गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 39)

🌞 हिमालय में प्रवेश (गोमुख के दर्शन)

🔵 आज माता गंगा के मूल उद्गम को देखने की चिर अभिलाषा पूरी हुई। गंगोत्री तक पहुंचने में जितना कठिन मार्ग मिला था उससे कहीं अधिक दुर्गम यह गंगोत्री से गोमुख तक का अठारह मील का टुकड़ा है। गंगोत्री तक के रास्ते में जो जब टूट-फूट होती है तो सरकारी सड़क विभाग के कर्मचारी ठीक करते रहते हैं। पर इस उपेक्षित मार्ग को जिसमें बहुत कम लोग ही कभी-कभी जाते हैं कौन सुधारे। पर्वतीय मार्गों को हर साल बिगड़ना ही ठहरा यदि एक दो वर्ष उनकी उपेक्षा रहे तो वे काफी जटिल हो जाते हैं। कई जगह तो रास्ते ऐसे टूट गये थे कि वहां से गुजरना जीवन के साथ जुआ खेलने के समान था। एक पैर फिसलने की देर थी कि जीवन का अन्त ही समझना चाहिए।

🔴 जिस हिमस्तूप (ग्लेशियर) से गंगा की छोटी सी धारा निकली है वह नीली रंग की है। गंगा माता का यह उद्गम हिमाच्छादित गिरि श्रृंगों से बहुत ही शोभनीय प्रतीत होता है। धारा का दर्शन एक साधारण से झरने के रूप में होता है। वह है तो पतली सी ही पर वेग बहुत है। कहते हैं कि यह धारा कैलाश से—शिवजी की जटाओं से आती है। कैलाश से गंगोत्री तक का सैकड़ों मील का रास्ता गंगा भीतर ही भीतर पार करती है और उसे करोड़ों टन ग्लेशियर का दबाव सहन करना पड़ता है इसी से धारा इतनी तीव्र निकली है। जो हो, भावुक हृदय के लिए यह धारा ऐसी ही लगती है मानो माता की छाती से दूध की धारा निकली है, उसे पान करके, इसी में निमग्न हो जाने की ऐसी ही हूक उठती है जैसी गंगा लहर के रचयिता जगन्नाथ मिश्र के मन में उठी थी और स्वरचित गंगा लहरी का एक-एक श्लोक का गान करते हुए एक-एक कदम उठाते गंगा और अन्तिम श्लोक गाते हुए भावावेश में माता की गोद में ही विलीन हो गये। कहते हैं कि स्वामी रामतीर्थ भी ऐसे ही भावावेश में गंगा माता की गोद में कूद पड़े थे और जल समाधि ले गये थे।

🔵 अपनी हूक मैंने पान और स्नान से ही शान्त की। रास्ते भर उमंगें और भावनाएं भी गंगा जल की भांति हिलोरें लेती रहीं। अनेक विचार आते और जाते रहे। इस समय एक महत्वपूर्ण विचार मन में आया, उसे लिपि बद्ध करने का लोभ संवरण न कर सका। इसलिए उसे लिख ही रहा हूं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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