शुक्रवार, 10 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 11 March 2017


👉 महाकाल ने सुनी माता की उलाहना

🔴 मुझे शादी के सात वर्षों के बाद चार वर्ष के अंतराल पर दो बेटियाँ बड़े ऑपरेशन से हुई थीं और सामाजिक संरचना को देखते हुए मेरी पत्नी एक पुत्र की चाहत में काफी चिंतित रहती थी; क्योंकि उस समय मान्यता थी कि ऑपरेशन के द्वारा तीन बच्चे ही हो सकते हैं। इसलिये मेरी पत्नी सोच में डूबी रहती थी कि अब तो अंतिम चांस है। पता नहीं मुझे पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी भी या नहीं। उन्हीं दिनों वह गर्भवती हुई; और इसी दौरान उन्होंने नवंबर १९८९ में षष्ठी व्रत रखा था। षष्ठी व्रत के दूसरे दिन रात्रि में स्वप्न देखती हैं कि बिल्कुल सादे लिबास में एक बूढ़ी औरत कह रही हैं कि तुम चिंतित मत होओ, तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।

🔵 एक दो महीने के बाद ही उसे मलेरिया बुखार हो गया। स्थानीय डॉक्टर और हाजीपुर की डॉ० सुचिता चौधरी (स्त्री रोग एवं प्रसूति विशेषज्ञ) ने कहा कि मलेरिया की दवा देने पर गर्भपात होने की प्रबल संभावना है; और अगर ऐसा नहीं होगा तो भी बच्चा विकलांग पैदा होगा। ऐसा सुनते ही मैं पत्नी को लेकर डॉ० सुभद्रा (स्त्री रोग विशेषज्ञ) के यहाँ पटना गया। वहाँ भी वही बात कही गई; परन्तु उन्होंने कहा कि पहले मरीज की जान बचाइए, बाद में बच्चे के लिए प्रयास किया जाएगा। उन्होंने जो दवा दी, उसे हम लोगों ने एक दिन तक उसे नहीं दिया, क्योंकि दवा से होने वाले बच्चे को खतरा है, यह जानने के बाद हमें हिम्मत नहीं हो रही थी कि दवा पिला दूँ। एक दिन तक हमने दवा रोके रखी। मगर रोगी को ठीक होने के लिए दवा तो लेनी ही होगी। दूसरे दिन रात्रि में गुरुजी- माताजी पर ध्यान लगाकर मैंने उसे दवा खिला दी। वह धीरे- धीरे स्वस्थ हो गई।

🔴 समय पूरा होने पर ८ अप्रैल १९९० को पटना की सुप्रसिद्ध चिकित्सक मंजू गीता मिश्रा के यहाँ ऑपरेशन से पुत्र का जन्म हुआ। बच्चा विकलांग तो नहीं हुआ लेकिन बहुत कमजोर था, जिसका वजन मात्र १.६ किलोग्राम ही था। बच्चे को पटना चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (पी एम० सी एच०) के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ० अरुण ठाकुर की देख- रेख में प्रेमतारा नर्सिंग होम में इलाज हेतु भर्ती कराया। उसके नाक के एक छिद्र में ऑक्सीजन का पाइप तथा दूसरे छिद्र में ग्लुकोन- डी देने के लिये पाइप लगा दिया गया। दिन रात देखने वालों का ताँता लगा रहता था। लोग आश्चर्यचकित थे कि इतना छोटा और कमजोर बच्चा जीवित कैसे है।

🔵 चार- पाँच दिन बीतने के बाद बच्चे को कै (उल्टी) हुई और बच्चे का पूरा शरीर नीला पड़ गया। डॉक्टर ने नर्स को सलाह दी कि उल्टी से पूरी गंदगी निकल नहीं पाई है, उसे मशीन से बाहर निकाल दीजिए। वैसे भी अब मेरे वश में नहीं रह गया इस बच्चे को बचाना। इस बच्चे को अब भगवान ही बचा सकते हैं। इतना सुनते ही मेरी बहन बहुत घबरा गई और दौड़ी- दौड़ी अपनी भाभी के पास गई और उन्हें सब कुछ बता दिया। वह अभी नर्सिंग होम में स्वयं ही नाजुक स्थिति में थी। डॉक्टरों ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि उसे किसी प्रकार का सदमा न पहुँचे। बच्चे की स्थिति के बारे में सुनते ही उसने उसी अवस्था में अपने कलेजे में मुक्का मारकर बेड से छलांग लगा दी और गुरु देव को कोसने लगी। वह बोली- हे गुरु देव, जब मुझसे मेरा बच्चा छीन ही लेना था तो बेटा दिया ही क्यों?

🔴 इसके तुरंत बाद बच्चे का शरीर नीला से सामान्य होने लगा और बच्चे में एक विशेष स्फूर्ति पैदा हो गई। इसके बाद वह बच्चा अपने नाक का पाइप बार- बार पकड़कर बाहर निकाल देता था। डॉक्टर का कहना था- बच्चे को कम से कम तीन महीने उस शीशे के बॉक्स में रखना पड़ेगा। बच्चे की स्थिति को देखकर मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि गुरु जी की कृपा से बच्चा अब पूर्ण स्वस्थ हो चुका है। जो बच्चा कुछ ही देर पहले बिल्कुल निस्तेज- निर्जीव पड़ा था वह अपने हाथ से पाइप पकड़कर बाहर निकाल दे- यह अनहोनी गुरु कृपा से ही संभव थी। मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ जिम्मेवारी लेते हुए बच्चे को घर ले आया। डॉक्टर ने कहा था- ऐसा करना खतरे से खाली नहीं होगा। पर मुझे ऐसा लगा कि जबरन नाक में पाइप लगाए रखना ही खतरनाक होगा; इसलिए डॉक्टर के नाराज होने पर भी मैं उसे घर ले आया। आज वह बिल्कुल स्वस्थ है।

🌹 वीरेन्द्र कुमार सिंह वैशाली (बिहार)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/mahakal

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 18)

🌹 परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान  

🔴 वह पौराणिक गाथा स्मरण रखने योग्य है कि सीता हरण के उपरान्त जब रावण को परास्त करने का प्रश्न सामने आया, तो राम के द्वारा भेजा गया निमन्त्रण उन दिनों के राजाओं और सम्बन्धियों तक ने अस्वीकृत कर दिया था, पर सुदृढ़ संकल्पों के अधूरे रहने से तो दिव्य व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगने की स्थिति आती है। वह भी तो अंगीकृत नहीं हो सकती।                 

🔵 ‘जिन खोजा, तिन पाइयाँ’ वाली उक्ति के अनुरूप खोज की गई, तो रीछ-वानरों में से भी ऐसे मनस्वी निकल पड़े, जो आदर्शों के निर्वाह में बड़े-से-बड़ा जोखिम उठाने के लिए तत्परता दिखाने लगे। उनकी एक अच्छी-खासी मण्डली कार्य क्षेत्र में उतरने के लिए कटिबद्ध होकर आगे आ गई। बन्दरों ने लकड़ी-पत्थर एकत्रित किये, रीछों ने इन्जीनियर की भूमिका निभाई और समुद्र पर सेतु बनकर खड़ा हो गया।       

🔴 ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं। प्रतिकूलताएँ हटतीं और अनुकूलताएँ जुटती चली गईं। लङ्का विजय और श्रीराम की अवध-वापसी वाली कथा सर्वविदित है। सीता भी अनेक बन्धनों से छुटकारा पाकर वापस आ गईं। यहाँ दो निष्कर्ष निकलते हैं-एक यह कि राम की प्रतिभा पर विश्वास करके वरिष्ठ वानर भी उत्साह और साहस से भर गए थे। अथवा राम दल के मूर्धन्यों ने सामान्य स्तर के वानरों को भी प्राण-चेतना से ओत-प्रोत कर दिया हो और समर्थ व्यक्तियों की एक अच्छी-खासी मण्डली बन गई हो? दूसरी ओर समर्थ शासनाध्यक्ष भी रावण की असमर्थता और अपनी दुर्बलता को देखते हुए डर गए हों और झंझट में पड़ने से डरकर कन्नी काट गए हों?

🔵 निष्कर्ष यही निकलता है कि परिष्कृत प्रतिभा, दुर्बल सहयोगियों की सहायता से भी बड़े-से-भी बड़े काम सम्पन्न कर लेती है जबकि डरकर समर्थ व्यक्ति भी हाथ-पैर फुला बैठते हैं। राणाप्रताप के सैनिकों में अधिकांश आदिवासियों का ही पिछड़ा समझा जाने वाला समुदाय प्रमुख था। लक्ष्मीबाई रानी ने घर के पिञ्जरे में बन्द रहने वाली महिलाओं को भी प्रोत्साहन देकर युद्ध क्षेत्र में वीर सैनिकों की तरह ला खड़ा किया था। रानी लक्ष्मीबाई ने तो अपने समय के दुर्दान्त दस्यु सागर सिंह को लूट-मार करके भागते समय, केवल अपनी सहेली सुन्दर के सहयोग से बन्दी बनाकर दरबार में खड़ा कर दिया था। उनकी मनस्विता के समक्ष उसका सारा दुस्साहस ढह गया। रानी ने अन्तत: उसे अपना सहयोगी बनाकर उसकी प्रतिभा का उपयोग अपनी सेना की शक्ति बढ़ाने में किया।    

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 यह खटकने वाला त्याग का अभाव

🔴 मेरे कुछ मित्र ढाका से लौट रहे थे। मार्ग में वह स्टीमर जिस पर यात्रा हो रही थी, किसी समुद्री चट्टान से टकरा गया और चूर-चूर होकर डूब गया। यात्रा कर रहे तीनों यात्री संकट में पड गए।

🔵 संयोग से एक नाव पास से गुजरी। डूबने वालों ने नाविक को पुकारा पर उसने कतई ध्यान नहीं दिया। डूबने वाले डूबते जाते थे और सहायता की प्रार्थना भी करते जाते थे। जीवन के प्रति प्यार छटपटाता रहा, पर मछुआरों में से कोई भी उनकी सहायता को तत्पर न हुआ, जबकि वे तीनों को बचा सकते थे। आत्म-त्याग का यह अभाव ही तो आज विश्व भर में अशांति, कलह और विद्वेष का कारण है। कदाचित् मनुष्य-मनुष्य के प्रति उत्सर्ग करना जानता तो कितना अच्छा होता ?

🔴 एक दिन और आया, हम एक खाड़ी में नौका-बिहार कर रहे थे। मछुओं ने मछली पकडने के लिये खूँटे गाड रखे थे। हमारी नाव उनसे टकरा गई और डूबने लगी। मछुओं को पुकार लगाई गई पर उनका ध्यान मछली पकडने में लगा था. हमारी कौन सुनता ?

🔵 हमारे मित्र ने कहा-जो हमें बचायेगा हम उसे सौ रुपया देंगे। फिर क्या था सब दौड़े। हाथों-हाथ बचा लिए गए। मछुओं को हमारे प्रति कोई करुणा न थी, कोई दया न थी। सहानुभूति और सेवा का भाव न था। वे सौ के नोट देखकर प्रसन्न हो रहे थे। उनके जीवन में धन ही सब कुछ था।

🔴 एक दिन हम सागर के तट पर खडे सिंधुराज की लहरों का खेल देख रहे थे। प्रकृति में कितनी संवेदना है कि उसका हर कण इतना प्यारा है कि उसे भुलाओ तो भूलता नहीं। पर उससे भी प्यारा है आहत हृदयों की सेवा का भाव, जिसकी शांति के आगे प्रकृति की शांति, सौंदर्य सब कुछ फीका है।

🔵 ऐसा दिखाई दिया कोई स्त्री सागर में डूब रही है। प्रयत्न करने पर उसे बचाया जा सकता था। हृदय ने कहा उछलो और समुद्र में कूद पडो़ तुम्हारे जीवन से किसी जीवन की रक्षा का सुख क्यों न उठाओ ? पर विवशता थी शरीर अशक्त था, हम तैर
नहीं सकते थे।

🔴 कुछ मछुए खड़े थे। हमने कहा भाई जो उस स्त्री को बचायेगा उसे बीस रुपये देंगे। मछुओं ने बिल्कुल ध्यान न दिया। जो मछलियों को मारते हैं उनकी तड़प देखकर भी दया नहीं करते। जीवों से जिन्हें प्रेम नहीं वह मनुष्य से ही कहाँ प्रेम करने लगे ?

🔵 हमने कहा-सौ रुपये देंगे। तब तो उन्हें सौदे में और भी आकर्षण दिखाई दिया। तब वे दौड़े और स्त्री को पानी से निकाल कर लाए। पैसे से मोह हो तो मनुष्य की आत्मा कितना गिर जाती है इसका अनुमान उस दिन हुआ तब से संसार का यह साधन भी तुच्छ लगता है।

🔴 इसी बीच टाइटेनिक जहाज के डूबने की घटना अखबारों मे पढी़। दो हजार यात्रियों को लेकर यह जहाज अटलांटिक महासागर में जा रहा था। एक रात वह ग्लेशियर से टकरा गया और डूबने लगा। उसमें अधिकांश योरोप और अमेरिका के धनी व्यक्ति थे सबने अपने धन और जीवन की चिंता छोड़ दी और सर्व प्रथम स्त्री और बच्चों को बचाने का प्रयत्न किया। इस प्रयत्न में कई लोग डूब भी गये पर अपनी आत्मा के अंदर उन्होंने कोई कमजोरी नहीं आने दी। अपनी आत्मा के आगे उन्होंने अपने आपको कायर नही होने दिया।

🔵 यह समाचार पढ़ता हूँ, याद करता हूँ तो आँखें छलक उठती हैं। सोचता हूँ वह कौन सा दिन होगा, जब इस तरह का प्यार और आत्म-त्याग का भाव मानवीय अंत करणों को छुयेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 75, 76

👉 इन तीन का ध्यान रखिए। (भाग 1)

🔴 उत्पादन की जड़-इन तीनों को सदैव अपने अधिकार में रखिये-
🌹 अपना क्रोध, अपनी जिह्वा और अपनी वासना।

(1) ये तीनों ही भयंकर उत्पादक की जड़ हैं। क्रोध के आवेश में मनुष्य कत्ल करने तक नहीं रुकता। ऊटपटाँग बक जाता है और बाद में हाथ मल मल कर पछताता है।

(2) जीभ के स्वाद के लालच में भक्ष्य अभक्ष्य का विवेक नष्ट हो जाता है। अनेक व्यक्ति चटपटे मसालों, चाट पकौड़ी और मिठाइयाँ खा खाकर अपनी पाचन शक्ति सदा के लिये नष्ट कर डालते हैं।

(3) सबसे बड़े मूर्ख वे हैं जो अनियंत्रित वासना के शिकार हैं। विषय-वासना के वश में मनुष्य का नैतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पतन तो होता ही है, साथ ही गृहस्थ सुख, स्वास्थ्य और वीर्य नष्ट होता है। समाज ऐसे भोग विलासी पुरुष को घृणा की दृष्टि से अवलोकता है। गुरुजन उसका तिरस्कार करते हैं। ऐसे पापी मदहोश को स्वास्थ्य लक्ष्मी और आरोग्य सदा के लिये त्याग देते हैं। इन तीनों ही शत्रुओं पर पूरा पूरा नियंत्रण रखिये।

🔴 इन तीनों को झिड़को :-

🌹 निर्दयता, घमण्ड और कृतघ्नता

(1) ये मन के मैल हैं। इनसे बुद्धि प्राप्त करने में फंस जाती है। निर्दयी व्यक्ति अविवेकी और अदूरदर्शी होता है। वह दया और सहानुभूति का मर्म नहीं समझता।

(2) घमण्डी हमेशा एक विशेष प्रकार के नशे में मस्त रहता है, धन, बल, बुद्धि में अपने समान किसी को नहीं समझता।

(3) कृतघ्न पुरुष दूसरों के उपकार को शीघ्र ही भूल कर अपने स्वार्थ के वशीभूत रहता है। वह केवल अपना ही लाभ देखता है। वस्तुतः उस अविवेकी का हृदय सदैव मलीन और स्वार्थ-पंक में कलुषित रहता है। दूसरे के किए हुए उपकार को मानने तथा उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने में हमारे आत्मिक गुण-विनम्रता, सहिष्णुता और उदारता प्रकट होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 March

🔴 सेवा करने का अपना महत्व है किन्तु सेवा के स्वरूप का भी महत्व कम नहीं है। कौन सेवा, जनता जनार्दन के माध्यम से, परमात्मा की वास्तविक सेवा है और कौन सी नहीं? वह सेवा जिसमें मनुष्य का कोई स्वार्थ निहित होता है, चाहे वह स्वार्थ स्थूल हो अथवा सूक्ष्म, प्रत्यक्ष हो अथवा परोक्ष, सेवा की उस कोटि में नहीं आती जिसे भगवद्भक्ति कहा जाता है।

🔵 श्रद्धा का अर्थ है आत्म-विश्वास, ईश्वर पर विश्वास। इसके सहारे मनुष्य अभाव में, तंगी में, निर्धनता में, कष्ट में, एकान्त में भी घबड़ाता नहीं। जीवन के अन्धकार में श्रद्धा प्रकाश बन कर मार्गदर्शन करती है और मनुष्य को उस शाश्वत लक्ष्य से विलग नहीं होने देती। आत्मदेव के प्रति, ईश्वर के प्रति जीवन लक्ष्य के प्रति हृदय में कितनी प्रबल जिज्ञासा है, जीवन की इस विशालता को जानना हो तो मनुष्य के अन्तःकरण की श्रद्धा को नापिये। यह वह दैवी मार्ग-दर्शन है जिसे प्राप्त कर साँसारिक बाधाओं का विरोध कर लेना सहज हो जाता है।

🔴 “संसार दुखों का सागर है”-यह उक्ति केवल उन्हीं पर चरितार्थ होती है जो दुखों से भयभीत और प्रत्येक क्षण सुख के लिये लालायित रहते हैं। सुख-सुविधा की अतिशय चाह भी दुख का एक विशेष कारण है। इस निरन्तर परिवर्तनशील और द्वन्द्व प्रधान जगत में जो सदा अपने मनोनुकूल परिस्थितियों की अपेक्षा करता है उसके लिये संसार की लघु से लघु प्रतिकूलता भी एक बड़ा दुःख बन जाती है। हम क्यों चाहते हैं कि हमें केवल शीतल मंद सुगन्ध समीर ही प्राप्त होती रहे, गर्म वायु का कोई झोंका हमारे पास होकर न निकले। ऐसा किस प्रकार सम्भव हो सकता है। जब संसार में दोनों प्रकार की वायु चलती हैं तो क्रम से वे हमारे पास आयेंगी ही। यदि हम छाँह की कामना करते हैं तो धूप सहन ही करनी होगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 34)

🌹 विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं
🔴 चरित्र की रचना संस्कारों के अनुसार होती है और संस्कारों की रचना विचारों के अनुसार। अस्तु आदर्श चरित्र के लिए, आदर्श विचारों को ही ग्रहण करना होगा। पवित्र कल्याणकारी और उत्पादक विचारों को चुन-चुनकर अपने मस्तिष्क में स्थान दीजिये। अकल्याणकर दूषित विचारों को एक क्षण के लिए भी पास मत आने दीजिये। अच्छे विचारों का ही चिन्तन और मनन करिये। अच्छे विचार वालों के संसर्ग करिये। अच्छे विचारों का साहित्य पढ़िये और इस प्रकार हर ओर से अच्छे विचारों से ओत-प्रोत हो जाइये।

🔵  कुछ ही समय में आपके उन शुभ विचारों से आपकी एकात्मक अनुभूति जुड़ जायेगी, उनके चिन्तन-मनन में निरन्तरता आ जायेगी, जिसके फलस्वरूप वे मांगलिक विचार चेतन मस्तिष्क से अवचेतन मस्तिष्क में संस्कार बन-बनकर संचित होने लगेंगे और तब उन्हीं के अनुसार आपका चरित्र निर्मित और आपकी क्रियायें स्वाभाविक रूप से आपसे आप संचालित होने लगेंगी। आप एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति बनकर सारे श्रेयों के अधिकारी बन जायेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 12)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि
🔵 उसे उपहार-मनुहार की टंट-घंट पूरी करके उन लाभों को पाने की प्रतीक्षा की जाने लगती है, जिनके लिये प्रबल पुरुषार्थ और व्यक्ति के उठे हुए स्तर की अपेक्षा की जाती है। समुचित मूल्य न चुकाने पर कोई कीमती वस्तु ऐसे ही तिकड़मबाज़ी के सहारे हाथ कैसे लगे? देखा जाता है कि मनोकामनाओं का पुलिंदा बाँधे फिरने वाले जिस-तिस देवी देवता के पीछे गिड़गिड़ाते फिरने के उपरांत भी खाली हाथ लौटते हैं और विधि-विधान में कोई गलती रहने या पूजा-पाठ को व्यर्थ बताने की नास्तिकों जैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते रहते हैं। आए दिन लाभ मिलते रहने की बात न बनते देखकर उस प्रक्रिया को छोड़ बैठते हैं या जब-तब अनमने मन से लकीर पीट लेते हैं।     

🔴 अच्छा होता अध्यात्म का दर्शन, स्वल्प, उद्देश्य और प्रयोग के संबंध में गहराई में उतरकर जानने का प्रयत्न किया गया होता और पूरा मूल्य देकर असली चीज पाने की मान्यता को बनाया गया होता। तब इस संदर्भ में किसी को कोई शिकायत करने की आवश्यकता न पड़ती। अच्छा होता अध्यात्म का दर्शन, स्वल्प, उद्देश्य और प्रयोग के संबंध में गहराई में उतरकर जानने का प्रयत्न किया गया होता और पूरा मूल्य देकर असली चीज पाने की मान्यता को बनाया गया होता। तब इस संदर्भ में किसी को कोई शिकायत करने की आवश्यकता न पड़ती।  

🔵 कहा जा चुका है कि विश्व के शक्ति-भण्डार में सर्वोपरि आत्मबल है। उसकी तुलना धनबल, शस्त्रबल, सत्ताबल आदि से नहीं हो सकती। वे सभी छोटे और बौने पड़ते हैं। जो कार्य आत्मबल संपन्न कर सके , वे दूसरों से नहीं बन पड़े। पुरुषार्थ का अपना प्रयोजन तो है, पर यदि उसके पीछे आत्मबल का समावेश न हो तो फिर समझना चाहिये कि वह फुलझड़ी की तरह तमाशा मात्र बनकर रह जाएगा। असुरों में से अनेकों ने साधनाबल के सहारे कई प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त कीं, पर वे न तो अधिक समय टिकीं और न अंतत: सुखद परिणाम ही प्रस्तुत कर सकीं।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 16)

🌹 दीक्षा के अंग-उपअंग

🔴 गुरु- दीक्षा के साथ गायत्री मंत्र हमको दिया जाता है और इस ख्याल से दिया जाता है कि इसका जप भी किया जायेगा, ध्यान भी किया जायेगा। जप और ध्यान करने के साथ- साथ में इसके अंदर जो शिक्षण भरा हुआ पड़ा है, जो दिशाएँ भरी हुई पड़ी हैं, उन दिशाओं को भी ध्यान में रखा जायेगा। बस यही गुरुदीक्षा का मतलब है।

🔵 मंत्र दीक्षा- दोनों हाथों के अँगूठे आपस में मिला लिये जाने चाहिए। कंधे और कमर को सीधे रखा जाना चाहिए। अपने अँगूठों के ऊपर निगाह रखी जानी चाहिए और ध्यान किया जाना चाहिए। भगवान् की प्रेरणा और भगवान् का प्रकाश अब हमारे अन्तरंग में आता है। जो आदमी गुरु दीक्षा करायें। मंत्र को स्वयं धीरे- धीरे बोलना चाहिए और जो आदमी बैठे हुए हैं, उनसे दोहराने के लिए कहना चाहिए और यह कहना चाहिए कि आप लोगों को ध्यान सिर्फ अँगूठे पर रखना है और जिस तरीके से कहा जा रहा है, उस तरीके से गायत्री मंत्र कहना चाहिए।

🔴 गुरू- दीक्षा का संस्कार कराने वाले टुकड़े- टुकड़े में गायत्री मंत्र कहें और बाकी लोग जो बैठे हुए हैं, उसको दोहराएँ। ॐ भूर्भुवः  स्वः तत् तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। इतने शब्दों को गुरु- प्रतिनिधि इस तरीके से कहें। उसके बीच में जब रुकने का समय आता है, दूसरे दीक्षा लेने वाले लोग उसको उसी तरीके से दोहराएँ अर्थात् एक टुकड़ा गायत्री मंत्र का दीक्षा संस्कार कराने वाला व्यक्ति कहे और बाकी उसी टुकड़े को उसके बाद के लोग कहें। बस इस तरह से कहने के बाद में जल के छीटे उनके ऊपर लगा दिये जाएँ और यह कहा जाए कि आपके अंदर पाप की जो आग जल रही थी, तृष्णा की जो आग जल रही थी, वासना की जो आग जल रही थी, इन मंत्रों के द्वारा उसको शांत किया जा रहा है।

🔵 पानी के पात्र लेकर के लोग खड़े हो जाएँ और जो व्यक्ति अँगूठे को मिलाए हुए, निगाह लगाये हुए बैठे थे, उन सबके ऊपर जल के छीटे लगाये जाएँ और दीक्षा देने वाला व्यक्ति शांति पाठ करता जाए- ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष œ शान्तिः, पृथिवी शान्तिरापः, शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः, शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः, सर्वœशान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि ॥ इन मंत्रों के साथ पानी के पात्र लिये हुए लोग पानी के छींटे सब पर लगाते जाएँ और दीक्षा लेने वालों को कहें कि आप हाथ खोल लीजिए, आपकी दीक्षा का कृत्य समाप्त हो गया। ये दीक्षा का कृत्य हुआ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 73)

🌹 विचार क्रांति का बीजारोपण पुनः हिमालय आमंत्रण

🔴 ऐसे आयोजन जहाँ-जहाँ भी हुए, बहुत ही सफल रहे, इनके माध्यम से प्रायः एक करोड़ व्यक्तियों ने मिशन की विचारधारा को सुना एवं लाखों व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने अनैतिकताओं, अंध-विश्वासों एवं कुरीतियों के परित्याग की प्रतिज्ञाएँ लीं। इन आयोजनों में से अधिकाँश के बिना दहेज और धूमधाम के साथ विवाह हुए। मथुरा में एक बार और सौ कुण्डीय यज्ञ में 100 आदर्श विवाह कराए गए। तब से ये प्रचलन बराबर चलते आ रहे हैं और हर वर्ष इस प्रकार के आन्दोलन से अनेक व्यक्ति लाभ उठाते रहे हैं।

🔵  सहस्र कुण्डीय यज्ञ से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रसंगों से जुड़े अनेकानेक रहस्यमय घटनाक्रमों का विवरण बताना अभी जनहित में उपयुक्त न होगा। इस काया को छोड़ने के बाद ही वह रहस्योद्घाटन हो, ऐसा प्रतिबन्ध हमारे मार्गदर्शक का है, सो हमने उसे दबी कलम से ही लिखा है। इस महान यज्ञ से हमें प्रत्यक्ष रूप से काफी कुछ मिला। एक बहुत बड़ा संगठन रातों रात गायत्री परिवार के रूप में खड़ा हो गया। युग निर्माण योजना के विचार क्रान्ति अभियान एवं धर्मतंत्र से लोकशिक्षण के रूप में उनकी भावी भूमिका भी बन गई।

🔴 जिन-जिन स्थानों से आए व्यक्तियों ने अपने यहाँ शाखा स्थापित करने के संकल्प लिए, लगभग वहीं दो दशक बाद हमारे प्रज्ञा संस्थान एवं स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित हुए। जिन स्थाई कार्यकर्ताओं ने हमारे मथुरा से आने के बाद प्रेस-प्रकाशन, संगठन-प्रचार का दायित्व अपने कंधों पर लिया, वे इसी महायज्ञ से उभरकर आए थे। सम्प्रति शान्तिकुञ्ज में स्थाई रूप से कार्यरत बहुसंख्य स्वयं सेवकों की पृष्ठभूमि में इस महायज्ञ अथवा इसके बाद देश भर में हुए आयोजनों की प्रमुख भूमिका रही है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/vichar.1

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 74)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू

🔴 पूजा के ६ घंटे, शेष और १८ घण्टों की भरपूर प्रेरणा देते। काम का जो समय रहा उसमें यह लगता रहा कि इष्ट देवता का तेजस् ही अपना मार्गदर्शक है। उनके संकेतों पर ही प्रत्येक क्रिया- कलाप बना और चल रहा है। लालसा और लिप्सा से, तृष्णा और वासना से प्रेरित अपना कोई कार्य हो रहा हो ऐसा कभी लगा ही नहीं। छोटे बालक को माँ जिस तरह उँगली पकड़कर चलाती है, उसी प्रकार दिव्य सत्ता ने मस्तिष्क को पकड़कर ऊँचा सोचने और शरीर को पकड़कर ऊँचा करने के लिए विवश कर दिया।  

🔵 उपासना के अतिरिक्त जाग्रत अवस्था के जितने घण्टे रहे उनमें शारीरिक नित्य कर्मों से लेकर आजीविका, उपार्जन, स्वाध्याय- चिन्तन परिवार व्यवस्था आदि की समस्त क्रियाएँ इस अनुभूति के साथ चलती रहीं मानो परमेश्वर इन सबका नियोजन और संचालन कर रहा हो। रात को सोने के ६ घण्टे ऐसी गहरी नींद में बीतते रहे मानों समाधि लग गई हो और माता के आँचल में अपने को सौंप कर परम शान्ति और सन्तुष्टि की भूमिका आत्मसत्ता से तादात्म्य प्राप्त कर रही हो। सोकर जब उठे तो लगा- नया जीवन, नया उल्लास, नया प्रकाश अग्रिम मार्गदर्शन के लिए पहले से ही पथ प्रदर्शन के लिए पहले से ही पथ प्रदर्शन के लिए सामने खड़ा है। 

🔴 उपासना के अतिरिक्त जाग्रत अवस्था के जितने घण्टे रहे उनमें शारीरिक नित्य कर्मों से लेकर आजीविका, उपार्जन, स्वाध्याय- चिन्तन परिवार व्यवस्था आदि की समस्त क्रियाएँ इस अनुभूति के साथ चलती रहीं मानो परमेश्वर इन सबका नियोजन और संचालन कर रहा हो। रात को सोने के ६ घण्टे ऐसी गहरी नींद में बीतते रहे मानों समाधि लग गई हो और माता के आँचल में अपने को सौंप कर परम शान्ति और सन्तुष्टि की भूमिका आत्मसत्ता से तादात्म्य प्राप्त कर रही हो। सोकर जब उठे तो लगा- नया जीवन, नया उल्लास, नया प्रकाश अग्रिम मार्गदर्शन के लिए पहले से ही पथ प्रदर्शन के लिए पहले से ही पथ प्रदर्शन के लिए सामने खड़ा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.3

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...