रविवार, 5 फ़रवरी 2017

प्रेरणादायक प्रसंग 6 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 6 Feb 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 29) 6 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र-   
🔴 आत्मोत्कर्ष की दूसरा अवलम्बन है-साधना साधना अर्थात् जीवन साधना। साधना अर्थात् अस्तव्यस्तता को सुव्यवस्था में बदलना। इसके लिये दो प्रयास निरन्तर जारी रखने पड़ते हैं-एक अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों को बारीकी से देखना, समझना और उन्हें उखाड़ने के लिये अनवरत प्रयत्नशील-संघर्षशील रहना। दूसरा कार्य है-मानवी गरिमा के अनुरूप जिन सत्प्रवृत्तियों की अभी कमी मालूम पड़ती है, उनकी आवश्यकता, उपयोगिता को समझते हुए, उसके लिये अनुकूलता स्तर का मानस बनाना। यह उभयपक्षीय क्रम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यवहृत होते चले तो समझना चाहिये कि जीवन साधना साधने का सरंजाम जुटा।                    

🔵 माना कि कार्य समयसाध्य और श्रमसाध्य है, फिर भी वह असम्भव नहीं है। कछुआ धीमी गति से चलकर भी बाजी जीत गया था। असफल तो वे खरगोश होते हैं जो क्षणिक उत्साह दिखाने के उपरान्त मन बदल लेते और इधर-उधर भटकते हैं। स्थिरता, तत्परता और तन्मयता हर प्रसंग में सफलता का श्रेष्ठ माध्यम बनती हैं। जीवन साधना के लिये भी किया गया प्रयत्न सफल होकर ही रहता है।

🔴 किसान अपने खेत में खरपतवार उखाड़ता रहता है। कंकड़- पत्थर बीनता रहता है, इसे परिशोधन कहा जा सकता है। जानवरों, पक्षियों से खेत की रखवाली करना भी इसी स्तर का कार्य है। कीटनाशक दवाओं का प्रयोग भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये है। खेत में खाद-पानी लगाना पड़ता है। यह परिपोषण पक्ष है। निराई-गुड़ाई का एक उद्देश्य यह भी है कि जमीन पोली बनी रहे। जड़ों में धूप, हवा की पहुँच बनी रहे। फसल को उगाने का यही तरीका है। जीवन को सुविकसित करना भी एक प्रकार का कृषि का कार्य है। इसके लिये भी इसी नीति को अपनाना होता है।       

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नौ सौ बच्चों के स्नेहपूर्ण पिता

🔴 शार्लोट (उत्तरी कैरोलाइना) के विला हाइट्स प्राथमिक स्कूल में चले जाइए। वहाँ के प्रधानाध्यापक श्री राल्फ क्लाइन को आप सदा बच्चों की चिंता में मग्न पायेंगे। इस शाला में नौ सौ बच्चे है। श्री राल्फ क्लाइन का बच्चों के प्रति अत्यंत की स्नेहसिक्त है।

🔵 अपनी कुर्सी पर बैठकर कार्य तो वे बहुत ही कम करते है। अधिकांश समय वे विद्यार्थियों तथा शिक्षकों के बीच गलियारों में घूमते हुये ही बिताते हैं, खाली समय मे भी वे विशेषत: ऐसे ही विद्यार्थियों को उद्बोधन देते रहते हैं, जिनकी रुचि पढ़ने-लिखने में कम होती है या जो किसी विशेष कमी के शिकार होते है।

🔴 इस शाला के बच्चों के लिए उनके सद्भाव, सद्व्यवहार, स्नेह तथा आत्मीयता की उपयोगितायों और अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि उसमे अधिकांशत: पिछडे वर्ग के बच्चे ही शिक्षा पाते है।

🔵 किसी-किसी को तो जीवन की मूल आवश्यकताओ की पूर्ति के साधन भी उपलब्ध नहीं होते।

🔴 श्री क्लाइन का मत है कि जब तक बच्चे की मूल तथा प्रारंभिक आवश्यकताऐं पूर्ण नहीं होती-उससे अच्छी पढाई, या किसी भी कुशलता अथवा सफलता की आशा करना व्यर्थ है। उन्होंने अपनी शाला में दोपहर के निःशुल्क भोजन की व्यवस्था की है। कभी-कभी नाश्ता भी दिया जाता है।

🔴 वे स्वयं प्रत्येक कठिनाइ का हल निकालकर, छात्रों तथा शिक्षकों की समस्याओं का समाधान करते हैं। उनका व्यवहार उन सबके प्रति वैसा ही है, जैसा किसी परिवार के मुखिया का होता है। बच्चों से असीम स्नेह-अतुल प्यार तथा आत्मीयतापूर्ण अपनापन। किंतु साथ ही इतनी स्वतंत्रता भी नहीं कि उच्छृंखलता को किसी प्रकार का बढावा मिले।

🔵 उनके प्रशिक्षण का ढंग अत्यंत ही अनुशासित तथा व्यवस्थित है। प्रत्येक विद्यार्थी के विषय में वे पूरी जानकारी रखते हैं कि उसकी मनोभूमि किस स्तर की है उसी प्रकार वे उससे व्यवहार तथा आशाएँ रखते हैं।

🔴 उनका कहना है कि बच्चे अपनी सहज ग्रहणशीलता के आधार पर यह जान जाते हैं कि आप उनका ध्यान रखते हैं या नहीं। अपने शिक्षको को भी उन्होंने इस प्रकार के निर्देश दे रखे हैं कि वे बालक बालिकाओं से अत्यंत ही प्रेम पूर्ण व्यवहार करें। गलती भी समझाएँ, पर उचित तथा मनोवैज्ञानिक ढंग से।

🔵 हाँ और यदि कोई बच्चा सीधे-सीधे समझाने तथा प्रयत्न करने पर भी सही रास्ते पर नहीं आता, तब कडाई का व्यवहार भी करते हैं उसी प्रकार जैसे एक अनुभवी पिता अपने बच्चों को गलत राह जाने से रोकता है। उनका अपना भी यही मत है कि बच्चों के मस्तिष्क मे यह बात भली-भॉति बैठा देनी चाहिए कि शिक्षक उनके साथ तभी कड़ा बर्ताव करता है, जबकि कुछ गलत कार्य मना करने पर भी करते है और शिक्षक तब बहुत प्यार करते हैं-जब बच्चे कोई अच्छा और उत्साहवर्द्धक कार्य करते है।

🔴 श्री क्लाइन-अपने आप में आदर्श शिक्षक के एक उदाहरण हैं। चालीस वर्ष की अवस्था में भी युवकों जैसी स्फूर्ति तथा उत्साह एवं हँसमुख स्वभाव उनके व्यक्तित्व का विशेष आकर्षण  है। आज के शिक्षकों को जो अपना उत्तरदायित्व पूर्ण रूप से नहीं निभाते इनसे बहुत कुछ सीखना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 11, 12

👉 मन को सदा सद्विचारों में संलग्न रखिये?

🔵 मनुष्य जब तक जीवित रहता है सर्वदा कार्य में संलग्न रहता है, चाहे कार्य शुभ हो या अशुभ। कुछ न कुछ कार्य करता ही रहता है और अपने कर्मों के फलस्वरूप दुःख सुख पाता रहता है, बुरे कर्मों से दुःख एवं शुभ कर्मों से सुख।

🔴 जब हम ईश्वर की आज्ञानुसार कर्म करते हैं तो हमें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है क्योंकि वे कार्य शुभ होते हैं परन्तु जब हम उनकी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करते हैं तभी दुःखी होते हैं, दुःख से छुटकारा पाने के लिये हमें सदैव यह प्रयत्न करना चाहिए कि हम बुराइयों से बचें।

🔵 ईश्वर आज्ञा देता है कि “हे मनुष्यों! इस संसार में सत्कर्मों को करते हुए 100 वर्ष तक जीने की इच्छा करो। सत्कर्म में कभी आलसी और प्रमादी मत बनो, जो तुम उत्तम कर्म करोगे तो तुम्हें इस उत्तम कर्म से कभी भी दुःख नहीं प्राप्त हो सकता है। अतः शुभ कार्य से कभी वंचित न रहो।”

🔴 हम लोगों का सबसे बढ़कर सही कर्त्तव्य है कि हम मन को किसी क्षण कुविचारों के लिए अवकाश न दें क्योंकि जिस समय हमें शुभ कर्मों से अवकाश मिलेगा उसी समय हम विनाशकारी पथ की ओर अग्रसर होंगे।

🔵 मनुष्य का जीवन इतना बहुमूल्य है कि बार-बार नहीं मिलता, यदि इस मनुष्य जीवन को पाकर हम ईश्वर की आज्ञा न मानकर व्यर्थ कर्मों में अपने समय को बरबाद कर रहे हैं तो इससे बढ़कर और मूर्खता क्या है? इससे तो पशु ही श्रेष्ठ है जिनसे हमें परोपकार की तो शिक्षा मिलती है।

🔴 हमारे जीवन का उद्देश्य सर्वदा अपनी तथा दूसरों की भलाई करना है। क्योंकि जो संकुचित स्वार्थ से ऊंचे उठकर उच्च उद्देश्यों के लिए उदार दृष्टि से कार्य करते हैं वे ही ईश्वरीय ज्ञान को पाते हैं और वही संसार के बुरे कर्मों से बचकर शुभ कर्मों को करते हुए आनन्द को उपलब्ध करते हैं। जो प्रत्येक जीव के दुःख को अपना दुःख समझता है तथा प्रत्येक जीव में आत्मभाव रखता है अथवा परमपिता परमात्मा को सदैव अपने निकट समझता है वह कभी पाप कर्म नहीं करता जब पाप कर्म नहीं तो उसका फल दुःख भी नहीं। इसलिए हमें सदा ईश्वर परायण होना चाहिए और सद्विचारों में निमग्न रहना चाहिए जिससे मानव जीवन का महान लाभ उपलब्ध किया जा सके।

🌹 अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/March/v1.19

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Feb 2017

🔵 लोगों के हाथों अपनी प्रसन्नता-अप्रसन्नता बेच नहीं देनी चाहिए। कोई प्रशंसा करे तो हम प्रसन्न हों और निन्दा करने लगे तो दुःखी हो चलें? यह तो पूरी पराधीनता हुई। हमें इस संबंध में पूर्णतया अपने ही ऊपर निर्भर रहना चाहिए और निष्पक्ष होकर अपनी समीक्षा आप करने की हिम्मत इकट्ठी करनी चाहिए। निन्दा से दुःख लगता हो तो अपनी नजर में अपने कामों को ऐसे घटिया स्तर का साबित न होने दें जिसकी निन्दा करनी पड़े। यदि प्रशंसा चाहते हैं तो अपने कार्यों को प्रशंसनीय बनायें।

🔴 घृणा पापी से नहीं, पाप से करो। यथार्थ में पापी कोई मनुष्य नहीं होता, वरन् पाप मनुष्य की एक अवस्था है। इसलिए यदि संशोधन करना हो तो पाप का ही करना चाहिए। अपराधी को यदि दण्ड देना हो तो उसे सुधारने के लिए ही दिया जाना चाहिए। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज की प्रत्येक अवस्था का उस पर प्रभाव पड़ सकता है इसलिए किसी को घृणापूर्वक बहिष्कृत कर देने से समस्या का समाधान नहीं होता, वरन् बुराई का शोधन करके अच्छे व्यक्तियों का निर्माण करने से ही उस अवस्था का नाश किया जा सकता है, जो घृणित है, हेय और जिससे सामाजिक जीवन में विष पैदा होता है।

🔵 दूसरा दूसरों को न तो खींच सकता है और न दबा सकता है। बाहरी दबाव क्षणिक होता है। बदलतो तो मनुष्य अपने आप है, अन्यथा रोज उपदेश-प्रवचन सुनकर भी इस कान से उस कान निकाल दिये जाते हैं। दबाव पड़ने पर बाहर से कुछ दिखा दिया जाता है, भीतर कुछ बना रहता है। इन विडम्बनाओं से क्या बनना है। बनेगा तो अंतःकरण के बदलने से और इसके लिए आत्म-प्रेरणा की आवश्यकता है। क्रान्ति अपने से ही आरंभ होगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 2)

🌹 मानव जीवन विचारों का प्रतिविम्ब

🔴 संसार में दिखाई देने वाली विभिन्नतायें, विचित्रतायें भी हमारे विचारों का ही प्रतिविम्ब ही हैं। संसार मनुष्य के विचारों की ही छाया है। किसी के लिए संसार स्वर्ग है तो किसी के लिए नरक। किसी के लिए संसार अशान्ति, क्लेश, पीड़ा आदि का आगार है तो किसी के लिए सुख सुविधा सम्पन्न उपवन। एक-सी परिस्थितियों में, एक-सी सुख-सुविधा समृद्धि से युक्त दो व्यक्तियों में भी अपने विचारों की भिन्नता के कारण असाधारण अन्तर पड़ जाता है।

🔵 एक जीवन में प्रतिक्षण सुख-सुविधा, प्रसन्नता, खुशी, शान्ति, सन्तोष का अनुभव करता है तो दूसरा पीड़ा, कोक, क्लेशमय जीवन बिताता है। इतना ही नहीं कई व्यक्ति कठिनाई का अभावग्रस्त जीवन बिताते हुए भी प्रसन्न रहते हैं तो कई समृद्ध होकर भी जीवन को नारकीय यन्त्रणा समझते हैं। एक व्यक्ति अपनी परिस्थितियों में सन्तुष्ट रहकर जीवन के लिए भगवान् को धन्यवाद देता है तो दूसरा अनेक सुख-सुविधायें पाकर भी असन्तुष्ट रहता है। दूसरों को कोसता है, महज अपने विचारों के ही कारण।

🔴 प्राचीन ऋषि-मुनि आरण्यक जीवन बिताकर, कन्द-मूल-फल खाकर भी सन्तुष्ट और सुखी जीवन बिताते थे और धरती पर स्वर्गीय अनुभूति में मग्न रहते थे। एक ओर आज का मानव है जो पर्याप्त सुख-सुविधा समृद्धि, ऐश्वर्य, वैज्ञानिक साधनों से युक्त जीवन बिताकर भी अधिक क्लेश, अशान्ति, दुःख, उद्विग्नता से परेशान है। यह मनुष्य के विचार चिन्तन का ही परिणाम है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक स्वर्ट अपने प्रत्येक जन्मदिन में काले और भद्दे कपड़े पहनकर शोक मनाया करते थे। वह कहते थे—‘‘अच्छा होता यह जीवन मुझे न मिलता, मैं दुनिया में न आता।’’ इसके ठीक विपरीत

🔵 अन्धे कवि मिल्टन कहा करते थे—‘‘भगवान् का शुक्रिया है जिसने मुझे जीने का अमूल्य वरदान दिया।’’ नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने अन्तिम दिनों में कहा था—‘‘अफसोस है कि मैंने जीवन का एक सप्ताह भी सुख-शान्तिपूर्वक नहीं बिताया।’’ जबकि उसे समृद्धि, ऐश्वर्य, सम्पत्ति, यश आदि की कोई कमी नहीं रही। सिकन्दर महान् भी अपने अन्तिम जीवन में पश्चात्ताप करता हुआ ही मरा। जीवन में सुख-शांति, प्रसन्नता अथवा दुःख, क्लेश, अशांति, पश्चात्ताप आदि का आधार मनुष्य के अपने विचार हैं, अन्य कोई नहीं। समृद्ध, ऐश्वर्य सम्पन्न जीवन में भी व्यक्ति गलत विचारों के कारण दुखी रहेगा और उत्कृष्ट विचारों से अभावग्रस्त जीवन में भी सुख-शान्ति, प्रसन्नता का अनुभव करेगा, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 9)

🌹 तीनों उद्यान फलेंगे और निहाल करेंगे

🔵 सम्पन्नता के अतिरिक्त दूसरा उद्यान शिक्षा का है, जिसे बुद्धिमत्ता दूरदर्शिता, एकाग्रता आदि के नाम से भी जाना जाता है। वकील, इंजीनियर, कलाकार, विद्वान, मनीषी आदि को देखकर अपना भी मन चलता है कि काश! हमें भी ऐसा संयोग मिला होता, तो अधिक कमाने और अधिक सम्मान पाने की परिस्थिति हाथ लगी होती? पर इस स्थिति से वञ्चित रहने का दोष परिस्थितियों या अमुक व्यक्तियों पर देना भी व्यर्थ है। यदि शिक्षा का महत्त्व समझा और उत्साह उभारा जा सके, तो बौद्धिक दृष्टि से समुन्नत बनने के लिए आवश्यक सुविधाएँ अनायास ही खिंचती चली आती हैं। संसार के अधिकांश मनीषी, प्रतिकूलताओं से जूझते हुए अपने लिए अनुकूलता उत्पन्न करते रहे हैं।

🔴 इस लेखक को एक ऐसे साथी के सम्बन्ध में जानकारी है, जो एक वर्ष की जेल काटने के साथ साथ लोहे के तसले पर कंकड़ को कलम बनाकर अंग्रेजी पढ़ता रहा। एक पुराने अखबार ने ही पुस्तकों की आवश्यकता पूरी कर दी। साथियों में ही ऐसे मिल गए जो पढ़ने में प्रसन्नतापूर्वक सहायता करते रहे। एक वर्ष में ही इतनी सफलता अर्जित कर ली, जिसे देखकर लोगों को आश्चर्यचकित रहना पड़ा था। इसमेें न जादू है, न चमत्कार।

🔵 भीतर का प्रसुप्त यदि अँगड़ाई लेकर उठ खड़ा हो और कुछ कर गुजरने की उमंगों से अपने को अनुप्राणित कर ले, तो समझना चाहिए कि सरस्वती उसके आँगन में नृत्य करने के लिए सहमत हो गई। अन्य विभूतियों की तरह विद्या भी मनुष्य के आन्तरिक आकर्षण से अनायास ही खिंचती चली आती है। संसार के प्रगतिशील मनीषियों का इतिहास इस सन्दर्भ में पग-पग पर साक्षी देने के लिए विद्यमान है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 संकल्पवान्-व्रतशील बनें (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 रावण से लड़े बिना कहीं काम चला? दुर्योधन से लड़े बिना काम चला? कंस से लड़े बिना काम चला? लड़ाई मोहब्बत की है अथवा कैसी है, हिंसा की है, अहिंसा की है, ये मैं इस वक्त बात नहीं कह रहा हूँ। मैं तो यह कह रहा हूँ कि आपको अपनी बुराइयों, कमजोरियों से मुकाबला करने के लिये और समाज में फैले अनाचार से लोहा लेने के लिए भी, हर हालत में आपको ऐसे ऊँचे विचारों की सेना बनानी चाहिए जो आपको भी हिम्मत देने में समर्थ हो सके और आपके समीपवर्ती इस वातावरण में भी नया माहौल पैदा करने में समर्थ हो सके। ये संकल्प भरे विचार होते हैं।

🔵 हजारी किसान ने ये फैसला किया था कि ‘‘मुझे हजार आम के बगीचे लगाने हैं।’’ बस घर से निकल पड़ा तो उसकी बात लोगों ने मान ली। क्यों मान ली? वो संकल्पवान् था। संकल्पवान् नहीं होता, तब ऐसे ही व्याख्यान करता फिरता, ‘‘साहब! पेड़ लगाइये, हरियाली बढ़ाइये।’’ तब कोई लगाता क्या? संसार इतना प्रचार किया करती है, कोई सुनता है क्या? सुनने के लिये ये बहुत जरूरी है कि जो आदमी उस बात को कहने के लिये आया है, वो संकल्पवान् हो। संकल्पवान् होने का अर्थ है, ऊँचे सिद्धान्तों को अपनाने का निश्चय। अवश्य निश्चय में कोई, रास्ते में कोई व्यवधान न आये, इसीलिये थोड़े-थोड़े समय के लिये ऐसे अनुशासन जिससे कि स्मरण बना रहे, मनोबल बढ़ता रहे, मनोबल गिरने न पाये। संकल्प की याद करके आदमी अपनी गौरव-गरिमा को बनाये रह पाये। इसलिये आपको व्रतशील होना जरूरी है।

🔴 पीले कपड़े पहनने के लिये आपको कहा गया है, ये व्रतशील होने की निशानी है। दूसरे लोग पीले कपड़े नहीं पहनते, आपको पहनना चाहिए। इसका मतलब ये है, दुनिया का कोई दबाव आपके ऊपर नहीं है और दुनिया की नकल करने में और अनुकरण करने में आपकी कोई मर्जी नहीं है। ये क्या है, ये व्रतशील की निशानी है। भोजन जैसा भी हो, खराब है तो खराब से क्या करें? खराब से ही काम चलायें, लेकिन नहीं साहब! जायका अच्छा नहीं लगता, वहाँ कचौड़ी खायेंगे। मत कीजिए ऐसा। तरह-तरह के व्यंजन और तरह-तरह के स्वादिष्ट भोजन की बात मत चलाया कीजिए। फिर क्या होगा? खान-पान का जो लाभ होगा तो होगा ही, खान-पान के लाभों को मैं इतना महत्त्व देता नहीं, जितना कि इस बात को महत्त्व देता हूँ कि आपने अपने मन को कुचल डालने का, मन से लोहा लेने का, मन को बदल डालने के लिये आपने वो हथियार उठा लिया, जिससे आपका दुश्मन, आपका दोस्त बन सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/sankalpvaan_vratsheel_bane

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 95)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 (6) प्रतिज्ञा आन्दोलन— कमर तोड़ खर्चीले विवाहों की कुरीति को त्यागने के लिए विचारशील लोगों से प्रतिज्ञा पत्र भराये जांय कि अवसर आने पर अपने बच्चों की शादी आदर्श विवाह वाली संहिता के अनुसार ही करूंगा। ऐसी प्रतिज्ञा सर्व साधारण से कराई जाय। इसके लिए जो छपे प्रतिज्ञापत्र हों उन्हें खेल कौतूहल की दृष्टि से नहीं वरन् ईश्वर को साक्षी देकर भरा जाना चाहिए और प्रण के निवाहने की दृढ़ता के साथ उसे निवाहा जाना चाहिए।

🔵 छात्रों, छात्राओं एवं अविवाहितों से भी ऐसे प्रतिज्ञा पत्र भराये जाने चाहिये जिनमें आदर्श विवाह न होने पर अविवाहित ही रहने की प्रतिज्ञा हो। जो युवक ऐसे प्रतिज्ञा पत्र भरें वे अपने अभिभावकों को भी इसकी सूचना दे दें ताकि पीछे उन्हें विरोध-प्रतिरोध का सामना न करना पड़े।

🔴 समाज निर्माण की पुण्य प्रवृत्ति में जिन्हें भावना एवं उत्साह हो वे ऐसी प्रतिज्ञा पत्र पुस्तिकाएं अपने साथ रखें और जहां जावें वहीं अपनी बात का प्रचार करें, जो सहमत हो जावें उनसे फार्म भरा लें। और साथ ही ‘धन्यवाद का अभिनन्दन पत्र’ भी उन्हें दे दें।

🔵 इस प्रकार की प्रतिज्ञा फार्मों की पुस्तिकायें तथा स्वीकृति के सुन्दर अभिनन्दन प्रमाण पत्रों की पुस्तिकायें युग-निर्माण योजना के केन्द्रीय कार्यालय में छापी जा रही है। आवश्यकतानुसार शाखायें उन्हें अपने यहां मंगालें और कार्यकर्त्ताओं के लिए सुलभ बनाया करें। यह प्रतिज्ञा पुस्तिकायें लागत से भी कम मूल्य पर प्रस्तुत की गई हैं।

🔴 यह हस्ताक्षर आन्दोलन तेजी से चलाया जाना चाहिये और प्रत्येक कार्यकर्ता को इस प्रकार के प्रयत्न को अपना एक आवश्यक कर्म मानकर उसके लिए सचेष्ट रहना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 43)

🌹 गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा
🔴 बात वन्य पशुओं की-हिंस्र जंतुओं की रह गई। वे प्रायः रात को ही निकलते हैं, उनकी आँखें चमकती हैं। फिर मनुष्य से सभी डरते हैं, शेर भी। यदि स्वयं उनसे न डरा जाएँ, उन्हें छेड़ा न जाए, तो मनुष्य पर आक्रमण नहीं करते, उनके मित्र ही बनकर रहते हैं।

🔵  प्रारंभ में हमें इस प्रकार का डर लगता था। फिर सरकस के सिखाने वालों की बात याद आई। वे उन्हें कितने करतब सिखा लेते है। तंज़ानिया की एक यूरोपियन महिला का वृतांत पढ़ा था ‘‘बॉर्न फ्री’’ जिसका पति वन विभाग का कर्मचारी था। उसकी स्त्री ने पति द्वारा माँ-बाप से बिछुड़े दो शेर के बच्चे पाल रखे थे, और वे जवान हो जाने पर भी गोद में सोते रहते थे। अपने मन में वजनदार निर्भयता या प्रेम भावना हो तो घने जंगलों में आनंद से रहा जा सकता है। वनवासी भील लोग अक्सर उसी क्षेत्र में रहते हैं। उन्हें न डर लगता है और न जोखिम दीखता है। ऐसे उदाहरणों को स्मृति में रखते-रखते निर्भयता आ गई और विचारा कि एक दिन वह आएगा, जब हम वन में कुटी बनाकर रहेंगे और गाय, शेर एक घाट पर पानी पिया करेंगे।

🔴  मन कमजोर भी है और मना लिए जाने पर समर्थ भी। हमने उस क्षेत्र में पहुँचकर यात्रा जारी रखी और मन में से भय को निकाल दिया। अनुकूल परिस्थिति की अपेक्षा करने के स्थान पर मनःस्थिति को मजबूत बनाने की बात सोची। इस दिशा में मन को ढालते चले गए और प्रतिकूलताएँ जो आरम्भ में बड़ी डरावनी लगती थीं, अब बिलकुल सरल और स्वाभाविक सी लगने लगीं।

🔵 मन की कुटाई-पिटाई और ढलाई करते-करते वह बीस दिन की यात्रा में काबू में आ गया। वह क्षेत्र ऐसा लगने लगा मानो हम यहीं पैदा हुए हैं और यहीं मरना है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur.3

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 43)

🌞  हिमालय में प्रवेश (तपोवन का मुख्य दर्शन)

🔵 यों गंगोत्री में भी गौरी कुण्ड के पास एक भागीरथ शिला है, इसके बारे में भी भागीरथ जी के तप की बात कही जाती है पर वस्तुतः यह स्थान हिमाच्छादित भागीरथ पर्वत ही है। इंजीनियर लोग इसी पर्वत में गंगा का उद्गम मानते हैं।

🔴 भागीरथ पर्वत के पीछे नीलगिरि पर्वत है जहां से नीले जल वाली नील नदी प्रवाहित होती है। यह सब रंग-बिरंगे पर्वतों का स्वर्गीय दृश्य एक ऊंचे स्थान पर से देखा जा सकता है। जब बर्फ पिघलती है तो भागीरथ पर्वत का विस्तृत फैला हुआ मैदान दुर्गम हो जाता है बर्फ फटने से बड़ी-बड़ी चौड़ी खाई जैसे दरारें पड़ती हैं उनके मुख में कोई चला जाय तो फिर उसके लौटने की आशा नहीं की जा सकती। श्रावण भाद्रपद महीने में जब बर्फ पिघल चुकी होती है तो यह प्रदेश सचमुच ही नन्दनवन जैसा लगता है। केवल नाम ही इसका नन्दनवन नहीं है वरन् वातावरण भी वैसा ही है। उन दिनों मखमल जैसी घास उगती है और दुर्लभ जड़ी बूटियों की महक से सारा प्रदेश सुगन्धित हो उठता है। फूलों से यह धरती लद सी जाती है। ऐसी सौन्दर्य स्रोत भूमि में यदि देवता निवास करते हों तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। पाण्डव सशरीर स्वर्गारोहण के लिए यहां आये होंगे इसमें कुछ भी अत्युक्ति मालूम नहीं होती।

🔵 हिमालय का यह हृदय तपोवन जितना मनोरम है उतना ही दुर्लभ भी है। शून्य से भी नीचे जमने लायक बिन्दु पर जब यहां सर्दी पड़ती है तब इस सौंदर्य को देखने के लिए कोई विरला ही ठहरने में समर्थ हो सकता है। बद्रीनाथ, केदारनाथ तीर्थ इस तपोवन की परिधि में ही आते हैं। यों वर्तमान रास्ते से जाने पर गोमुख से बद्रीनाथ लगभग ढाई सौ मील है पर यहां तपोवन से माणा घाटी होकर केवल बीस मील ही है। इस प्रकार केदारनाथ यहां से बारह मील है पर हिमाच्छादित रास्ते सबके लिए सुगम नहीं हैं।

🔴  इस तपोवन को स्वर्ग कहा जाता है। उसमें पहुंच कर मैंने यही अनुभव किया मानो सचमुच स्वर्ग में ही खड़ा हूं। यह सब उस परम शक्ति की कृपा का ही फल है, जिनके आदेश पर यह शरीर निमित्त मात्र बनकर कठपुतली की तरह चलता चला जा रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...