शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

👉 एक नास्तिक की भक्ति

हरिराम नामक आदमी शहर के एक छोटी सी गली में रहता था। वह एक मेडिकल दुकान का मालिक था। सारी दवाइयों की उसे अच्छी जानकारी थी, दस साल का अनुभव होने के कारण उसे अच्छी तरह पता था कि कौन सी दवाई कहाँ रखी है। वह इस पेशे को बड़े ही शौक से बहुत ही निष्ठा से करता था।

दिन-ब-दिन उसके दुकान में सदैव भीड़ लगी रहती थी, वह ग्राहकों को वांछित दवाइयों को सावधानी और इत्मीनान होकर देता था। पर उसे भगवान पर कोई भरोसा नहीं था वह एक नास्तिक था, भगवान के नाम से ही वह चिढ़ने लगता था।

घरवाले उसे बहुत समझाते पर वह उनकी एक न सुनता था, खाली वक्त मिलने पर वह अपने दोस्तों के संग मिलकर घर या दुकान में ताश खेलता था। एक दिन उसके दोस्त उसका हालचाल पूछने दुकान में आए और अचानक बहुत जोर से बारिश होने लगी,बारिश की वजह से दुकान में भी कोई नहीं था।

बस फिर क्या, सब दोस्त मिलकर ताश खेलने लगे। तभी एक छोटा लड़का उसके दूकान में दवाई लेने पर्चा लेकर आया। उसका पूरा शरीर भीगा था। हरिराम ताश खेलने में इतना मशगूल था कि बारिश में आए हुए उस लड़के पर उसकी नजर नहीं पड़ी।

ठंड़ से ठिठुरते हुए उस लड़के ने दवाई का पर्चा बढ़ाते हुए कहा- "साहब जी मुझे ये दवाइयाँ चाहिए, मेरी माँ बहुत बीमार है, उनको बचा लीजिए. बाहर और सब दुकानें बारिश की वजह से बंद है। आपके दुकान को देखकर मुझे विश्वास हो गया कि मेरी माँ बच जाएगी। यह दवाई उनके लिए बहुत जरूरी है।

इस बीच लाइट भी चली गई और सब दोस्त जाने लगे। बारिश भी थोड़ा थम चुकी थी, उस लड़के की पुकार सुनकर ताश खेलते-खेलते ही हरिराम ने दवाई के उस पर्चे को हाथ में लिया और दवाई लेने को उठा, ताश के खेल को पूरा न कर पाने के कारण अनमने से अपने अनुभव से अंधेरे में ही दवाई की उस शीशी को झट से निकाल कर उसने लड़के को दे दिया।

उस लड़के ने दवाई का दाम पूछा और उचित दाम देकर बाकी के पैसे भी अपनी जेब में रख लिया। लड़का खुशी-खुशी दवाई की शीशी लेकर चला गया। वह आज दूकान को जल्दी बंद करने की सोच रहा था। थोड़ी देर बाद लाइट आ गई और वह यह देखकर दंग रह गया कि उसने दवाई की शीशी समझकर उस लड़के को दिया था, वह चूहे मारने वाली जहरीली दवा है, जिसे उसके किसी ग्राहक ने थोड़ी ही देर पहले लौटाया था, और ताश खेलने की धुन में उसने अन्य दवाइयों के बीच यह सोच कर रख दिया था कि ताश की बाजी के बाद फिर उसे अपनी जगह वापस रख देगा।

अब उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी दस साल की नेकी पर मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस लड़के बारे में वह सोच कर तड़पने लगा। सोचा यदि यह दवाई उसने अपनी बीमार माँ को देगा, तो वह अवश्य मर जाएगी।

लड़का भी बहुत छोटा होने के कारण उस दवाई को तो पढ़ना भी नहीं जानता होगा। एक पल वह अपनी इस भूल को कोसने लगा और ताश खेलने की अपनी आदत को छोड़ने का निश्चय कर लिया पर यह बात तो बाद के बाद देखा जाएगी।

अब क्या किया जाए? उस लड़के का पता ठिकाना भी तो वह नहीं जानता। कैसे उस बीमार माँ को बचाया जाए? सच कितना विश्वास था उस लड़के की आंखों में। हरिराम को कुछ सूझ नहीं रहा था।

घर जाने की उसकी इच्छा अब ठंडी पड़ गई। दुविधा और बेचैनी उसे घेरे हुए था। घबराहट में वह इधर-उधर देखने लगा। पहली बार उसकी दृष्टि दीवार के उस कोने में पड़ी, जहाँ उसके पिता ने जिद्द करके भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर दुकान के उदघाटन के वक्त लगाई थी, पिता से हुई बहस में एक दिन उन्होंने हरिराम से भगवान को कम से कम एक शक्ति के रूप मानने और पूजने की मिन्नत की थी।

उन्होंने कहा था कि भगवान की भक्ति में बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह व्याप्त है और हमें सदैव अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देता है। हरिराम को यह सारी बात याद आने लगी। आज उसने इस अद्भुत शक्ति को आज़माना चाहा।

उसने कई बार अपने पिता को भगवान की तस्वीर के सामने कर जोड़कर, आंखें बंद करते हुए पूजते देखा था। उसने भी आज पहली बार कमरे के कोने में रखी उस धूल भरे कृष्ण की तस्वीर को देखा और आंखें बंद कर दोनों हाथों को जोड़कर वहीं खड़ा हो गया।

थोड़ी देर बाद वह छोटा लड़का फिर दुकान में आया। हरिराम को पसीने छूटने लगे। वह बहुत अधीर हो उठा। पसीना पोंछते हुए उसने कहा- क्या बात है बेटा तुम्हें क्या चाहिए?

लड़के की आंखों से पानी छलकने लगा। उसने रुकते-रुकते कहा- बाबूजी...बाबूजी माँ को बचाने के लिए मैं दवाई की शीशी लिए भागे जा रहा था, घर के करीब पहुँच भी गया था, बारिश की वजह से ऑंगन में पानी भरा था और मैं फिसल गया। दवाई की शीशी गिर कर टूट गई।

क्या आप मुझे वही दवाई की दूसरी शीशी दे सकते हैं बाबूजी? लड़के ने उदास होकर पूछा। हाँ! हाँ ! क्यों नहीं? हरिराम ने राहत की साँस लेते हुए कहा। लो, यह दवाई! पर उस लड़के ने दवाई की शीशी लेते हुए कहा, पर मेरे पास तो पैसे नहीं है, उस लड़के ने हिचकिचाते हुए बड़े भोलेपन से कहा।

हरिराम को उस बिचारे पर दया आई। कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले जाओ और अपनी माँ को बचाओ। जाओ जल्दी करो, और हाँ अब की बार ज़रा संभल के जाना। लड़का, अच्छा बाबूजी कहता हुआ खुशी से चल पड़ा।

अब हरिराम की जान में जान आई। भगवान को धन्यवाद देता हुआ अपने हाथों से उस धूल भरे तस्वीर को लेकर अपनी धोती से पोंछने लगा और अपने सीने से लगा लिया।
अपने भीतर हुए इस परिवर्तन को वह पहले अपने घरवालों को सुनाना चाहता था।

जल्दी से दुकान बंद करके वह घर को रवाना हुआ।
उसकी नास्तिकता की घोर अंधेरी रात भी अब बीत गई थी और अगले दिन की नई सुबह एक नए हरिराम की प्रतीक्षा कर रही थी।

👉 आज का सद्चिंतन 30 November 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 November 2018


👉 On The Karma-Yoga of Gita

Every human being, each one of us, is born in human form to play a specific role, transact some specific duty. This duty and one’s ability to fulfill it depends upon one’s intrinsic character since birth. Honest efforts to do the karmas towards these duties are what could be termed as the gist of Karma Yoga. It was essentially this duty that Arjun was reminded by Lord Krishna in the holy Bhagvad Gita. Lord Krishna made him aware of the majestic purpose for which Arjun was born on the earth. God has given us the freedom of karma and hence of creating our own future destiny; but we can’t escape transacting the destined duties.

God lives within every living being and triggers the direction of one’s life as per the accumulated effects of one’s past karmas. The molecular or cellular components or the RBCs in our blood are bound to be at the assigned positions and be engaged in specific functions as per their biological nature. They are the parts of our body and hence should be governed by us. But we can’t change their natural properties in any case. Thus, they are independent too… This is how we are also independent in God’s creation.

We have the freedom in choosing our (new) karma despite having to live as per certain destined circumstances, but the results of these would be according to our intentions, aim and nature of our karma as per the absolute law of the Supreme Creator. That is why God says – “Karmanyeva Adhikarste, Ma Phalesu Kadachan”. Those who understand and follow it are karma-yogis. Those who do not, and always expect desired outputs in return of their actions, are, on the contrary, often found complaining their destiny or the world and remain desperate and dismayed most of the time…

Akhand Jyoti, July 1940

👉 विनम्रता गुण

विनम्रता आपके आंतरिक प्रेम की शक्ति से आती है। दूसरों को सहयोग व सहायता का भाव ही आपको विनम्र बनाता है। यह कहना गलत है कि यदि आप विनम्र बनेंगे तो दूसरे आपका अनुचित लाभ उठाएँगे। जबकि यथार्थ स्वरूप में विनम्रता आपमें गज़ब का धैर्य पैदा करती है। आपमे सोचने समझने की क्षमता का विकास करती है। विनम्र व्यक्तित्व का एक प्रचंड आभामण्डल होता है। धूर्तो के मनोबल उस आभा से निस्तेज हो स्वयं परास्त हो जाते है। उल्टे जो विमम्र नहीं होते वे आसानी से धूर्तों के प्रभाव में आ जाते है क्योंकि धूर्त को तो अहंकारी का मात्र चापलूसी से अहं सहलाना भर होता है। बस चापलूसी से अहंकार प्रभावित हो जाता है। किन्तु जहाँ विनम्रता होती है वहाँ तो व्यक्ति को सत्य की अथाह शक्ति प्राप्त होती है। सत्य की शक्ति, मनोबल प्रदान करती है।

विनम्रता के प्रति पूर्ण समर्पण युक्त आस्था जरूरी है। मात्र दिखावे की ओढी हुई विनम्रता, अक्सर असफ़ल ही होती है। सोचा जाता है-‘पहले विन्रमता से निवेदन करूंगा यदि काम न हुआ तो भृकुटि टेढी करूंगा’ यह चतुरता विनम्रता के प्रति अनास्था है, छिपा हुआ अहं भी है। कार्य पूर्व ही अविश्वास व अहं का मिश्रण असफलता ही न्योतता है। सम्यक् विनम्र व्यक्ति, विनम्रता को झुकने के भावार्थ में नहीं लेता। सच्चाई उसका पथप्रदर्शन करती है। निश्छलता उसे दृढ व्यक्तित्व प्रदान करती है।

अहंकार सदैव आपसे दूसरों की आलोचना करवाता है। वह आपको आलोचना-प्रतिआलोचना के एक प्रतिशोध जाल में फंसाता है। अहंकार आपकी बुद्धि को कुंठित कर देता है। आपके जिम्मेदार व्यक्तित्व को संदेहयुक्त बना देता है। अहंकारी दूसरों की मुश्किलों के लिए उन्हें ही जिम्मेवार कहता है और उनकी गलतियों पर हंसता है। जबकि अपनी मुश्किलो के लिए सदैव दूसरों को जवाबदार ठहराता है। और लोगों से द्वेष रखता है।

विनम्रता हृदय को विशाल, स्वच्छ और ईमानदार बनाती है। यह आपको सहज सम्बंध स्थापित करने के योग्य बनाती है। विनम्रता न केवल दूसरों का दिल जीतने में कामयाब होती है अपितु आपको अपना ही दिल जीतने के योग्य बना देती है। जो आपके आत्म-गौरव और आत्म-बल में उर्ज़ा का अनवरत संचार करती है। आपकी भावनाओं के द्वन्द समाप्त हो जाते है। साथ ही व्याकुलता और कठिनाइयां स्वतः दूर होती चली जाती है। एक मात्र विनम्रता से ही सन्तुष्टि, प्रेम और सकारात्मकता आपके व्यक्तित्व के स्थायी गुण बन जाते है।

👉 गीता का कर्मयोग

प्रत्येक व्यक्ति संसार में किसी न किसी विशेष उद्देश्य से आता है और उसका यह एक जन्मजात स्वभाव भी होता है। वह उस विशेष उद्देश्य को पूरा करते हुए स्वभाव के अनुसार कर्म करने में समर्थ होता है। इसके विपरीत जाने के लिए वह स्वतंत्र नहीं। उदाहरण के रूप में अर्जुन को लीजिए, पृथ्वी के भार को दूर करने के विशेष उद्देश्य से उसका जन्म हुआ था। अतएव इस कार्य में वह परतंत्र हुआ। उसे यह कार्य करना ही होगा। ईश्वर समस्त प्राणियों के हृदय में रहता हुआ उन्हें घुमाता रहता है।

हमारे शरीर के भीतर जितने रक्त के कण हैं, वे जिस स्थान पर हैं, वहीं रहने के लिए विवश हैं। कहा जा सकता है कि हमारी शक्ति उनके भीतर है और हम उनको संचालित करते हैं, परंतु वे अपने स्थान पर रहते हुए अपनी चेष्टाओं में स्वतंत्र हैं। ऐसे ही ईश्वर द्वारा नियुक्त स्थान पर रहते हुए, संसार में अपने आने के विशेष उद्देश्य को पूर्ण करते हुए मनुष्य अपनी दूसरी चेष्टाओं में स्वतंत्र है।

यही है मनुष्य का कर्म-स्वातंत्र्य। इसीलिए भगवान् ने `कर्मण्येवाधिकारस्ते’ कहा है, केवल कर्म में अधिकार है, स्वभाव परिवर्तन या ईश्वर के दिए स्थान-परिवर्तन में नहीं। मा फलेषु कदाचन् – फल में तेरा अधिकार कभी नहीं है। अत: कर्म का यह फल होगा ही या फल होना चाहिए, ऐसा सोचकर कर्म करने वाले सर्वदा दु:ख पाते हैं।

अखण्ड ज्योति-जुलाई 1940

गुरुवार, 29 नवंबर 2018

👉 जीवन में सफलता चाहते हैं तो माता-पिता का आदर करो

🔷 माता-पिता ने तुम्हारे पालन-पोषण में कितने कष्ट सहे हैं! भूलकर भी कभी अपने माता-पिता का तिरस्कार नहीं करना। वे तुम्हारे लिए आदरणीय हैं। उनका मान-सम्मान करना तुम्हारा कर्तव्य है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवता कहा गया है: मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। भगवान गणेश माता-पिता की परिक्रमा करके ही प्रथम पूज्य हो गये।

🔶 श्रवण कुमार ने माता-पिता की सेवा में अपने कष्टों की जरा भी परवाह न की और अंत में सेवा करते हुए प्राण त्याग दिये।देवव्रत भीष्म ने पिता की खुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया और विश्वप्रसिद्ध हो गये।

🔷 एक पिता अपने छोटे-से पुत्र को गोद में लिये बैठा था। एक कौआ सामने छज्जे पर बैठ गया। पुत्र ने पूछा: ‘‘पापा! यह क्या है?’’ पिता ने बताया: ‘‘कौआ है।’’ पुत्र ने फिर पूछा: ‘‘यह क्या है?’’ पिता ने कहा: ‘‘कौआ है। ’’पुत्र बार-बार पूछता: ‘‘पापा! यह क्या है? ’’पिता स्नेह से बार-बार कहता: ‘‘बेटा! कौआ है कौआ! ’’कई वर्षों के बाद पिता बूढ़ा हो गया। एक दिन पिता चटाई पर बैठा था। घर में कोई उसके पुत्र से मिलने आया। पिता ने पूछा: ‘‘कौन आया है? ’’पुत्र ने नाम बता दिया। थोड़ी देर में कोई और आया तो पिता ने फिर पूछा। पुत्र ने झल्लाकर कहा: ‘‘आप चुपचाप पड़े क्यों नहीं रहते! आपको कुछ करना-धरना तो है नहीं, ‘कौन आया-कौन गया’ दिन भर यह टाँय-टाँय क्यों लगाये रहते हैं?’’

🔶 पिता ने लम्बी सांस खींची, हाथ से सिर पकड़ा। बड़े दुःख भरे स्वर में धीरे-धीरे कहने लगा: ‘‘मेरे एक बार पूछने पर तुम कितना क्रोध करते हो और तुम दसों बार एक ही बात पूछते थे कि यह क्या है? मैंने कभी तुम्हें झिड़का नहीं। मैं बार-बार तुम्हें बताता: बेटा! कौआ है।’’

🔷 माता-पिता ने तुम्हारे पालन-पोषण में कितने कष्ट सहे हैं! कितनी रातें मां ने तुम्हारे लिए गीले में सोकर गुजारी हैं, तुम्हारे जन्म से लेकर अब तक और भी कितने कष्ट तुम्हारे लिए सहन किये हैं, तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। कितने-कितने कष्ट सहकर तुमको बड़ा किया और अब तुमको वृद्ध माता-पिता को प्यार से दो शब्द कहने में कठिनाई लगती है!

🔶 पिता को ‘पिता’ कहने में भी शर्म आती है! अभी कुछ वर्ष पहले की बात है - इलाहाबाद में रहकर एक किसान का बेटा वकालत की पढ़ाई कर रहा था। बेटे को शुद्ध घी, चीज-वस्तु मिले,बेटा स्वस्थ रहे इसलिए पिता घी, गुड़, दाल-चावल आदि सीधा-सामान घर से दे जाते थे। एक बार बेटा अपने दोस्तों के साथ चाय-ब्रेड का नाश्ता कर रहा था। इतने में वह किसान पहुंचा। धोती फटी हुई, चमड़े के जूते, हाथ में डंडा,कमर झुकी हुई... आकर उसने गठरी उतारी।

🔷 बेटे को हुआ, ‘बूढ़ा आ गया है, कहीं मेरी इज्जत न चली जाय!’ इतने में उसके मित्रों ने पूछा: ‘‘यह बूढ़ा कौन है?’’ लड़के ने कहा :यह तो मेरा नौकर है।
लड़के ने धीरे से कहा किंतु पिता ने सुन लिया। वृद्ध किसान ने कहा: ‘‘भाई! मैं नौकर तो जरूर हूँ लेकिन इसका नौकर नहीं हूँ, इसकी मां का नौकर हूँ। इसीलिए यह सामान उठाकर लाया हूँ।’’

🔶 यह अंग्रेजी पढ़ाई का फल है कि अपने पिता को मित्रों के सामने ‘पिता’ कहने में शर्म आ रही है, संकोच हो रहा है! ऐसी अंग्रेजी पढ़ाई और आडम्बर की ऐसी-की-तैसी कर दो, जो तुम्हें तुम्हारी संस्कृति से दूर ले जाय!

🔷 पिता तो आखिर पिता ही होता है, चाहे किसी भी हालत में हो। प्रह्लाद को कष्ट देनेवाले दैत्य हिरण्यकशिपु को भी प्रह्लाद कहता है: ‘पिताश्री!’ और तुम्हारे लिए तनतोड़ मेहनत करके तुम्हारा पालन-पोषण करनेवाले पिता को नौकर बताने में तुम्हें शर्म नहीं आती!

🔶 माता-पिता व गुरुजनों की सेवा करने वाला और उनका आदर करनेवाला स्वयं चिर आदरणीय बन जाता है। जो बच्चे अपने माता-पिता का आदर-सम्मान नहीं करते, वे जीवन में अपने लक्ष्य को कभी प्राप्त नहीं कर सकते।

👉 आज का सद्चिंतन 29 November 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 November 2018

👉 "Avoid Wailing Over Circumstances

🔷 Instead of making big plans, the utilization of available tools and working on whatever small tasks are on our hands, can provide a sound footing for progress. It is far better to plunge into work with minimum available resources, rather than waiting for comfortable situation and abundance of instruments. For any task, small or big, success does not depend on tools and resources, but untiring efforts, perseverance and honesty are the roots for success.

🔶 If we see, all noble rich people of the world have risen from a very ordinary situation to the amazing level. Situations were always unfavorable and tools were limited, but with their sincere efforts and right attitude, they reached the pinnacle of success. Had they kept wailing over circumstances, they would have been sitting idle even today, pampering the mind in imagination of illusive riches.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Aacharya
📖 Not a Big-Shot, Be Super-Human, Page 13

👉 मन निर्मल तो दु:ख काहे को होय

🔷 इस जगत में व्याप्त हर प्राणी अपने आपको सुखी रखने का प्रयास करते हैं, लेकिन प्रयास व्यर्थ हो जाता है। जब तक हम अपने चंचल मन को वश में नहीं कर लेते तब तक हम सुख की अनुभूति नहीं प्राप्त कर सकते। सुख प्राय: दो तरह के होते हैं, दिव्यानुभूति सुख और आत्मिक सुख। आत्मिक सुख को हम भौतिक सुख के सन्निकट रख सकते हैं। दिव्यानुभूति सुख के लिए इस सांसारिक जगत के मोह से ऊपर उठना होता है, लेकिन भौतिक सुख के लिए मन का संतुलित होना आवश्यक है। खुशी सुखी मन का संवाहक होती है। एक संतुलित मन हमेशा प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है, जो सुख का कारण बनता है। अपने आपको खुश रखने की कोशिश करने वाला इंसान अपने कर्तव्यों और दायित्वों से बंधा होता है। लेकिन, जो इंसान अपने मन को वश में नहीं रखता, वह परिस्थिति में विचलित हो जाता है और विचलित मन खुशी की अनुभूति नहीं कर सकता।

🔶 मन को संतुलित रखने के लिए जीवन में नित्य अभ्यास की जरूरत होती है। अपने मन को कभी-कभी हम इतना भारी कर लेते हैं कि घुटन-सी होने लगती है। प्राकृतिक गुणों के हिसाब से हल्की चीजें सदैव ऊपर होती हैं। जब मन हल्का होने लगता है, तब वह धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ जाता है और मन स्वच्छ एवं निर्मल प्रतीत होने लगता है। निर्मल मन वाला व्यक्ति हर चीज की बारीकियों को इसी तरह समझने लगता है। उसके बाद वह संसार के द्वंद्व से मुक्त हो जाता है और सुख का आभास करने लगता है।

🔷 कभी-कभी बहुत आगे की सोच हमें भयाक्रांत कर देती है। इस क्षणभंगुर दुनिया में जो भी घटता है वह परमात्मा की इच्छानुरूप घटित होता है। इसलिए स्वयं को निमित्तमात्र समझकर अपने कर्त्तव्य-पथ पर चलकर इस सुख का अनुभव कर सकते हैं। भविष्य हमारे हाथ में नहीं होता। रात्रिकाल के बाद सुबह का सूर्य देखना भी परमात्मा के निर्देशानुसार होता है। प्रलय, तूफान, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं और आतंकवादी हमलों जैसी मानवकृत घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि किसी भी पल कुछ भी हो सकता है। मनुष्य चाहे जो करे, लेकिन इन घटनाओं के सामने नि:सहाय हो जाता है। इसलिए सिर्फ अपने कत्र्तव्यों का निर्वाह करते रहना चाहिए।

🔶 अपने जीवन को सुखद बनाने के लिए सबसे पहले अपने आस-पड़ोस के लोगों को सुखी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। आचरण से ही वातावरण का निर्माण होता है। दूसरों को खुशी देकर हम अपनी खुशी को भी कई गुणा बढ़ा लेते हैं। सांसारिक लिप्ता में लिप्त व्यक्तियों के लिए दूसरों की खुशी उसके स्वयं के दुखी होने का कारण बन जाती है। एक  सुंदर कोठी में रहने वाली और स्वयं एक अच्छी नौकरी करने वाली महिला, एक कामवाली को प्रतिदिन ध्यान से देखा करती थी। उस महिला को प्रतिदिन उसका पति छोडऩे के लिए और काम समाप्त होने के बाद उसे लेने के लिए आता था। इसे देखकर कोठी वाली महिला बहुत व्यथित रहती थी। उसे इस बात का दु:ख था कि एक काम करने वाली महिला भी उससे अधिक खुश है। वह सोचती रहती थी इतना धन होने के बावजूद उसके पति के पास उसके लिए समय नहीं है। इस धन-संपदा का क्या अर्थ है, जब अपने पति के साथ अधिकांश समय नहीं गुजार सकती। इस बात को लेकर वह महिला अपने पति के साथ अक्सर झगड़ा करने लगी। एक दिन महिला ने देखा कि काम करने वाली महिला का हाथ टूटा हुआ है। वह अचंभित हुई। दूसरे लोगों से ज्ञात हुआ कि कामवाली महिला का पति उस पर बहुत अत्याचार करता था। उसके पति को डर था कि इसके कारण उसकी पत्नी उसे छोड़कर न चली जाए, इसलिए वह सुबह-शाम उसे लेकर आता और लेकर जाता था। सत्य को जानकर महिला को बहुत पश्चताप हुआ।

🔷 कभी-कभी हम दूसरों को देखकर अपनी स्थिति की तुलना उसके साथ करने लगते हैं। यह भी दुख का कारण बनता है। दरअसल सुख और दुख हमारे मन के ही अंदर होते हैं। सच्चे मन से और दूसरों के साथ प्रेमपूर्वक मिलकर परिश्रम करने वाले इंसान के पास कभी दु:ख पहुंच ही नहीं सकता।

👉 "परिस्थितियों का रोना न रोयें

🔷 लंबी-चौड़ी योजनाएँ बनाने की अपेक्षा अपने पास मौजूद साधनों को लेकर ही छोटे-मोटे कार्यों में जुट जाया जाए तो भी प्रगति का सशक्त आधार बन सकता है। परिस्थितियाँ अनुकूल होंगी - साधनों का बाहुल्य होगा, तब व्यवसाय आरंभ करेंगे, यह सोचते रहने की तुलना में अपने अल्प साधनों को लेकर काम में जुट जाना कहीं अधिक श्रेयस्कर है। काम छोटा हो अथवा बड़ा उसमें सफलता के कारण, साधन नहीं, अथक पुरुषार्थ, लगन एवं प्रामाणिकता बनते हैं ।

🔶 देखा जाए तो विश्व के सभी मूर्धन्य संपन्न सामान्य स्थिति से उठकर असामान्य तक पहुँचे। साधन एवं परिस्थितियाँ तो प्रतिकूल ही थीं, पर अपनी श्रमनिष्ठा एवं मनोयोग के सहारे सफलता के शिखर पर जा चढ़े। वे यदि परिस्थितियों का रोना रोते रहते तो अन्य व्यक्तियों के समान ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते और संपन्न बनने की कल्पना में मन बहलाते रहते।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 13

बुधवार, 28 नवंबर 2018

👉 शैतान को आत्म समर्पण न करो।

🔶 जिन विचारों, सिद्धान्तों और कार्यों को मनुष्य सत्य, उचित एवं आवश्यक समझता है कभी-कभी वह उनके अनुसार कार्य नहीं कर पाता। परिस्थितियाँ और कमजोरियाँ उसे इस योग्य नहीं बनने देंगी कि जिन सिद्धान्तों को वह सत्य समझता हैं, उनके अनुसार व्यावहारिक जीवन को बना सके। वर्तमान वातावरण को पार करना उसे कठिन प्रतीत होता है।

🔷 ऐसी स्थिति में कितने ही लोग आत्म वंचना करने लगते हैं। हृदय जिस बात को अनुचित एवं असत्य समझता है बहस में उसी बात का पक्ष समर्थन करने लगते हैं। उस अनुचित को उचित सिद्ध करने के लिए उनका मस्तिष्क लम्बी चौड़ी वकालत करने लगता है और कई कई जोरदार दलीलें इस ढंग से पेश करता है जिससे उसका पक्ष मजबूत हो जाय और यह मान लिया जाय कि मैं जिस कार्य को कर रहा हूँ वह अनुचित नहीं उचित है।

🔶 यह मार्ग आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत ही नीची श्रेणी का काम है। इसे शैतान को आत्म समर्पण करना कहा जा सकता है। मजबूरी की हालत में विवश होकर, दूसरों के दबाव या व्यक्तिगत स्वभाव संस्कारों की कमजोरी के कारण कोई ऐसा काम करना पड़ रहा है जो अनुचित प्रतीत होता है, तो यह आवश्यकता नहीं कि हम अनुचित को उचित सिद्ध करने का प्रयत्न करें। यह तो शैतान की वकालत होगी।

🔷 जो बात अनुचित है उसे हृदय में अनुचित ही मानिए। आप उसका त्याग नहीं कर पा रहे हैं यह दूसरी बात है। चूँकि हम बीमार हैं इसलिए बीमारी अच्छी चीजें हैं यह कहना या खुद समझना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं हैं। मनुष्य भूलों, कमजोरियों और बुराइयों से मुक्त नहीं है। आप भी उनसे मुक्त नहीं हैं।

🔶 हमें अपनी कमजोरियों को समझना चाहिए और उनके विरुद्ध विद्रोह जारी रखना चाहिए चाहे वह विद्रोह कितना ही मंद क्यों न हो। जो बुराई है उसे बुराई ही समझना चाहिए। अपने मल मूत्र को भी कोई पवित्र नहीं मानता फिर अपनी बुराई को अच्छाई क्यों बताया जाय। गीता में भगवान कृष्ण ने हर घड़ी युद्ध जारी रखने का उपदेश किया है। यह युद्ध अपनी बुराई और कमजोरियों के विरुद्ध ही लड़ा जाता हैं। शत्रु के विरुद्ध जब तक किसी भी रूप में लड़ाई जारी है तब तक पराजय नहीं समझी जाती। गत महायुद्ध में हमने देखा कि जिन देशों पर शत्रु ने कब्जा कर लिया उनने गुरिल्ला युद्ध जारी रखे, शत्रु के सामने आत्म समर्पण न किया। राजनीतिज्ञ जानते हैं कि जब तक कोई जाति मानसिक दृष्टि से पराधीन नहीं हो जाती, मानसिक आत्मसमर्पण नहीं कर देती तब तक वह राजनैतिक गुलाम नहीं कही जा सकती। जिस जाति ने मानसिक दृष्टि से पराधीनता स्वीकार नहीं की है वह एक न एक दिनों अवश्य ही राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करके रहेगी।

🔷 यही बात अपनी बुराइयों के सम्बन्ध में है। परिस्थितियां और कमजोरियाँ पैदा करके शैतान ने किसी को अवाँछनीय स्थिति में डाल रखा है, गुलाम बना लिया है, कब्जा कर लिया है तो भी उसे चाहिए कि गुरिल्ला युद्ध जारी रखे। मन में नित्य प्रति दुहराता रहे कि यह मेरी कमजोरी है, इस कमजोरी से मुझे घृणा है। इसे एक न एक दिन दूर करके रहूँगा। अवसर आने पर दूसरों के सामने भी अपनी कमजोरी, भूल स्वीकार करनी चाहिए। कम से कम उसका समर्थन तो नहीं ही करना चाहिए, इस प्रकार यदि शैतान के आगे आत्म समर्पण न किया जाय, उसके विरुद्ध युद्ध जारी रखा जाय तो एक न एक दिन पूर्ण आध्यात्मिक स्वतंत्रता-मुक्ति-मिले बिना न रहेगी।

👉 आज का सद्चिंतन 28 November 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 November 2018


मंगलवार, 27 नवंबर 2018

👉 क्षमा, क्षांति

क्षमा आत्मा का नैसर्गिक गुण है. यह आत्मा का स्वभाव है. जब हम विकारों से ग्रस्त हो जाते है तो स्वभाव से विभाव में चले जाते है. यह विभाव क्रोध, भय, द्वेष, एवं घृणा के विकार रूप में प्रकट होते है. जब इन विकारों को परास्त किया जाता है तो हमारी आत्मा में क्षमा का शांत झरना बहने लगता है।

क्रोध से क्रोध ही प्रज्वल्लित होता है. क्षमा के स्वभाव को आवृत करने वाले क्रोध को, पहले जीतना आवश्यक है. अक्रोध से क्रोध जीता जाता है. क्योंकि क्रोध का अभाव ही क्षमा है. अतः क्रोध को धैर्य एवं विवेक से उपशांत करके, क्षमा के स्वधर्म को प्राप्त करना चाहिए. बडा व्यक्ति या बडे दिल वाला कौन कहलाता है? वह जो सहन करना जानता है, जो क्षमा करना जानता है. क्षांति जो आत्मा का प्रथम और प्रधान धर्म है. क्षमा के लिए ”क्षांति” शब्द अधिक उपयुक्त है. क्षांति शब्द में क्षमा सहित सहिष्णुता, धैर्य, और तितिक्षा अंतर्निहित है।

क्षमा में लेश मात्र भी कायरता नहीं है. सहिष्णुता, समता, सहनशीलता, मैत्रीभाव व उदारता जैसे सामर्थ्य युक्त गुण, पुरूषार्थ हीन या अधैर्यवान लोगों में उत्पन्न नहीं हो सकते. निश्चित ही इन गुणों को पाने में अक्षम लोग ही प्रायः क्षमा को कायरता बताने का प्रयास करते है. यह अधीरों का, कठिन पुरूषार्थ से बचने का उपक्रम होता है. जबकि क्षमा व्यक्तित्व में तेजस्विता उत्पन्न करता है. वस्तुतः आत्मा के मूल स्वभाव क्षमा पर छाये हुए क्रोध के आवरण को अनावृत करने के लिए, दृढ पुरूषार्थ, वीरता, निर्भयता, साहस, उदारता और दृढ मनोबल चाहिए, इसीलिए “क्षमा वीरस्य भूषणम्” कहा जाता है।

दान करने के लिए धन खर्चना पडता है, तप करने के लिए काया को कष्ट देना पडता है, ज्ञान पाने के लिए बुद्धि को कसना पडता है. किंतु क्षमा करने के लिए न धन-खर्च, न काय-कष्ट, न बुद्धि-श्रम लगता है. फिर भी क्षमा जैसे कठिन पुरूषार्थ युक्त गुण का आरोहण हो जाता है।

क्षमा ही दुखों से मुक्ति का द्वार है. क्षमा मन की कुंठित गांठों को खोलती है. और दया, सहिष्णुता, उदारता, संयम व संतोष की प्रवृतियों को विकसित करती है। क्षमापना से निम्न गुणों की प्राप्ति होती है-

◼ चित्त में आह्लाद– मन वचन काय के योग से किए गए अपराधों की क्षमा माँगने से मन और आत्मा का बोझ हल्का हो जाता है. क्योंकि क्षमायाचना करना उदात्त भाव है. क्षमायाचक अपराध बोध से मुक्त हो जाता है परिणाम स्वरूप उसका चित्त प्रफुल्ल हो जाता है।

◼ मैत्रीभाव- क्षमापना में चित्त की निर्मलता ही आधारभूत है. क्षमायाचना से वैरभाव समाप्त होकर मैत्री भाव का उदय होता है. “आत्मवत् सर्वभूतेषु” का सद्भाव ही मैत्रीभाव की आधारभूमि है।

◼ भावविशुद्धि– क्षमापना से विपरित भाव- क्रोध,वैर, कटुता, ईर्ष्या आदि समाप्त होते है और शुद्ध भाव सहिष्णुता, तितिक्षा, आत्मसंतोष, उदारता, करूणा, स्नेह, दया आदि उद्भूत होते है. क्रोध का वैकारिक विभाव हटते ही क्षमा का शुद्ध भाव अस्तित्व में आ जाता है।

◼ निर्भयता– क्रोध, बैर, ईर्ष्या और प्रतिशोध में जीते हुए व्यक्ति भयग्रस्त ही रहता है. किंतु क्रोध निग्रह के बाद सहिष्णुता और क्षमाशीलता से व्यक्ति निर्भय हो जाता है. स्वयं तो अभय होता ही है साथ ही अपने सम्पर्क में आने वाले समस्त सत्व भूत प्राणियों और लोगों को अभय प्रदान करता है।

◼ द्विपक्षीय शुभ आत्म परिणाम– क्रोध शमन और क्षमाभाव के संधान से द्विपक्षीय शुभ आत्मपरिणाम होते है. क्षमा से सामने वाला व्यक्ति भी निर्वेरता प्राप्त कर मैत्रीभाव का अनुभव करता है. प्रतिक्रिया में स्वयं भी क्षमा प्रदान कर हल्का महसुस करते हुए निर्भय महसुस करता है. क्षमायाचक साहसपूर्वक क्षमा करके अपने हृदय में निर्मलता, निश्चिंतता, निर्भयता और सहृदयता अनुभव करता है. अतः क्षमा करने वाले और प्राप्त करने वाले दोनो पक्षों को सौहार्द युक्त शांति का भाव स्थापित होता है।

क्षमाभाव मानवता के लिए वरदान है. जगत में शांति सौहार्द सहिष्णुता सहनशीलता और समता को प्रसारित करने का अमोघ उपाय है।

👉 अपने को जानो

विद्वान इब्सन का कथन है - शक्तिशाली मनुष्य वह है, जो अकेला है। कमजोर वह है, जो दूसरों का मुँह ताकता है। अकेले का अर्थ है "आत्म-निर्भर, अपने पैरों पर खड़े होने वाला"।

यहाँ अकेलापन असहयोगी के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है। इब्सन का तात्पर्य यह है कि जो अपनी जिम्मेदारी को समझता है, अपने कर्तव्यों को निबाहता है, उसे प्रगति के लिये आवश्यक आधार अपने भीतर से ही मिल जाता है, बहार के साधन उसके चुम्बकत्व से खींचकर अनायास ही इकट्ठे हो जाते हैं।

कन्फ्यूसियस ने कहा है महान व्यक्ति अपनी आवश्यक वस्तुओं को भीतर ढूंढ़ते हैं, जबकि कमजोर उन्हें पाने के लिये दूसरों का सहारा तकते हुए भटकते रहते हैं। तत्त्वदर्शी और मनीषी सदा से ही कहते रहे हैं - जो अपनी सहायता आप करता है, उसी कि सहायता करने परमात्मा भी आता है।

जिसने अपने ऊपर से भरोसा खो दिया उसे इश्वर कि ऑंखें भी अविश्वासी ठहरती हैं। परमात्मा कि निकटतम और अधिकतम सत्ता अपने भीतर ही पाई जा सकी है। जो उसे नहीं देखता वह बहार कहाँ पर ऐसा अवलंबन प्राप्त कर सकेगा जो उसे विपत्ति से बचाने और आगे बढ़ाने में सहायता कर सके? अपनी क्षमता और सम्भावना पर से विश्वास उठा लेना परमात्मा कि सत्ता और महत्ता को अस्वीकार करना है।

ऐसी अनास्थावादी मनोभूमि जहाँ हो वहाँ हमें घिनौने किस्म कि नास्तिकता कि गंध मिलेगी।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 चेतन, अचेतन एवं सुपर चेतन मन वांग्मय 22- पृष्ठ 3.1

👉 Know thyself

Wise Ibsen says, "The strongest man in the world is he who stands alone. He is weak who expects, waits for others [to help him]" (An Enemy of the People, 1882). Alone here means - self-reliant, one who is able to stand on one'||chr(39)||'s own two feet. In this context, alone does not mean an uncooperative individual. What Ibsen implies here is a person who knows his responsibilities, performs his duties, that person finds the necessary support he needs [for progress] from within. External resources easily come, drawn to him by his magnetism.

Confucius says, "What the superior man seeks is in himself; what the small man seeks is in others". Intellectuals and sages have always taught, God helps them who help themselves. One who has lost faith and confidence in himself, is counted amongst the unfaithful in the eyes of God.

Inside of us lies the most intense and nearest presence of the divine. One who does not experience that presence, that which is inside of him, from where will he be able to find a support [something to hold on to], which will save him and push him forward?

To not believe in ones own capabilities and possibilities is like refusing to accept the authority of God. In places, where such type of disbelief exists, there we can find the vilest form of atheism.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Chetan, Achetan Evum Super Chetan Mann Vangmay 22 Page- 3.1

👉 आज का सद्चिंतन 27 November 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 November 2018


👉 बीता हुआ कल

◼ बुद्ध भगवान एक गाँव में उपदेश दे रहे थे। उन्होंने कहा कि “हर किसी को धरती माता की तरह सहनशील तथा क्षमाशील होना चाहिए। क्रोध ऐसी आग है जिसमें क्रोध करनेवाला दूसरोँ को जलाएगा तथा खुद भी जल जाएगा।”

◼ सभा में सभी शान्ति से बुद्ध की वाणी सून रहे थे, लेकिन वहाँ स्वभाव से ही अतिक्रोधी एक ऐसा व्यक्ति भी बैठा हुआ था जिसे ये सारी बातें बेतुकी लग रही थी। वह कुछ देर ये सब सुनता रहा फिर अचानक ही आग- बबूला होकर बोलने लगा, “तुम पाखंडी हो। बड़ी-बड़ी बाते करना यही तुम्हारा काम। है। तुम लोगों को भ्रमित कर रहे हो। तुम्हारी ये बातें आज के समय में कोई मायने नहीं रखतीं “

◼ ऐसे कई कटु वचनों सुनकर भी बुद्ध शांत रहे। अपनी बातोँ से ना तो वह दुखी हुए, ना ही कोई प्रतिक्रिया की ; यह देखकर वह व्यक्ति और भी क्रोधित हो गया और उसने बुद्ध के मुंह पर थूक कर वहाँ से चला गया। अगले दिन जब उस व्यक्ति का क्रोध शांत हुआ तो उसे अपने बुरे व्यवहार के कारण पछतावे की आग में जलने लगा और वह उन्हें ढूंढते हुए उसी स्थान पर पहुंचा, पर बुद्ध कहाँ मिलते वह तो अपने शिष्यों के साथ पास वाले एक अन्य गाँव निकल चुके थे।

◼ व्यक्ति ने बुद्ध के बारे में लोगों से पुछा और ढूंढते- ढूंढते जहाँ बुद्ध प्रवचन दे रहे थे वहाँ पहुँच गया। उन्हें देखते ही वह उनके चरणो में गिर पड़ा और बोला, “मुझे क्षमा कीजिए प्रभु !” बुद्ध ने पूछा : कौन हो भाई ? तुम्हे क्या हुआ है ? क्यों क्षमा मांग रहे हो ?”

◼ उसने कहा : “क्या आप भूल गए। मै वही हूँ जिसने कल आपके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था। मै शर्मिन्दा हूँ। मै मेरे दुष्ट आचरण की क्षमायाचना करने आया हूँ।” भगवान बुद्ध ने प्रेमपूर्वक कहा : “बीता हुआ कल तो मैं वहीँ छोड़कर आया गया और तुम अभी भी वहीँ अटके हुए हो। तुम्हे अपनी गलती का आभास हो गया, तुमने पश्चाताप कर लिया; तुम निर्मल हो चुके हो; अब तुम आज में प्रवेश करो। बुरी बाते तथा बुरी घटनाएँ याद करते रहने से वर्तमान और भविष्य दोनों बिगड़ते जाते है। बीते हुए कल के कारण आज को मत बिगाड़ो।”

◼ उस व्यक्ति का सारा बोझ उतर गया। उसने भगवान बुद्ध के चरणों में पड़कर क्रोध त्यागका तथा क्षमाशीलता का संकल्प लिया; बुद्ध ने उसके मस्तिष्क पर आशीष का हाथ रखा। उस दिन से उसमें परिवर्तन आ गया, और उसके जीवन में सत्य, प्रेम व करुणा की धारा बहने लगी।

◼ मित्रों, बहुत बार हम भूत में की गयी किसी गलती के बारे में सोच कर बार-बार दुखी होते और खुद को कोसते हैं। हमें ऐसा कभी नहीं करना चाहिए, गलती का बोध हो जाने पर हमे उसे कभी ना दोहराने का संकल्प लेना चाहिए और एक नयी ऊर्जा के साथ वर्तमान को सुदृढ़ बनाना चाहिए।

सोमवार, 26 नवंबर 2018

👉 इतना तो व्यस्त और विवश होते हुए भी करं सकते हैं

जिनके पास अभीष्ट योग्यता, भावना और सुविधा हो उन्हें इस आपत्तिकाल में मानवता की पुकार सुनकर आगे आना चाहिए और लोभ-मोह की कीचड़ में सड़ते रहने की अपेक्षा उस आदर्शवादी महानता का वरण करना चाहिए जिसे किसी समय इस देश के प्रत्येक नागरिक द्वारा सहज स्वभाव अपनाया जाता था। परिस्थितियाँ, मनोभूमि और प्रवाह प्रचलन बदल जाने से अब इस प्रकार के कदम बढ़ाना दुस्साहस जैसा प्रतीत होता है। किसी समय, जिसमें इतनी भी जीवट न हो, उसे मृतक तुल्य माना जाता था। आज की परिस्थितियों में जो लोग वरिष्ठ अथवा क्लिष्ट वानप्रस्थ का मार्ग अपना सकेंगे विश्व मानव और विश्व-शान्ति के लिए अपना थोड़ा-बहुत भी योगदान दे सकेंगे वे बड़भागी माने जायेंगे। इस घोर अन्धकार में उन छोटे दीपकों का साहस भी भूरि-भूरि सराहने योग्य माना जायगा।

सम्भवतः इस आह्वान को प्रत्येक जीवित और जागृत आत्मा द्वारा सुनने योग्य माना जायगा। सम्भवतः बहुतों की आन्तरिक आकाँक्षा इस दिशा में कदम बढ़ाने की होगी भी किन्तु यह सम्भव है कि वे ऐसी विषम परिस्थितियों में जकड़े हुए हो कि व्यवहारतः कुछ अधिक कर सकना उनके लिए सम्भव न हो। विधि की विडम्बना विचित्र है। कुछ की परिस्थितियाँ बहुत कुछ करने योग्य होती हैं पर मन इतना गिरा मरा होता है कि आदर्शों की तरफ बढ़ने की इच्छा तक नहीं उठती। इसे विपरीत कुछ ऐसे भी होते है कि जिनका अन्तरात्मा महामानवों के चरण-चिन्हों पर चलते हुए कुछ कर गुजरने के लिए निरन्तर छटपटाता रहता है पर परिस्थितियाँ इतनी विपरीत होती हैं कि उन्हें लाँघ सकना किसी जिम्मेदार एवं कर्त्तव्य परायण व्यक्ति के लिए सम्भव ही नहीं होता वरन् उन्हें मन मसोस कर बैठना पड़ता है।

मिशन के लिए भी वह सम्भव नहीं कि वानप्रस्थ कार्यकर्त्ताओं के घर परिवार का आर्थिक उत्तरदायित्व वहन कर सके। अधिक से अधिक इतना ही सम्भव है कि कार्यकर्त्ताओं के भोजन-वस्त्र की व्यवस्था जुटाई जाती रहे। ऐसी दशा में जिन्हें घर से बाहर जाकर कार्य-क्षेत्र में कूदने की सुविधा नहीं है उन्हें स्थानीय क्षेत्र में ही प्रकाश फल का प्रयत्न करना चाहिए। सक्रिय सदस्यों और कर्मठ कार्यकर्ताओं को भी सृजन-सेना के द्वितीय मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिक माना जाता है। नियमित रूप से कुछ घण्टे अथवा समय दे सकने वाले और अपनी आजीविका का उपयुक्त अंश इस प्रयोजन के लिए लगाने वाले व्यक्ति भी अपने क्षेत्र में इतना काम कर सकते हैं जिसे अति-महत्वपूर्ण कह कर सराहा जा सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 धीरे-धीरे सीख

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मुझे हर उस बात पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहिए जो मुझे चिंतित करती है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जिन्होंने मुझे चोट दी है मुझे उन्हें चोट नहीं देना है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
शायद सबसे बड़ी समझदारी का लक्षण भिड़ जाने के बजाय अलग हट जाने में है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
अपने साथ हुए प्रत्येक बुरे बर्ताव पर प्रतिक्रिया करने में आपकी जो ऊर्जा खर्च होती है वह आपको खाली कर देती है और आपको दूसरी अच्छी चीजों को देखने से रोक देती है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मैं हर आदमी से वैसा व्यवहार नहीं पा सकूंगा जिसकी मैं अपेक्षा करता हूँ।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
किसी का दिल जीतने के लिए बहुत कठोर प्रयास करना समय और ऊर्जा की बर्बादी है और यह आपको कुछ नहीं देता, केवल खालीपन से भर देता है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जवाब नहीं देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह सब मुझे स्वीकार्य है, बल्कि यह कि मैं इससे ऊपर उठ जाना बेहतर समझता हूँ।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
कभी-कभी कुछ नहीं कहना सब कुछ बोल देता है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
किसी परेशान करने वाली बात पर प्रतिक्रिया देकर आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण की शक्ति किसी दूसरे को दे बैठते हैं।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मैं कोई प्रतिक्रिया दे दूँ तो भी कुछ बदलने वाला नहीं है। इससे लोग अचानक मुझे प्यार और सम्मान नहीं देने लगेंगे। यह उनकी सोच में कोई जादुई बदलाव नहीं ला पायेगा।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जिंदगी तब बेहतर हो जाती है जब आप इसे अपने आसपास की घटनाओं पर केंद्रित करने के बजाय उसपर केंद्रित कर देते हैं जो आपके अंतर्मन में घटित हो रहा है।

आप अपने आप पर और अपनी आंतरिक शांति के लिए काम करिए और आपको बोध होगा कि चिंतित करने वाली हर छोटी-छोटी बात पर प्रतिक्रिया 'नहीं' देना एक स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का 'प्रथम अवयव' है।

सच कहें तो
कभी कभी कुछ अपनी ही मूर्खता पूर्ण बातों या कामों से पछतावा भी होता है तो कभी कभी कुछ ईमानदारी भरा ठीक कर पाने की खुशी भी।

अब पता नहीं क्यों दूसरों की निंदा प्रशंसा में कुछ ज्यादा अंतर नहीं सा लगता।

पर जो भी हो ये भरोसा सा है कि अब समझदारी की तरफ सुनिश्चित कदम दर कदम बढ़ रहे हैं,
मन में छाई रहने वाली शांति, खुशी, संतुष्टि इसकी गवाह है कि पथिक की राह ठीक है,
एक दिन मंजिल भी मिल ही जाएगी।
उस मंजिल को तय करने का मजा ही शायद जिंदगी के अनूठे से जगह जगह बिखरे रंग हैं।

👉 Eradication of evil tendencies

Many times, morally sound people are seen indulging in ill-stuffs. The reason for that is, the ill tendencies are deep-rooted somewhere inside them and they pop up as and when they get opportunity.Just like for a person who keeps thinking about stealing things, it's not difficult to do so whenever he gets a chance. A person who might be highly knowledgeable in his physical appearance but has evil tendencies in his mind, would be ultimately considered an immoral person. Because of pressure of social etiquette, even though the physical action did not take place but it was always present in its subtle form in his mind. Thus if opportunity was there, the sin would have been committed.

So continuous efforts must be made to remove bad tendencies hiding in subtle mind. Therefore it is absolutely necessary, that whatever bad tendencies we find in our actions, thoughts and personality, we gather positive thoughts contradictory to these tendencies and do arrangements to make them available to mind again and again.

The eradication of bad thoughts is only possible by current of good thoughts.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama 66:2.18

👉 दुर्भावों का उन्मूलन

कई बार सदाचारी समझे जाने वाले लोग आश्चर्यजनक दुष्कर्म करते पाए जाते हैं। उसका कारण यही है कि उनके भीतर ही भीतर वह दुष्प्रवृति जड़ जमाए बैठी रहती है। उसे जब भी अवसर मिलता है, नग्न रूप में प्रकट हो जाती है। जैसे, जो चोरी करने की बात सोचता रहता है, उसके लिए अवसर पाते ही वैसा कर बैठना क्या कठिन होगा। शरीर से ब्रह्मज्ञानी और मन से व्यभिचारी बना हुआ व्यक्ति वस्तुत: व्यभिचारी ही माना जाएगा। मजबूरी के प्रतिबंधों से शारीरिक क्रिया भले ही न हुई हो, पर वह पाप सूक्ष्म रूप से मन में तो मौजूद था । मौका मिलता तो वह कुकर्म भी हो जाता ।

इसलिए प्रयत्न यह होना चाहिए कि मनोभूमि में भीतर छिपे रहने वाले दुर्भावों का उन्मूलन करते रहा जाए। इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि अपने गुण, कर्म, स्वभाव में जो त्रुटियॉं एवं बुराइयॉ दिखाई दें, उनके विरोधी विचारों को पर्याप्त मात्रा में जुटा कर रखा जाय और उन्हें बार-बार मस्तिष्क में स्थान मिलते रहने का प्रबंध किया जाए। कुविचारों का शमन सद्विचारों से ही संभव है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 2.18



👉 आज का सद्चिंतन 26 Nov 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 November 2018


रविवार, 25 नवंबर 2018

👉 करो या फिर मरो।

विपरीत परिस्थितियाँ हर व्यक्ति के जीवन में कभी-न-कभी आती ही हैं। ऐसे में आत्मविश्वास सूखी रेत की तरह मुट्ठियों से फिसलने लगता है। चारों तरफ अंधकार ही अंधकार नजर आता है, साहस घुटने टेकने लगता है। एक पल ऐसा लगता है कि सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

ऐसी स्थिति में केवल दो ही विकल्प शेष रह जाते हैं- करो या फिर मरो।

इसमें जो विपरीतताओं-विषमताओं से लड़े बगैर हार मान लेता है, उसका मरण तो निश्चित्त है। लेकिन जो साहस जुटाकर संघर्ष करता है, वही प्रतिकूलताओं पर विजय प्राप्त कर इतिहास रचता और सफलता की इबारत गढ़ता है।

👉 चापलूसी नही, अच्छी सलाह दे!!

किसी की झूठी प्रशंसा करके उसका अहंकार बढा देने की गलती हमें नहीं करनी चाहिए! क्योकि अहंकार बढने से नाश का द्वार खुलता है! इतिहास साक्षी है राजाओ का नाश हाँ मे हाँ मिलाकर उनके चापलूस ही करते रहे है! कोई भी सलाह नम्रता से, मधुरता से एकांत में ठीक प्रकार समझाते हुए दी जाए तो समझदार लोग उस पर ध्यान देते भी है और सुधरने का प्रयत्न भी करते है! क्योकि अपने अहंकार को ठेस लगने से लोग आगबबूला होने लगते है! पर अपने हितैषी के लिए तो यह जोखिम भी उठानी चाहिए और अवसर देखकर उचित सलाह देनी भी चाहिए! चुप बैठे रहने से बुराई घटती नहीं, बढती ही रहती है! अपने को ही नहीं, अपने स्वजन संबंधियो को भी निरहंकारी बनने की सलाह देते रहना चाहिए!

👉 आज का सद्चिंतन 25 Nov 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 November 2018

शनिवार, 24 नवंबर 2018

👉 गुरु तेग बहादुर जी ”हिन्द की चादर “बलिदान दिवस 24 नवंबर

संसार को ऐसे बलिदानियों से प्रेरणा मिलती है, जिन्होंने जान तो दे दी, परंतु सत्य का त्याग नहीं किया। नवम पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर जी भी ऐसे ही बलिदानी थे। गुरु जी ने स्वयं के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के अधिकारों एवं विश्वासों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। अपनी आस्था के लिए बलिदान देने वालों के उदाहरणों से तो इतिहास भरा हुआ है, परंतु किसी दूसरे की आस्था की रक्षा के लिए बलिदान देने की एक मात्र मिसाल है-नवम पातशाह की शहादत। औरंगजेब को दिल्ली के तख्त पर कब्जा किए 24-25 वर्ष बीतने को थे। इनमें से पहले 10 वर्ष उसने पिता शाहजहां को कैद में रखने और भाइयों से निपटने में गुजारे थे।

औरंगजेब के अत्याचार अपने शिखर पर थे। बात 1675 ई. की है। कश्मीरी पंडितों का एक दल पंडित किरपा राम के नेतृत्व में गुरु तेग बहादुर जी के दरबार में कीरतपुर साहिब आया और फरियाद की- हे सच्चे पातशाह, कश्मीर का सूबेदार बादशाह औरंगजेब को खुश करने के लिए हम लोगों का धर्म परिवर्तन करा रहा है, आप हमारी रक्षा करें। यह फरियाद सुनकर गुरु जी चिंतित हो उठे। इतने में, मात्र नौ वर्षीय श्री गुरु गोविंद सिंह बाहर से आ गए। अपने पिता को चिंताग्रस्त देखकर उन्होंने कारण पूछा। गुरु पिता ने कश्मीरी पंडितों की व्यथा कह सुनाई। साथ ही यह भी कहा कि इनकी रक्षा सिर्फ तभी हो सकती है, जब कोई महापुरुष अपना बलिदान करे। बालक गोविंद राय जी ने स्वाभाविक रूप से उत्तर दिया कि इस महान बलिदान के लिए आपसे बडा महापुरुष कौन हो सकता है?

नवम पातशाह ने पंडितों को आश्वासन देकर वापस भेजा कि अगर कोई तुम्हारा धर्म परिवर्तन कराने आए, तो कहना कि पहले गुरु तेग बहादुर का धर्म परिवर्तन करवाओ, फिर हम भी धर्म बदल लेंगे। नवम पातशाह औरंगजेब से टक्कर लेने को तैयार हो गए। बालक गोविंद राय को गुरुगद्दी सौंपी और औरंगजेब से मिलने के लिए दिल्ली रवाना हो गए। औरंगजेब ने गुरु जी को गिरफ्तार किया और काल-कोठरी में बंद कर दिया। गुरु जी के सामने तीन शर्ते रखी गई- या तो वे धर्म परिवर्तन करें या कोई करामात करके दिखाएं या फिर शहादत को तैयार रहें। गुरु जी ने पहली दोनों शर्ते मानने से इंकार कर दिया।

परिणामस्वरूप गुरु जी के साथ आए तीन सिखों-भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला को यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया। गुरु जी इन सबके लिए पहले से ही तैयार थे। उन्होंने कहा-मैं धर्म परिवर्तन के खिलाफ हूं और करामात दिखाना ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है। गुरु जी को आठ दिन चांदनी चौक की कोतवाली में रखा गया। उन पर अत्याचार किया गया, परंतु वे अचल रहे और अंतत: नानकशाही तिथि पत्रानुसार 24 नवंबर 1675 के दिन उन्हें चांदनी चौक में शहीद कर दिया गया। गुरु जी के एक सिख भाई जैता जी ने गुरु जी के शीश को आनंदपुर साहिब लाने की दिलेरी दिखाई। गुरु गोविंद सिंह जी ने भाई जैता के साहस से प्रसन्न होकर उन्हें रंगरेटे-गुरु के बेटे का खिताब दिया।

गुरु जी के शीश का दाह-संस्कार आनंदपुर साहिब में किया गया। गुरु जी के शरीर को भाई लखी शाह और उनके पुत्र अपने गांव रकाबगंज ले गए और घर में आग लगाकर गुरु जी का दाह-संस्कार किया। आज यहां गुरुद्वारा रकाबगंज, दिल्ली सुशोभित है। दिल्ली में आज भी गुरुद्वारा शीशगंज नवम पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर जी की बेमिसाल शहादत की याद दिलाता है। आज भी लोग उन्हें हिंद की चादर कह कर याद करते हैं।

👉 मौत का सौदागर

1888 की बात है, एक व्यक्ति सुबह-सुबह उठ कर अखबार पढ़ रहा था, तभी अचानक उसकी नज़र एक “शोक – सन्देश ” पर पड़ी। वह उसे देख दंग रह गया , क्योंकि वहां मरने वाले की जगह उसी का नाम लिखा हुआ था। खुद का नाम पढ़कर वह आश्चर्यचकित तथा भयभीत हो गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अखबार ने उसके भाई लुडविग की मरने की खबर देने की जगह खुस उसके मरने की खबर प्रकाशित कर दी थी। खैर, उसने किसी तरह खुद को समभाला, और सोचा, चलो देखते हैं की लोगों ने उसकी मौत पर क्या प्रतिक्रियाएं दी हैं।

उसने पढ़ना शुरू किया, वहां फ्रेंच में लिखा था, “”Le marchand de la mort est mort” यानि, “मौत का सौदागर” मर चुका है”

यह उसके लिए और बड़ा आघात था, उसने मन ही मन सोचा , ” क्या उसके मरने के बाद लोग उसे इसी तरह याद करेंगे?”

यह दिन उसकी ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट बन गया, और उसी दिन से डायनामाइट का यह अविष्कारक विश्व शांति और समाज कल्याण के लिए काम करने लगा। और मरने से पहले उसने अपनी अकूत संपत्ति उन लोगों को पुरस्कार देने के लिए दान दे दी जो विज्ञान और समाज कलायन के क्षत्र में उत्कृष्ट काम करते हैं।

मित्रों, उस महान व्यक्ति का नाम था, ऐल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल, और आज उन्ही के नाम पर हर वर्ष “नोबेल प्राइज ” दिए जाते हैं। आज कोई उन्हें “मौत के सौदागर के रूप” में नहीं याद करता बल्कि हम उन्हें एक महान वैज्ञानिक और समाज सेवी के रूप में याद किया जाता है।

जीवन एक क्षण भी हमारे मूल्यों और जीवन की दिशा को बदल सकता है, ये हमें सोचना है की हम यहाँ क्या करना चाहते हैं? हम किस तरह याद किये जाना चाहते हैं? और हम आज क्या करते हैं यही निश्चित करेगा की कल हमें लोग कैसे याद करेंगे! इसलिए, हम जो भी करें सोच-समझ कर करें, कहीं अनजाने में हम “मौत के सौदागर” जैसी यादें ना छोड़ जाएं!!!

👉 जाने घूमना क्यों जरुुरी

जब आप घूमना शुरू करते हैं तो आपके शरीर में हर पल क्या होता है। यहां प्रति मिनट के लिहाज से होने वाली शारीरिक प्रतिक्रियाएं उनका आपस में क्या संबंध है, नियमित भ्रमण और व्यायाम से आपके शरीर पर पड़ने वाले चमत्कारिक और लाभकारी परिवर्तनों का क्रम इस प्रकार है-

शुरुआती एक मिनट से 5 मिनट में जब आप घूमना शुरू करते हैं और चहलकदमी के साथ कदम रखते हैं तो शरीर मेें ऊर्जा के उत्पादन के साथ कुछ रसायनों का शरीर की कोशिकाओं में संचार होता है, जो आपकी शारीरिक कोशिकाओं के लिए ईंधन का कार्य करती है, घूमते समय।

आपके हृदय की धडक़न की दर 70 से 100 तक प्रति मिनट पहुंच जाती है, (बीपीएम) रक्त संचार में तेजी होती है, जिससे मांसपेशियों में गर्मी आती है। शरीर के जोड़ों की अकड़न को दूर करने के लिए वसीय तत्व (ल्युब्रिकेंट फ्लूड) का संचार होता है। जिससे आपके चलने की राह सुगम हो जाती है।

जब आप चलना शुरू करते हैं तो उपका शरीर प्रति मिनट 5 कैलोरी ऊर्जा का क्षय करना शुरू कर देता है हर एक मिनट के अंतराल के दौरान। इस सतत ऊर्जा क्षय के दौरान आपका शरीर ईंधन के रूप में शरीर में संचित कार्बोहाइड्रेट और वसा को खींचने लगता है।

मिनट 6 से 10 में  हृदय की धडक़न बढ़ जाती है और ऊर्जा के क्षय होने की दर बढ़ कर प्रति मिनट 6 कैलोरी हो जाती है, जिससे आपको आराम का अहसास होता है। रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) में भी मामूली वृद्धि हो जाती है नियमित रसायनों के संचार से जिससे रक्त वाहिकाओं में अधिक रक्त का प्रवाह हो जाता है जिससे बढ़े हुए रक्त के अनुपात में ऑक्सीजन की जरुरत बढ़ने से शरीर की मांस पेशियां काम करने लगती है।

11 से 20 मिनट की अवधि में शरीर के तापमान में वृद्धि होना शुरू हो जाता है जिससे रक्त की धमनियों में प्रसरण शुरू होता इसकी शुरूआत त्वचा से होती है, जो धीरे-धीरे बढक़र हृदय को आराम पहुंचाता है। इस अवधि में आपका ऊर्जा क्षय प्रति मिनट 7 कैलोरी हो जाता है साथ श्वांस लेने में जोर आने लगता है। इससे हार्मोन्स जैसे एपिनिजिन और ग्लूकोगोन की मात्र बढ़ जाती है, जिससे शरीर की मांसपेशियों को आसानी से ईंधन (ऊर्जा) मिलने लगती है।

21 से 45 मिनट की अवधि में घूमने वाले शरीर में ताजगी के साथ ही स्व उत्प्रेरण की क्षमता आ जाती है, जिससे आप अपने शरीर को आराम देने का क्रम शुरू कर देते हैं, उससे आपके तनाव को स्तर घटने लगता है। साथ ही अच्छे व लाभकारी रसायनों का संचार होने लगता है जैसे आपके मस्तिष्क से एंडोरफिन्स का संचरण। जिससे अधिक संचित वसा का क्षय शुरू होता है।

इससे इंसुलिन हार्मोन का स्तर भी संतुलित होने लगता है। जिससे जो लोग मोटापा और मधुमेह से ग्रसित हैं उन्हें इन दोनों रोग से लड़ने की ताकत मिलती है। 45 से 60 मिनट की अवधि में शरीर की मांसपेशियां में थकान का स्तर बढ़ जाता है, जिससे आपके शरीर में जमा कार्बोहाइड्रेट की मात्रा घटने लगती है। जिससे आपको शीतलता का अनुभव होता है।

आपके हृदय के धडक़न की दर घट जाती है, श्वांस लेने की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है। इस अवधि में आपके शरीर से ऊर्जा के क्षरण का स्तर थोड़ा कम होता है, पर जब आपने घूमना शुरू किया उससे अधिक ऊर्जा का क्षरण इस अवधि में होता है। एक घण्टे घूमने से ऊर्जा के क्षय होने की गति में वृद्धि होती है। ऐसे में कहा जा सकता है। एकमात्र घूमने से तमाम खुशियां मिल सकती है शरीर के लिए घुमना मानव शरीर के लिए वरदान है।

👉 Praise be only unto those making meritorious use of money

These days money is commonly reckoned to be the loftiest blessing, gift or glory among all. However, it doesn’t deserve the honour of being the jewel in the crown of divine gifts which should actually belong to pre-eminent feelings like empathy, kindness, generosity, etc. Anyone endowed with such pre-eminent feelings becomes a divine being in person. Great people, sages, those having a simple-living-high-thinking way of austere life, and people who renounced their happiness or sacrificed their everything for others belong to this class of sublime people, i.e. the divine beings. They burn like a candle to impart the light of bliss everywhere. Whatever goodness, blessedness or bliss we experience everywhere are in reality the manifestations of pre-eminent feelings.

The second place among divine gifts goes to vidyā or wisdom. (This is a manifestation of brāhmaṇatva, i.e. a mental faculty of sublime thinking.) The third gift is that of the talents. (This can be classed as kshatriyatwa i.e. the physical expression of brave deeds.) Money comes next at the fourth place. Money basking the undeserving top praise has become a great misfortune for the human race. One of its offshoot is that people have become more inclined to amass as much money as possible so as to become more praiseworthy or respectable in society. On the contrary, such money should have been well utilised all the time to facilitate noble causes.

Money is indeed a divine gift. Wealth is a sign of a glimpse of divine grace. This is one of the reasons why we offer prayers to Mother Lakshmi—the Goddess of wealth and properity during Deepawali, the festival of light. However, any money that is wrongly used to provide luxuries to or to satisfy ego of just a few rather than aptly being used for the good of the masses isn’t at all worth of accolade. Such riches have been and should be disapproved of.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama 66:1.38

👉 सम्मान सिर्फ धन के सदुपयोगियों का

विभूतियों में इन दिनों अग्रिम स्थान धन को मिल गया है, पर वस्तुत: वह उसका स्थान नहीं है। प्रथम स्थान उदात्त भावनाओं का है। वे जिनके पास हैं, वे देव हैं। महामानवों को, ऋषि व तपस्वियों को, त्यागी-बलिदानियों को देव संज्ञा में गिना जाता है, वे दीपक की तरह जलकर सर्वत्र प्रकाश फैलाते हैं। इस संसार में जितना चेतनात्मक वर्चस्व है, उसे उदात्त भावनाओं का वैभव ही कहना चाहिए।

दूसरा स्थान है विद्या का, इसे ब्राह्मणत्व कह सकते हैं। तीसरी विभूति है प्रतिभा, इसे क्षत्रियत्व कहा जा सकता है। इसके बाद चौथी गणना धन की है। मानव जाति का दुर्भाग्य ही है कि आज धन को सर्वप्रथम स्थान और सम्मान मिल गया। इसी का दुष्परिणाम यह हुआ कि व्यक्ति अधिकाधिक धन संग्रह करके बड़े से बड़ा सम्मानीय बनना चाहता है, जबकि धन का उपयोग उसे बिना रोके निरन्तर सत्प्रयोजनों में प्रयुक्त करते रहना ही हो सकता है।

धन एक विभूति है। उसके पीछे दैवी अनुकम्पा की झाँकी है, इसलिए अपने यहाँ दीपावली पर्व पर लक्ष्मी की पूजा होती है। पर वह धन सम्मानित नहीं हो सकता जो लोकहित से अवरुद्ध होकर चन्द व्यक्तियों की विलासिता और अहंता की पूर्ति में लगा हुआ है। ऐसे धन की निन्दा की गई है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (१.३८)

👉 आज का सद्चिंतन 24 Nov 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 November 2018

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

👉 भगवान का कार्य:-

उस दिन सबेरे 6 बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला, मैं रेलवे स्टेशन पहुचा, पर देरी से पहुचने कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी, मेरे पास 9.30 की ट्रेन के आलावा कोई चारा नही था मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए, बहुत जोर की भूख लगी थी मैं होटल की ओर जा रहा था।

अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी, दोनों लगभग 10 साल के रहे होंगे बच्चों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। कमजोरी के कारण अस्थि पिंजर साफ दिखाई दे रहे थे, वे भूखे लग रहे थे।

छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था, बड़ा उसे चुप करा ने कोशिश कर रहा था, मैं अचानक रुक गया दौड़ती भागती जिंदगी में यह ठहर से गये। जीवन को देख मेरा मन भर आया सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाए, मैंने उन्हें 10 रु दे कर आगे बढ़ गया। तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितना कंजूस हु मैं, 10 रु क्या मिलेगा, चाय तक ढंग से न मिलेगी, स्वयं पर शर्म आयी फिर वापस लौटा।

मैंने बच्चों से कहा: कुछ खाओगे? बच्चे थोड़े असमंजस में पड़े मैंने कहा बेटा मैं नाश्ता करने जा रहा हु, तुम भी कर लो, वे दोनों भूख के कारण तैयार हो गए। उनके कपड़े गंदे होने से होटल वाले डाट दिया भगाने लगा, मैंने कहा भाई साहब उन्हें जो खाना है वो उन्हें दो पैसे मैं दूंगा।

होटल वाले ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा.. उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी। बच्चों ने नाश्ता मिठाई व् लस्सी मांगी। सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया बच्चे जब खाने लगे, उनके चेहरे की ख़ुशी कुछ निराली ही थी।

मैंने बच्चों को कहा बेटा अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए है उसमे 1 रु का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना। और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना, और मैं नाश्ते के पैसे दे कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर बढ़ निकला।

वहा आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे होटल वाले के शब्द आदर मे परिवर्तित हो चुके थे। मैं स्टेशन की ओर निकला, थोडा मन भारी लग रहा था मन थोडा उनके बारे में सोच कर दुखी हो रहा था।

रास्ते में मंदिर आया मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा हे भगवान! आप कहा हो? इन बच्चों की ये हालत ये भुख, आप कैसे चुप बैठ सकते है। दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया, पुत्र अभी तक जिसने उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था??

👉 आत्म ख़ज़ाना


सत्संग का आदर करो प्यारे और खुद को पहचानों आप क्या हो और क्या कर रहे हो?

एक भिखारी था । उसने सम्राट होने के लिए कमर कसी। चौराहे पर अपनी फटी-पुरानी चादर बिछा दी, अपनी हाँडी रख दी और सुबह-दोपहर-शाम भीख माँगना शुरू कर दिया क्योंकि उसे सम्राट होना था। भीख माँगकर भी भला कोई सम्राट हो सकता है ? किंतु उसे इस बात का पता नहीं था।

भीख माँगते-माँगते वह बूढ़ा हो गया और मौत ने दस्तक दी। मौत तो किसी को नहीं छोड़ती। वह बूढ़ा भी मर गया। लोगों ने उसकी हाँडी फेंक दी, सड़े-गले बिस्तर नदी में बहा दिये, जमीन गंदी हो गयी थी तो सफाई करने के लिए थोड़ी खुदाई की । खुदाई करने पर लोगों को वहाँ बहुत बड़ा खजाना गड़ा हुआ मिला।

तब लोगों ने कहा: 'कितना अभागा था! जीवनभर भीख माँगता रहा। जहाँ बैठा था अगर वहीं जरा-सी खुदाई करता तो सम्राट हो जाता!'

ऐसे ही हम जीवनभर बाहर की चीजों की भीख माँगते रहते हैं किन्तु जरा-सा भीतर गोता मारें, ईश्वर को पाने के लिए ध्यान का जरा-सा अभ्यास करें तो उस आत्मखजाने को भी पा सकते हैं, जो हमारे अंदर ही छुपा हुआ है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 November 2018


👉 आज का सद्चिंतन 23 Nov 2018


गुरुवार, 22 नवंबर 2018

👉 तृष्णा

🔶 एक व्यापारी था, वह ट्रक में चावल के बोरे लिए जा रहा था। एक बोरा खिसक कर गिर गया। कुछ चीटियां आयीं 10-20 दाने ले गयीं, कुछ चूहे आये 100-50 ग्राम खाये और चले गये, कुछ पक्षी आये थोड़ा खाकर उड़ गये, कुछ गायें आयीं 2-3 किलो खाकर चली गयीं, एक मनुष्य आया और वह पूरा बोरा ही उठा ले गया।

🔷 अन्य प्राणी पेट के लिए जीते हैं, लेकिन मनुष्य तृष्णा में जीता है। इसीलिए इसके पास सब कुछ होते हुए भी यह सर्वाधिक दुखी है।
      
🔶 आवश्यकता के बाद इच्छा को रोकें, अन्यथा यह अनियंत्रित बढ़ती ही जायेगी, और दुख का कारण बनेगी।

बुधवार, 21 नवंबर 2018

👉 गुरु के दर्शन का लाभ -------

🔶 एक बार गुरु नानक देव जी से किसी ने पूछा कि गुरु के दर्शन करने से क्या लाभ होता है? गुरु जी ने कहा कि इस रास्ते पर चला जा, जो भी सब से पहले मिले उस से पूछ लेना। वह व्यक्ति उस रास्ते पर गया तो उसे सब से पहले एक कौवा मिला, उसने कौवे से पूछा कि गुरु के दर्शन करने से क्या होता है?
उसके यह पूछते ही वह कौवा मर गया....

🔷 वह व्यक्ति वापिस गुरु जी के पास आया और सब हाल बताया... अब गुरु ने कहा कि फलाने घर में एक गाय ने एक बछड़ा दिया है, उससे जाकर यह सवाल पूछो, वह आदमी वहां पहुंचा और बछड़े के आगे यही सवाल किया तो वह भी मर गया.....

🔶 वह आदमी भागा भागा गुरु जी के पास आया और सब बताया... अब गुरु जी ने कहा कि फलाने घर में जा, वहां एक बच्चा पैदा हुआ है, उस से यही सवाल करना...
वह आदमी बोला के वह बच्चा भी मर गया तो? गुरु जी ने कहा कि तेरे सवाल का जवाब वही देगा...

🔷 अब वह आदमी उस घर में गया और जब बच्चे के पास कोई ना था तो उसने पूछा कि गुरु के दर्शन करने से क्या लाभ होता है?
वह बच्चा बोला कि मैंने खुद तो नहीं किये लेकिन तू जब पहली बार गुरु जी के दर्शन करके मेरे पास आया तो मुझे कौवे की योनी से मुक्ति मिली और बछड़े का जन्म मिला....
तू दूसरी बार गुरु के दर्शन करके मेरे पास आया तो मुझे बछड़े से इंसान का जन्म मिला....

🔶 सो इतना बड़ा हो सकता है गुरु के दर्शन करने का फल, फिर चाहे वो दर्शन आंतरिक हो या बाहरी......

ऐ सतगुरू मेरे...
नज़रों को कुछ ऐसी खुदाई दे...
जिधर देखूँ उधर तू ही दिखाई दे...
कर दे ऐसी कृपा आज इस दास पे कि...
जब भी बैठूँ सिमरन में...
सतगुरू तू ही दिखाई दे...!

👉 बेटी पढाओ, दहेज मिटाओ

🔶 चौबे का लड़का है अशोक, एमएससी पास। नौकरी के लिए चौबे निश्चिन्त थे, कहीं न कहीं तो जुगाड़ लग ही जायेगी। बियाह कर देना चाहिए।

🔷 मिश्रा जी की लड़की है ममता, वह भी एमए पहले दर्जे में पास है, मिश्रा भी उसकी शादी जल्दी कर देना चाहते हैं।

🔶 सयानों से पोस्ट ग्रेजुएट लड़के का भाव पता किया गया। पता चला वैसे तो रेट पांच से छः लाख का चल रहा है, पर बेकार बैठे पोस्ट ग्रेजुएटों का रेट तीन से चार लाख का है।

🔷 सयानों ने सौदा साढ़े तीन में तय करा दिया। बात तय हुए अभी एक माह भी नही हुआ था, कि कमीशन से पत्र आया कि अशोक का डिप्टी कलक्टर के पद पर चयन हो गया है।

🔶 चौबे- साले, नीच, कमीने... हरामजादे हैं कमीशन वाले...!
चौबन - लड़के की इतनी अच्छी नौकरी लगी है नाराज क्यों होते हैं?

🔷 चौबे- अरे सरकार निकम्मी है, मैं तो कहता हूँ इस देश में क्रांति होकर रहेगी... यही पत्र कुछ दिन पहले नहीं भेज सकते थे, डिप्टी कलेक्टर का 40-50 लाख यूँ ही मिल जाता।

🔶 चौबन- तुम्हारी भी अक्ल मारी गई थी, मैं न कहती थी महीने भर रुक जाओ, लेकिन तुम न माने... हुल-हुला कर सम्बन्ध तय कर दिया... मैं तो कहती हूँ मिश्रा जी को पत्र लिखिये वे समझदार आदमी हैं।

🔷 प्रिय मिश्रा जी, अत्र कुशलं तत्रास्तु! आपको प्रसन्नता होगी कि अशोक का चयन डिप्टी कलेक्टर के लिए हो गया है। विवाह के मंगल अवसर पर यह मंगल हुआ। इसमें आपकी सुयोग्य पुत्री के भाग्य का भी योगदान है। आप स्वयं समझदार हैं, नीति व मर्यादा जानते हैं। धर्म पर ही यह पृथ्वी टिकी हुई है। मनुष्य का क्या है, जीता मरता रहता है। पैसा हाथ का मैल है, मनुष्य की प्रतिष्ठा बड़ी चीज है। मनुष्य को कर्तव्य निभाना चाहिए, धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। और फिर हमें तो कुछ चाहिए नहीं, आप जितना भी देंगे अपनी लड़की को ही देंगे।

🔶 मिश्रा परिवार ने पत्र पढ़ा, विचार किया और फिर लिखा- प्रिय चौबे जी, आपका पत्र मिला, मैं स्वयं आपको लिखने वाला था। अशोक की सफलता पर हम सब बेहद खुश हैं। आयुष्मान अब डिप्टी कलेक्टर हो गया हैं। अशोक चरित्रवान, मेहनती और सुयोग्य लड़का है। वह अवश्य तरक्की करेगा। आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि ममता का चयन आईएएस के लिए हो गया है। आयुष्मति की यह इच्छा है कि अपने अधीनस्थ कर्मचारी से वह विवाह नहीं करेगी। मुझे यह सम्बन्ध तोड़कर अपार हर्ष हो रहा है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 November 2018


👉 आज का सद्चिंतन 21 Nov 2018


👉 Writers are acting like hunters’ dogs!

🔶 Hunters keep dogs which run several miles, toils really hard to catch their preys like rabbit, fox, deer, etc. and bring them back to their masters. The hunters will keep the prey and toss a small portion of meat to reward the dog. Similar practice is followed in the field of publication and intellectual works wherein the publishers are playing the role of hunters and get work done by writers who act similar to hunters’ dogs. If we happen to gather all literature written on disgusting, vulgar, erotic, provoking themes as well as those which talk about the ways to carry out evils like stealing, robbery, cheating, etc. it could easily make a heap as tall as the Mount Everest. What is more, this type of voluminous literature is read by millions of naive readers! A bait made of food mixed with poison is used to kill rats. Rats eat the bait and get killed by the poison concealed in it. The aforesaid literature is just like these baits. The naive minds of the readers easily fall prey to the ideas expressed in these publications and is compelled to act them out.

🔷 Nowadays, many writers are behaving like hunters’ dogs. They are helping their masters—the publishers and distributors to become rich media moguls. The writers may well be contented with the little bounty they get for their work. However, in doing so they are recklessly demonstrating the ‘genius’ of their nasty work by making readers to rise to their baits and making them do what the publishers dream of. As if the Divine Mother of knowledge is being portrayed in an evil way. Such a sorry situation would make anyone sensible enough let out a sigh, “Oh God! Please take away all the knowledge, we would be far better off with being illiterate!”

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama Vangmay 66 Page 1.35

👉 साहित्यकार बहेलियों के कुत्तों की भूमिका ना निभायें

🔶 बहेलियों के पास शिकारी कुत्ते होते हैं। खरगोश, लोमड़ी, हिरन, आदि जानवरों के पीछे उन्हें दौड़ाते हैं। कुत्ते कई मील दौडक़र, भारी परिश्रम के उपरान्त शिकार दबोचे हुए मुँह में दबाये घसीट लाते हैं। बहेलिये उससे अपनी झोली भरते हैं और कुत्तों को एक टुकड़ा देकर सन्तुष्ट कर देते हैं। यही क्रम आज विद्या, बुद्धि के क्षेत्र में चल रहा है। पुस्तक-प्रकाशक बहेलिए -तथाकथित साहित्यकारों से चटपटा लिखाते रहते हैं। गन्दे, अश्लील, कामुक, पशु प्रवृत्तियाँ भडक़ाने वाले, चोरी, डकैती, ठगी की कला सिखाने वाले उपन्यास यदि इकट्ठे किए जाएँ, तो वे एवरेस्ट की चोटी जितने ऊँचे हो जाएँगे। अबोध जनमानस उन्हीं विष-मिश्रित गोलियों को गले निगलता रहता है। चूहों को मारने की दवा आटे में मिलाकर गोलियों बनाकर बिखेर दी जाती हैं । उन्हें खाते ही चूहा तड़प-तड़प कर मर जाता है। यह साहित्य ठीक इसी प्रकार का है । इसे पढऩे के बाद कोई अपरिपक्व बुद्धि पाठक वैसा ही अनुकरण करने के लिए विवश होता है।

🔷 आज अनेक साहित्यकार बहेलियों के कुत्तों की भूमिका प्रस्तुत कर रहे हैं। अनेक प्रकाशक और विक्रेता मालामाल हो रहे हैं। कुछ टुकड़े खाकर यह साहित्यकार पाठकों का माँस इन आततायियों के पेट में पहुँचाने में अपनी विद्या, बुद्धि, कला-कौशल का परिचय दे रहे हैं। विद्या माता को व्यभिचारिणी वेश्या के रूप में जिस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, उसे देखकर यही कहना पड़ता हैं – " हे भगवान! इस संसार से विद्या का अस्तित्व मिटा दो, इससे तो हमारी निरक्षरता ही अच्छी है।"

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 1.35

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

👉 कर्ज वाली लक्ष्मी

🔶 एक छोटा 15 साल का भाई अपने पापा से "पापा पापा  दीदी के होने वाले ससुर और सास कल आ रहे है अभी जीजाजी ने  फोन पर बताया". दीदी मतलब उसकी बड़ी बहन की सगाई कुछ दिन पहले एक अच्छे घर में तय हुई थी।

🔷 दीनदयाल जी पहले से ही उदास बैठे थे धीरे से बोले... हां बेटा.. उनका कल ही फोन आया था कि वो एक दो दिन में दहेज की बात करने आ रहे हैं.. बोले... दहेज के बारे में आप से ज़रूरी बात करनी है.. बड़ी मुश्किल से यह अच्छा लड़का मिला था.. कल को उनकी दहेज की मांग इतनी ज़्यादा हो कि मैं पूरी नही कर पाया तो ?" कहते कहते उनकी आँखें भर आयीं..

🔶 घर के प्रत्येक सदस्य के मन व चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी...लड़की भी उदास हो गयी... खैर.. अगले दिन समधी समधिन आए.. उनकी खूब आवभगत की गयी.. कुछ देर बैठने के बाद लड़के के पिता ने लड़की के पिता से कहा" दीनदयाल जी अब काम की बात हो जाए.. दीनदयाल जी की धड़कन बढ़ गयी.. बोले.. हां हां.. समधी जी.. जो आप हुकुम करें.. लड़के के पिताजी ने धीरे से अपनी कुर्सी दीनदयाल जी और खिसकाई ओर धीरे से उनके कान में बोले. दीनदयाल जी मुझे दहेज के बारे बात करनी है!...

🔷 दीनदयाल जी हाथ जोड़ते हुये आँखों में पानी लिए हुए बोले  बताईए समधी जी....जो आप को उचित लगे.. मैं पूरी कोशिश करूंगा..

🔶 समधी जी ने धीरे से दीनदयाल जी का हाथ अपने हाथों से दबाते हुये बस इतना ही कहा..... आप कन्यादान में कुछ भी देगें या ना भी देंगे... थोड़ा देंगे या ज़्यादा देंगे.. मुझे सब  स्वीकार है... पर कर्ज लेकर आप एक रुपया भी दहेज मत देना.. वो मुझे स्वीकार नहीं.. क्योकि जो बेटी अपने बाप को कर्ज में डुबो दे वैसी "कर्ज वाली लक्ष्मी" मुझे स्वीकार नही...मुझे बिना कर्ज वाली बहू ही चाहिए.. जो मेरे यहाँ आकर मेरी सम्पति को दो गुना कर देगी..

🔷 दीनदयाल जी हैरान हो गए.. उनसे गले मिलकर बोले.. समधी जी बिल्कुल ऐसा ही होगा..

🔶 शिक्षा- कर्ज वाली लक्ष्मी ना कोई विदा करें नही कोई स्वीकार करे .. l