गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 2 Feb 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 26) 3 Feb

🌹 व्यावहारिक साधना के चार पक्ष   

🔴 आत्मसमीक्षा के चार मापदंड हैं- १ इन्द्रिय संयम, (२) समय संयम, (३) अर्थ संयम, (४) विचार संयम। देखना चाहिये कि इन चारों में कहीं कोई व्यतिक्रम तो नहीं हो रहा है? जीभ स्वाद के नाम पर अभक्ष्य भक्षण तो नहीं करने लगी? वाणी से असंस्कृत वार्तालाप तो नहीं होता? कामुकता की प्रवृत्ति कहीं कुदृष्टि से तो नहीं उभर रही? असंयम से शरीर और मस्तिष्क खोखला तो नहीं हो रहा? शारीरिक और मानसिक स्वस्थता बनाये रखने के लिये इन्द्रियनिग्रह अमोघ उपाय है।                

🔵 समय संयम का अर्थ है- एक-एक क्षण का सदुपयोग। आलस्य-प्रमाद में, दुर्व्यसनों में दुर्गुणों के कुचक्र में फँसकर समय का एक अंश भी बरबाद न होने पाये। इसकी सुरक्षा और सदुपयोग पर पूरी-पूरी जागरूकता बरती जानी चाहिये। समय ही जीवन है। जिसने समय का सदुपयोग किया समझो कि उसने जीवन का परिपूर्ण लाभ उठा लिया।    

🔴 तीसरा संयम है- अर्थसंयम पैसा ईमानदारी और परिश्रमपूर्वक कमाया जाये। मुफ्तखोरी और बेईमानी का आश्रय न लिया जाये। औसत भारतीय स्तर का जीवन जिया जाये। ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’ की नीति अपनाई जाये। विलास प्रदर्शन की मूर्खता में कुछ भी खर्च न होने दिया जाये। कुरीतियों के नाम पर भी बरबादी न चले। बचत का एक बड़ा अंश परमार्थ प्रयोजन में लगा सकने और पुण्य की पूँजी जमा करने का श्रेय उन्हीं को मिलता है, जो विवेकपूर्वक औचित्य का ध्यान रखते हुए खर्च करते हैं।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दोस्त का जवाब

🔴 बहुत समय पहले की बात है, दो दोस्त बीहड़ इलाकों  से होकर शहर जा रहे थे. गर्मी बहुत अधिक होने के कारण वो बीच-बीच में रुकते और आराम करते. उन्होंने अपने साथ खाने-पीने की भी कुछ चीजें रखी हुई थीं. जब दोपहर में उन्हें भूख लगी तो दोनों ने एक जगह बैठकर खाने का विचार किया।

🔵 खाना खाते – खाते दोनों में किसी बात को लेकर बहस छिड गयी..और धीरे-धीरे बात इतनी बढ़ गयी कि एक दोस्त ने दूसरे को थप्पड़ मार दिया. पर थप्पड़ खाने के बाद भी दूसरा दोस्त चुप रहा और कोई विरोध नहीं किया….बस उसने पेड़ की एक टहनी उठाई और उससे मिटटी पर लिख दिया आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मुझे थप्पड़ मारा।

🔴 थोड़ी देर बाद उन्होंने पुनः यात्रा शुरू की, मन मुटाव होने के कारण वो बिना एक-दूसरे से बात किये आगे बढ़ते जा रहे थे कि तभी थप्पड़ खाए दोस्त के चीखने की आवाज़ आई, वह गलती से दलदल में फँस गया था…दूसरे दोस्त ने तेजी दिखाते हुए उसकी मदद की और उसे दलदल से निकाल दिया।

🔴 इस बार भी वह दोस्त कुछ नहीं बोला उसने बस एक नुकीला पत्थर उठाया और एक विशाल पेड़ के तने पर लिखने लगा आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मेरी जान बचाई।

🔵 उसे ऐसा करते देख दूसरे मित्र से रहा नहीं गया और उसने पूछा, जब मैंने तुम्हे
थप्पड़ मारा तो तुमने मिटटी पर लिखा और जब मैंने तुम्हारी जान बचाई तो तुम पेड़ के तने पर कुरेद -कुरेद कर लिख रहे हो, ऐसा क्यों?

🔵 जब कोई तकलीफ दे तो हमें उसे अन्दर तक नहीं बैठाना चाहिए ताकि क्षमा रुपी हवाएं इस मिटटी की तरह ही उस तकलीफ को हमारे जेहन से बहा ले जाएं, लेकिन जब कोई हमारे लिए कुछ अच्छा करे तो उसे इतनी गहराई से अपने मन में बसा लेने चाहिए कि वो कभी हमारे जेहन से मिट ना सके.” दोस्त का जवाब आया।

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 4)

🔵 किसी मित्र सम्बन्धी अथवा आत्मीयजन ने मानिये जन्म-दिन अथवा किसी अन्य शुभ अवसर पर अपनी योग्यता एवं समाज के अनुसार कोई उपहार दिया अथवा भेजा। कोई भी व्यक्ति इस सम्मान और स्नेह से पुलकित हो उठता और आभार भरा धन्यवाद देते-देते न अघाता। किन्तु दोषदर्शी तो अपने रोग से मजबूर ही रहता है। यद्यपि वह आभार एवं धन्यवाद न प्रकट करने की असभ्यता नहीं करता तथापि और कुछ नहीं उसमें इतना ही शामिल कर देता कि आपने बेकार यह चीज भेजी। यह तो मेरे पास पहले से ही थी और मुझे ऐसा रंग यह डिजाइन पसन्द नहीं है। यह रंग और प्रकार उपहार के रूप में बहुत आम और सस्ते हो गये हैं। इससे अच्छा यह होता कि आप सद्भावना और बधाई के ही दो शब्द दे देते। बात भले ही सही रही हो। किन्तु इस भावना ने, इस दोष-दृष्टि ने उसको स्वयं तो प्रसन्न नहीं ही होने दिया साथ ही अपने मित्र और स्वजन की प्रसन्नता भी छीन ली।

🔴 यही बात नहीं कि दोष-दृष्टा केवल दूसरों में ही बुराई और कमियाँ देखता हो। स्वयं अपने प्रति भी उसका यही अत्याचार रहा करता है। उदाहरण के लिये वह बाजार से अपने लिये कोई वस्तु खरीदने जाती है। पहले तो वह कितनी ही प्रकार की चीजें क्यों न दिखलाई जायें, उसे पसन्द ही नहीं आती, सबमें कोई-न-कोई दोष दिखलाई देता है। वस्तु के निर्दोष होने पर भी वह अपनी और से किसी दोष का आरोपण कर ही लेगा। अपनी इस प्रक्रिया से थक जाने के बाद जब चीज लेकर घर आता है। तब भी उसका पेट अप्रशंसा से भरा नहीं होता। चीज डाली और कहना आरम्भ कर दिया- ‘‘खरीदने को खरीद तो अवश्य लाया लेकिन कुछ पसन्द नहीं आई। यदि पत्नी इस बात को नहीं मानती और चुनाव की प्रशंसा करती है, तो झूठी प्रशंसा का करने का आरोप पाती है। जब तक वह अपनी पसन्द, बाजारदारी, चीज की पहचान के विषय में आलोचना नहीं कर लेता, बुराई नहीं निकाल लेता, अपनी अकल और अनुभव को कोस नहीं लेता चैन नहीं पड़ता। इस प्रकार वह इस प्रसन्नता के छोटे अवसर को भी खिन्नता से कडुआ बना ही लेता है।

🔵 तात्पर्य यह है कि दोष-दर्शी कितने ही सुन्दर स्थान, वस्तु और व्यक्ति के संपर्क में क्यों न आये अपने अवगुण के प्रभाव से उससे मिलने वाले आनन्द से वंचित ही रहता है। निदान इस लम्बे-चौड़े संसार में उसे न तो कहीं आनन्द दीखता है और न किसी वस्तु में सामंजस्य का सुख प्राप्त होता है। उसे हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण अपनी रुचि के साथ असमंजस उत्पन्न करती ही दीखती है। जबकि गुण-ग्राहक हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण में सामंजस्य और सुन्दरता ही खोज निकालता है। यही कारण है कि गुण-ग्राहक सदैव प्रसन्न और दोषान्वेषक सदा खिन्न बना रहता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 23  
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1968/May/v1.23

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 Feb 2017

🔵 अपने उद्धार के लिए नारी को स्वयं भी जागरूक होना पड़ेगा। अपने आपको आत्मा, वह आत्मा जो पुरुषों में भी है समझना होगा। मातृत्व के महान् पद की प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित रखने के लिए उसे सीता, गौरी, मदालसा, देवी, दुर्गा, काली की सी शक्ति, क्षमता और कर्त्तव्य का उत्तरदायित्व ग्रहरण करना होगा। कामिनी, विलास की सामग्री  न बनकर अपने आपको आदर्श, पूजनीय गुणों का आधार बनाना होगा, तभी वह गिरी हुई अवस्था से उठ सकती है।

🔴 नारी का उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। पुरुष से भी अधिक कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। वह गृहिणी है, नियत्री है, अन्नपूर्णा है। नारी में ममतामयी माँ का अस्तित्व निहित है, तो नारी पुरुष की प्रगति, विकास की प्रेरणा स्रोत जाह्नवी है। नारी अनेकों परिवारों का संगम स्थल है। नारी मनुष्य की आदि गुरु है, निर्मात्री है, इसमें कोई संदेह नहीं कि मानव समाज में नारी का बहुत बड़ा स्थान है और नारी की उन्नत अथवा पतित स्थिति पर ही समाज का भी उत्थान-पतन निर्भर करता है।

🔵 शालीनता सादगी में ही निवास करती है। नारी जाति का गौरव सादगी, प्रकृत्त सौन्दर्य और लज्जायुक्त नम्रता में ही है और इसी से वह मानव जीवन में सत् तत्त्वों की प्रेरणा स्रोत देवी बन सकती है, पूज्य बन सकती है। मनुष्य की भावनाओं को पुरोगामी बना सकती है। वस्तुतः नारी का कार्य क्षेत्र घर है। इसी काम को नारियाँ भलीभाँति कर सकती है यह उनकी प्राकृतिक और स्वाभाविक जिम्मेदारी है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 42) 3 Feb

🌹 प्रातः सायं उपासना

🔴 एक घण्टे में गायत्री मन्त्र की प्रायः ग्यारह मालाओं का जप सामान्य गति से पूरा हो जाता है। किन्हीं की गति कम हो सकती है और किन्हीं की ज्यादा भी, पर औसत गति यही मानी जा सकती है। इस प्रकार पन्द्रह माला जपने में लगभग डेढ़ घण्टा समय लगना चाहिए। यह सारा समय प्रातःकाल ही लग सके तो अधिक अच्छा है, अन्यथा इसे प्रातः सायं में दो बार भी पूरा किया जा सकता है। सायंकाल से तात्पर्य सूर्य अस्त होने का समय ही नहीं, उसके बाद में रात को सोते समय भी समझना चाहिए। काम पर लगने से पहले सुबह और काम से निवृत्त होने के बाद रात्रि को ही प्रायः समय मिलता है। यही दोनों समय उपासना के लिए सुविधाजनक हैं। अधिक रात्रि बीत जाने पर मुंह बन्द रखकर मानसिक जप द्वारा प्रातःकाल में बची हुई शेष मालाएं पूर्ण की जा सकती हैं। प्रयत्न यही करना चाहिए अधिकांश जप संख्या प्रातःकाल पूर्ण हो जाए। इसके लिए एक घन्टा सुबह और आधा घन्टा रात्रि में अथवा सवा घन्टा सुबह और पन्द्रह मिनट रात्रि में, इस प्रकार समय निर्धारित किया जा सकता है।

🔵 जप के समय गायत्री माता की छवि का अथवा निराकार साधक सविता देवता का मध्य भाग में ध्यान करे और भावना करे कि उसका दिव्य प्रकाश, स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर में प्रवेश कर उन्हें ज्योतिर्मय बना रहा है। उपासना के समय मन को पूरी तरह इष्ट छवि पर केन्द्रित रखना चाहिए, उसे इधर-उधर भटकने नहीं देना चाहिए और न ही दूसरे विचारों को मनःक्षेत्र में प्रविष्ट होने देना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 6)

🌹 गरीबों द्वारा अमीरों का आडम्बर
🔵 अमीरों के साथ जुड़ा-अपव्यय एक भारी रोग है। इसी के सहारे तो किसी को अमीर होने के भ्रम में डाला जा सकता है। फैशन, जेवर, ठाटबाट, नशेबाजी जैसे दुर्व्यसन तो अमीरी के प्रतीक बन गए हैं। विवाह-शादियों के अवसर पर तो यह अमीरी सिर पर चढ़ बैठती है और आवश्यक साधनों को भी बेच कर उन्हें उसकी फुलझड़ी जलाने के लिए आकुल-व्याकुल कर देती है। दूल्हे और दुल्हन को इस तरह सजाया जाता है मानो वे राजकुमार और राजकुमारी से कम न हों। बरातों और दावतों को देखकर यह कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि यह लोग दैनिक जीवन में रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल से जुटा पाते होंगे। ऐसा लगता है मानों इन्हें कहीं से मुफ्त का खजाना मिल गया हो?

🔴 औसत भारतीय को दिनभर में कुछ घण्टे का ही काम मिलता है। शेष तो वे ज्यों-त्यों मटरगश्ती, आवारागर्दी, निठल्लेबाजी में ही बिताते रहते हैं। यदि इस समय को कठोर श्रम के साथ नियोजित किया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि उसके बदले वे साधन न मिल सकें, जिनके सहारे खुशहाली की परिस्थितियों में रहा जा सकता है। कृषि कार्य में निरत व्यक्ति यदि चाहे, तो अपने प्राय: आधे समय में खालीपन को कुटीर उद्योगों में लगा सकता है और अतिरिक्त आजीविका का कोई सुयोग बिठा सकता है।

🔵 जिन्हें पैसे की आवश्यकता या तंगी नहीं, वे बचत वाले समय को शिक्षा संवर्धन में, गन्दगी के स्थान पर स्वच्छता नियोजित करने में लगा सकते हैं। परिवार के साथ मिल जुलकर उस परिकर को सभ्यजनों जैसा बना सकते हैं। स्वास्थ्य-रक्षा आजीविका अभिवृद्धि, कलाकौशल, शिक्षा-विस्तार जैसे अनेक कार्य हैं, जिनके लिए यदि उत्साह उभरे तो कोई कारण नहीं कि आज की अपेक्षा कल अधिक सम्पन्न, शिक्षित, सभ्य एवं प्रतिभाशाली न बना जा सके। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 39)

🌞 हिमालय में प्रवेश (गोमुख के दर्शन)

🔵 आज माता गंगा के मूल उद्गम को देखने की चिर अभिलाषा पूरी हुई। गंगोत्री तक पहुंचने में जितना कठिन मार्ग मिला था उससे कहीं अधिक दुर्गम यह गंगोत्री से गोमुख तक का अठारह मील का टुकड़ा है। गंगोत्री तक के रास्ते में जो जब टूट-फूट होती है तो सरकारी सड़क विभाग के कर्मचारी ठीक करते रहते हैं। पर इस उपेक्षित मार्ग को जिसमें बहुत कम लोग ही कभी-कभी जाते हैं कौन सुधारे। पर्वतीय मार्गों को हर साल बिगड़ना ही ठहरा यदि एक दो वर्ष उनकी उपेक्षा रहे तो वे काफी जटिल हो जाते हैं। कई जगह तो रास्ते ऐसे टूट गये थे कि वहां से गुजरना जीवन के साथ जुआ खेलने के समान था। एक पैर फिसलने की देर थी कि जीवन का अन्त ही समझना चाहिए।

🔴 जिस हिमस्तूप (ग्लेशियर) से गंगा की छोटी सी धारा निकली है वह नीली रंग की है। गंगा माता का यह उद्गम हिमाच्छादित गिरि श्रृंगों से बहुत ही शोभनीय प्रतीत होता है। धारा का दर्शन एक साधारण से झरने के रूप में होता है। वह है तो पतली सी ही पर वेग बहुत है। कहते हैं कि यह धारा कैलाश से—शिवजी की जटाओं से आती है। कैलाश से गंगोत्री तक का सैकड़ों मील का रास्ता गंगा भीतर ही भीतर पार करती है और उसे करोड़ों टन ग्लेशियर का दबाव सहन करना पड़ता है इसी से धारा इतनी तीव्र निकली है। जो हो, भावुक हृदय के लिए यह धारा ऐसी ही लगती है मानो माता की छाती से दूध की धारा निकली है, उसे पान करके, इसी में निमग्न हो जाने की ऐसी ही हूक उठती है जैसी गंगा लहर के रचयिता जगन्नाथ मिश्र के मन में उठी थी और स्वरचित गंगा लहरी का एक-एक श्लोक का गान करते हुए एक-एक कदम उठाते गंगा और अन्तिम श्लोक गाते हुए भावावेश में माता की गोद में ही विलीन हो गये। कहते हैं कि स्वामी रामतीर्थ भी ऐसे ही भावावेश में गंगा माता की गोद में कूद पड़े थे और जल समाधि ले गये थे।

🔵 अपनी हूक मैंने पान और स्नान से ही शान्त की। रास्ते भर उमंगें और भावनाएं भी गंगा जल की भांति हिलोरें लेती रहीं। अनेक विचार आते और जाते रहे। इस समय एक महत्वपूर्ण विचार मन में आया, उसे लिपि बद्ध करने का लोभ संवरण न कर सका। इसलिए उसे लिख ही रहा हूं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 39)

🌹  गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा

🔴   उनसे तो हमें चट्टियों पर दुकान लगाए हुए पहाड़ी दुकानदार अच्छे लगे। वे भोले और भले थे। आटा, दाल, चावल आदि खरीदने पर वे पकाने के बर्तन बिना किराया लिए, बिना गिने ऐसे ही उठा देते थे, माँगने-जाँचने का कोई धंधा उनका नहीं था। अक्सर चाय बेचते थे। बीड़ी, माचिस, चना, गुड़, सत्तू, आलू जैसी चीजें यात्रियों को उनसे मिल जातीं थीं। यात्री श्रद्धालु तो होते थे, पर गरीब स्तर के थे। उनके काम की चीजें ही दुकानों पर बिकती थीं। कम्बल उसी क्षेत्र के बने हुए किराए पर रात काटने के लिए मिल जाते थे।

🔵 शीत ऋतु और पैदल चलना यह दोनों ही परीक्षाएँ कठिन थीं। फिर उस क्षेत्र में रहने वाले साधु-संन्यासी उन दिनों गरम इलाकों में गुजारे की व्यवस्था करने नीचे उतर आते हैं। जहाँ ठंड अधिक है, वहाँ के ग्रामवासी भी पशु चराने नीचे इलाकों में चले जाते हैं। गाँवों में झोपड़ियों से सन्नाटा रहता है। ऐसी कठिन परिस्थितियों में हमें उत्तरकाशी से नंदन वन तक की यात्रा पैदल पूरी करनी थी। हर दृष्टि से यात्रा बहुत कठिन थी।

🔴 स्थान नितांत एकाकी। ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं, वन्य पशुओं का निर्भीक विचरण, यह सभी बातें काफी कष्टकर थीं। हवा उन दिनों काफी ठंडी चलती थी। सूर्य ऊँचे पहाड़ों की छाया में छिपा रहने के कारण दस बजे के करीब दीखता है और दो बजे के करीब शिखरों के नीचे चला जाता है। शिखरों पर तो धूप दीखती है, पर जमीन पर मध्यम स्तर का अँधेरा। रास्ते में कभी कोई भटका आदमी मिलता। जिन्हें कोई अति आवश्यक काम होता, किसी की मृत्यु हो जाती, तो ही आने-जाने की आवश्यकता पड़ती। हर दृष्टि से वह क्षेत्र अपने लिए सुनसान था।

🔵 सहचर के नाम पर थे, छाती से धड़कने वाला दिल या सोच विचार उठाने वाले सिर में अवस्थित मन। ऐसी दशा में लम्बी यात्रा सम्भव है या असम्भव, यह परीक्षा ली जा रही थी। हृदय ने निश्चय किया कि साँस चलनी है, उतने दिन अवश्य चलेगी। तब तक कोई मारने वाला नहीं। मस्तिष्क कहता, वृक्ष वनस्पतियों में भी तो जीवन है। उन पर पक्षी रहते हैं। पानी में जलचर मौजूद हैं। जंगल में वन्य पशु फिरते हैं। सभी नंगे बदन, सभी एकाकी। जब इतने सारे प्राणी इस क्षेत्र में निवास करते हैं, तो तुम्हारे लिए सब कुछ सुनसान कैसे? अपने को छोटा मत बनाओ। जब ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की बात मानते हो, तब इतने सारे प्राणियों के रहते, तुम अकेले कैसे? मनुष्यों को ही क्यों प्राणी मानते हो? यह जीव-जन्तु क्या तुम्हारे अपने नहीं? फिर सूनापन कैसा?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 91)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 (2) प्रगतिशील जातीय संगठन— यों रूढ़ियों के समर्थक पंच चौधरियों का मान बढ़ाने के लिए अभी भी बहुत-सी जातीय सभाएं बनी हुई हैं। पर उनका स्वरूप और उद्देश्य बारीकी से देखने पर पता चलता है कि एकाध छोटी-मोटी बात सुधार की रखकर अधिकांश में वे रूढ़िवाद का पोषण करती हैं और संकीर्णता, पृथकता एवं जन्म-जाति के बड़प्पन का समर्थन करती हैं। इसीलिए विचारवान् एवं प्रगतिशील लोग इन जातीय संगठनों को अनुपयोगी एवं हानिकारक मानकर उनसे उपेक्षा या घृणा का भाव रखते हैं, जो उचित भी है।

🔵 हमें जातीय संगठनों की आवश्यकता अनुभव हो रही है पर उनका उद्देश्य सर्वथा भिन्न है। हम सामाजिक क्रान्ति का एक महान् मिशन लेकर अग्रसर हो रहे हैं। उसमें विवाहों में होने वाले अपव्यय को रोकना हमारा प्रथम मोर्चा है। इसके लिए पृष्ठभूमि तैयार करनी है। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई प्रगतिशील विचार के लोगों का परस्पर न होना है। चूंकि अभी लोग छोटी-छोटी जातीय इकाइयों में ही विवाह शादी करते हैं, इस दायरे को बढ़ाना, आदर्श विवाहों से भी अधिक कठिन है। इसलिए प्रारम्भ में आदर्श विवाहों को ही हाथ में लिया जाय और विवाहों की जातीय इकाइयों को उतना ही बढ़ाया जाय जितना कि वर्तमान परिस्थितियों में-आरम्भिक प्रयास में-सम्भव है। इसमें उन जातियों के बन्धन ढीले करने तक की बात ही अभी व्यवहारिक हो सकती है। अन्त में हर जाति की प्रगतिशील सभाएं गठित करनी चाहिए। इनका उद्देश्य कुरीतियों का उन्मूलन एवं स्वस्थ परम्पराओं का प्रचलन हो।

🔴 इन सभाओं के सदस्य केवल वे बनाये जांय जो विवेक एवं औचित्य पर आस्था रखते हों। सदस्यता के प्रतिज्ञा पत्र में यह बातें लिखी हुई हों। भले ही आरम्भ में संख्या थोड़ी हो और उसमें ‘‘बड़े लोग’’ भले ही सम्मिलित न हों पर यह ध्यान रखा जाय कि इन संगठनों में रहें वे लोग जो सुधारवाद पर विश्वास करते हों। प्रयत्न करके ऐसे लोग ढूंढ़े और पैदा किये जांय, इसमें देर लगे तो हर्ज नहीं। पर जल्दी से बड़ी सभा बना लेने के मोह में रूढ़िवादियों को उसमें भर लेने से वे अपनी मनमानी चलायेंगे और संगठन का उद्देश्य ही नष्ट कर देंगे।

🔵 यह शुभारम्भ अपने युग-निर्माण परिवार से ही आरम्भ होता है, इसलिए हम लोगों को अपनी-अपनी प्रगतिशील जातीय सभाओं के संगठन की तैयारी में लग जाना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य