शुक्रवार, 10 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 12)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि
🔵 उसे उपहार-मनुहार की टंट-घंट पूरी करके उन लाभों को पाने की प्रतीक्षा की जाने लगती है, जिनके लिये प्रबल पुरुषार्थ और व्यक्ति के उठे हुए स्तर की अपेक्षा की जाती है। समुचित मूल्य न चुकाने पर कोई कीमती वस्तु ऐसे ही तिकड़मबाज़ी के सहारे हाथ कैसे लगे? देखा जाता है कि मनोकामनाओं का पुलिंदा बाँधे फिरने वाले जिस-तिस देवी देवता के पीछे गिड़गिड़ाते फिरने के उपरांत भी खाली हाथ लौटते हैं और विधि-विधान में कोई गलती रहने या पूजा-पाठ को व्यर्थ बताने की नास्तिकों जैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते रहते हैं। आए दिन लाभ मिलते रहने की बात न बनते देखकर उस प्रक्रिया को छोड़ बैठते हैं या जब-तब अनमने मन से लकीर पीट लेते हैं।     

🔴 अच्छा होता अध्यात्म का दर्शन, स्वल्प, उद्देश्य और प्रयोग के संबंध में गहराई में उतरकर जानने का प्रयत्न किया गया होता और पूरा मूल्य देकर असली चीज पाने की मान्यता को बनाया गया होता। तब इस संदर्भ में किसी को कोई शिकायत करने की आवश्यकता न पड़ती। अच्छा होता अध्यात्म का दर्शन, स्वल्प, उद्देश्य और प्रयोग के संबंध में गहराई में उतरकर जानने का प्रयत्न किया गया होता और पूरा मूल्य देकर असली चीज पाने की मान्यता को बनाया गया होता। तब इस संदर्भ में किसी को कोई शिकायत करने की आवश्यकता न पड़ती।  

🔵 कहा जा चुका है कि विश्व के शक्ति-भण्डार में सर्वोपरि आत्मबल है। उसकी तुलना धनबल, शस्त्रबल, सत्ताबल आदि से नहीं हो सकती। वे सभी छोटे और बौने पड़ते हैं। जो कार्य आत्मबल संपन्न कर सके , वे दूसरों से नहीं बन पड़े। पुरुषार्थ का अपना प्रयोजन तो है, पर यदि उसके पीछे आत्मबल का समावेश न हो तो फिर समझना चाहिये कि वह फुलझड़ी की तरह तमाशा मात्र बनकर रह जाएगा। असुरों में से अनेकों ने साधनाबल के सहारे कई प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त कीं, पर वे न तो अधिक समय टिकीं और न अंतत: सुखद परिणाम ही प्रस्तुत कर सकीं।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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