गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 91)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 (2) प्रगतिशील जातीय संगठन— यों रूढ़ियों के समर्थक पंच चौधरियों का मान बढ़ाने के लिए अभी भी बहुत-सी जातीय सभाएं बनी हुई हैं। पर उनका स्वरूप और उद्देश्य बारीकी से देखने पर पता चलता है कि एकाध छोटी-मोटी बात सुधार की रखकर अधिकांश में वे रूढ़िवाद का पोषण करती हैं और संकीर्णता, पृथकता एवं जन्म-जाति के बड़प्पन का समर्थन करती हैं। इसीलिए विचारवान् एवं प्रगतिशील लोग इन जातीय संगठनों को अनुपयोगी एवं हानिकारक मानकर उनसे उपेक्षा या घृणा का भाव रखते हैं, जो उचित भी है।

🔵 हमें जातीय संगठनों की आवश्यकता अनुभव हो रही है पर उनका उद्देश्य सर्वथा भिन्न है। हम सामाजिक क्रान्ति का एक महान् मिशन लेकर अग्रसर हो रहे हैं। उसमें विवाहों में होने वाले अपव्यय को रोकना हमारा प्रथम मोर्चा है। इसके लिए पृष्ठभूमि तैयार करनी है। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई प्रगतिशील विचार के लोगों का परस्पर न होना है। चूंकि अभी लोग छोटी-छोटी जातीय इकाइयों में ही विवाह शादी करते हैं, इस दायरे को बढ़ाना, आदर्श विवाहों से भी अधिक कठिन है। इसलिए प्रारम्भ में आदर्श विवाहों को ही हाथ में लिया जाय और विवाहों की जातीय इकाइयों को उतना ही बढ़ाया जाय जितना कि वर्तमान परिस्थितियों में-आरम्भिक प्रयास में-सम्भव है। इसमें उन जातियों के बन्धन ढीले करने तक की बात ही अभी व्यवहारिक हो सकती है। अन्त में हर जाति की प्रगतिशील सभाएं गठित करनी चाहिए। इनका उद्देश्य कुरीतियों का उन्मूलन एवं स्वस्थ परम्पराओं का प्रचलन हो।

🔴 इन सभाओं के सदस्य केवल वे बनाये जांय जो विवेक एवं औचित्य पर आस्था रखते हों। सदस्यता के प्रतिज्ञा पत्र में यह बातें लिखी हुई हों। भले ही आरम्भ में संख्या थोड़ी हो और उसमें ‘‘बड़े लोग’’ भले ही सम्मिलित न हों पर यह ध्यान रखा जाय कि इन संगठनों में रहें वे लोग जो सुधारवाद पर विश्वास करते हों। प्रयत्न करके ऐसे लोग ढूंढ़े और पैदा किये जांय, इसमें देर लगे तो हर्ज नहीं। पर जल्दी से बड़ी सभा बना लेने के मोह में रूढ़िवादियों को उसमें भर लेने से वे अपनी मनमानी चलायेंगे और संगठन का उद्देश्य ही नष्ट कर देंगे।

🔵 यह शुभारम्भ अपने युग-निर्माण परिवार से ही आरम्भ होता है, इसलिए हम लोगों को अपनी-अपनी प्रगतिशील जातीय सभाओं के संगठन की तैयारी में लग जाना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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