सोमवार, 11 दिसंबर 2017

👉 लक्ष्मीजी का निवास

🔶 एक बूढे सेठ थे। वे खानदानी रईस थे, धन-ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में था परंतु लक्ष्मीजी का तो है चंचल स्वभाव। आज यहाँ तो कल वहाँ!!

🔷 सेठ ने एक रात को स्वप्न में देखा कि एक स्त्री उनके घर के दरवाजे से निकलकर बाहर जा रही है।

🔶 उन्होंने पूछा : ‘‘हे देवी आप कौन हैं ? मेरे घर में आप कब आयीं और मेरा घर छोडकर आप क्यों और कहाँ जा रही हैं?

🔷 वह स्त्री बोली : ‘‘मैं तुम्हारे घर की वैभव लक्ष्मी हूँ। कई पीढयों से मैं यहाँ निवास कर रही हूँ किन्तु अब मेरा समय यहाँ पर समाप्त हो गया है इसलिए मैं यह घर छोडकर जा रही हूँ। मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ क्योंकि जितना समय मैं तुम्हारे पास रही, तुमने मेरा सदुपयोग किया। संतों को घर पर आमंत्रित करके उनकी सेवा की, गरीबों को भोजन कराया, धर्मार्थ कुएँ-तालाब बनवाये, गौशाला व प्याऊ बनवायी। तुमने लोक-कल्याण के कई कार्य किये। अब जाते समय मैं तुम्हें वरदान देना चाहती हूँ। जो चाहे मुझसे माँग लो।

🔶 सेठ ने कहा : ‘‘मेरी चार बहुएँ है, मैं उनसे सलाह-मशवरा करके आपको बताऊँगा। आप कृपया कल रात को पधारें।

🔷 सेठ ने चारों बहुओं की सलाह ली। उनमें से एक ने अन्न के गोदाम तो दूसरी ने सोने-चाँदी से तिजोरियाँ भरवाने के लिए कहा।

🔶 किन्तु सबसे छोटी बहू धार्मिक कुटुंब से आयी थी। बचपन से ही सत्संग में जाया करती थी।

🔷 उसने कहा : ‘‘पिताजी! लक्ष्मीजी को जाना है तो जायेंगी ही और जो भी वस्तुएँ हम उनसे माँगेंगे वे भी सदा नहीं टिकेंगी। यदि सोने-चाँदी, रुपये-पैसों के ढेर माँगेगें तो हमारी आनेवाली पीढी के बच्चे अहंकार और आलस में अपना जीवन बिगाड देंगे। इसलिए आप लक्ष्मीजी से कहना कि वे जाना चाहती हैं तो अवश्य जायें किन्तु हमें यह वरदान दें कि हमारे घर में सज्जनों की सेवा-पूजा, हरि-कथा सदा होती रहे तथा हमारे परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम बना रहे क्योंकि परिवार में प्रेम होगा तो विपत्ति के दिन भी आसानी से कट जायेंगे।

🔶 दूसरे दिन रात को लक्ष्मीजी ने स्वप्न में आकर सेठ से पूछा : ‘‘तुमने अपनी बहुओं से सलाह-मशवरा कर लिया? क्या चाहिए तुम्हें?

🔷 सेठ ने कहा : ‘‘हे माँ लक्ष्मी! आपको जाना है तो प्रसन्नता से जाइये परंतु मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे घर में हरि-कथा तथा संतो की सेवा होती रहे तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम बना रहे।

🔶 यह सुनकर लक्ष्मीजी चौंक गयीं और बोलीं : ‘‘यह तुमने क्या माँग लिया। जिस घर में हरि-कथा और संतो की सेवा होती हो तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रीति रहे वहाँ तो साक्षात् नारायण का निवास होता है और जहाँ नारायण रहते हैं वहाँ मैं तो उनके चरण पलोटती (दबाती) हूँ और मैं चाहकर भी उस घर को छोडकर नहीं जा सकती। यह वरदान माँगकर तुमने मुझे यहाँ रहने के लिए विवश कर दिया है.!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 12 Dec 2017


👉 परिवर्तन चिह्न है प्रगति का

🔷 स्थिरता जड़ता का चिन्ह है और परिवर्तन प्रगति का ।। स्थिरता में नीरसता एवं निष्क्रियता है। किन्तु परिवर्तन नये चिन्तन और नये अनुभव का पथ प्रशस्त करता रहता है। जीवन प्रगतिशील है, अस्तु इसमें परिवर्तन आवश्यक होता है और अनिवार्य भी।       

🔶 प्रगतिशील परिवर्तन से डरते नहीं, उसका समर्थन करते हैं और स्वागत भी। आकाश में सभी ग्रह गोलक गतिशील हैं। इससे उनका चुम्बकत्व स्थिर रहता और उसके सहारे उनका मध्यवर्ती सहकार बना रहता है। यदि वे निक्रिय रहे होते, तो अपनी ऊर्जा गँवा बैठते ।। जो आगे नहीं बढ़ता वह स्थिर भी नहीं रह सकता। स्थिरता पर संकट आते ही, विकल्प विनाश ही रह जाता है। अस्तु जीवन को गतिशील रहना पड़ता है। जो निर्जीव है- वह भी गतिहीन नहीं है।

🔷 युग बदलते हैं। परिवर्तन क्रम में आशा और निराशा के अवसर आते हैं और चले जाते हैं। रात्रि और दिन, स्वप्न और जागृति, जीवन और मरण, शीत और ग्रीष्म, हानि और लाभ, संयोग और वियोग का अनुभव लगता तो परस्पर विरोधी हैं, अन्ततः वे एक दूसरे के साथ गुँथे रहते हैं और दुहरे रसास्वादन का आनन्द देते हैं। ऋण और धन धाराओं का मिलन ही बिजली की सामर्थ्य भरे प्रभाव को जन्म देता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 The Art Of Living

🔶 We may look at it either from philosophical viewpoint or from a scientific one, human life is accepted as a most valuable possession. Physical, mental and spiritual fields are full of such miraculous capacities that they can not even be imagined by an ordinary intellect. If we can acquire the knowledge of developing them and inculcate the attitude of putting them to proper use, life can be full of heaps of mundane and divine acquisitions.

🔷 Man has been bestowed with not only human but also godly means of leading his life. Inspite of this, he has to lead a miserable animal like life because he neither pays any attention to fundamental principles which make life full and vital nor put them into practice. Knowledge of leading life properly and artistically is called the ‘art of living’.

🔶 Proper planning of life makes it attractive & beautiful, where as its maladjustment makes it ugly & unprofitable. Gods are beautiful, pure and systematic. Evil spirits are frightful & unsystematic. Man acquires godly status by accomplishment of life whereas he reaches devilish state by ignoring it. Godly spirits produce happiness, contentment & evil spirits always raise fresh problems.

🔷 The art of living consists in making one’s personality pure and beautiful by solving the problems of life & decorating it with desired accquisitions. Constant practice of adopting this art in practical life is called accomphishment of life. Devotion is the means by adopting which the ugliest becomes most beautiful & attractive.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (अन्तिम भाग)

🔶 आध्यात्मिक अनुभूतियों से प्राप्त सुख ही जीवन का सच्चा सुख है। दयावान् व्यक्ति दूसरों के दुःख दूर करने में अलौकिक सुख का आनन्द लूटते हैं। असहाय व्यक्तियों की सहायता करने वाले शक्तिमान् व्यक्ति परमात्मा का ध्यान-सान्निध्य प्राप्त करने वाले योगी की ही तरह जीवन का सच्चा सुख प्राप्त करते हैं। जो इस जीवन में ऐसा सुख प्राप्त कर सका वह परलोक में भी सुख प्राप्त करेगा, ऐसा मानना चाहिए। कई लोगों की यह मान्यता है कि जितना यहां कष्ट भोग लें उतना ही स्वर्ग में सुख मिलता है। यह भावना नितान्त भ्रामक है। परलोक में स्वर्ग और मुक्ति का आधार यह है कि मनुष्य इस जीवन में भी सच्चा सुख—आध्यात्मिक सुख—प्राप्त करें। स्वर्ग की सद्गति उन्हें ही मिलती है जो उसे प्राप्त कर लेते हैं।
   
🔷 यहां यह समझ लेना नितान्त आवश्यक है कि सुख, चित्त का वह भाव है जो मनुष्य के हृदय में उसकी अभिलाषाओं के पूरा होने से या जिस कार्य में वह लगा हो उसमें सफलता प्राप्त कर लेने या उद्देश्य की सफलता से उत्पन्न होता है। गणितज्ञ को सच्चा सुख किसी प्रमेय या साध्य को हल करने में मिलता है। अनुसन्धान कर्त्ताओं को सबसे बड़ी प्रसन्नता उस समय मिलती है जब वह कोई नया आविष्कार करता है। अपने विषय की सफलता को ही जीवन का सुख कह सकते हैं।

 🔶 आत्मा का विषय है—आनन्द की प्राप्ति। मानव-जीवन का उद्देश्य भी यही है। यह सुख अपने जीवन को समष्टि में घुलाने से होता है। सबके हित में अपना हित समाहित कर देने से जिस दिव्य-ज्योति के दर्शन होते हैं आत्मा को उससे बड़ा सुख अन्यत्र नहीं मिलता। इसलिये आध्यात्मिक-जीवन सुखों का मूल कहकर पुकारा गया है। लौकिक कामनाओं की पूर्ति से आंशिक सुख मिलता है। किन्तु सबके कल्याण की भावना से सर्वाङ्गपूर्ण सुख की अनुभूति होती है।

🔷 शास्त्रकार का कथन है:—

अपहृत्यार्तिमार्तानाम् सुखं यदुपजायते । तस्य स्वर्गोपवर्गो वा कलां नहित षोडशीम् ।।
अर्थात्—परोपकार से, दुःखियों के दुःख दूर करने से जो सुख मिलता है, वह चिरस्थायी और सच्चा होता है। इस सुख की कोई सीमा नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.27

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 3)

🔶 लेकिन आप ऊपर की ओर सिर उठाकर देखेंगे, हमें आपसे यह उम्मीद है। यह उम्मीद है कि ऐसे भयंकर समय में अपना सारा वक्त केवल पेट पालने के लिए और सन्तान पैदा करने के लिए जाया नहीं करेंगे। अगर आप चाहें तो ढेरों समय बचा हैं, बीस घण्टे में अपना, अपने शरीर व कुटुम्ब का आराम से आप गुजारा कर सकते हैं। आठ घण्टा काम करने के लिए, सात घण्टा विश्राम के लिए और पाँच घण्टा घरेलू काम के लिए। फिर भी चार घण्टा आप समाज के लिए आई हुई परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए, समय को ऊँचा उठाने के लिए इनसान का भाग्य और भविष्य शानदार बनाने के लिए आप लगा सकते हैं। करना ही पड़ेगा यह आपको।
                 
🔷 इसमें तो नुकसान पड़ेगा? नहीं, मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि नुकसान नहीं पड़ेगा। जिन्होंने भी अपने समय को लोकसेवा में लगाया है, वे चाहे गाँधी रहे हों या नेहरू, विनोबा रहे हों या विवेकानन्द किसी भी तरह वे नुकसान में नहीं रहे हैं। वे ऊँचा उठे हैं, आगे बढ़े हैं और उन्होंने हजारों आदमियों को ऊँचा उठाया व आगे बढ़ाया है। स्वयं भी नफे में रहे हैं। वे नुकसान में रहे? क्या नुकसान में रहे आप बताइए? किसी एक का नाम तो बताइए।
    
🔶 गाँधीजी ने वकालत की होती तो वकालत में कितना कमा लेते? लेकिन जब उन्होंने अपना समय सेवा में लगा दिया तो आप बताइए, क्या कमी रह गई उनके पास। उन्होंने इस्तेमाल नहीं किया। यह उनकी इच्छा पर है। ब्राह्मण अपने लिए कभी इस्तेमाल नहीं करते। गाँधी ब्राह्मण थे, बड़े शानदार आदमी थे और शानदार सिर्फ इसलिए कि उन्होंने अपने समय को पेट-पालन और जानवर के तरीके से औलाद पैदा करने में नहीं, बल्कि इनसान के तरीके से खर्च किया।

🔷 यह समय ठीक ऐसा ही है। इस विषम समय में मेरी आप लोगों से, प्रत्येक से यही प्रार्थना है कि आप अपने समय का थोड़ा अंश निकालें। हमने कितनी बार कहा व छापा है कि आप समयदान कीजिए। चन्द्रमा पर ग्रहण जब पड़ता है तब कितने ही लोग आते हैं व पुकार करते हैं कि चन्द्रमा पर ग्रहण पड़ा है, पुण्य कमाना हो तो दान करो। इस खराब समय में हमारी भी एक रट है—महाकाल की भी एक ही पुकार है—आप समय दीजिए, समय खर्च कीजिए। किस काम के लिए? आप इस काम के लिए समय लगाइए जिससे आप लोगों के दिमागों और विचारों को ठीक कर सकें। इनसान के अन्दर क्या है? वस्तुतः न हाड़ है, न माँस है, न मिट्टी, न पखाना, जो भी कुछ काम की चीज है वह है विचार।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 SPIRITUALISM DURING EMERGENCY

🔶 A new era is going to take birth. Two things will happen— first, reconstruction of this world, second, destruction before this construction. Destruction must happen. When a building is raised, the land is hollowed out for its foundation. After that soil is buried and it is made even and thorough by powerful force of heavy stones. Then only walls are raised.

🔷 When God incarnates, He doesn’t do single thing. He doesn’t come only with the establishment of religion and divinity, but also destructing and ruining the evil. No doubt, He will come taking and bestowing peace all around, but keep this in mind too, He will bring agonies and lamentation for millions of us. On one hand He will bestow blessings, then on the other one, He will shed His immense anger.

🔶 At the juncture of this transition and change, neither you behold the specific demand of time nor listen the call of responsibilities and duties. What’s happening all around, you should perceive this. If you remain ignorant, remain indulged in the cycle of eating, earning and reproducing (giving births), then what to say anything about that!


✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya 

👉 आपत्तिकाल का अध्यात्म

🔷 नए युग का जन्म होने जा रहा है। दो बातें होनी हैं— एक युग-निर्माण की, दूसरा निर्माण से पहले ध्वंस होना है। ध्वंस भी होना है। इमारत जब बनाई जाती है, तब जमीन की खुदाई करनी पड़ती है। पीछे मिटटी डालकर कुटाई-पिटाई भी करते हैं और गड्ढे को ठीक करके तब दीवार की चिनाई की जाती है।

🔶 भगवान के जब अवतार होते हैं, तब एक ही कार्य नहीं करते, मात्र धर्म की स्थापना करते हुए नहीं आते, वरन अनीति, बुराई का ध्वंस करते हुए भी आते हैं। वे शांति लेकर आयेंगे तो सही, पर यह भी ध्यान में रखिये की वे लाखों-करोड़ों के लिए रोना-पीटना और हाहाकार भी लेकर आयेंगे। वे दया बरसाएंगे. तो क्रोध भी बरसाएंगे।

🔷 परिवर्तन की इस संधिबेला में आपको न तो कोई विशेष समय की मांग दिखाई दिखाई पड़ती है, न कर्तव्यों की पुकार सुनाई पड़ती है। चारों ओर क्या हो रहा है, आपको दिखाई पड़ना चाहिए। अगर आप विमूढ़ ही बने रहे, रोटी खाने और पैसा कमाने से लेकर बच्चे पैदा करने तक के चक्र में पड़े रहे तो फिर मैं क्या कह सकता हूँ!


✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रज्ञायुग में दुनिया का कायाकल्प

🔷 प्रज्ञा युग में चिन्तन, आचरण एवं व्यवहार के सभी पक्षों में काया-कल्प जैसा हेर-फेर होगा। यही युग परिवर्तन है। इस परिवर्तन का आधार दूरदर्शी विवेकशीलता का कसौटी पर कसकर अपनाया गया औचित्य ही होगा। पिछले दिनों का क्या सोचा माना या किया जाता रहा है। इसे भावी रीति-नीति का आधार नहीं माना जायेगा वरन् तर्क, तथ्य, प्रमाण न्याय एवं लोकहित की हर कसौटी पर कसने के उपरान्त जो खरा पाया जायेगा उसी को अपनाया जायेगा। न किसी को भूत का आग्रह होगा और न कोई भविष्य की अवज्ञा करेगा। वर्तमान का निर्धारण करते समय आज की आवश्यकता और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना को ही महत्व दिया जायेगा। यह निर्धारण पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाये हुए अन्तःकरण ही कर सकेंगे। अगले दिनों उन्हीं को युग ऋषि माना जायेगा और उन्हीं का निर्धारण लोक-मानस द्वारा श्रद्धापूर्वक अपनाया जायेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 27

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 164)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 परिवर्तन और निर्माण दोनों ही कष्टसाध्य हैं। भ्रूण जब शिशु रूप में धरती पर आता है तो प्रसव पीड़ा के साथ होने वाला खून खच्चर दिल दहला देता है। प्रस्तुत परिस्थितियों के दृश्य और अदृश्य दोनों ही पक्ष ऐसे हैं, जिनके कण-कण से महाविनाश का परिचय मिलता है। समय की आवश्यकताएँ इतनी बड़ी हैं जिन्हें पूरा करने के लिए बहुतों को बहुत कुछ करना चाहिए। विनाश से निपटने और विकास प्रत्यक्ष करने के लिए असामान्य व्यक्तित्व, असामान्य कौशल और असीम साधन चाहिए। इतने असीम जिन्हें जुटा सकना किसी व्यक्ति या समुदाय के लिए कठिन है। उस सारे सरंजाम को जुटाना मात्र परमेश्वर के हाथ है। हाँ इतना अवश्य है कि निराकार को साकार जीवधारियों में नियोजित रणनीति की और कौशल भरी व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है। सो भी परिमाण में।

🔶 ऐसे कार्यों का संयोजन तो सृष्टा की विधि व्यवस्था ही करती है, पर उसका श्रेय श्रद्धावान साहसियों को मिल जाता है। हनुमान और अर्जुन की शक्ति उनकी निज की उपार्जित नहीं थी वे सृष्टा का काम करते हुए उसी की सामर्थ्य को प्राप्त कर सके। अर्जुन को सारथी का यदि समर्थन न रहा होता, तो महाभारत कैसे जीता जाता? हनुमान स्वयं बलवान रहे होते तो सुग्रीव सहित ऋष्यमूक पर्वत पर छिपे-छिपे न फिरते। समुद्र छलांगने, लंका जलाने, पर्वत उखाड़ने की सामर्थ्य उन्हें धरोहर में इसलिए मिली थी कि वह राम काज में समर्पित हों। यदि निजी मनोवाँछनाओं के लिए किसी भक्त ने माँगा है तो नारद मोह के समय पर मिले उपहास की तरह तिरस्कृत होना पड़ा है।

🔷 महान् परिवर्तन के साथ जुड़े हुए नवसृजन का उभय पक्षीय कार्य ऐसा है कि जिसे सम्पन्न किए जाने के लिए उतने साधन चाहिए जिनका विवरण शब्दों में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। वह जुटाए जाने हैं, जुटेंगे भी।

🔶 अभीष्ट प्रयोजन की महानता को समग्र रूप से आँका जाना कठिन है। इसकी किस्तें ही शृंखला की कड़ियों की तरह प्रादुर्भूत होती हैं। प्रस्तुत संकट या संकल्प इसी प्रकार का है जो अवतरण पर्व पर विगत वसंत पंचमी को प्रकट हुआ। उस एक को पाँच भागों की सुविधा की दृष्टि से विभाजित किया गया है। १-एक लाख यज्ञ, २-एक लाख नर रत्न, ३-एक लाख अशोक वाटिका, ४-एक लाख ग्राम्य तीर्थ, ५-एक लाख वर्ष का समयदान संकलन। यह पाँचों ही काम इतने भारी लगते हैं मानों शेषनाग के सिर पर धरती का बोझ लादने वाले का अनुशासन ही प्रत्यक्ष हुआ हो। यह सभी कार्य ऐसे हैं जिन्हें मानवी सत्ता न सोच सकती है, न उनकी योजना बना सकती है और न पूरी करने का दुस्साहस ही सँजो सकती है। ये अतिमानवी कार्य हैं जिन्हें हमारे जैसा तुच्छ व्यक्ति अपने निज के बलबूते किसी भी प्रकार वहन एवं सम्पन्न नहीं कर सकता। यह परम सत्ता का कार्य है और वही बाजीगर की तरह कठपुतलियों को नचा-कुदा रही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.188

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22