शनिवार, 27 अगस्त 2016

👉 गीता का कर्मयोग

👉 गीता का कर्मयोग
 
🔴 प्रत्येक व्यक्ति संसार में किसी न किसी विशेष उद्देश्य से आता है और उसका यह एक जन्मजात स्वभाव भी होता है। वह उस विशेष उद्देश्य को पूरा करते हुए स्वभाव के अनुसार कर्म करने में समर्थ होता है। इसके विपरीत जाने के लिए वह स्वतंत्र नहीं। उदाहरण के रूप में अर्जुन को लीजिए, पृथ्वी के भार को दूर करने के विशेष उद्देश्य से उसका जन्म हुआ था। अतएव इस कार्य में वह परतंत्र हुआ। उसे यह कार्य करना ही होगा। ईश्वर समस्त प्राणियों के हृदय में रहता हुआ उन्हें घुमाता रहता है।

🔵 हमारे शरीर के भीतर जितने रक्त के कण हैं, वे जिस स्थान पर हैं, वहीं रहने के लिए विवश हैं। कहा जा सकता है कि हमारी शक्ति उनके भीतर है और हम उनको संचालित करते हैं, परंतु वे अपने स्थान पर रहते हुए अपनी चेष्टाओं में स्वतंत्र हैं। ऐसे ही ईश्वर द्वारा नियुक्त स्थान पर रहते हुए, संसार में अपने आने के विशेष उद्देश्य को पूर्ण करते हुए मनुष्य अपनी दूसरी चेष्टाओं में स्वतंत्र है।

🔴 यही है मनुष्य का कर्म-स्वातंत्र्य। इसीलिए भगवान् ने `कर्मण्येवाधिकारस्ते’ कहा है, केवल कर्म में अधिकार है, स्वभाव परिवर्तन या ईश्वर के दिए स्थान-परिवर्तन में नहीं। मा फलेषु कदाचन् – फल में तेरा अधिकार कभी नहीं है। अत: कर्म का यह फल होगा ही या फल होना चाहिए, ऐसा सोचकर कर्म करने वाले सर्वदा दु:ख पाते हैं।

🌹 -अखण्ड ज्योति-जुलाई 1940

👉 On The Karma-Yoga of Gita

🔵 Every human being, each one of us, is born in human form to play a specific role, transact some specific duty. This duty and one’s ability to fulfill it depends upon one’s intrinsic character since birth. Honest efforts to do the karmas towards these duties are what could be termed as the gist of Karma Yoga. It was essentially this duty that Arjun was reminded by Lord Krishna in the holy Bhagvad Gita. Lord Krishna made him aware of the majestic purpose for which Arjun was born on the earth. God has given us the freedom of karma and hence of creating our own future destiny; but we can’t escape transacting the destined duties.

🔴  God lives within every living being and triggers the direction of one’s life as per the accumulated effects of one’s past karmas. The molecular or cellular components or the RBCs in our blood are bound to be at the assigned positions and be engaged in specific functions as per their biological nature. They are the parts of our body and hence should be governed by us. But we can’t change their natural properties in any case. Thus, they are independent too… This is how we are also independent in God’s creation.

🔵 We have the freedom in choosing our (new) karma despite having to live as per certain destined circumstances, but the results of these would be according to our intentions, aim and nature of our karma as per the absolute law of the Supreme Creator. That is why God says – “Karmanyeva Adhikarste, Ma Phalesu Kadachan”. Those who understand and follow it are karma-yogis. Those who do not, and always expect desired outputs in return of their actions, are, on the contrary, often found complaining their destiny or the world and remain desperate and dismayed most of the time…

🌹 -Akhand Jyoti, July 1940

2 टिप्‍पणियां: