गुरुवार, 4 मई 2017

👉 हिम्मत इंसान की मदद भगवान् की

🔵 सन् १९३९ तब रूस के मुखिया स्टालिन थे। फिनलैंड के कई बंदरगाह रूस के लिए सामरिक महत्त्व के थे, इसलिये उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर फिनलैंड को धमकी दी-यह बंदरगाह रूस को दे दिये जाएँ? यदि फिनलैंड ने बात न मानी तो रूस शक्ति प्रयोग करना भी जानता है।''

🔴 वह वैसा ही अपराध था जैसे चोरी, डकैती, अपहरण या लूटपाट। यदि संसार में शक्ति और सैन्यबल ही सब कुछ हो तो फिर न्याय-नीति आदि सद्भावनाओ को प्रश्रय कहॉ मिले? पर किया क्या जाए? ऐसे लोग भी इस दुनिया में हैं, जो केवल शक्ति और उद्दंडता की भाषा समझते हैं। इनसे रक्षा भी हिम्मत से ही करनी पडती है। स्वल्प क्षमता के लोग साहसपूर्वक संघर्ष कर बैठते हैं तो उनकी मदद भगवान् करता है। बाहर से दिखाई देने वाला राक्षसी बल तब जीतता है, जब अच्छाई की शक्तियॉ भले ही सीमित सही-संघर्ष करने से भय खा जाती है।

🔵 फिनलैण्ड़ की कुल २ लाख सेना रूस की ४० लाख की विशाल सेना और आधुनिक शस्त्र सज्जा के सामने जा डटी। रूसियों को अनुमान था- प्रात: होते देर है, फिनलैंड को जीतना देर नहीं, उनको यह आशा महंगी पडी।

🔴 एक स्थान पर फिनलैंड के एक सेनाधिकारी लेफ्टिनेंट हीन सारेला को नियुक्त किया गया। साथ में कुल ४९ सिपाही थे। हथियार भी उस समय के जब बंदूके बनना प्रारभ हुईं थीं। रात से ही रूसी टैंको की गडगडा़हट सुनाई देने लगी। रूसी सेना मार्च करती हुई बढी चली आ रही थी।

🔵 ४९ सैनिकों के आगे हजारों की सेना। सैनिकों ने हाथ ढीले कर दिए और कहा- भेड़िये-भेड का युद्ध नहीं होता। लडाना है तो हमें आप ही मार डालिये। युद्ध के मोर्चे पर आगे बढ़ना तो एक प्रकार से जानबूझकर हमारी हत्या कराना है। लेफ्टिनेंट सारेला का माथा ठनक गया। यह बात उसके अपने मन में आई होती तो वह गोली मार लेता-उसने कडककर कहा-सैनिको! यह मत भूलो संसार में वही जातियाँ जीवित रहती है, जो संघर्ष से नहीं घबडातीं। जो बाह्य आक्रमण का मुकाबला नहीं कर सकते वह अपने सामाजिक जीवन में दृढ़ नही हो सकते। प्रतिरोध से घबडाने वाले लोगों में अपने से ही उद्दंड और अभद्र लोग पैदा हो जाते हैं और सामाजिक शांति एवं व्यवस्था को चौपट कर डालते हैं। पाप, दुर्भाव, उद्दंडता और उच्छृंखलता मुर्दा जातियों के जीवन में पाई जाती है। साहसी शूर-वीरो के राज्य में चोर, उठाईगीर क्या-डकैत, आतताई लोग भी मजदूरी करते है। उनमें अंधविश्वास और रूढिवादिता नहीं, पौरुष और पराक्रम का विकास होता है, इसलिये वे थोड़े-से भी हों तो भी संसार में छाए रहते हैं। निश्चय करो, तुम्हें पराधीनता का जीवन जीना है या फिर शानदार जीवन की प्राप्ति के लिए संधर्ष की तैयारी करनी है।

🔴 सैनिको के हृदयों में सारेला का तेजस्वी भाषण सुनकर विद्युत् कौंध गई। हथियार उठा-उठाकर उन्होंने प्रतिज्ञा की लडे़ंगे और रक्त की आखिरी बूंद तक संघर्ष करेंगे।

🔵 मुट्ठी-मर जवान विकराल दानवी सेना से जूझ पडे। ४९ जवान दिन भर कुछ खाए-पिए बिना जमीन में रैंगते शत्रुओ को मारते हुए आगे बढते गए और जब उस दिन का युद्ध समाप्त हुआ तो संसार के अखबारो ने बडे़ बडे़ अक्षरों में छापा-मुट्ठी भर फिनलैण्ड़ के सिपाहियो ने रूसी सेना की अग्रिम पंक्ति के बीस हजार सैनिकों को कुचलकर रख दिया। ५० गाडियों और १२० टेंकों को भी उन्होंने ध्वस्त करके रख दिया था।

🔴 सच है जिंदा दिल कौमें बुराइयों और अपराधों के आगे घुटने नही टेकती, उनसे लड पडती है और विजय पाती हैं। हिम्मत करने वाले इंसान की मदद भगवान् करता है। स्टालिन जैसे सशक्त व्यक्ति ने भी इस पराजय को चमत्कार ही माना था।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 149, 150

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