बुधवार, 11 अप्रैल 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 12 April 2018


👉 महिमा गुणों की ही है

🔷 असुरों को जिताने का श्रेय उनकी दुष्टता या पाप-वृति को नहीं मिल सकता। उसने तो अन्तत: उन्हें विनाश के गर्त में ही गिराया और निन्दा के नरक में जलाया। विजय चाहे आरम्भिक या क्षणिक ही क्यों न रही हो पर वह उन्हें इसलिए मिली कि उन्होंने संगठन, साहस और पराक्रम को अपना सहचर बनाया और अवसर चूकने का आलस्य, प्रमाद नहीं किया। इतने अंशों में जो सजग समर्थता उनमें थी उसी को देवत्व की एक नन्हीं किरण कहा जा सकता है, उतने ही अंशों में वे विजेता भी होते रहे हैं।

🔶 देवों की पराजय का दोष उनके देवत्व अथवा सद्गुणों को नहीं दिया जाना चाहिए। उन विशेषताओं के कारण तो वे स्वर्ग लोक के अधिपति, लोकपूजित, यशस्वी और अजर-अमर बन सके हैं। पराजय का दोष तो उन थोड़े अंशों में पाई जाने वाली उस असावधानी और अदूरदर्शिता को ही दिया जायेगा, जिसके कारण उन्होंने पारम्परिक संगठन, सहयोग को सुदृढ़ बनाने और अवांछनीयता से आरम्भ में ही निपटने की आवश्यकता ही भूला दी, जब तक उन्होंने अपनी यह भूल सुधारी नहीं, तब तक उन्हें पराजय, उत्पीडऩ, और अपयश ही मिलता रहा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (४.६३)

👉 It is the virtues that are of the essence

🔷 (This is about the battles between the demons and the divine beings, the evil and the good throughout the history) Demons’ blatant callousness and their audacity to commit any evil cannot be given credit for their victories against the divine beings.These are the very vices that ultimately caused their annihilation and brought reproach upon themselves. Their victories—even though they may have been just in the initial stages or momentary—were actually the result of their unity, courage and adventurous nature. Besides, they never let any opportunity slip away in laziness or procrastination.

🔶 These divine virtues can be hailed as just a tiny ray or a small fraction of divinity and even that much of tiny divinity made them excel in the battles. The Divine Beings’ divinity and good virtues shouldn’t be blamed for their defeats against the demons. These are the very merits which made them the lords of Heaven, famous, immortal, admired by people and eventually enabled them to be victorious and to regain their lost kingdom. Their earlier defeats should be blamed on their little sloppiness and thoughtlessness which lead them to overlook the need of consolidating mutual unity and cooperation as well as to tackle any undesirable elements beforehand. They had to suffer defeats,repression and humiliation until they didn’t rectify these mistakes.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP & KARYAKRAM -66 (4.63)

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (अन्तिम भाग)

🔷 अपने जीवन की वास्तविकता को समझ सकें, तो ये ज्ञानयोग हो जाएगा। जब अपने फर्ज और ड्यूटी को सब कुछ मान लें, इस बात पर ध्यान नहीं दें कि दूसरा आदमी क्या कहता है और क्या सलाह देता है, तब इसको कर्मयोग कहेंगे। ये तीन बातों का ध्यान रखेंगे, तब आपका व्यक्तित्व निखरता हुआ चला जाएगा। जीवन की साधना के लिए इन बातों पर ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

🔶 हमारा जीवन पारस है, हमारा जीवन कल्पवृक्ष है, हमारा जीवन अमृत है, हमारा जीवन कामधेनु है। आप जो भी चाहें, इस जीवन को बना सकते हैं; लेकिन बनाना तो आपको ही पड़ेगा! आप ही बनाएँगे, तभी बनेगा। अपनी साधना आप कीजिए। अपने आपके विरुद्ध बगावत खड़ी कर दीजिए। अपने जन्म-जन्मान्तरों को तोड़-मरोड़ के फेंक दीजिए और जो अच्छाई आपके भीतर नहीं हैं, जो विशेषताएँ अभी तक पैदा नहीं कर सके हैं, उन गुण, कर्म और स्वभाव के बारे में आप अभी तक अभावग्रस्त हैं, कृपा करके वे ठीक कीजिए, उनको सुधारिए। ये पुरुषार्थ कीजिए।

🔷 बुराइयों को छोड़ने का पुरुषार्थ, अच्छाइयों को बढ़ाने का पुरुषार्थ। पराक्रम अगर आप करेंगे, तो किस तरीके से? आगे बढ़ने के लिए दो कदम बढ़ाने पड़ते हैं। एक कदम के बाद दूसरा, दूसरे के बाद पहला। ऐसे ही आपको अपनी कमजोरियों और बुराइयों को दूर करने की जद्दोजहद करनी पड़ेगी और अपनी अच्छाइयों को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना पड़ेगा। यह दो काम करते हुए चले जाएँगे, तो आपकी जीवन-साधना पूर्ण हो जाएगी। जीवन-साधना जिस हिसाब से आपकी पूर्ण होगी, आप देखेंगे सारा समाज आपका सहयोग करता है, अन्तरात्मा आपका सहयोग करता है; भगवान आपका सहयोग करते हैं, पात्रता जैसी ही विकसित होती चलेगी।

🔶 इसलिए मैंने कल कहा था—आपके भीतर फूल जैसे खिलना शुरू हो जाएगा, वैसे ही आपके ऊपर भौंरे आने शुरू हो जाएँगे, तितलियाँ आनी शुरू हो जाएँगी; बच्चे आपको ललचाई आँखों से देखने लगेंगे। भगवान अपेक्षा करेंगे कि ये फूल हमारे गले में हैं, सिर पर होता, तो कैसा अच्छा होता? कृपा करके कीजिए, साधना कीजिए। साधना के चमत्कार देखिए। साधना से सिद्धि मिलती है—इस सिद्धान्त को आपको जीवन में प्रयोग करके दिखाना है, तभी फायदा उठा सकेंगे, जिसके लिए कल्प-साधना में आप आए हैं।

हमारी बात समाप्त।
॥ॐ शान्ति:॥

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 11 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 April 2018

👉 राष्ट निर्माण

🔶 मजबूत राष्ट निर्माण के लिए सर्वप्रथम चरित्रवान नागरिकों  को गढऩे की आवश्यकता है। चरित्रवान नागरिक ही किसी राष्ट की बुनियाद से लेकर गुंबद तक के निर्माण में सहायक होते हैं। इसके लिए उनके अंदर पवित्र प्रेरणा जगानी होगी। प्रेरणाविहीन व्यक्ति मुरदे के समान होता है। शव का शृंगार करने के शरीर स्पंदित नहीं होता। शरीर स्पंदन के लिए प्राणतत्व आवश्यक है। प्राणशक्ति तभी सुरक्षित रह सकती है, जब साधना की जाएगी। इन प्राणशक्तिसंपन्न जीवंत नागरिकों से ही कोई राष्ट शक्तिवान एवं सामर्थ्यवान बन सकता है। जीवनी शक्ति के लिए चाहिए राष्ट माता के प्रति अटूट, अखंड, अविचल, निष्ठा एवं भक्ति। राष्ट सुदृढ तभी होगा, जब ऐसे नागरिकों के मन मिलेंगे और ये मन तभी मिलेंगे, जब किसी निर्दिष्ट लक्ष्य पर केंद्रित होंगे।

🔷 राष्ट के वैभव के लिए भौतिक संपन्नता एवं उपलब्धियाँ आवश्यक हैं, परंतु राष्ट सुदृढ़ एवं मजबूत नहीं रहा तो यह संपदा-संपन्नता संकट और विनाश को न्योता देने लगती हैं। मजबूत राष्ट, विकसित राष्ट की परिकल्पना किसे अच्छी नहीं लगती, पर इस अच्छे लगने मात्र से राष्ट निर्माण नहीं होता है। राष्ट निर्माण के लिए पीढिय़ों को बलिदान करना पड़ता है।

🔶 हमारे राष्ट की स्वतंत्रता इन्हीं बलिदानी परंपराओं का परिणाम है। राष्ट को समग्र रूप से समृद्ध और विकसित करने के लिए इसी बलिदानी मानसिकता तथा आध्यात्मिक तत्त्वों की आवश्यकता है। त्याग, बलिदान, समर्पण, निस्स्वार्थपरता, सेवा, क्षमा, सहिष्णुता, धैर्य, सहानुभूति, भ्रातृत्व, उदारता, दया, करुणा आदि गुणों का विकास करके अपने खोए राष्ट के आत्मसम्मान को हम फिर से प्राप्त कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Empower women, empower the world

🔶 Man and woman are like the two eyes or the two shoulders of our creator. They are identical in their level, value, utility, responsibilities, as well as rights. Generally speaking, industry, endurance, toughness, and a mentality of providing for the family are attributes more predominant in man, signifying intelligence and action. On the flip side, art, humility, compassion, and love are more prominent in woman, signifying creation and emotional intelligence. Both of these characteristics have equal importance and it is their confluence that creates a complete human being.

🔷 The important needs of the time are met by calling upon these manly as well as womanly characteristics. Traditionally, the manly qualities were needed to fight wars, and hence men fought wars. Leadership naturally fell into their hands, rendering women as the followers. Such circumstances created a divide and a hierarchy between the two sexes. Man became the leader, woman became the follower and the worshipper. Whether in the guise of worship and love for the man, or in an environment where she was helpless and explicitly suppressed, woman was exploited; man stayed ahead.

🔶 For the new era, we must develop the new woman, who can manage and mould the emotional landscape of the world with her strong hands. We must develop the woman who can use her innate abilities and demonstrate that it is indeed possible to transform the hell of subhuman existence into a heaven of grand-hearted humanness. To promote the ascent of woman toward a position of power and responsibility is to inch closer and closer to the goal of world peace.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP & KARYAKRAM -66 (4.28)

👉 नारी का वर्चस्व- विश्व का उत्कर्ष

🔶 नर और नारी यों दोनों ही भगवान की दायीं-बायीं ऑंख, दायीं बायीं भुजा के समान हैं । उनका स्तर, मूल्य, उपयोग, कर्त्तव्यत, अधिकार पूर्णत: समान है । फिर भी उनमें भावनात्मक दृष्टि से कुछ भौतिक विशेषताएँ हैं । नर की प्रकृति में परिश्रम, उपार्जन, संघर्ष, कठोरता जैसे गुणों की विशेषता है वह बुद्धि और कर्म प्रधान है । नारी में कला, लज्जा, शालीनता, स्नेह, ममता जैसे सद्गुण हैं वह भाव और सृजन प्रधान है । यह दोनों ही गुण अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हं् । उनका समन्वय ही एक पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करता है ।

🔷 सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नर और नारी की इन विशेषताओं का उपयोग किया जाता है । युद्ध कौशल में पुरुष की प्रकृति ही उपयुक्त थी सो उसे आगे रहना पड़ा । जो वर्ग आगे रहता है, नेतृत्व भी उसी के हाथ में आ जाता है । जो वर्ग पीछे रहते हैं उन्हें अनुगमन करना पड़ता हैं । परिस्थितियों ने नर-नारी के समान स्तर को छोटा-बड़ा कर दिया, पुरुष को प्रभुता मिली - नारी उसकी अनुचरी बन गई । जहॉं प्रेम सद्भाव की स्थिति थी वहॉं वह उस आधार पर हुआ और जहॉं दबाव और विवश्सता की स्थिति थी वहाँ दमन पूर्वक किया गया । दोनों ही परिस्थितियों में पुरुष आगे रहा और नारी पीछे ।

🔶 नये युग के लिये हमें नई नारी का सृजन करना होगा, जो विश्व के भावनात्मक क्षेत्र को अपने मजबूत हाथों में सम्भायल सके और अपनी स्वाभाविक महत्ता का लाभ समस्त संसार को देकर नारकीय दावानल में जलने वाले कोटि-कोटि नर-पशुओं को नर-नारायण के रूप में परिणत करना सम्भव करके दिखा सकें । नारी के उत्कर्ष - वर्चस्व को बढ़ाकर उसे नेतृत्व का उत्तरदायित्व जैसे-जैसे सौंपा जायेगा वैसे-वैसे विश्व शान्ति की घड़ी निकट आती जायेगी ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (४.२८)

👉 The Service by Dhramraj

🔷 People asked Lord Krishna, "Why do you call Yudhishthira -Dharmaraj?" Krishna told them that during the Mahabharat war, every evening Yudhishthira used to mysteriously disappear somewhere. They found out that he was spending his time serving the wounded in the battlefield. When asked why he was doing this so secretly. Yudhishthira told them that he was serving the wounded in the enemy's camp too. Lord Krishna said, "Dharma (religion) and service are equivalent, hence I call him Dharmaraj".

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 9)

🔶 तीन योग हैं न! एक योग का नाम है—ज्ञानयोग। इसका अर्थ है—आप वास्तविकता को समझें। आपने बाहर को समझा है, चीजों को समझा है, खेती-बाड़ी को समझा है, पैसे को समझा है, दुकान को समझा है, मुहल्ले वालों को समझा है, सन्तान को समझा है, फिर अपने आपको क्यों नहीं समझा? अगर आप जीवन को और अपने आपको समझ सकते हों, तो इसका नाम ‘ज्ञान योग’ होगा। अगर आपने अपने फर्ज और कर्तव्यों को समझ रखा हो तब? फर्ज का ज्ञान नहीं, कर्तव्य का ज्ञान नहीं, कोल्हू के बैल के तरीके से सारे दिन मरते रहते हैं, दूसरों की देखा-देखी वासनाओं के दबाव में। मेहनत कम नहीं करते। बहुत मेहनत करते हैं; पर कर्तव्यपालन? कर्तव्यपालन अलग चीज है। हमारे फर्ज और हमारी ड्यूटियाँ कहाँ हैं? ड्यूटियाँ और हमारे फर्ज जहाँ कहीं भी हमको बुलाते हैं, वहाँ हमको जाना चाहिए। इसका नाम कर्मयोग है और भक्ति-भावना?

🔷 भक्ति-भावना मुहब्बत को कहते हैं, प्यार भगवान को किया जाता है। उपासना भगवान की, की जाती है। प्रेम भगवान को किया जाता है; पर भगवान तक सीमित नहीं रखा जाता। अखाड़े में कसरत करते तो हैं; पर अखाड़े तक, उस कसरत की जो शक्ति-संचय है, उसको खर्च थोड़े कर देते हैं। वह तो बाजार में करना पड़ता है, कहीं और करना पड़ता है। भगवान की भक्ति का अभ्यास करते हैं, भगवान से हम प्रेम करते हैं, उपासना करते हैं। अगर उपासना के बाद में हमारी भक्ति का विकास हुआ हो, तब प्राणियों में इसका उपयोग करना पड़ेगा, मनुष्यों में उपयोग करना पड़ेगा, सबमें उपयोग करना पड़ेगा। प्यार से अपने आप को, हरेक को सराबोर कर देना पड़ेगा। प्यार अपने शरीर से कीजिए, ताकि इसको अच्छे तरीके से सुरक्षित रख सकें।

🔶 प्यार अपनी अन्तरात्मा से कीजिए, ताकि इसका कल्याण करने में आप समर्थ हो सकें। प्यार अपने मस्तिष्क के चिन्तन की मशीन से कीजिए, ताकि प्यार द्वारा सही विचार करें और अपने आप को तहस-नहस न होने दें। प्यार अपनी बीबी को कीजिए, ताकि उसका व्यक्तित्व आप निखार सकें। प्यार अपने बच्चों से कीजिए, ताकि उनको संस्कारवान बना सकें। प्यार अपने मुल्क को कीजिए, देश को कीजिए, धर्म और संस्कृति को कीजिए, ताकि उनको इस लायक बना सकें कि वह सम्मानास्पद हों, उनका मजाक नहीं उड़ाया जाए। हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति के बारे में लोग तरह-तरह के लांछन न लगा सकें, ऐसा कीजिए न! भक्ति का अर्थ प्यार होता है। प्यार का अर्थ सेवा होता है। सेवा कीजिए, सेवा! अगर भक्ति को समझ सकते हों, तब फिर ये क्या हो जाएगा? फिर ये भक्तियोग हो जाएगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 86)

👉 ‘गुरुसेवा’  ही सच्ची साधना
🔶 इस सम्बन्ध में बड़ी प्यारी अनुभूति कथा है। यह कथा एक ऐसे शिष्य की है, जिसके मन में तो उज्ज्वल विचार थे, पर जिसके संस्कार बड़े दूषित थे। जो अनचाहे व अनजाने अनेकों वासनाओं से घिर जाता है। अनेकों प्रयत्नों के बावजूद जिसकी काम वासना शान्त न होती थी। बड़ी दुःखद स्थिति थी उसकी। इस गहरी पीड़ा में उसका कोई साझीदार न था। उसकी कामवासना की परिणति सदा अवसाद में होती है, पर करे भी तो क्या? कोई रास्ता भी तो न था। कामवासना की भीषणता में ध्यान, जप एवं उपवास के सारे प्रयोग निरर्थक चले जाते। अपने आन्तरिक द्वन्द्व व संघर्ष की इसी घड़ी में गुरु ने अपने शिष्य को अपना लिया और शिष्य ने अपने उद्धारक सद्गुरु को पहचान लिया।
  
🔷 विकल वासनाओं से घिरे शिष्य की यही एक चाहत थी कि उसकी वासनाएँ गिरें, उसका चित्त निर्मल हो। गुरुदेव ने उसे आश्वासन भी दिया और कहा कि वह अपने को आश्रम की साफ-सफाई में लगा दें। ऊपर से साधारण दिखने वाले इस काम में शिष्य ने अपने को झोंक दिया। रात-दिन उसका एक ही काम था-जो कहा गया, उसे करना। अपमान तिरस्कारों की झड़ी, शारीरिक व मानसिक परेशानियाँ उसे डिगा न सकीं। गुरुदेव को दिया गया वचन ही उसका जीवन था। ऐसा करते हुए उसकी किशोरावस्था कब प्रौढ़ावस्था में बदल गयी, पता नहीं चला। हालाँकि उसे अपने जीवन के इस तरह बीत जाने का कोई दुःख न था, परन्तु एक पीड़ा अवश्य उसके मन में पलती थी। एक वेदना से अवश्य उसका मन विकल होता था और वह वेदना थी-वासनाओं के आकर्षण की। अभी तक उसका मन पूर्ण निर्मल न हो पाया था।
  
🔶 अपनी इस वेदना को अपने अकेलेपन में जीता हुआ वह गुरु आज्ञा का पालन किये जा रहा था, पर कहीं गहरे छुपे दुःख में वह लिपटा हुआ था। बार-बार उसका आर्त स्वर बाबा सर्वानन्द को पुकार लेता, जो अब अपनी स्थूल देह में नहीं थे। अरे! यह क्या हुआ बाबा? मेरा अन्तस् इतना कलुषित क्यों है? पुकार के स्वर निरन्तर गहरे-घने होते गये। पीड़ा बढ़ती गयी। यह सघन पीड़ा ही उसकी प्रार्थना बन गयी। अपने शिष्य की इस असह्य वेदना को भला कृपालु सद्गुरु कब तक सहन करते। एक दिन वह उसके ध्यान में प्रकट हो गये। बेचारा शिष्य बिलख-बिलख कर रो पड़ा। उसके अन्तस् से यही भाव फूटे-गुरुदेव! आपने जैसा कहा-मैंने वही किया। फिर भी मेरी यह दुर्दशा क्यों है?
  
🔷 उसकी भाव चेतना में उपस्थित बाबा सर्वानन्द की सूक्ष्म चेतना स्पन्दित हुई। वत्स! हम तुम्हारी पीड़ाओं से परिचित हैं। यह सच है कि तुम अभी पूर्ण परिष्कृत नहीं हो पाये हो; परन्तु अपने परिष्कार की राह पर गतिशील हो। तुम्हारे इस वर्तमान जीवन और शरीर की कुछ सीमाएँ हैं। तुम्हें यह जीवन एवं शरीर तुम्हारे विगत दुष्कर्मों के प्रायश्चित के लिए मिला है और वही हो रहा है। प्रत्येक घड़ी-प्रत्येक पल में विभिन्न परिस्थितियों के द्वारा तुम्हारे  चित्त को निर्मल बना रहा हूँ। तुम्हारा सूक्ष्म शरीर भी जाग्रत् होकर परिपक्व होने की दशा में है। इसके सम्पूर्ण विकास के साथ ही तुम्हारी स्थूल देह नष्ट हो जायेगी, क्योंकि इस देह से उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधनाएँ सम्भव नहीं हैं। ध्यान रहे, जो देह प्रायश्चित के लिए मिलती है, वह अध्यात्म की उच्चतम कक्षा के लिए योग्य नहीं होती। उच्चतम साधनाओं का क्रम तुम अपनी सूक्ष्म चेतना द्वारा पूरा करोगे। अगले जीवन में इसमें और भी विकास होगा। बाबा सर्वानन्द की इन बातों ने शिष्य को यह अनुभव करा दिया कि कृपालु गुरुदेव सदा अपने शिष्य का ध्यान रखते हैं। बस शिष्य उन्हें अपने भावों में अनुभव करता रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 131