गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 26) 3 Feb

🌹 व्यावहारिक साधना के चार पक्ष   

🔴 आत्मसमीक्षा के चार मापदंड हैं- १ इन्द्रिय संयम, (२) समय संयम, (३) अर्थ संयम, (४) विचार संयम। देखना चाहिये कि इन चारों में कहीं कोई व्यतिक्रम तो नहीं हो रहा है? जीभ स्वाद के नाम पर अभक्ष्य भक्षण तो नहीं करने लगी? वाणी से असंस्कृत वार्तालाप तो नहीं होता? कामुकता की प्रवृत्ति कहीं कुदृष्टि से तो नहीं उभर रही? असंयम से शरीर और मस्तिष्क खोखला तो नहीं हो रहा? शारीरिक और मानसिक स्वस्थता बनाये रखने के लिये इन्द्रियनिग्रह अमोघ उपाय है।                

🔵 समय संयम का अर्थ है- एक-एक क्षण का सदुपयोग। आलस्य-प्रमाद में, दुर्व्यसनों में दुर्गुणों के कुचक्र में फँसकर समय का एक अंश भी बरबाद न होने पाये। इसकी सुरक्षा और सदुपयोग पर पूरी-पूरी जागरूकता बरती जानी चाहिये। समय ही जीवन है। जिसने समय का सदुपयोग किया समझो कि उसने जीवन का परिपूर्ण लाभ उठा लिया।    

🔴 तीसरा संयम है- अर्थसंयम पैसा ईमानदारी और परिश्रमपूर्वक कमाया जाये। मुफ्तखोरी और बेईमानी का आश्रय न लिया जाये। औसत भारतीय स्तर का जीवन जिया जाये। ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’ की नीति अपनाई जाये। विलास प्रदर्शन की मूर्खता में कुछ भी खर्च न होने दिया जाये। कुरीतियों के नाम पर भी बरबादी न चले। बचत का एक बड़ा अंश परमार्थ प्रयोजन में लगा सकने और पुण्य की पूँजी जमा करने का श्रेय उन्हीं को मिलता है, जो विवेकपूर्वक औचित्य का ध्यान रखते हुए खर्च करते हैं।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 उपयोगिता की समझ

🔶 एक बादशाह अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था। उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक दार्शनिक भी था। 🔷 कुत्ते ने कभी नौका में ...