रविवार, 5 फ़रवरी 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 6 Feb 2017

🔵 लोगों के हाथों अपनी प्रसन्नता-अप्रसन्नता बेच नहीं देनी चाहिए। कोई प्रशंसा करे तो हम प्रसन्न हों और निन्दा करने लगे तो दुःखी हो चलें? यह तो पूरी पराधीनता हुई। हमें इस संबंध में पूर्णतया अपने ही ऊपर निर्भर रहना चाहिए और निष्पक्ष होकर अपनी समीक्षा आप करने की हिम्मत इकट्ठी करनी चाहिए। निन्दा से दुःख लगता हो तो अपनी नजर में अपने कामों को ऐसे घटिया स्तर का साबित न होने दें जिसकी निन्दा करनी पड़े। यदि प्रशंसा चाहते हैं तो अपने कार्यों को प्रशंसनीय बनायें।

🔴 घृणा पापी से नहीं, पाप से करो। यथार्थ में पापी कोई मनुष्य नहीं होता, वरन् पाप मनुष्य की एक अवस्था है। इसलिए यदि संशोधन करना हो तो पाप का ही करना चाहिए। अपराधी को यदि दण्ड देना हो तो उसे सुधारने के लिए ही दिया जाना चाहिए। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज की प्रत्येक अवस्था का उस पर प्रभाव पड़ सकता है इसलिए किसी को घृणापूर्वक बहिष्कृत कर देने से समस्या का समाधान नहीं होता, वरन् बुराई का शोधन करके अच्छे व्यक्तियों का निर्माण करने से ही उस अवस्था का नाश किया जा सकता है, जो घृणित है, हेय और जिससे सामाजिक जीवन में विष पैदा होता है।

🔵 दूसरा दूसरों को न तो खींच सकता है और न दबा सकता है। बाहरी दबाव क्षणिक होता है। बदलतो तो मनुष्य अपने आप है, अन्यथा रोज उपदेश-प्रवचन सुनकर भी इस कान से उस कान निकाल दिये जाते हैं। दबाव पड़ने पर बाहर से कुछ दिखा दिया जाता है, भीतर कुछ बना रहता है। इन विडम्बनाओं से क्या बनना है। बनेगा तो अंतःकरण के बदलने से और इसके लिए आत्म-प्रेरणा की आवश्यकता है। क्रान्ति अपने से ही आरंभ होगी।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 उपयोगिता की समझ

🔶 एक बादशाह अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था। उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक दार्शनिक भी था। 🔷 कुत्ते ने कभी नौका में ...