रविवार, 12 अगस्त 2018

👉 सुसंस्कारी आत्माएँ चेतें

🔶 अखण्ड ज्योति परिवार के परिजनों में अधिकांश बहुत सुसंस्कारी आत्माएँ हैं। उन्हें प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़ा और परिश्रमपूर्वक एक टोकरी में संग्रह किया गया है। वही हमारा परिवार है। इनसे नव निर्माण की भूमिका संपादन करने की, अग्रिम मोर्चा सँभालने की हमारी आशा अकारण नहीं है। उसके पीछे एक तथ्य है कि उत्कृष्ट आत्माएँ कैसे ही मलीन आवरण में क्यों न फँस जाएँ, समय आने पर वे अपना स्वरूप और कर्त्तव्य समझ लेती हैं और दैवी प्रेरणा एवं संदेश को पहचानकर सामयिक कर्त्तव्यों की पूर्ति में विलंब नहीं करतीं। फायर ब्रिगेड वाले वैसे महीनों पड़े सोते रहें पर जब कहीं आग लगने की सूचना मिलती है, तो उनकी तत्परता देखने को ही मिलती है। अपने परिवार को भी यही सब करना है।

🔷 घंटों अँगड़ाई लेते रहने में वक्त की बरबादी होती है, सोने का समय चला गया। जगना-उठना पड़ेगा ही। फिर व्यर्थ करवटें बदलते रहने और अँगड़ाई मात्र लेते रहने, समय गँवाते रहने से क्या लाभ? जब जग ही गए तो उठ खड़ा होना ही उचित है। जो काम प्रतीक्षा कर रहे हैं उन्हें समय पर निपटा लेने में ही खूबसूरती और प्रशंसा है। रोते-झींकते, देर-सवेर में जब करना ही पड़ेगा, तो आत्मग्लानि और लोकनिंदा का कलंक ओढ़ने की क्या आवश्यकता? असामयिक आलस्य प्रमाद को छोड़ ही क्यों न दिया जाए?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त 1969 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.42

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 4)

🔶 गाँवों में रहने वाले लोगों को प्रायः लकड़बग्घे, बाघ या भेड़ियों का सामना करना पड़ जाता है। शहरी लोग चिड़िया−घरों में इन जन्तुओं को दे...