रविवार, 10 दिसंबर 2017

👉 उपयोगिता की समझ

🔶 एक बादशाह अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था। उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक दार्शनिक भी था।

🔷 कुत्ते ने कभी नौका में सफर नहीं किया था, इसलिए वह अपने को सहज महसूस नहीं कर पा रहा था।

🔶 वह उछल-कूद कर रहा था और किसी को चैन से नहीं बैठने दे रहा था। मल्लाह उसकी उछल-कूद से परेशान था कि ऐसी स्थिति में यात्रियों की हड़बड़ाहट से नाव डूब जाएगी।

🔷 वह भी डूबेगा और दूसरों को भी ले डूबेगा। परन्तु कुत्ता अपने स्वभाव के कारण उछल-कूद में लगा था। ऐसी स्थिति देखकर बादशाह भी गुस्से में था। पर, कुत्ते को सुधारने का कोई उपाय उन्हें समझ में नहीं आ रहा था।

🔶 नाव में बैठे दार्शनिक से रहा नहीं गया। वह बादशाह के पास गया और बोला - "सरकार! अगर आप इजाजत दें तो मैं इस कुत्ते को भीगी बिल्ली बना सकता हूँ।"

🔷 बादशाह ने तत्काल अनुमति दे दी। दार्शनिक ने दो यात्रियों का सहारा लिया और उस कुत्ते को नाव से उठाकर नदी में फेंक दिया।

🔶 कुत्ता तैरता हुआ नाव के खूंटे को पकड़ने लगा। उसको अब अपनी जान के लाले पड़ रहे थे। कुछ देर बाद दार्शनिक ने उसे खींचकर नाव में चढ़ा लिया।

🔷 वह कुत्ता चुपके से जाकर एक कोने में बैठ गया। नाव के यात्रियों के साथ बादशाह को भी उस कुत्ते के बदले व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ।

🔶 बादशाह ने दार्शनिक से पूछा - "यह पहले तो उछल-कूद और हरकतें कर रहा था, अब देखो कैसे यह पालतू बकरी की तरह बैठा है?"

🔷 दार्शनिक बोला - "खुद तकलीफ का स्वाद चखे बिना किसी को दूसरे की विपत्ति का अहसास नहीं होता है। इस कुत्ते को जब मैंने पानी में फेंक दिया तो इसे पानी की ताकत और नाव की उपयोगिता समझ में आ गयी ।"

👉 आज का सद्चिंतन 11 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Dec 2017


👉 अन्तपारा दुष्पूरा तृष्णा दोष

🔷 सम्पत्ति मात्र एक सीमित मात्रा में अपने पास रखी जा सकती है। उससे अधिक रखने के लिए गोदाम अपने पास है ही नहीं। फिर तृष्णाजन्य उपार्जन से संकट यह खड़ा हो जाता है कि जो चाहा गया है, यदि उतना मिल भी जाय, तो वह संचित न रखा जा सकेगा। चीज चाही हुई हो, प्रिय भी हो और मूल्यवान भी, पर उसे रखने का प्रबन्ध किये बिना, उसे जहाँ- तहाँ कैसे फेंक दिया जाय? स्थान बनाये बिना संग्रह कर लेना मुसीबत मोल लेने के समान है। पेट में चार रोटी का स्थान है।      

🔶 मिष्ठान्न सामने अधिक मात्रा में उपस्थित हों और उन्हें छोड़ देने का मन न हो, रखने की जगह नहीं, ऐसी दशा में खाये जाने पर पेट में दर्द उठेगा ही। बाहर कहीं रखेंगे, तो चोरी होने या सड़ जाने का संकट खड़ा होगा। यह है सांसारिक मुसीबतों की जड़। साधनों की कमी नहीं, पचाने की क्षमता नहीं। ऐसी दशा में तृष्णा अपनी ही होते हुए भी अपने लिए ही संकट उत्पन्न करती है।

🔷 संसार में असीम वैभव भरा पड़ा है, पर वह पात्रता के अनुरूप ही उपलब्ध है। भगवान सुख इतना देता है, जितना हजम हो सके। बिना पचे भी दर्द होता है। यही है तृष्णाजन्य दुःख अन्यथा इस वैभव से भरे संसार में हमें अकारण दुःख क्यों उठाना पड़े?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (भाग 3)

🔶 ऐसे व्यक्तियों को दो श्रेणी में विभक्त कर सकते हैं—
     

🔷 (1) विचारों से दुःखी— ऐसे लोग 90 प्रतिशत होते हैं, जिन्हें केवल मानसिक दुःख होता है। भविष्य के प्रति गलत निर्णय कर लेने से लोग अकारण ही दुःखी बने रहते हैं। पुत्री की शादी की चिन्ता, तरक्की न मिलने का दुःख, चोरों का भय, हानि का आशा का, मित्रों से विश्वास-घात की आशंका, गृह-नक्षत्र द्वारा हानि पहुंचने का डर पाये जाते हैं। ऐसे दुःखों का कारण वस्तुतः इतना बड़ा नहीं होता जितना कि वे उद्विग्न और संतप्त रहते हैं।

🔶 (2) शारीरिक दुःखी— इनके दुःख को दुःख कहा जा सकता है। शरीर रोगी है तो सुख कहां मिलेगा? पाचन-क्रिया खराब हो रही हो तो बहु स्वाद युक्त भोजन भी फीका जान पड़ेगा। ऐसे लोगों को एक हद तक वास्तविक दुःखी मान सकते हैं।

🔷 किन्तु यदि भावनाओं में परिष्कार किया जा सके तो अरुचिकर कारणों को भी सुख में बदला जा सकता है। तपस्वी लोग घर के सुखों को त्याग कर जंगल का जीवन अधिक व्यतीत करते हैं। देखने में वनवासी जीवन नितान्त अभावपूर्ण लगता है। आहार, विहार और आमोद-प्रमोद की जो सुविधा गृहस्थ जीवन में सम्भव है वह भला वन के जीवन में कहां मिलेगी? फिर भी एकान्त वासियों को आनन्द-पूर्ण जीवन बिताते देखा जाता है, इसका कारण भावनाओं का परिष्कार ही है।

🔶 स्वार्थी मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति को सुख मानते हैं किन्तु परमार्थी व्यक्तियों को परोपकार में सुख मिलता है। परोपकार देखने में घाटे का सौदा है। बाह्य दृष्टि से माप करें तो दूसरों के हित के लिये सदैव ही अपने हितों को होम देना होता है। समय, श्रम और कभी-कभी धन भी लगाना पड़ता है, किन्तु परोपकारी को अपनी उच्च भावनाओं में ही अतीव सुख प्राप्त होता है। देखने वाला उसे बेवकूफ मान सकता है किन्तु उसके आन्तरिक सुख को वह स्वयं ही जान सकता है। भावनाओं का सुख ही सच्चा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.27

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.2

👉 Solution Of Today’s Problems

🔶 Every body is worried today on account of internal conflict. A person has adequate wealth & means of livelihood, even then, he appears to be unhappy & worried. Another person looks lost inspite of being highly educated & well placed. Businessmen, scholars, leaders, religious persons & highly placed officers appear to be worried only for a solution of this problem. Most people complain of conflict, unhappiness, anguish & distress. Majority of people ‘both small & great, are worried only on account’ of these problems & make various efforts to get rid of them, even then, no solution is found.

🔷 In fact, the solution of these problems of life does not lie in the world of external achievements. The solution lies within the man.

🔶 The pride of prosperity, beauty, scholarship, intelligence, post, etc. is the boundary wall which has kept us apart from the realities of life. Pride, egoism may be of any quality, beauty or article, keeps man distant from real happiness & spiritual peace. How can he, whose mind & heart are caught in the siege of this vanity, remain contented.

🔷 When the rich will give up pride of wealth & will link their heart with poverty; when the scholars will sit in the line of ordinary being; when high officers will start worshipping common man, their egoism will vanish easily by itself & they will be able to find the solution of this important problem of life. Real happiness of life is only possible by making the heart free & comprehensive.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 2)

🔶 यह ऐसा समय है जिसमें किसी को किसी पर विश्वास नहीं रह गया है। आतंक और आशंकाओं से वातावरण चारों ओर घिरा हुआ है। सड़क पर जब आप निकलते हैं तो मालूम नहीं कि आपके साथ पड़ोस में चलने वाला आपके चाकू भोंककर कब आपकी सम्पत्ति छीन लेगा, इसका क्या विश्वास है? इनसान का चाल-चलन, इनसान का विचार इतना गन्दा-घटिया हो गया है कि यह स्थिति अगर बनी रही तो कोई किसी पर विश्वास नहीं करेगा, न भाई-भाई पर विश्वास करेगा, न स्त्री पुरुष पर विश्वास करेगी, न पुरुष स्त्री पर विश्वास करेगा, ऐसा गन्दा, ऐसा वाहियात समय है यह।
                 
🔷 यह समय इसलिए भी घटिया और वाहियात है कि नेचर हमसे आप सबसे नाराज हो गई है। जब उसकी मौज आती है तो अन्धाधुन्ध पानी बरसा देती है और जब मूड आता है तो सूखा नजर आता है। कहीं मौसम का ठिकाना नहीं कि मौसम पर पानी बरसेगा कि नहीं, ठण्ड के समय ठण्ड ही पड़ेगी कि गर्मी पड़ेगी, कोई नहीं कह सकता। भूकम्प कब आ जाए, कोई नहीं कह सकता? बाढ़ कब आ जाए, कोई ठिकाना नहीं? प्रकृति हम सबसे बिल्कुल नाराज हो गई है, इसलिए उसने काम करना बन्द कर दिया है। यह ऐसा भयंकर समय है।
    
🔶 ऐसे भयंकर समय में आपके ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या आपके कोई कर्तव्य नहीं है? क्या आपके अन्दर भावनाएँ नहीं हैं? क्या आपका हृदय पत्थर और लोहे का हो गया है? नहीं, मेरा ख्याल है कि सब आदमियों का ऐसा नहीं हुआ होगा। ज्यादातर लोगों का तो ऐसा ही हुआ है कि वे घटते-घटते जानवर की तरीके से बनते चले जा रहे हैं। जवान आदमी जब ज्यादा बुड्ढा हो जाता है तो कमर झुकने लगती है, आँखें नीची हो जाती हैं, लाठी टेककर चलता है। इनसान की जवानी चली जाती है तो वह बौना हो जाता है, घटिया हो जाता है, कमर झुक जाती है, उसका आसमान की ओर देखने का न मन होता है, न उसकी बनावट ही ऐसी रह जाती है कि वह ऊपर देखे। अधिकांश आदमी आज ऐसे हो गए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 तड़फ

🔶 एक बार एक छोटा सा बच्चा अपने बेहद अमीर पिता की ऊँगली थामे नदी के किनारे सैर कर रहा था। नदी का पानी धीरे धीरे बह रहा था। बच्चे की नज़रें ढूंढ रही थीं नदी में रहने वाली मछलियों को, बच्चा कभी आगे जाता तो कभी पीछे आता। मछलियों से उसका सामना नहीं हो पता।

🔷 अचानक थोड़ी दूर चलकर उस बच्चे को नदी के किनारे एक मछली मिल ही गयी, मछली गलती से नदी के किनारे पे चली आयी थी और बुरी तरह से तड़फ रही थी। मछली की तड़फ बच्चे से देखी नही गयी वो फौरन अपने पापा से बोला - पापा मछली शायद भूखी होगी, चलो इसे फाइव स्टार होटल में खाना खिलाते हैं पापा मुस्कराये, बच्चा परेशान हो गया। वो बोला- पापा मछली को शायद नींद आ रही होगी, चलो इसे ले जाकर सोने के पलंग पर सुलाते हैं।

🔶 यह सुनकर पापा ने कहा नहीं बेटे मछली को सोना-चांदी, रुपया-पैसा खुश नही कर सकते, यह तो तभी खुश होगी जब इसे वापिस नदी में डाल देंगे और बच्चे ने उसे उठाकर नदी में डाल दिया, मछली झट से खुश होकर नदी में तैरने लगी।

🔷 ठीक इसी मछली की तरह हम और आप भी तड़फ रहे हैं इस भौतिक जगत में भगवान से दूर होकर रुपया-पैसा, धन-दौलत, बड़ी-बड़ी उपलब्धियां बड़े-बड़े सम्मान हमारी तड़फ, हमारे दुखों को कम नहीं कर पाते, थोड़ी समय के लिए ख़ुशी जरूर मिलती है, इन्हें पाकर लेकिन फिर तड़फ और बेचैनी अपने कब्जे में ले लेती है हमें।

🔶 हम भी भगवान के अंश होकर भगवान से बहुत दूर हैं और बहुत बहुत तड़फ रहे हैं भगवान की कृपा से जब कोई दिव्य आत्मा आकर हमारा हाथ भगवान के हाथ में थमा देता है तब हमें हमारी बेचैनी से छुटकारा मिल सकता है वरना ये दुःख, तकलीफ हमेशा यूँ ही जारी रहेंगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 10 Dec 2017


👉 जीवन जीने की कला ही सच्ची साधना

🔷 कलाकार के हाथ अनगढ़ वस्तुओं को पकड़ते हैं और अपने उपकरणों के सहारे उन्हें नयनाभिराम सुन्दरता से भरते और बहुमुल्य बनाते हैं। कुम्हार मिट्टी से सुन्दर खिलौने बनाते हैं- मूर्तिकार पत्थर के टुकड़े को देव प्रतिमा में परिणत करता है। गायक बाँस के टुकड़े से वंशी की ध्वनि निनादित करता है। धातु का टुकड़ा स्वर्णकार केहथौड़े की चोट खाकर आकर्षक आभूषण बनता है। कागज, रंग और कलम से बहुमूल्य चित्र बनाने का कर्तृत्व कितना चमत्कार उत्पन्न करता है, इसे कोई भी देख सकता है।     

🔶 क्या वस्तुतः जीवन ऐसा ही है, जिसे रोते- खीझते किसी प्रकार पूरा किया जाना है? उसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि अनाड़ी हाथों पड़कर हीरा भी उपेक्षित होता है, तो बहुमूल्य मनुष्य जीवन भी क्यों न भार बनकर लदा रहेगा। किन्तु यह भी स्पष्ट है कि यदि उसे कलाकार की प्रतिभा से सँभाला- सँजोया जाय, तो उसे निश्चय ही देवोपम स्तर का स्वर्गीय परिस्थितियों से भरा पूरा जिया जा सकता है।

🔷 साधना जीवन जीने की कला का नाम है। जो मानवी अस्तित्व की गरिमा समझ सका और उसे अनगढ़ स्थिति से निकालकर सुसंस्कृत पद्धति से जी सका, उसे सर्वोपरि कलाकार कह सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (भाग 2)

🔶 गृहस्थी की सुघड़ व्यवस्था बच्चों का पालन-पोषण, श्रम-उद्योग और क्रियाशीलता का आधार सूत्र मोह होता है। इससे यह बात समझ में आती है कि अपनी मर्यादा के अन्दर संसार की कोई भी वस्तु बुरी नहीं है। सुख प्राप्ति की आकांक्षा भी इसी प्रकार बुरी नहीं। यह स्वाभाविक एवं उचित भी है कि लोग सुखों की कामना करते हैं। जीवन के विभिन्न व्यापार इसी से तो चलते हैं।
   
🔷 सुख की आकांक्षा न हो तो कौन परिश्रम करना चाहेगा? कड़ी धूप में अपनी चमड़ी कौन सुखाना चाहेगा? आठ घण्टे ड्यूटी बजाने में कौन-सा आनन्द रखा है? सुख की आकांक्षा के पीछे संसार की एक बहुत बड़ी व्यवस्था सन्निहित है, किन्तु यह है तभी तक जब तक सुख की प्राप्ति के साधनों में व्यत्तक्रम उत्पन्न न हो। इसे साधन न मानें, आसक्ति न हो। शक्ति के रूप में ही सुख का महत्व है।

🔶 ‘सुख’ एक दृष्टिकोण है—जो लोगों की रुचि के अनुरूप होता है। वस्तुतः संसार की किसी भी वस्तु में न सुख है, न दुःख। जिसके सन्तान नहीं होती है, वह इसके लिए बड़ा व्यग्र, दुःखी तथा बेचैन रहता है, उसकी दृष्टि में पुत्र-प्राप्ति का सुख ही संसार का बड़ा भारी सुख होगा। पर जिसके कई सन्तानें पहले ही हैं, घर में धन का अभाव है, उन्हें सन्तान का होना दुर्भाग्य जान पड़ता है। सुख का प्रधान साधन और आकांक्षा की प्रमुख वस्तु ऐसे लोगों के लिए धन होगी। धन और पुत्र दोनों अवस्थाओं में एक जैसे हैं। किन्तु भिन्न दृष्टिकोणों के कारण एक व्यक्ति धन कसे सुख का सार मानता है दूसरे के लिए ‘पुत्र’ सुख है।

🔷 इससे स्पष्ट हो जाता है कि संसार के किसी भी पदार्थ में सुख नहीं। रुचि के अनुकूल सुख का भाव अपने दृष्टिकोण में होता है। लोगों के दुःख का कारण पदार्थ के सुख की आसक्ति ही है। अधिकांश लोग इसी कारण दुःखी रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.26

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.2

👉 Mental Tension

🔶 Man alone is born crying & lives & dies complaining. Other being have neither worries nor problems in their lives. But man on account of being rational & emotional is influenced by even small thing & manifests his reactions. These reactions are more unfavorable than favorable.

🔷 Someone is worried on account of lack of material happiness & comforts; someone else is worried on account of lack of mental peace. These problems have become even more serious these days. New problems are arising alongwith the development of civilization. Of all the problems created by today’s material civilizations, the main one is mental tension.

🔶 To keep oneself busy is the surest way of keeping free from mental tension alongwith various kinds of problems. Co-ordination between ambitions & capabilities also reduces tension to a great extent. Everybody is desirous of rising higher than his present position & reaching the acme of progress. Freedom from anxiety should be made our aim, but we should not be impatient & bewildered. The aim can be achieved step-by-step.

🔷 It is also necessary  for an individual to have faith in God in order to save himself from bodily ailments produced by tension. Some people may object to the acceptance of God’s existence, but everybody can have faith in himself at least.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
मित्रो !

🔶 जानवर की एक विशेषता यह होती है कि उसे अपने पेट की हमेशा फिक्र बनी रहती है। जब वह जवान होता है तो उसे सन्तान पैदा करने का ख्याल आता है। दो के अलावा वह और कोई काम कर नहीं पाता और इनसान? इनसान देखने में तो जानवरों जैसा ही मालूम होता है, किन्तु उसमें भावनाएँ पाई जाती है। वनमानुष, बन्दर, लंगूर शायद आपने देखे हों, इनसे मिलती-जुलती है आदमी की देह। लेकिन उसकी विशेषता खासतौर से यह है कि उसमें भावनाएँ होती हैं। कहीं अकाल पड़ता है तो आदमी अपने अनाज के कोठों को खाली कर देता है। कहता है हम अकेले जीकर के क्या करेंगे? बाकी लोग भी खाएँ तो क्या हर्ज है? यदि किसी के छप्पर में, मुहल्ले में आग लगे तो वह सबसे पहले दौड़ता है आग बुझाने के लिए। यह क्या है? यह है आदमी की भावनाएँ। दूसरों की सेवा के लिए दौड़ पड़ना, यह इनसानियत की एक ही परीक्षा है। अगर इस परीक्षा में फेल हो जाएँ तो जानना चाहिए कि शक्ल इनसान जैसी भले हो, पर है तो वास्तव में जानवर।
                 
🔷 इस समय जिसमें आप हमारी बात सुन रहे हैं, ऐसा समय है, जिसको सामान्य नहीं कह सकते। इसे असामान्य ही कहा जाएगा। वैसे आपका सूरज सबेरे निकलता है, शाम को अस्त हो जाता है। कुएँ से पानी निकालते हैं, चक्की से आटा पीसते हैं, चौके से खाना खा लेते हैं। समय मामूली-सा मालूम पड़ता है, लेकिन हम और आप विचारपूर्वक अगर इसका अन्दाज लगाना चाहें तो मालूम पड़ेगा कि यह बहुत भयंकर समय में तूफान भले ही न आते हों, आपके ऊपर घनघोर बारिश भले ही न होती हो, लेकिन संसार की निगाह से और जरा लम्बी दृष्टि फेंककर देखेंगे तो आपको यह मालूम पड़ेगा कि यह बहुत ही असाधारण समय है। दस समय में हवा में जहर ही जहर घुला हुआ है। जो साँस आप लेते हैं उससे आपके भीतर जहर चला जा रहा है और आपकी जिन्दगी को रोज कम कर रहा है।
    
🔶 इस भयंकर समय में प्रत्येक आदमी के ऊपर मुसीबत छाई हुई है। थोड़े आदमियों के ऊपर नहीं, बहुत आदमियों के ऊपर, सारे संसार के ऊपर। पानी गन्दा हुआ जा रहा है। विकिरण बढ़ता जा रहा है। इससे बच्चे अपाहिज, लँगड़े-लूले पैदा हो रहे हैं। जनसंख्या की दृष्टि से आदमी किस कदर बढ़ता हुआ चला जा रहा है और खाने के लिए सामान कम पड़ता चला जा रहा है। आपने देखा, सुना? आपकी इतनी उमर हो गई? जिस भाव से आपको आज गेहूँ मिलता है, चावल, घी मिलता है, क्या आपने इससे पहले कभी सुना था? नहीं, कभी नहीं सुना था। यह महँगाई बढ़ रही है। अभी और बढ़ेगी। मुझे घटने की कोई सूरत नजर नहीं आती। वस्तुतः यह मुसीबत का समय है और आदमी पर मुसीबतें बढ़ती ही चली जा रही हैं और बढ़ेंगी अभी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)