सोमवार, 20 मार्च 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 82)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 सर्वत्र फैला दु:ख दारिद्र्य, शोक, सन्ताप किस प्रकार समस्त मानव प्राणियों को कितना कष्टकर हो रहा है। पतन और पाप के गर्त में लोग किस शान और तेजी से गिरते- मरते चले जा रहे हैं। यह दयनीय दृश्य देखे, सुने तो अन्तरात्मा रोने लगी। मनुष्य अपने ईश्वरीय अंश- अस्तित्व को क्यों भूल गया ?? उसने अपना स्वरूप और स्तर इतना क्यों गिरा दिया ?? यह प्रश्न निरन्तर मन में उठे पर; उत्तर कुछ न दिया। बुद्धिमानी, चतुरता, समय कुछ भी तो यहाँ कम नहीं है। लोग एक से एक बढ़कर कला- कौशल उपस्थित करते हैं और एक से एक बढ़कर चातुर्य चमत्कार का परिचय देते है; पर इतना क्यों नहीं समझ पाते कि दुष्टता का पल्ला पकड़कर वे जो पाने की आशा करते हैं वह मृग तृष्णा ही बनकर रह जायेगा?          

🔵 केवल पतन और सन्ताप ही हाथ लगेगा। मानवीय बुद्धिमत्ता में यदि एक कड़ी और जुड़ गई होती, समझदारी ने इतना निर्देश किया होता कि ईमान को साबित और सौजन्य को विकसित किए रहना मानवीय गौरव के अनुरूप और प्रगति के लिए आवश्यक है, तो इस संसार की स्थिति कुछ दूसरी ही होती। सभी सुख- शान्ति का जीवन जी रहे होते। किसी को किसी पर अविश्वास सन्देह न करना पड़ता और किसी द्वारा ठगा, सताया न जाता। तब यहाँ दु:ख दारिद्र्य का अता- पता भी न मिलता। सर्वत्र सुख- शान्ति की सुरभि फैली अनुभव होती।

🔴 समझदार मनुष्य इतना नासमझ क्यों? जो पाप का फल दु:ख और नहीं होता। इतिहास और अनुभव का प्रत्येक अंकन अपने गर्भ में यह छिपाये बैठा है कि अनीति अपनाकर, स्वार्थ संकीर्णता में आबद्ध रहकर, हर किसी को पतन और सन्ताप ही हाथ लगा है। उदात्त और निर्मल हुए बिना किसी को भी आदर्शवादी रीति- नीति अपनाये बिना नहीं मिली है। कुटिलता सात पर्दे भेद कर अपनी पोल आप खोलती है। यह हम पग- पग पर देखते हैं, फिर भी न जाने क्यों यही सोचते रहते हैं कि हम संसार की आंखों में धूल झोंक कर अपनी धूर्तता को छिपाये रहेंगे।

🔵 कोई हमारी दुरभि सन्धियों की गन्ध न पा सकेगौर लुक- छिपकर आँख मिचौनी का खेल सदा खेला जाता रहेगा। यह सोचने वाले लोग क्यों भूल जाते हैं कि हजारों आँख से देखने, हजारों कानों से सुनने और हजारों पकड़ से पकड़ने वाला विश्वात्मा किसी की धूर्तता पर पर्दा नहीं पड़ा रहने देता, वस्तु स्थिति प्रकट होकर रहती है और दुष्टता छत पर चढ़कर अपनी कलई आप खोलती और अपनी दुरभि सन्धि आप बखानती है। सनातन सत्य और पुरातन तथ्य लोग समझ सके होते और अशुभ का अवलम्बन करने पर जो दुर्गति होती है उसे अनुभव कर सके होते, तो क्यों सन्मार्ग का राजपथ छोड़कर कंटकाकीर्ण कुमार्ग पर भटकते ?? क्यों रोते- बिलखते इस सुर दुर्लभ मानव जीवन को सड़ी हुई लाश की तरह ढोते, घसीटते?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamare_drash_jivan.3

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