रविवार, 5 फ़रवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 29) 6 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र-   
🔴 आत्मोत्कर्ष की दूसरा अवलम्बन है-साधना साधना अर्थात् जीवन साधना। साधना अर्थात् अस्तव्यस्तता को सुव्यवस्था में बदलना। इसके लिये दो प्रयास निरन्तर जारी रखने पड़ते हैं-एक अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों को बारीकी से देखना, समझना और उन्हें उखाड़ने के लिये अनवरत प्रयत्नशील-संघर्षशील रहना। दूसरा कार्य है-मानवी गरिमा के अनुरूप जिन सत्प्रवृत्तियों की अभी कमी मालूम पड़ती है, उनकी आवश्यकता, उपयोगिता को समझते हुए, उसके लिये अनुकूलता स्तर का मानस बनाना। यह उभयपक्षीय क्रम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यवहृत होते चले तो समझना चाहिये कि जीवन साधना साधने का सरंजाम जुटा।                    

🔵 माना कि कार्य समयसाध्य और श्रमसाध्य है, फिर भी वह असम्भव नहीं है। कछुआ धीमी गति से चलकर भी बाजी जीत गया था। असफल तो वे खरगोश होते हैं जो क्षणिक उत्साह दिखाने के उपरान्त मन बदल लेते और इधर-उधर भटकते हैं। स्थिरता, तत्परता और तन्मयता हर प्रसंग में सफलता का श्रेष्ठ माध्यम बनती हैं। जीवन साधना के लिये भी किया गया प्रयत्न सफल होकर ही रहता है।

🔴 किसान अपने खेत में खरपतवार उखाड़ता रहता है। कंकड़- पत्थर बीनता रहता है, इसे परिशोधन कहा जा सकता है। जानवरों, पक्षियों से खेत की रखवाली करना भी इसी स्तर का कार्य है। कीटनाशक दवाओं का प्रयोग भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये है। खेत में खाद-पानी लगाना पड़ता है। यह परिपोषण पक्ष है। निराई-गुड़ाई का एक उद्देश्य यह भी है कि जमीन पोली बनी रहे। जड़ों में धूप, हवा की पहुँच बनी रहे। फसल को उगाने का यही तरीका है। जीवन को सुविकसित करना भी एक प्रकार का कृषि का कार्य है। इसके लिये भी इसी नीति को अपनाना होता है।       

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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