही विदा होते हैं। आने वाला कल ऐसा आकाश कुसुम है जो सुना तो गया पर पाया कभी नहीं गया। किन्तु दुर्भाग्य है कि हर स्थगनशील व्यक्ति सदा ही उसी कल पर विश्वास किये हुए उपस्थित वर्तमान में सोता रहता है और जब उसका प्रतीक्षित कल कभी नहीं आता तब उसके पास उस बीते हुये कल के लिये रोने-पछताने के सिवाय कुछ नहीं रह जाता जिसको कि उसने वर्तमान में अवहेलना की थी, और जो कि किसी भी मूल्य पर वापस नहीं लाया जा सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्थायी सफलता का राजमार्ग (अंतिम भाग)

🔵 मनुष्य को अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जैसा उत्साह होता है वैसा उत्साह उसे कर्म-फल के लिए होता है वैसा ही उत्साह उसे कर्म करने में भी होना चाहिये। लोक-सेवा का स्वाभाविक फल यश की प्राप्ति है। अतएव यदि कोई यश प्राप्त करना चाहता है तो उसे लोक-सेवा में भी वैसी ही रुचि प्रदर्शित करनी चाहिए। यदि कोई दानी कहलाने की उत्कट इच्छा रखता है तो उसे दान देते समय अपना हाथ भी न सिकोड़ना चाहिये। किंतु बहुधा यह देखा जाता है कि मनुष्यों में कर्म-फल-भोग के लिए जो उत्साह देखा जाता है वैसा उत्साह कर्म करने के लिए नहीं। जहाँ कर्मोत्साह नहीं होता और कर्म-फल-भोग की भावना प्रबल होती है, वहाँ मनुष्य भटक जाता है और अधर्म करता है।

🔴 सच्ची उद्देश्य-सिद्धि न्याय पूर्ण तरीकों से ही हो सकती है। तभी वह स्थायी भी होती है। न्याय-संगत साधनों के प्रयोग से मनुष्य को न केवल साध्य की ही प्राप्ति होती है बल्कि उसे साधनकाल में अनेकों अन्य वस्तुओं की भी प्राप्ति हो जाती है जिनका कि मूल्य कभी-कभी उद्देश्य से भी कई गुना अधिक होता है। जो व्यक्ति न्यायपूर्ण तरीकों से धनी बनना चाहता है वह धन पाने के अतिरिक्त अध्यवसाय, मितव्ययिता आदि सद्गुण भी प्राप्त कर लेता है। जो विद्यार्थी ईमानदारी से परीक्षा पास होना चाहता है वह न केवल बी.ए., एम.ए. आदि उपाधियाँ ही प्राप्त करता है बल्कि ठोस ज्ञान भी प्राप्त करता है। वह एतर्द्थ ब्रह्मचर्य-धारण करना सीखता है, पूर्ण मनोयोग से कार्य करता है एवं अपने चित्त को विषय-विलासों से विरत रखता है। विद्याभ्यास और ब्रह्मचर्य के ही मिस से वह चित्त-संयम अथवा योग साधन में प्रवृत्त होता है जिसका कि मूल्य परीक्षा पास कर उपाधियाँ पाने और नौकरी पाने से कम नहीं।

🔵 जिस वस्तु को हम न्यायपूर्ण तरीकों से कमाते हैं उसकी रक्षा की योग्यता को हम अपने वंशजों को भी दे जाते हैं। यदि हम अन्यायपूर्ण तरीकों से कोई धन-राशि संचित करते हैं तो हममें उसको प्राप्ति के लिए जितने अध्यवसाय और आत्म-संयम की मात्रा होना चाहिए वह न होगी और फिर हमारी संतान में भी इन गुणों के होने की कम सम्भावना है। यदि हमारी संतान में आत्म-संयम का गुण न होगा तो वह उस धनराशि का दुरुपयोग कर उसे नष्ट कर डालेगी। इस तरह हम देखते हैं कि जिसमें किसी वस्तु के न्यायोचित ढंग से प्राप्त करने की योग्यता नहीं होती उसमें तथा उसकी संतान में उसकी रक्षा करने की भी सामर्थ्य नहीं रहती। यही कारण है कि हम बहुधा लक्षाधीशों के पुत्रों को अपने जीवन काल में कंगाल होते देखते हैं और भ्रमवश यह समझते हैं कि लक्ष्मी अकारण ही चंचल है।

🌹 अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/March/v1.25

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...