मंगलवार, 4 अक्तूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 48)


और तब गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए एक वाणी ने मेरी आत्मा से कहा : -

🔵 वत्स! अपने गुरु पर असीम श्रद्धा रखो। उनकी कृपा से, उनके ज्ञान से तुम्हारी अन्तरात्मा पुनर्जीवित हो उठी है। उन्होंने तुम्हारा चयन किया है तथा उनके द्वारा ही तुम पूर्ण बनाये गये हो। गुरु की अनुभूतियाँ शिष्य पर मूसलाधार वर्षा के समान गिरती हैं। यह सतत चलता और इसे कोई रोक नहीं सकता। तुम्हारे प्रति उनका प्रेम असीम है। तुम्हारे लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते है। वे तुम्हें कभी नहीं त्यागेंगे। उनका प्रेम ही उनकी दिव्यता का प्रमाण है। उनका अभिशाप भी छद्म में वरदान है।

🔴 तुम्हारे गुरु की अनुभूति तुम्हारे सामने प्रत्यक्ष और घनीभूत रूप में है। वस्तुत: उनके जीवन के परिवर्तन के द्वारा ही तुम आध्यात्मिक सत्य के दर्शन करते हो। तुम्हारे लिए और कोई मार्ग नहीं है। स्वयं को पूर्णत: गुरु के प्रति समर्पित कर दो। सब देवता भी क्या हैं? जिसने अपने स्वरूप की अनुभूति कर ली वही सबसे महान आध्यात्मिक पुरुष है। जिसने आत्मा का दर्शन कर लिया है उसकी महिमा को देख कर मनुष्य उस अनुभूति को विभिन्न रूपों में देख पाता है। गुरुदेव व्यक्तित्व की सीमा से बहुत अधिक हैं। उनके द्वारा आध्यात्मिक सत्य के सभी पक्ष प्रकाशित होते है। क्या वे स्वयं शिव नहीं हैं?

🔵 शिव महान् गुरु के एक पक्ष मात्र हैं। अपने गुरु का शिव रूप में ध्यान करो। इष्ट के रूप में ध्यान करो और ध्यान के सर्वोच्च क्षणों में तुम पाओगे कि गुरुदेव तुम्हारे इष्ट में विलीन हो गये हैं। आत्मसाक्षात्कार के द्वारा आध्यात्मिक सत्य के मूर्त स्वरूप बने श्रीगुरुदेव तुम्हारे सम्मुख खड़े हैं। फिर तुम भावनात्मक देवताओं या देवी देवताओं संबंधी धारणा को ले कर क्या करोगे ? तुम जहाँ भी जाओगे गुरु तुम्हारे साथ रहेंगे। क्योंकि मनुष्य की सहायता करने के लिए उन्होंने निर्वाण का भी त्याग कर दिया है। इस रूप में वे सचमुच दूसरे बुद्ध हैं। क्योंकि उन्होंने अपने स्वरूप का साक्षात्कार कर लिया है अत: उनका व्यक्तित्व और अधिक सत्य तथा शक्तिशाली हो उठा है। ब्रह्मचैतन्य लाभ करने के कारण वे अतिमानवीय जीवन तथा ज्ञान से संपन्न हैं।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 5 Oct 2016


🔴 मानव जीवन उन्नति और प्रगति का अवसर है। इसका उपयोग कर मनुष्य किसी भी दिशा में कितनी ही उन्नति कर सकता है, किन्तु इस उन्नति का आधार एकमात्र श्रम और पुरुषार्थ ही है। ऐसा पुरुषार्थ जो कर्मयोग के भाव से प्रेरित और तपश्चर्या की गरिमा से किया जाय। ऐसा श्रम आनंददायक, सफलतादायक और पुण्यदायक भी होता है।

🔵 भाग्यवादी ऐसे पंगु की तरह हैं, जो अपने पाँवों पर नहीं, दूसरों के कंधों पर चलते हैं। जब तक दूसरे बुद्धिमान् व्यक्ति उसे उठाये रहते हैं, तब तक तो वह किसी प्रकार चलता रहता है। दूसरों का आधार हटते ही वह गिरकर नष्ट हो जाता है। उन्नति करने के लिए, संघर्ष के लिए उसमें न पुरुषार्थ होता है, न समुचित उल्लास और न अध्यवसाय।

🔴 जो लोग अध्यात्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ, कथा-वार्ता, उपवास-व्रत, तीर्थयात्रा, कर्मकाण्ड आदि को समझते हैं, वे गलती पर हैं। ये बातें अध्यात्म भावना उत्पन्न करने में सहायक हो सकती हैं, पर इनको स्वयं अध्यात्म नहीं कहा जा सकता। अध्यात्म तो तभी समझा जा सकता है, जब मनुष्य में ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की मनोवृत्ति उत्पन्न हो जाए और वह तद्नुसार व्यवहार करने लगे।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 47)

🔵 सच्चा ज्ञान  सदैव एक चेतन अनुभूति की प्रक्रिया है। विचारों को आत्मसात् करना भोजन ग्रहण करने के समान ही हमारे चेतन व्यक्तित्व को स्पर्श करता है तथा उस पर प्रभाव डालता है। स्नायुजालों को, विचारों को अवश्य आत्मसात् करना चाहिये तब समस्त शरीर ही चैतन्यमय हो उठता है। शरीर आत्मा हो उठता है। इसी अर्थ में कुछ आचार्यों ने कहा है कि मैं शरीर से भी चिन्मय हूँ। इसीलिए गुरु की शारीरिक सेवा भी एक सौभाग्य हैं। तब शरीर स्वयं चैतन्य की एक प्रक्रिया बन जाता है।

🔴 वत्स! एक बहुत बड़ा कार्य जो तुम्हें करना होगा वह है आत्मसंपर्क। अभी तुम्हारे मन की एकाग्रता अधिकांश परिस्थितियों तथा वातावरण पर निर्भर है।तुम दूसरों से संपर्क करने की आवश्यकता अनुभव करते हों। किन्तु दूसरे का मन तुम्हें थोड़ी उत्तेजना भर दे सकता है। जब तुम दूसरों से बातचीत करते हो तब भी तो स्वयं अपने आपसे भी बात करते हो। किन्तु ज्ञान जो सच्चा प्रेरक कह भीतर से आना चाहिये। दूसरों पर क्यों निर्भर रहोगे ? गैंडे के समान अकेले बढ़ चलो।

🔵 वत्स! मन स्वयं ही गुरु हो जाता है। यह एक प्राचीन उपदेश है। क्यों? क्योंकि मन पर आत्मसाक्षात्कार के लिए जोर डालने वाले तुम स्वयं ही तो दिव्य हो। मैं तथा अन्य सभी उस महान सत्य के विभिन्न पथ हैं। जब मैं शरीर में था, तुम्हारे स्तर पर के चैतन्य का आश्रय किया था, वह मानो एक खिड़की थी जिससे तुम अनंत को देख पाते थे। किन्तु वह चेतना जो कि मैं था, मैं स्वयं ही उसे महान दिव्य सत्ता में विलीन करने की चेष्टा करता हूँ। तुममें जो सत्य है, मुझमें जो सत्य है, वह ब्रह्म ही है। वत्स! उस ब्रह्म की ही पूजा करो! उसी की उपासना करो।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 सन्तोष का फल मधुर है

किसी कसाई के यहाँ एक बकरा और कुत्ता था, बकरे को वह अच्छे स्थान पर बाँध कर नित्य हरी-हरी घास खिलाता, उसके रहने का स्थान साफ किया करता था।...