रविवार, 12 अगस्त 2018

👉 पिंजरा निकालना बाकी है

निकाल लाया हूँ एक
पिंजरे से मैं एक परिंदा
परिंदे के तनहा दिल से 
पिंजरा निकालना बाकी है

परिंदे तेरा एक घरोंदा
जिसमें बसता तेरा दिल
हाड़ माँस के पुतले से
तुझको निकालना बाकी है

नाहक पाले रिश्ते नाते
झूठे है यह विष के प्याले
सांसों की इस सरगम से
आठवाँ सुर निकालना बाकी है

रे ! पंछी यह है रैन बसेरा
क्यों समेटा मिटटी का ढेरा
पत्थरों की इस जमघट में
रूह को निकालना बाकी है

अब तो सुध ले ले अपनी
आयेगी सिर्फ तेरी करनी
शख्सियत की नुमाइएश में
अहम् को निकालना बाकी है

छोड़ दे ओ ! नादाँ परिन्दे
इंसानों के ये मोह के पिंजरे
उम्मीदों की पैमाइएश में
यादों को निकालना बाकी है


विचार क्रांति अभियान  शांतिकुंज हरिद्वार 

👉 स्वाध्याय-सन्दोह

🔶 “जो ब्रह्मचारी बनने की कोशिश कर रहा है उसके लिये अनेक बन्धनों (नियमों) की जरूरत है। आम के छोटे पेड़ को सुरक्षित रखने के लिये उसके चारों तरफ बाड़ लगानी पड़ती है। छोटा बच्चा पहले माँ की गोद में सोता है, फिर पालने में और फिर चालन-गाड़ी लेकर चलता है। जब बड़ा होकर खुद चलने लगता है तब सब सहारा छोड़ देता है। ब्रह्मचर्य पर भी यही चीज लागू होती हैं। ब्रह्मचर्य एकादश व्रतों में से एक व्रत बतलाया गया है। इस पर से यह कहा जा सकता है कि ब्रह्मचर्य की मर्यादा या रक्षा करने वाली बाड़ एकादश व्रतों का पालन है। वास्तव में ब्रह्मचर्य मन की स्थिति है। बाहरी आचार या व्यवहार उसकी निशानी है।

🔷 जिस पुरुष के मन में जरा भी विषय-वासना नहीं रही है, वह कभी विकार के वश में नहीं होगा। वह किसी स्त्री को चाहे जिस हालत में देखे, चाहे जिस रूप-रंग में देखे, तो भी उसके मन में विकार उत्पन्न नहीं होगा। इसलिए ब्रह्मचारी को अपनी मर्यादा स्वयं ही बना लेनी चाहिये। उद्देश्य यही है कि हम सच्चे ब्रह्मचर्य को पहिचानें, उसकी कीमत जान लें और ऐसे कीमती ब्रह्मचर्य का पालन करें।”

✍🏻 महात्मा गाँधी
📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 सफल वही होता है जो लक्ष्य का निर्धारण कर उसपर अडिग रहता है!

🔶 एक बार की बात है, एक निःसंतान राजा था, वह बूढा हो चुका था और उसे राज्य के लिए एक योग्य उत्तराधिकारी की चिंता सताने लगी थी। योग्य उत्तराधिकारी के खोज के लिए राजा ने पुरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि अमुक दिन शाम को जो मुझसे मिलने आएगा, उसे मैं अपने राज्य का एक हिस्सा दूंगा। राजा के इस निर्णय से राज्य के प्रधानमंत्री ने रोष जताते हुए राजा से कहा, "महाराज, आपसे मिलने तो बहुत से लोग आएंगे और यदि सभी को उनका भाग देंगे तो राज्य के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। ऐसा अव्यावहारिक काम न करें।" राजा ने प्रधानमंत्री को आश्वस्त करते हुए कहा, ''प्रधानमंत्री जी, आप चिंता न करें, देखते रहें, क्या होता है।' 

🔷 निश्चित दिन जब सबको मिलना था, राजमहल के बगीचे में राजा ने एक विशाल मेले का आयोजन किया। मेले में नाच-गाने और शराब की महफिल जमी थी, खाने के लिए अनेक स्वादिष्ट पदार्थ थे। मेले में कई खेल भी हो रहे थे।

🔶 राजा से मिलने आने वाले कितने ही लोग नाच-गाने में अटक गए, कितने ही सुरा-सुंदरी में, कितने ही आश्चर्यजनक खेलों में मशगूल हो गए तथा कितने ही खाने-पीने, घूमने-फिरने के आनंद में डूब गए। इस तरह समय बीतने लगा। 

🔷 पर इन सभी के बीच एक व्यक्ति ऐसा भी था जिसने किसी चीज की तरफ देखा भी नहीं, क्योंकि उसके मन में निश्चित ध्येय था कि उसे राजा से मिलना ही है। इसलिए वह बगीचा पार करके राजमहल के दरवाजे पर पहुंच गया। पर वहां खुली तलवार लेकर दो चौकीदार खड़े थे। उन्होंने उसे रोका। उनके रोकने को अनदेखा करके और चौकीदारों को धक्का मारकर वह दौड़कर राजमहल में चला गया, क्योंकि वह निश्चित समय पर राजा से मिलना चाहता था। 

🔶 जैसे ही वह अंदर पहुंचा, राजा उसे सामने ही मिल गए और उन्होंने कहा, 'मेरे राज्य में कोई व्यक्ति तो ऐसा मिला जो किसी प्रलोभन में फंसे बिना अपने ध्येय तक पहुंच सका। तुम्हें मैं आधा नहीं पूरा राजपाट दूंगा। तुम मेरे उत्तराधिकारी बनोगे।

🔷 सफल वही होता है जो लक्ष्य का निर्धारण करता है, उसपर अडिग रहता है, रास्ते में आने वाली हर  कठिनाइयों का डटकर सामना करता है और छोटी-छोटी कठिनाईयों को नजरअंदाज कर देता है।

👉 आज का सद्चिंतन 12 August 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 26)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔶 सड़क पर मोटर के पहिए दौड़ते दीखते हैं, पर इंजन का परदा उठाकर देखने पर प्रतीत होगा कि उसके भीतर तेल जलकर ऊर्जा उत्पन्न कर रहा है। उस उत्पादन में भी बैटरी और डायनेमो की अपनी-अपनी भूमिका है। उसी शक्ति से अनेक कलपुर्जे अपने-अपने ढंग से घूमते और मोटर को सड़क पर दौड़ाते रहते हैं। मानवी सत्ता के संबंध में भी यही बात है। उसकी प्रत्यक्ष हलचलें हाथ, पैर, सिर, धड़, आँख, मुँह आदि के माध्यम से कार्य करती दीख पड़ती हैं, पर त्वचा का ढक्कन उठाकर देखने से कुछ और ही प्रतीत होता है।

🔷 हृदय का रक्त संचार, माँस पेशियों का आकुंचन-प्रकुँचन श्वास-प्रश्वास आदि हरकतें भीतरी अवयव करते हैं और उनके घर्षण से ऊर्जा का वह उत्पादन होता है, जिसके माध्यम से शरीर के सभी अंग अपनी-अपनी निर्धारित क्रिया-प्रक्रिया संपन्न करते रहने में समर्थ होते हैं। इन सबके भीतर भी एक गहरी परत है, जो मस्तिष्क के मध्य भाग ब्रह्मरंध्र में, विद्युत प्रवाह के उद्गम स्रोत का काम करती है। इस उद्गम का भी स्वतंत्र कर्तृत्व नहीं है। वह अखिल ब्रह्मांड में संव्याप्त महाऊर्जा से संबंध जोड़कर जितना आवश्यक है, ग्रहण करती रहती है।
  
🔶 अंग-अवयवों की बनावट तो रक्त, माँस अस्थि, मज्जा, वसा आदि से विनिर्मित प्रतीत है, किंतु वस्तुतः इनके बीच अरबों-खरबों जीवकोषों ऊतकों की ऐसी क्रियाशीलता विद्यमान दिखाई देती है, मानो किसी स्वतंत्र विश्व का उद्भव, अभिवर्धन, परिवर्तन उनके बीच हो रहा हो। यों जीवकोष अपने स्थान पर व्यवस्थित रूप से विद्यमान दीखते हैं, पर वे तेजी से अपना काम करते हुए, अपनी सीमित सत्ता को समाप्त कर लेते हैं। साथ ही वे एक और आश्चर्य प्रस्तुत करते हैं कि अपना समानांतर उत्तराधिकारी कोष बनाकर, अपने मरण से पूर्व स्थानापन्न कर देते हैं, ताकि रिक्तता उत्पन्न न होने पाए। मृतक कोष कचरे के रूप में बहिर्गमन छिद्रों द्वारा बाहर निकलते रहते हैं। जीवित कोष अन्न, जल, वायु जैसे पोषक माध्यमों को ग्रहण करने से लेकर पचाने तक में लगे रहते हैं।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 35

👉 Amrit Chintan 12 Aug

🔶 "He has achieved success who has lived well, laughed often, and loved much; Who has enjoyed the trust of pure women, the respect of intelligent men and the love of little children; Who has filled his niche and accomplished his task; Who has never lacked appreciation of Earth's beauty or failed to express it; Who has left the world better than he found it, Whether an improved poppy, a perfect poem, or a rescued soul; Who has always looked for the best in others and given them the best he had; Whose life was an inspiration; Whose memory a benediction."

Bessie Anderson Stanley

👉 अहंकार का तो उन्मूलन ही किया जाय (भाग 1)

🔶 मनुष्य के भीतर की जो प्रवृत्ति अध्यात्म मार्ग में प्रधान रूप से बाधक होती है, वह है “अहंकार”। संसार में हमारे जो तरह-तरह के सम्बन्ध है उनके कारण हम अनेक बन्धनों में बँध जाते है। उनके घात-प्रतिघात से हमारे मन में सदैव द्वन्द्व की भावनायें उत्पन्न होती रहती हैं और उन्हीं के परिणाम स्वरूप हमको हर्ष-शोक सुख-दुःख स्तुति-निन्दा हानि-लाभ आदि के विचार उत्पन्न होकर अस्थिर बनाते रहते है।

🔷 इस प्रकार अहंकार तीन प्रकार का बतलाया गया है- सात्विक, राजसिक और तामसिक। अधिकांश मनुष्यों में राजसिक अहंकार की ही प्रधानता होती है, क्योंकि यह विषय वासना के फल से उत्पन्न होता है। इसी के चक्कर में पड़कर हम दिखावटी धर्म-कर्म के चक्कर में फँस जाते है। यदि हमको ऐसे बन्धन से छुटकारा पाना है तो गीता के “मा कर्मफल हेतुर्भूः” वचन को सदैव स्मरण रखना चाहिये। इसके अनुसार यदि हम अपने समस्त धर्म-कर्म का फल भगवान के चरणों में अर्पित कर देंगे तो हमारा अहंकार स्वयं ही जाता रहेगा।

🔶 तामसिक प्रवृत्ति मानसिक दुर्बलता की उत्पत्ति होती है। इसके प्रभाव से हम सदैव आलसी, सुस्त, अकर्मण्य बने रहते है, हमारा तेज क्षीण हो जाता है, और निराशा की भावना हमारे मानसिक क्षेत्र को ढक लेती है। किसी कार्य के लिये दिल में उत्साह नहीं होता। छोटे-छोटे कामों में भी भय लगता है और यही इच्छा होती है कि हम बिना कुछ उद्योग और परिश्रम के बैठे-बैठे मौज उड़ाते रहें। ऐसे लोगों में किसी उत्तम कार्य के लिये स्फूर्ति नहीं देखी जाती और वे समझते हैं कि हम में ऐसे कार्यों के लिये शक्ति और योग्यता ही नहीं है।

🔷 यह अवस्था बड़ी भयंकर और पतन मार्ग पर ले जाने वाली है। ऐसी ही अवस्था वालों के लिये गीता में “मा ते संगोऽत्सव कर्मणि” और “योगस्थः कुरु कर्माणि” आदि वाक्य लिखे गये हैं। इनका आशय यही है कि अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्य को अपने भीतर कभी अकर्मण्यता की भावना को टिकने नहीं देना चाहिये और योग युक्त होकर कर्म करते रहना चाहिये। अर्थात् प्रत्येक काम को अपना ईश्वर-प्रेरित कर्तव्य समझ कर करे, उससे क्या लाभ और क्या हानि होगी इसकी चिन्ता सर्वथा त्याग दे। केवल ‘संगत्यक्त्वा’ के उपदेश को अपना मूल-मंत्र बनाकर मोह और आसक्ति रहित भाव से कार्य करता चला जाय। भगवान की यही आज्ञा है कि कर्म करो पर उसमें आसक्त मत हो जाओ। जब तुम यह समझ लोगे कि हम जो कुछ कर रहे हैं वह भगवान की प्रेरणा से करते हैं, तो फिर हजारों विघ्न-बाधाओं के सम्मुख आने पर भी तुम घबराओगे नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.8

👉 सुसंस्कारी आत्माएँ चेतें

🔶 अखण्ड ज्योति परिवार के परिजनों में अधिकांश बहुत सुसंस्कारी आत्माएँ हैं। उन्हें प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़ा और परिश्रमपूर्वक एक टोकरी में संग्रह किया गया है। वही हमारा परिवार है। इनसे नव निर्माण की भूमिका संपादन करने की, अग्रिम मोर्चा सँभालने की हमारी आशा अकारण नहीं है। उसके पीछे एक तथ्य है कि उत्कृष्ट आत्माएँ कैसे ही मलीन आवरण में क्यों न फँस जाएँ, समय आने पर वे अपना स्वरूप और कर्त्तव्य समझ लेती हैं और दैवी प्रेरणा एवं संदेश को पहचानकर सामयिक कर्त्तव्यों की पूर्ति में विलंब नहीं करतीं। फायर ब्रिगेड वाले वैसे महीनों पड़े सोते रहें पर जब कहीं आग लगने की सूचना मिलती है, तो उनकी तत्परता देखने को ही मिलती है। अपने परिवार को भी यही सब करना है।

🔷 घंटों अँगड़ाई लेते रहने में वक्त की बरबादी होती है, सोने का समय चला गया। जगना-उठना पड़ेगा ही। फिर व्यर्थ करवटें बदलते रहने और अँगड़ाई मात्र लेते रहने, समय गँवाते रहने से क्या लाभ? जब जग ही गए तो उठ खड़ा होना ही उचित है। जो काम प्रतीक्षा कर रहे हैं उन्हें समय पर निपटा लेने में ही खूबसूरती और प्रशंसा है। रोते-झींकते, देर-सवेर में जब करना ही पड़ेगा, तो आत्मग्लानि और लोकनिंदा का कलंक ओढ़ने की क्या आवश्यकता? असामयिक आलस्य प्रमाद को छोड़ ही क्यों न दिया जाए?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त 1969 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.42