बुधवार, 6 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 62)

🌹  राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान् रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे।

🔴 अगली शताब्दी की संभावनाएँ अद्भुत, अनुपम और अभूतपूर्व हैं। वैज्ञानिक, बौद्धिक और औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ ही उदार चेतना का अवमूल्यन भी इन्हीं दिनों हुआ है। जिसके कारण प्रगति के नाम पर जो कुछ हस्तगत हुआ है, उसका दुरुपयोग होने का परिणाम उलटे रूप में ही सामने आए हैं। सुविधा साधन अवश्य ही बढ़े हैं, पर उलझे मानस ने न केवल व्यक्तित्व का स्तर गिराया है, वरन् साधनों को इस बुरी तरह प्रयुक्त किया है कि पिछले पूर्वजों की सामान्य स्थिति की तुलना में हम कहीं अधिक समस्याओं में फँस जाने जैसी स्थिति अवश्य है, पर ऐसा नहीं हो सकता कि देवत्व से एक सीढ़ी नीचे ही समझा जाने वाला मनुष्य असहाय बनकर अपना सर्वनाश ही देखता रहे, समय रहते न चेतें।

🔵 मानस बदलने से प्रचलन गड़बड़ाते हैं और व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है। बिखराव और विषमता दो बड़े संकट हैं, जो असंख्यों प्रकार के संकटों को जन्म देते हैं। इन्हें निरस्त करने के लिए एकता और समता की सर्वतोमुखी प्रतिष्ठा करनी पड़ती है। इतना बन पड़ने पर वे सभी अवरोध अनायास ही समाप्त हो जाते हैं, जो तिल से ताड़ बनकर, राई का पर्वत बन कर महाविनाश को चुनौती देते हुए गर्ज-तर्जन कर रहे थे। नवयुग में एकता और समता के दोनों सिद्धांत हर व्यक्ति को इच्छा या अनिच्छा और अंगीकार करने पड़ेंगे, ऐसा मनीषियों, भविष्यद्रष्टाओं का अभिमत है। शासन और समाज को भी अपनी मान्यताएँ व्यवस्थाएँ इसी प्रकार की बनानी पड़ेंगी।

🔴 प्रवाह और प्रचलन के अनुरूप अपने स्वभाव में आवश्यक परिवर्तन करने होंगे। अडंगेबाजी तो भली-बुरी व्यवस्था में अपनी उद्दंडता का परिचय देने के लिए कहीं न कहीं से आ टपकती है। जलते दीपक की लौ बुझाने के लिए पतंगों के दल उस पर टूट पड़ने से बाज़ नहीं आते, भले ही इस दुरभिसंधि में उन्हें अपने पंख जलाने और प्राण गँवाने पड़ें। तूफान का मार्ग रोकने वाले वृक्षों को उखड़ते और झोंपड़ों को आसमान में उड़ते हुए आए दिन देखा जाता है। महाकाल के निर्धारण एवं अनुशासन के सामने कोई उद्दंडता अवरोध बन कर अड़ेगी और व्यवधान बनकर कारगर रोकथाम करेगी, इसी आशंका न की जाए तो ही ठीक है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.86

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.16

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 61)

🌹  सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 सार्वजनिक संस्थाओं में स्वार्थपरता और नेतागिरी लूटने के लिए जिन दुरात्माओं ने अड्डा जमा लिया है, उन्हें दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया जाए। धर्म और अध्यात्म का लबादा ओढ़कर जो रंगे सियार अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, उनकी असलियत चौराहे पर नंगी खड़ी कर दी जाए, ताकि लोग उन्हें भरपूर धिक्कारे। भोले लोगों को अनेक हाथों से लूटने से बचाना, एक ऊँची और श्रेष्ठ सेवा होती है। ८० लाख भिखमंगे नाना प्रकार के ढोंग बनाकर जिस तरह ठगी और हरामखोरी करने में जुटे हुए हैं, आखिर उसे कब तक सहन किया जाता रहेगा। स्वच्छ शासन प्रदान करने के लिए राजनैतिक नेता और विधायकों, शासकों और अफसरों को यह सोचने के लिए बाध्य किया जाएगा कि वे अपने निजी लाभ के लिए नहीं, लोकमंगल के लिए ही शासन-तंत्र का उपयोग करें।

🔵 इस प्रकार संघर्ष की बहुमुखी प्रचंड प्रक्रिया अगले दिनों युग निर्माण योजना आरंभ करेगी। उसके साधन जैसे-जैसे विकसित होते जाएँगे, संघ शक्ति जितनी मात्रा में उसके हाथ लगेगी, उसी अनुपात में वह शांत, अहिंसक, सज्जनोचित, सांस्कृतिक कार्य के अथक सम्पादन में जुटेगी। पग-पग पर अनौचित्य के, अन्याय के साथ लड़ा जाने वाला यह धर्म-युद्ध तभी समाप्त होगा, जब मानवता के आदर्श की विजय पताका सारे विश्व में फहराने लगेगी।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.84

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.15

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (अंतिम भाग)

🔵 काम बड़ा है तो उसके अनुरुप व्यक्तित्व भी चाहिए। यह आवश्यकता जब भी जितनी मात्रा में भी पूरी हुई तब उसी अनुपात से व्यापक समस्याओं के समाधान सम्भव हुए हैं। जन साधारण के लिए तो कर्तव्य पालन ही सम्भव होता है।वे अपनी निज समस्याओं को सुलझाने में ही अधिकाँश क्षमता खो बैठते हैं जो बचती है उससे लोक मंगल का प्रयोजन एक सीमा तक ही पूरा करपाते हैं। यों बूँद-बूँद से भी घड़ा भरता है पर उन बूँदों का संचय करने और उस संचय का सदुपयोग करने की प्रतिभा भी तो किसी में चाहिए।

🔴 नव निर्माण में असंख्य दिशा धाराएँ हैं-विकृतियों से जूझने के लिए असंख्य मोर्चे हैं, पाटने के लिए अनेक खाई, खन्दक और बनने के लिए अनेकों पुत्रल बाँध सामने है। इनके लिए जितनी साधन सामग्री चाहिए उससे अनेक गुनी आवश्यकता उन हस्तियों की है जो मौलिक विशेषताओं से संचित सपदाओं की दृष्टि से सम्पन्न एवं समर्थ कही जा सकें।उथले लोग गुब्बारे की तरह फूलते और बबूले की तरह फूटते रहते हैं।

🔵 युग सृजन के लिए सम्पदा, प्रतिभा, शिक्षा, श्रमशीलता जैसी विभूतियाँ प्रचुर परिमाण में चाहिए ही। पर उससे भी अधिक आवश्यकता उन देवात्माओं की है जिनमें आन्तरिक वर्चस् विपुल परिमाणों से भरा पड़ा हैं वर्चस् ही आत्मबल हैं। ओजस्वी, मनस्वी, तेजस्वी, व्यक्ति वही होते हैं जिनमें इस आन्तरिक वैभव की दैवी अनुदान की-समुचित मात्रा विद्यमान हो।
 
🔴 इस खोज को इन दिनों सबसे अधिक महत्व दिया जाना है। कठिन उत्तरदायित्व सामने हैं उन्हें निभाने योग्य प्रतिभाओं के आगे आने और लाने की आवश्यकता ऐसी है जिसे एक क्षण के लिए भी आगे नहीं टाला जा सकता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 51
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.51

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Sep 2017

🔵 सच्चरित्रता को आस्तिकता का पर्यायवाची शब्द माना जा सकता है। ढोंग जैसी झूठी भक्ति, जिसमें साढ़े  तेईस घंटे पाप करते रहने और आधे घंटे पूजा-पत्री करके सारे पापों से छुटकारा मिलने की प्रवंचना सिखाई जाती है, उपहासास्पद हो सकती है। इसी प्रकार देव दर्शन से सकल मनोरथ सहज ही पूरे जो जाने की मान्यता भी धृष्टता कही जा सकती है पर सच्चे अध्यात्म का सच्ची आस्तिकता का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं होता। ईश्वर विश्वास का आस्तिकता का प्रतिफल एक ही होना चाहिए- सन्मार्ग का अवलम्बन और कुमार्ग का त्याग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म और कर्तव्य का अनुशासन स्थापित करने के लिए ईश्वर विश्वास से बढ़कर और कोई प्रभावशाली माध्यम हो नहीं सकता।

🔴 प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को सार्थक एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आधारशिला-आस्तिकता को जीवन में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करे। ईश्वर को अपना साथी, सहचर मानकर हर घड़ी निर्भय रहे और सन्मार्ग से ईश्वर की कृपा एवं कुमार्ग से ईश्वर की सजा प्राप्त होने के अविचल सिद्धान्त को हृदयंगम करता हुआ अपने विचारों और आचरणों को सज्जनोचित बनाने का प्रयत्न करता रहे। इसी प्रकार जिसे अपने परिवार में, स्त्री बच्चों से सच्चा प्रेम हो, उसे भी यही प्रयत्न करना चाहिए कि घर के प्रत्येक सदस्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार आस्तिकता का प्रवेश हो। परिवार का बच्चा-बच्चा ईश्वर विश्वासी बने।

🔵 अपने परिवार के लोगों के शरीर और मन को विकसित करने के लिए जिस प्रकार भोजन और शिक्षण की व्यवस्था की जाती है उसी प्रकार आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ बनाने के लिए घर में बाल-वृद्ध सभी की उपासना में निष्ठा एवं अभिरुचि बनी रहे। इसके लिए समझाने - बुझाने का तरीका सबसे अच्छा है। गृहपति का अनुकरण भी परिवार के लोग करते है इसलिए स्वयं नित्य नियमपूर्वक नियत समय पर उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाय। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है। आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जातीं और उन्हें उपहास तथा उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। यही वातावरण अपने घर में भी धुला हुआ हो सकता है, पर उसे हटाया तो जाना ही चाहिए। देर तक सोना, गंदे रहना, पढ़ने में लापरवाही करना, ज्यादा खर्च करना, बुरे लोगों की संगति आदि बुराइयां घर के किसी सदस्य में हो तो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। क्योंकि यह बातें उनके भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाली, अहितकर सिद्ध हो सकती हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन के उतार-चढावों पर उद्विग्न न हों। (भाग 2)

🔵 अयोग्य विद्यार्थी का न तो कोई वर्तमान होता है और न भविष्य। वह निकम्मा, चाहे दुःख हो, चाहे प्रसन्न कोई अन्तर नहीं पड़ता। इस प्रकार पतन द्वारा पाई असफलता तो दुःख का हेतु है, किन्तु पुरुषार्थ से अलंकृत प्रयत्न की असफलता दुःख खेद का नहीं, चिन्तन−मनन और अनुभव का विषय है। आशा, उत्साह, साहस और धैर्य की परीक्षा का प्रसंग है। प्रयत्न की असफलता स्वयं एक परीक्षा है। मनुष्य को उसे स्वीकार करना और उत्तीर्ण करना ही चाहिए।

🔴 प्रायः आर्थिक उतार लोगों को बहुत दुःखी बना देता है। जिसका लंबा−चौड़ा व्यापार चलता हो। लाखों रुपये वर्ष की आमदनी होती हो, सहसा उसका रोजगार ठप हो जाए, कोई लंबा घाटा पड़ जाए, हैसियत, बिगड़ जाए और वह असाधारण से साधारण स्थिति में आ गिरे तो वह अवश्य ही दुःखी और शोक−ग्रस्त रहने लगेगा। फिर भी इस आर्थिक उतार का शोक करना उचित नहीं। क्योंकि शोक करने से स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। यदि शोक करने और दुःखी रहने से स्थिति में सुधार की आशा हो तो एक बार शोक करना और दुःखी रहना उस स्थिति में किसी हद तक उचित कहा जा सकता है। किन्तु यह सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि विपन्नता का उपचार दुःखी रहना नहीं, बल्कि उत्साहपूर्वक पुरुषार्थ करना ही है। तथापि लोग उल्टा आचरण करते हैं। यह कम खेद की बात नहीं है।

🔵 सम्पन्नता से विपन्नता में आ जाने पर लोग क्यों दुःखी रहते हैं? इसके अनेक कारण होते हैं। इसका एक कारण तो है अपनी वर्तमान स्थिति से विगत स्थिति की तुलना करना। दूसरा कारण है दूसरों की संपन्न स्थिति को सामने रखकर अपनी स्थिति देखना। तीसरा कारण है, सामाजिक अप्रतिष्ठा की आशंका करना चौथा कारण है लज्जा और आत्म−हीनता का भाव रखना। और पाँचवाँ कारण है, विगत वैभव का व्यामोह। यह और इसी प्रकार के अन्य कारणोंवश लोग अपने आर्थिक उतार पर दुःखी और शोकग्रस्त रहा करते हैं। किन्तु यदि इन कारणों पर गहराई से विचार किया जाए तो पता चलेगा कि इन कारणों को सामने रखकर अपनी विपन्नता पर शोक करना बड़ी हल्की और निरर्थक बात है। इनमें से कोई कारण तो ऐसा नहीं, जिसे शोक का उचित सम्पादक माना जा सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1970 पृष्ठ 56
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/January/v1.56

👉 आज का सद्चिंतन 6 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Sep 2017


👉 यह संसार क्या है?

🔴 एक दिन एक शिष्य ने गुरु से पूछा, 'गुरुदेव, आपकी दृष्टि में यह संसार क्या है? ' इस पर गुरु ने एक कथा सुनाई। 'एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया। कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती।

🔵  कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।'

🔴 कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा, 'संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं। जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता।'

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...