गुरुवार, 19 जुलाई 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 6)

👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज

🔷 त्रेता में एक ओर रावण का आसुरी आतंक छाया हुआ था, दूसरी ओर रामराज्य वाले सतयुग की वापसी, अपने प्रयास-पुरुषार्थ का परिचय देने के लिए मचल रही थी। इस विचित्रता को देखकर सामान्यजन भयभीत थे। राम के साथ लड़ने के लिए उन दिनों के एक भी राजा की शासकीय सेनाएँ आगे बढ़कर नहीं आईं। फिर भी हनुमान्, अंगद के नेतृत्व में रीछ-वानरों की मंडली जान हथेली पर रख आगे आई और समुद्र-सेतु बाँधने, पर्वत उखाड़ने लंका का विध्वंस करने में समर्थ हुई। राम ने उनके सहयोग की भाव भरे शब्दों में भूरि-भूरि प्रशंसा की। इस सहायक समुदाय में गीध, गिलहरी, केवट, शबरी जैसे कम सामर्थ्यवानों का भी सदा सराहने योग्य सहयोग सम्मिलित रहा।

🔶 महाभारत के समय भी ऐसी ही विपन्नता थी। एक ओर कौरवों की विशाल संख्या वाली सुशिक्षित और समर्थ सेना थी, दूसरी ओर पाण्डवों का छोटा-सा अशक्त समुदाय। फिर भी युद्ध लड़ा गया। भगवान ने सारथी की भूमिका निबाही और अर्जुन ने गाण्डीव से तीर चलाए। जीत शक्ति की नहीं, सत्य की, नीति की, धर्म ही हुई। इन उदाहरणों में गोवर्धन उठाने वाले ग्वाल-बालों का सहयोग भी सम्मिलित है। बुद्ध की भिक्षु मंडली और गाँधी की सत्याग्रही सेना भी इसी तथ्य का स्मरण दिलाती है।

🔷 प्रतिभा ने नेतृत्व सँभाला, तो सहयोगियों की कमी नहीं रही। संसार के हर कोने से, हर समय में ऐसे चमत्कारी घटनाक्रम प्रकट होते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि सत्य की शक्ति अजेय है। उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ उसे गंगावतरण काल के जैसे प्रयोजन में और परशुराम जैसे ध्वंस प्रयोजनों में प्रयुक्त करती रही हैं। महत्त्व घटनाक्रमों और साधनों का नहीं रहा, सदैव मूर्द्धन्य प्रतिभाओं ने ही महान समस्याओं का हल निकालने में प्रमुख भूमिका निबाही है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 7

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 July 2018

👉 आज का सद्चिंतन 19 July 2018


👉 विभूतियाँ महाकाल के चरणों में समर्पित करें

🔷 प्रचारात्मक, संगठनात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक चतुर्विधि कार्यक्रमों को लेकर युग निर्माण योजना क्रमशः अपना क्षेत्र बनाती और बढ़ाती चली जायेगी। निःसन्देह इसके पीछे ईश्वरीय इच्छा और महाकाल की विधि व्यवस्था काम कर रहीं है, हम केवल उसके उद्घोषक मात्र है। यह आन्दोलन न तो शिथिल होने वाला है, न निरस्त। हमारे तपश्चर्या के लिये चले जाने के बाद वह घटेगा नहीं - हजार लाख गुना विकसित होगा। सो हममें से किसी को शंका कुशंकाओं के कुचक्र में भटकने की अपेक्षा अपना वह दृढ़ निश्चय परिपक्व करना चाहिए कि विश्व का नव निर्माण होना ही है और उससे अपने अभियान को, अपने परिवार को अति महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भूमिका का सम्पादन करना ही है।

🔶 परिजनों को अपनी जन्म-जन्मान्तरों की उस उत्कृष्ट सुसंस्कारिता का चिंतन करना चाहिए जिसकी परख से हमने उन्हें अपनी माला में पिरोया है। युग की पुकार, जीवनोद्देश्य की सार्थकता, ईश्वर की इच्छा और इस ऐतिहासिक अवसर की स्थिति, महामानव की भूमिका को ध्यान में रखते हुए कुछ बड़े कदम उठाने की बात सोचनी चाहिए। इस महाअभियान की अनेक दिशाएँ हैं जिन्हें पैसे से, मस्तिष्क से, श्रम सीकरों से सींचा जाना चाहिए। जिसके पास जो विभूतियाँ हैं उन्हें लेकर महाकाल के चरणों में प्रस्तुत होना चाहिए।

🔷 लोभ, मोह के अज्ञान और अंधकार की तमिस्रा को चीरते हुए हमें आगे बढ़ना चाहिए और अपने पास जो हो उसका न्यूनतम भाग अपने और अपने परिवार के लिए रख कर शेष को विश्व मानव के चरणों में समर्पित करना चाहिए। नव निर्माण की लाल मशाल में हमने अपने सर्वस्व का तेल टपका कर उसे प्रकाशवान् रखा है। अब परिजनों की जिम्मेदारी है कि वे उसे जलती रखने के लिए हमारी ही तरह अपने अस्तित्व के सार तत्व को टपकाएँ। परिजनों पर यही कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व छोड़कर इस आशा के साथ हम विदा हो रहे हैं कि महानता की दिशा में कदम बढ़ाने की प्रवृत्ति अपने परिजनों में घटेगी नहीं बढ़ेगी ही।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1971, पृष्ठ 62
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/June/v1.62

👉 देने वाला घाटे में नहीं रहता

🔷 प्रकृति का नियम है—जो देता है वह पाता है; जो रोकता है वह सड़ता है। छोटी पोखर का पानी घटता, सड़ता और सूखता है, किन्तु झरने में सदा स्वच्छता गतिशीलता बनी रहती है और वह अक्षय भी बना रहता है। जो देने से इनकार करेगा वह गतिशीलता के नियम का उल्लंघन करके संचय में निरत होगा, उसे थोड़ा ही मिलेगा। अजस्र अनुदान पाने की पात्रता से उसे वंचित ही रहना पड़ेगा।

🔶 धरती अपना जीवन-तत्व वनस्पति को देती है। अनादि काल से यह क्रम चल रहा है। धरती का कोष घटा नहीं, वनस्पति की सड़न से बना खाद और वर्षा का जल उसका भण्डार भरते चले आ रहे हैं। धरती को देते रहने की साध उसकी मूर्खता नहीं है—जो देती है, प्रकृति उसकी पूरी तरह भरपाई करती रहती है।

🔷 वृक्ष फल-फूल, पत्ते प्राणियों को देते हैं। जड़ें गहराई से लाकर उनकी क्षति पूर्ति करती हैं। समुद्र बादलों को देता है, उस घाटे को नदियाँ अपना जल देकर पूरा किया करती हैं। बादल बरसते हैं उन्हें समुद्र कं गाल नहीं बनने देता। हिमालय अपनी बर्फ गला कर नदियों को देता हैं— नदियाँ जमीन को खींचती हैं। हिमालय पर बर्फ जमने का क्रम प्रकृति ने जारी रखा है, ताकि नदियों को जल देते रहने की उसकी दान वीरता में कमी न आने पावे।

🔶 आज का दिया हुआ भविष्य में असंख्य गुना होकर मिलने वाला है। कब मिलेगा इसकी तिथियाँ न गिनो। विश्वास रख देने वाला खाली नहीं होता। प्रकृति उसकी भरपाई पूरी तरह कर देती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1974 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1974/July/v1