शुक्रवार, 10 मार्च 2017

👉 यह खटकने वाला त्याग का अभाव

🔴 मेरे कुछ मित्र ढाका से लौट रहे थे। मार्ग में वह स्टीमर जिस पर यात्रा हो रही थी, किसी समुद्री चट्टान से टकरा गया और चूर-चूर होकर डूब गया। यात्रा कर रहे तीनों यात्री संकट में पड गए।

🔵 संयोग से एक नाव पास से गुजरी। डूबने वालों ने नाविक को पुकारा पर उसने कतई ध्यान नहीं दिया। डूबने वाले डूबते जाते थे और सहायता की प्रार्थना भी करते जाते थे। जीवन के प्रति प्यार छटपटाता रहा, पर मछुआरों में से कोई भी उनकी सहायता को तत्पर न हुआ, जबकि वे तीनों को बचा सकते थे। आत्म-त्याग का यह अभाव ही तो आज विश्व भर में अशांति, कलह और विद्वेष का कारण है। कदाचित् मनुष्य-मनुष्य के प्रति उत्सर्ग करना जानता तो कितना अच्छा होता ?

🔴 एक दिन और आया, हम एक खाड़ी में नौका-बिहार कर रहे थे। मछुओं ने मछली पकडने के लिये खूँटे गाड रखे थे। हमारी नाव उनसे टकरा गई और डूबने लगी। मछुओं को पुकार लगाई गई पर उनका ध्यान मछली पकडने में लगा था. हमारी कौन सुनता ?

🔵 हमारे मित्र ने कहा-जो हमें बचायेगा हम उसे सौ रुपया देंगे। फिर क्या था सब दौड़े। हाथों-हाथ बचा लिए गए। मछुओं को हमारे प्रति कोई करुणा न थी, कोई दया न थी। सहानुभूति और सेवा का भाव न था। वे सौ के नोट देखकर प्रसन्न हो रहे थे। उनके जीवन में धन ही सब कुछ था।

🔴 एक दिन हम सागर के तट पर खडे सिंधुराज की लहरों का खेल देख रहे थे। प्रकृति में कितनी संवेदना है कि उसका हर कण इतना प्यारा है कि उसे भुलाओ तो भूलता नहीं। पर उससे भी प्यारा है आहत हृदयों की सेवा का भाव, जिसकी शांति के आगे प्रकृति की शांति, सौंदर्य सब कुछ फीका है।

🔵 ऐसा दिखाई दिया कोई स्त्री सागर में डूब रही है। प्रयत्न करने पर उसे बचाया जा सकता था। हृदय ने कहा उछलो और समुद्र में कूद पडो़ तुम्हारे जीवन से किसी जीवन की रक्षा का सुख क्यों न उठाओ ? पर विवशता थी शरीर अशक्त था, हम तैर
नहीं सकते थे।

🔴 कुछ मछुए खड़े थे। हमने कहा भाई जो उस स्त्री को बचायेगा उसे बीस रुपये देंगे। मछुओं ने बिल्कुल ध्यान न दिया। जो मछलियों को मारते हैं उनकी तड़प देखकर भी दया नहीं करते। जीवों से जिन्हें प्रेम नहीं वह मनुष्य से ही कहाँ प्रेम करने लगे ?

🔵 हमने कहा-सौ रुपये देंगे। तब तो उन्हें सौदे में और भी आकर्षण दिखाई दिया। तब वे दौड़े और स्त्री को पानी से निकाल कर लाए। पैसे से मोह हो तो मनुष्य की आत्मा कितना गिर जाती है इसका अनुमान उस दिन हुआ तब से संसार का यह साधन भी तुच्छ लगता है।

🔴 इसी बीच टाइटेनिक जहाज के डूबने की घटना अखबारों मे पढी़। दो हजार यात्रियों को लेकर यह जहाज अटलांटिक महासागर में जा रहा था। एक रात वह ग्लेशियर से टकरा गया और डूबने लगा। उसमें अधिकांश योरोप और अमेरिका के धनी व्यक्ति थे सबने अपने धन और जीवन की चिंता छोड़ दी और सर्व प्रथम स्त्री और बच्चों को बचाने का प्रयत्न किया। इस प्रयत्न में कई लोग डूब भी गये पर अपनी आत्मा के अंदर उन्होंने कोई कमजोरी नहीं आने दी। अपनी आत्मा के आगे उन्होंने अपने आपको कायर नही होने दिया।

🔵 यह समाचार पढ़ता हूँ, याद करता हूँ तो आँखें छलक उठती हैं। सोचता हूँ वह कौन सा दिन होगा, जब इस तरह का प्यार और आत्म-त्याग का भाव मानवीय अंत करणों को छुयेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 75, 76

2 टिप्‍पणियां:

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