सोमवार, 20 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 21 March 2017


👉 गुरुर्वाक्यं ब्रह्मवाक्यं

🔵 मैं बचपन से ही बहुत तार्किक स्वभाव का था। ज्यादा पूजा पाठ या साधू बाबा आदि के आडम्बरों से बहुत दूर रहता था। मुझे समाज निर्माण से जुड़े नैतिक और सामाजिक कार्यों में रुचि थी। मुझे आर्यसमाज से जुड़ी हुई कुछ चीजें पसन्द थीं, विशेषकर गायत्री मंत्र। १९७६ की बात है। उन्हीं दिनों मैं पहली बार इस मिशन से परिचित हुआ। मेरे बड़े भाई के समान श्री मंगल प्रसाद लोहिया जी एक दिन मेरे पास आए और बोले कि आपको सोनी माता जी के यहाँ गायत्री यज्ञ में चलना है। चूँकि मेरी गायत्री मंत्र में श्रद्धा पूर्व से ही थी, मैं सहर्ष तैयार हो गया।

🔴 मैं सोनी माता जी के यहाँ यज्ञ में पहुँचा। यज्ञ श्री कोलेश्वर तिवारी जी करा रहे थे। मैंने प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ किया। यज्ञ के बाद तिवारी जी बोले अब कुछ दक्षिणा दो। मैं दक्षिणा का अर्थ ठीक से नहीं समझ पाया, तो उन्होंने बताया कि अपने अन्दर की कुछ बुराई यज्ञ भगवान की साक्षी में छोड़ दो। मैंने पान, नॉनवेज तथा आलस्य आदि छोड़ दिया और प्रतिदिन गायत्री मंत्र की उपासना करने लगा। लगभग १५ दिन के अन्दर ही मुझे हरिद्वार जाने की प्रेरणा हुई।

🔵 संयोग से मंगल जी शान्तिकुञ्ज जा रहे थे, मैं भी उनके साथ हो लिया। ट्रेन से सुबह ही पहुँच गया था। स्नान आदि के बाद मैं गुरुजी के प्रवचन में पहुँच गया। मुझे शान्तिकुञ्ज के वातावरण से लगा मैं स्वर्ग में पहुँच गया हूँ। उसके बाद जब गुरुदेव का प्रवचन सुना तो लगा मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ, जो ऐसे भगवान स्वरूप गुरु के दर्शन हुए।

🔴 प्रवचन समाप्त होने के बाद मंगल जी ने मंच के पीछे मुझे गुरुदेव से मिलाया और मेरा परिचय दिया। गुरुदेव ने कुशल क्षेम पूछा। उनके सरल व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित हुआ। वे ऐसे बात कर रहे थे जैसे मुझे बहुत पहले से जानते हों। उनका अपनापन देखकर मेरे हृदय में उनके प्रति अटूट श्रद्धा हो गई।

🔵 उसके पश्चात् मैं गुरुदेव से उनके कमरे में मिला। गुरुदेव ने मुझे अपने पास बिठाया। घर परिवार का हाल पूछा। मैं असमंजस में पड़ गया कि क्या उत्तर दूँ। मुझे निरुत्तर देख वे बोले ‘तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे।’ तुम्हारी दुकानदारी, बीमारी, परेशानी सबकी जिम्मेदारी मेरी है। बस तुम मन लगाकर कार्य करना। इतना बड़ा आश्वासन पाकर मैं कृतार्थ हो गया। उस समय तो दो- तीन दिन वहाँ रहकर मैं घर वापस आ गया। लेकिन शान्तिकुञ्ज का आकर्षण बराबर अनुभव होता रहता। मैंने उस समय ३ शिविर १- १ महीने के कर डाले। इस तरह से मैं किसी न किसी रूप में शान्तिकुञ्ज हमेशा महीने- दूसरे महीने पहुँच ही जाता।

🔴 सन् १९८६ की घटना है। मुझे हार्ट में कुछ परेशानी मालूम पड़ने लगी। इधर- उधर कुछ दिखाया, लेकिन आराम नहीं मिला। मेरे मित्र अरविन्द निगम जी को इस बात का पता चला। वे तुरन्त मुझे लखनऊ मेडिकल कालेज लेकर गए। वहाँ डॉक्टरों ने बताया कि हार्ट में प्रॉबलम है। चूँकि इसमें दवा काम नहीं करेगी इसलिए एक छोटा सा ऑपरेशन करेंगे। ऑपरेशन का खर्च लगभग ७० हजार रुपए बताया गया।

🔵 खर्च की राशि सुनते ही जैसे लगा कि पैरों के तले की धरती ही खिसक गई। मेरे पास ५ हजार रुपये भी नहीं हैं। ७० हजार कहाँ से लाऊँगा। मैं घर वापस चला गया। मैं मानसिक रूप से बहुत परेशान था। मेरी इतनी बड़ी हैसियत भी नहीं थी कि उधार लेकर ऑपरेशन कराता। वापस करता भी तो कैसे? यह मेरे लिए उस समय असंभव ही था। मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। अचानक मुझे गुरुदेव के वे शब्द याद आये कि बेटा ‘तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे।’

🔴 तुरन्त मैंने हरिद्वार जाने की व्यवस्था बनाई। शान्तिकुञ्ज पहुँचकर डॉ० प्रणव पण्ड्या जी भाई साहब को अपनी रिपोर्ट दिखाई। दवा आदि का पर्चा भी दिखाया। डॉ० साहब भी बोले, स्थिति तो ऑपरेशन की ही बन रही है। फिर मैं गुरुदेव के पास गया। उनसे सारी बातें बताई। रिपोर्ट और सारे पर्चे भी दिखाए। गुरुदेव बोले- तुम्हें कुछ नहीं होगा। तुम्हें कोई बीमारी नहीं है। जाओ मन लगाकर काम करो। खूब साइकिल चलाना। तुम्हें कुछ नहीं होगा।

🔵 कहते हैं, गुरु का वाक्य ब्रह्मवाक्य होता है। गुरुदेव का वह वाक्य सचमुच मेरे लिए ब्रह्मवाक्य बन गया। मैं आज तक पूरी तरह स्वस्थ हूँ। मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं है। गुरुदेव की कृपा से मेरा जीवन संकट बड़ी आसानी से टल गया। मैं उस परमसत्ता का बहुत ऋणी हूँ, जिन्होंने मुझ अकिंचन पर अहैतुक कृपा की। मैं आज भी तन- मन से गुरु कार्य में संलग्न हूँ।

🌹 बिजलेश्वरी प्रसाद कसेरा चौक बाजार, बलरामपुर (उ.प्र.) 
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/guru.1

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 26)

🌹 आगे बढ़ें और लक्ष्य तक पहुँचें     

🔴 उन दिनों जर्मनी मित्र राष्ट्रों के साथ पूरी शक्ति झोंककर लड़ रहा था। इंग्लैण्ड के साथ रूस और अमेरिका भी थे। वे बड़ी मार से अचकचाने लगे और हर्जाना देकर पीछा छुड़ाने की बात सोचने लगे। बात इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री चर्चिल के सामने आई, तो उन्होंने त्यौरी बदलकर कहा आप लोग जैसा चाहें सोच या कर सकते हैं; पर इंग्लैण्ड कभी हारने वाला नहीं है। वह आप दोनों के बिना भी अपनी लड़ाई आप लड़ लेगा और जीतकर दिखा देगा। इस प्रचण्ड आत्मविश्वास को देखकर दोनों साथी भी ठिठक गए और लड़ाई छोड़ भागने से रुक गए। डार्विन के कथनानुसार बन्दर की औलाद बताया गया मनुष्य, आज इसी कारण सृष्टि का मुकुटमणि बन चुका है और धरती या समुद्र पर ही नहीं, अन्तरिक्ष पर भी अपना आधिपत्य जमा रहा है। कभी के समर्थ देवता चन्द्रमा को उसने अपने पैरों तले बैठने के लिए विवश कर दिया है।                        

🔵 लकड़ी का लट्ठा पानी में तभी तक डूबा रहता है, जब तक कि उसकी पीठ पर भारी पत्थर बँधा हो। यदि उस वजन को उतार दिया जाए, तो छुटकारा पाते ही नदी की लहरों पर तैरने लगता है और भँवरों को पार करते हुए दनदनाता हुआ आगे बढ़ता है। राख की मोटी परत चढ़ जाने पर जलता हुआ अंगारा भी नगण्य मालूम पड़ता है; पर परत हटते ही वह अपनी जाज्वल्यमान ऊर्जा का परिचय देने लगता है। वस्तुत: मनुष्य अपने सृजेता की तरह ही सामर्थ्यवान है। 

🔴 लकड़ियों को घिसकर आग पैदा कर लेने वाला मनुष्य अपने अन्दर विद्यमान सशक्त प्रतिभा को अपने बलबूते बिना किसी का अहसान लिए प्रकट न कर सके, ऐसी कोई बात नहीं। आवश्यकता केवल प्रबल इच्छा शक्ति एवं उत्कण्ठा की है। उसकी कमी न पड़ने दी जाए, तो मनुष्य अपनी उस क्षमता को प्रकट कर सकता है, जो न तो देवताओं से कम है और न दानवों से। जब वह घिनौने कार्य पर उतरता है, तो प्रेत-पिशाचों से भी भयंकर दीखता है। जब वह अपनी श्रेष्ठता को उभारने, कार्यान्वित करने में जुट जाता है, तो देवता भी उसे नमन करते हैं। मनुष्य ही है, जिसके कलेवर में बार-बार भगवान अवतार धारण करते हैं। मनुष्य ही है, जिसकी अभ्यर्थना पाने के लिए देवता लालायित रहते हैं और वैसा कुछ मिल जाने पर वरदानों से उसे निहाल करते हैं।
          
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सादगी के दो नमूने

🔴 अपने भू० पू० राष्ट्रपति-स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद जी का जीवन सादगी का जीता-जागता उदाहरण कहा जा सकता है। प्रस्तुत घटना सन १९३५ की है। राजेंद्र बाबू अगले होने वाले कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष थे। वे इलाहाबाद स्टेशन पर उतरे। किसी आवश्यक कार्य से आए थे। 'लीडर' अखबार में उन्हें अपना एक वक्तव्य भी देना था। उन दिनों उसके संपादक थे सी० वाई० चिंतामणि। अच्छा परिचय था उनसे राजेंद्र बाबू का। सोचा, क्यों न वक्तव्य स्वयं ही कार्यालय जाकर दे आऐ। सीधे चल पडे़ वह भी पैदल।

🔵 सर्दी के दिन थे। हल्की बूंदाबाँदी हो रही थी। पहुँचते-पहुँचते कपडे़ थोडे गीले हो गए।

🔴 जाकर चपरासी को अपना परिचय पत्र दिया। वह जाकर संपादक महोदय की टेबल पर रख दिया।

🔵 संपादक जी उस समय कुछ लिखने में व्यस्त थे, उसने बीच में बोलना उचित न समझा। बाहर आकर कह दिया कि-साहब अभी व्यस्त हैं। देर लगेगी।

🔴 थोडी देर प्रतीक्षा की, फिर उनकी दृष्टि सामने गई जहाँ कुछ चपरासी एक सिगडी के सहारे हाथ सेक रहे थे, बस फिर क्या था वे भी चले गए और अपने गीले कपडे़ सुखाने लगे।

🔵 थोडी देर बाद जब चिंतामणि जी ने दृष्टि उठाइ काम पर से, तब अनायास ही कार्ड दिखाई दे गया।

🔴 घंटी बजाई और चपरासी को बुलाकर पूछा कार्ड कौन लाया था ?'' चपरासी ने उत्तर दिया, "वह आदमी बाहर खडा है।" वे शीघ्रता से बाहर आए। पर वहाँ कोई न था, फिर चपरासी से पूछा- 'ये सज्जन कहाँ हैं ? तब चपरासी ने उधर की ओर इशारा कर दिया, जहाँ वे अपने गीले कपडे़ सुखा रहे थे। श्री चिंतामणि दौडकर उनके पास गये और क्षमा याचना की।

🔵 पर वहाँ कहाँ कोई बात थी उनके मन में। हँसकर कहने लगे मैंने सोचा इतनी देर में यही काम कर डालूँ। कपडे़ सुखाना भी तो जरूरी थे।

🔴 इसी प्रकार एक बार विश्व-विख्यात वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ श्री आइंस्टीन, बेलजियम की महारानी के निमंत्रण पर उनके यहाँ जा रहे थे, महारानी ने अपने यहाँ के उच्च अधिकारियों को लेने स्टेशन भेजा, कितु उनकी वेशभूषा इतनी साधारण थी कि उनमें से कोई भी उन्हें पहचान न सका। महान् मनीषी कहाँ इस बात की परवाह करते हैं कि लिबास या रहन-सहन के उपकरण भड़कीले तथा आकर्षक हैं या नहीं, बल्कि उन्हें वे अनुपयोगी तथा अनावश्यक ही मानते हैं। ''सादा जीवन-उच्च विचार'' ही उनका जीवन आदर्श होता है।

🔵 अधिकारीगण निराश होकर लौट गए। इधर विज्ञानाचार्य महोदय उतरे और अपना बैग लिए हुए महल के द्वार पर जा पहुँचे। महारानी समझ रही थीं कि वे आए ही नही। इस प्रकार उनके पहुँचने पर उन्होंने बडा खेद प्रगट किया और कहा- "आपको पैदल ही आना पडा। इसका मुझे बहुत ही दुःख है।" किंतु आइंस्टीन महोदय मुस्कराते हुये कहने लगे- 'आप इस जरा-सी बात के लिए दुःख न करें, मुझे चलना बहुत अच्छा लगता है।"

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 93, 94

👉 इस ढोंग से क्या फायदा?

🔵 माथे पर चन्दन पोतने से क्या फायदा? जब कि मन में बुराइयों के ढेर जमा हो रहे हैं। बाहरी बनावट से कुछ काम न सरेगा जबकि दिल मक्कारियों की गठरी बना हुआ है। चेहरे को विशेष आकृति का बनाकर धर्मात्मा नहीं बना जा सकता है। ढोंग करना सज्जनों का काम नहीं, ठगों का व्यापार है। बाहर से उजला और भीतर से मैला मनुष्य उस गधे के तुल्य है जो शेर की खाल ओढ़े फिरता है, पर घरों पर चरता है। धर्मात्मा बनने वाला दुराचारी उस बधिक की तरह है कि जो जाल बिछा कर झाड़ियों के पीछे छिपा रहता है और भोली चिड़ियों को फँसाता है। अपवित्र मन को लेकर तीर्थ में जाने से कुछ लाभ न होगा।

🔴 मन में वासनायें भरी रहे और बाहर से त्याग का आडंबर करें, तो उससे क्या प्रयोजन? ढोंगी आदमी समझता है कि मैं दूसरों को खूब चकमा देता हूँ, परन्तु यथार्थ में वह अपने सिवाय और किसी को नहीं ठग सकता। जो दूसरों की दृष्टि में धर्मात्मा बनता है, पर अपनी दृष्टि में पापी है, वह अन्त समय बहुत पछतावेगा और कहेगा-हाय! मैंने अपने हाथों अपना नाश क्यों किया? जिनका हृदय पवित्र है, उन्हें आडम्बर की क्या जरूरत? अगर तुम्हारे हृदय में त्याग मौजूद है, तो न सिर घुटाने की जरूरत है और न जटा रखने की।

🌹 ऋषि तिरुवल्लुवर
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1942 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1942/July.25

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 March

🔴 संसार में मनुष्य अपने क्षणिक सुख के लिए अनेक प्रकार के दुष्कर्म कर डालता है। उसे यह खबर नहीं होती कि इन दुष्कर्मों का फल हमें अन्त में किस प्रकार भुगतना पड़ेगा। मनुष्य को जो तरह-तरह के कष्ट उठाने पड़ते हैं, उनके लिए किसी अंश तक समाज और देशकाल की परिस्थितियाँ भी उत्तरदायी हो सकती हैं पर अधिकाँशतया वह अपने ही दुष्कर्मों के प्रतिफल भोगता है। किन्तु मनुष्य शरीर दुःख भोगने के लिए नहीं मिला। यह आत्म-कल्याण के लिए मुख्यतः कर्म-साधन है, इसलिए अपनी प्रवृत्ति भी आत्म-कल्याण या सुख प्राप्ति के उद्देश्य की पूर्ति होना चाहिए और इसके लिए बुरे कर्मों से बचना भी आवश्यक हो जाता है।

🔵 मनुष्य-योनि में आकर जिसने जीवन में कोई विशेष कार्य नहीं किया, किसी के कुछ काम नहीं आया, उसने मनुष्य शरीर देने वाले उस परमात्मा को लज्जित कर दिया। अपने में अनन्त शक्ति होने पर भी दीनतापूर्ण जीवन बिताना, दयनीयता को अंगीकार करना अपने साथ घोर अन्याय करना है। मनुष्य जीवन रोने कलपने के लिए नहीं, हँसते मुस्कराते हुए अपना तथा दूसरों का उत्कर्ष करने के लिए है।

🔴 इच्छाओं के त्याग का अर्थ यह कदापि नहीं कि मनुष्य प्रगति, विकास, उत्थान और उन्नति की सारी कामनाएँ छोड़कर निष्क्रिय होकर बैठ जाये। इच्छाओं के त्याग का अर्थ उन इच्छाओं को छोड़ देना है जो मनुष्य के वास्तविक विकास में काम नहीं आतीं, बल्कि उलटे उसे पतन की ओर ही ले जाती हैं। जो वस्तुऐं आत्मोन्नति में उपयोगी नहीं, जो परिस्थितियाँ मनुष्य को भुलाकर अपने तक सीमित कर लेती हैं मनुष्य को उनकी कामना नहीं करनी चाहिये। साथ ही वाँछनीय कामनाओं को इतना महत्व न दिया जाये कि उनकी अपूर्णता शोक बनकर सारे जीवन को ही आक्रान्त कर ले।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 42)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 विचारों की व्यक्ति निर्माण में बड़ी शक्ति होती है। विचारों का प्रभाव कभी व्यर्थ नहीं जाता। विचार परिवर्तन के बल पर असाध्य रोगियों को स्वस्थ तथा मरणान्तक व्यक्तियों को नया जीवन दिया जा सकता है। यदि आपके विचार अपने प्रति ओछे, तुच्छ तथा अवज्ञा पूर्ण हैं तो उन्हें तुरन्त ही बदल दो और उनके स्थान पर ऊंचे उदात्त यथार्थ विचारों का सृजन कर लीजिए। वह विचार-कृषि आपको चिन्ता, निराशा अथवा पराधीनता के अन्धकार से भरे जीवन को हरा-भरा बना देगी। थोड़ा सा अभ्यास करने से यह विचार परिवर्तन सहज में ही लाया जा सकता है। इस प्रकार आत्म-चिंतन करिये और देखिये कि कुछ ही दिन में आप में क्रान्तिकारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगेगा।

🔵 विचार कीजिए—‘‘मैं सच्चिदानन्द परमात्मा का अंश हूं। मेरा उससे अविच्छिन्न सम्बन्ध है। मैं उससे कभी दूर नहीं होता और न वह मुझसे ही दूर रहता है। मैं शुद्ध-बुद्ध और पवित्र आत्मा हूं। मेरे कर्तव्य भी पवित्र तथा कल्याणकारी हैं उन्हें मैं अपने बल पर आत्म-निर्भर रह कर पूरा करूंगा। मुझे किसी दूसरे का सहारा नहीं चाहिए, मैं आत्म-निर्भर, आत्मविश्वासी और प्रबल माना जाता हूं।

🔴 असद् तथा अनुचित विचार अथवा कार्यों से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है और न किसी रोग-दोष से ही मैं आक्रान्त हूं। संसार की सारी विषमतायें क्षणिक हैं जो मनुष्य की दृढ़ता देखने के लिए आती हैं। उनसे विचलित होना कायरता है। धैर्य हमारा धन और साहस हमारा सम्बल है। इन दो के बल पर बढ़ता हुआ मैं बहुत से ऐसे कार्य कर सकता हूं जिससे लोक-मंगल का प्रयोजन बन सके। आदि आदि।’’ 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 20)

🌹 जीवन-साधना एवं ईश-उपासना  

🔵 आस्तिकता या आध्यात्मिकता का क्रियापक्ष भी अपने स्थान पर उचित है। उससे अभीष्ट प्रयोजन के सधने में सुविधा भी रहती है और सरलता भी होती है, पर किसी को यह अनुमान नहीं लगा लेना चाहिये, कि पूजा-कृत्यों की प्रक्रिया पूरी करने भर से आध्यात्मिकता के साथ जुड़ी रहने वाली फलश्रुतियों और विभूतियों की प्राप्ति भी हो जाती है। यह तो संकेत ‘सिम्बल’ मात्र है, जो दिशा-निर्धारण करता है और मील के पत्थर की तरह बताता है कि अपनी दिशाधारा किस ओर होनी चाहिये।        

🔴 साधना का प्रयोजन है- जीवन-साधना अर्थात् अपने साथ कड़ाई और दूसरों के साथ उदारता बरतना। कड़ाई का तात्पर्य है-संयम-अनुशासन का कठोरतापूर्वक परिपालन। इन्द्रिय-संयम अर्थ-संयम और विचार-संयम ही साधना के तीन चरण हैं। इन्हीं को तत्परता के नाम से जाना जाता है। इस प्रयोजन के लिये अपव्यय को कठोरतापूर्वक रोकना पड़ता है और जो समय, श्रम, चिंतन, साधन आदि बचाया जा सकता है, उसे तत्परतापूर्वक रोका जाता है और साथ ही इसका भी ध्यान रखना पड़ता है कि उसका सत्प्रयोजनों में श्रेष्ठतम सदुपयोग किस प्रकार बन पड़े? यदि यह निभ सके तो समझना चाहिये कि वास्तविक संयम-साधना की तपश्चर्या सही दिशा में रीति से चल रही है और उसका सदुपयोग भी उच्चस्तरीय प्रतिफल प्रदान करके रहेगा।        

🔵 पूजा-अर्चा प्रतीक मात्र है, जो बताती है कि वास्तविक उपासक का स्वरूप क्या होना चाहिये और उसके साथ क्या उद्देश्य और क्या उपक्रम जुड़ा रहना चाहिये। देवता के सम्मुख दीपक जलाने का तात्पर्य यहाँ दीपक की तरह जलने और सर्वसाधारण के लिये प्रकाश प्रदान करने की अवधारणा हृदयंगम कराना है। पुष्प चढ़ाने का तात्पर्य यह है कि जीवन क्रम को सर्वांग सुंदर, कोमल व सुशोभित रखने में कोई कमी न रखने दी जाए। अक्षत चढ़ाने का तात्पर्य है कि हमारे आय का एक नियमित अंशदान परमार्थ-प्रयोजन के लिये लगता रहेगा। चंदन-लेपन का तात्पर्य यह है कि संपर्क क्षेत्र में अपनी विशिष्टता सुगंध बनकर अधिक विकसित हो।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 24)

🌹 प्रगति के कदम-प्रतिज्ञाएँ
पुण्य बढ़ाएँ-

🔴 ठीक इसी तरीके से बाप- दादा की मृत्यु हो जाए, घर में किसी की मृत्यु हो जाए, दावत खाई जाए। ये क्या वाहियात है? घर में जिसकी मृत्यु हो गई है तो सहायता की जानी चाहिए, उसकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जाना चाहिए, उसकी हिम्मत बढ़ाई जानी चाहिए। घर में बेचारे के यहाँ दो मन अनाज है, उसको भी खा- पी करके, उसको भी दावत उड़ा करके मूँछों पर ताव दे करके भाग जाना चाहिए। ये जलील रिवाज है और हमारा समाज सब जलील रिवाजों से भरा हुआ पड़ा है। इस तरह के रिवाज जिनकी ओर मैंने आपको इशारा किया था। हमको देखना चाहिए कि हमारी बिरादरी, हमारी कौम और हमारे समाज में क्या- क्या सामाजिक बुराइयाँ हैं? उनमें से कोई न कोई छोड़ी ही जानी चाहिए।       

🔵 इसी तरह से कोई एकाध अच्छाई इसी दीक्षा के समय में सीख लेनी चाहिए। अच्छाइयों में से एक अच्छाई ये है कि हम में से हर आदमी को गायत्री मंत्र का जप करना और भगवान् पर विश्वास करना आना चाहिए। भगवान् की पूजा के साथ भगवान् पर विश्वास बहुत सख्त जरूरी है। बहुत से मनुष्य ऐसे हैं, जो पूजा तो करते हैं, पर भगवान् पर विश्वास बिलकुल नहीं करते हैं। भगवान् पर विश्वास करते, तब उनको पाप करने की इच्छा क्यों होती? भगवान् पर विश्वास कर लिये होते, तो बात- बात में रोते- चिल्लाते, डरते और कमजोर होते क्यों?     

🔴  हानि जरा- सी हो जाती और आपे से बाहर हो जाते हैं, ये क्यों होता? भगवान् पर विश्वास करने वाला ऐसा नहीं कर सकता है। बड़ा धीर, वीर और गंभीर होता है। भगवान् पर विश्वास तो आदमी को होना चाहिए। भगवान् का पुजारी हो, तो वो भी अच्छी बात है। उसको मैं आस्तिक कहता हूँ। आस्तिकता को अपने मन में धारण करने वाली बात हर आदमी को करनी चाहिए। ये अच्छाई दीक्षा के समय ग्रहण की जानी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/f.2

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 81)

🌹 महामानव बनने की विधा, जो हमने सीखी-अपनाई

🔴 समझा जाना चाहिए कि जो वस्तु जितनी महत्त्वपूर्ण है, उसका मूल्य भी उतना ही अधिक होना चाहिए। प्रधानमन्त्री के दरबार का सदस्य बनने के लिए पार्लियामेंट का चुनाव जीतना चाहिए। उपासना का अर्थ है पास बैठना। यह वैसा नहीं है जैसा कि रेलगाड़ी के मुसाफिर एक दूसरे पर चढ़ बैठते हैं। वरन् वैसा है जैसा कि दो घनिष्ठ मित्रों को दो शरीर एक प्राण होकर रहना पड़ता है। सही समीपता ऐसे ही गम्भीर अर्थों में ली जानी चाहिए, समझा जाना चाहिए कि इसमें किसी को किसी के लिए समर्पण करना होगा। चाहे तो भगवान अपने नियम विधान, मर्यादा और अनुशासन छोड़कर किसी भजनानन्दी के पीछे-पीछे नाक में नकेल डालकर फिरें और जो कुछ भला-बुरा वह निर्देश करे उसकी पूर्ति करता रहे। अन्यथा दूसरा उपाय यही है कि भक्त को अपना जीवन भगवान की मर्जी के अनुरूप बनाने के लिए आत्म-समर्पण करना होगा।

🔵 हमें हमारे मार्गदर्शक ने जीवनचर्या को आत्मोत्कर्ष के त्रिविध कार्यक्रमों में नियोजित करने के लिए सर्वप्रथम उपासना का तत्त्वदर्शन और स्वरूप समझाया। कहा-‘‘भगवान तुम्हारी मर्जी पर नहीं नाचेगा। तुम्हें ही भगवान का भक्त बनना और उसके संकेतों पर चलना पड़ेगा। ऐसा कर सकोगे, तो तद्रूप होने का लाभ प्राप्त करोगे।’’

🔴 उदाहरण देते हुए उनने समझाया कि ‘‘ईंधन की हस्ती दो कौड़ी की होती है, पर जब वह अग्नि के  साथ जुड़ जाता है, तो उसमें सारे गुण अग्नि के आ जाते हैं। आग ईंधन नहीं बनती, ईंधन को आग बनना पड़ता है। नाला नदी में मिलकर वैसा ही पवित्र और महान बन जाता है, पर ऐसा नहीं होता कि नदी उलट कर नाले में मिले और वैसी ही गंदी बन जाए। पारस को छूकर लोहा सोना होता है, लोहा पारस नहीं बनता। किसी भक्त की यह आशा कि भगवान उसके इशारे पर नाचने के लिए सहमत हो जाएगा, आत्म-प्रवंचना भर है।

🔵 भक्त को ही भगवान के संकेतों पर कठपुतली की तरह नाचना पड़ता है। भक्त की इच्छाएँ भगवान पूरी नहीं करते। वरन् भगवान की इच्छा पूरी करने के लिए भक्त को आत्म-समर्पण करना पड़ता है। बूँद को समुद्र में घुलना पड़ता है। समुद्र बूँद नहीं बनता। यही है उपासना का एक मात्र तत्त्वदर्शन। जो भगवान के समीप बैठना चाहे, वह उसी का निर्देशन, अनुशासन स्वीकार करें। उसी का अनुयायी, सहयोगी बने।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/upasana

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 82)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 सर्वत्र फैला दु:ख दारिद्र्य, शोक, सन्ताप किस प्रकार समस्त मानव प्राणियों को कितना कष्टकर हो रहा है। पतन और पाप के गर्त में लोग किस शान और तेजी से गिरते- मरते चले जा रहे हैं। यह दयनीय दृश्य देखे, सुने तो अन्तरात्मा रोने लगी। मनुष्य अपने ईश्वरीय अंश- अस्तित्व को क्यों भूल गया ?? उसने अपना स्वरूप और स्तर इतना क्यों गिरा दिया ?? यह प्रश्न निरन्तर मन में उठे पर; उत्तर कुछ न दिया। बुद्धिमानी, चतुरता, समय कुछ भी तो यहाँ कम नहीं है। लोग एक से एक बढ़कर कला- कौशल उपस्थित करते हैं और एक से एक बढ़कर चातुर्य चमत्कार का परिचय देते है; पर इतना क्यों नहीं समझ पाते कि दुष्टता का पल्ला पकड़कर वे जो पाने की आशा करते हैं वह मृग तृष्णा ही बनकर रह जायेगा?          

🔵 केवल पतन और सन्ताप ही हाथ लगेगा। मानवीय बुद्धिमत्ता में यदि एक कड़ी और जुड़ गई होती, समझदारी ने इतना निर्देश किया होता कि ईमान को साबित और सौजन्य को विकसित किए रहना मानवीय गौरव के अनुरूप और प्रगति के लिए आवश्यक है, तो इस संसार की स्थिति कुछ दूसरी ही होती। सभी सुख- शान्ति का जीवन जी रहे होते। किसी को किसी पर अविश्वास सन्देह न करना पड़ता और किसी द्वारा ठगा, सताया न जाता। तब यहाँ दु:ख दारिद्र्य का अता- पता भी न मिलता। सर्वत्र सुख- शान्ति की सुरभि फैली अनुभव होती।

🔴 समझदार मनुष्य इतना नासमझ क्यों? जो पाप का फल दु:ख और नहीं होता। इतिहास और अनुभव का प्रत्येक अंकन अपने गर्भ में यह छिपाये बैठा है कि अनीति अपनाकर, स्वार्थ संकीर्णता में आबद्ध रहकर, हर किसी को पतन और सन्ताप ही हाथ लगा है। उदात्त और निर्मल हुए बिना किसी को भी आदर्शवादी रीति- नीति अपनाये बिना नहीं मिली है। कुटिलता सात पर्दे भेद कर अपनी पोल आप खोलती है। यह हम पग- पग पर देखते हैं, फिर भी न जाने क्यों यही सोचते रहते हैं कि हम संसार की आंखों में धूल झोंक कर अपनी धूर्तता को छिपाये रहेंगे।

🔵 कोई हमारी दुरभि सन्धियों की गन्ध न पा सकेगौर लुक- छिपकर आँख मिचौनी का खेल सदा खेला जाता रहेगा। यह सोचने वाले लोग क्यों भूल जाते हैं कि हजारों आँख से देखने, हजारों कानों से सुनने और हजारों पकड़ से पकड़ने वाला विश्वात्मा किसी की धूर्तता पर पर्दा नहीं पड़ा रहने देता, वस्तु स्थिति प्रकट होकर रहती है और दुष्टता छत पर चढ़कर अपनी कलई आप खोलती और अपनी दुरभि सन्धि आप बखानती है। सनातन सत्य और पुरातन तथ्य लोग समझ सके होते और अशुभ का अवलम्बन करने पर जो दुर्गति होती है उसे अनुभव कर सके होते, तो क्यों सन्मार्ग का राजपथ छोड़कर कंटकाकीर्ण कुमार्ग पर भटकते ?? क्यों रोते- बिलखते इस सुर दुर्लभ मानव जीवन को सड़ी हुई लाश की तरह ढोते, घसीटते?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamare_drash_jivan.3

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...