शनिवार, 21 अप्रैल 2018

👉 टकराव के तीन सिद्धांत

🔶 टकराव का लक्ष्य अन्य व्यक्ति को नीचा दिखाना अथवा व्याकुल करना नहीं है।

🔷 किसी का सामना करना कठिन होता है, क्योंकि कई बार इस का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति संताप में डूब जाता है। आप जिस से टकराव कर रहे हैं वह व्यक्ति असहमति प्रकट कर सकता है, विरोध कर सकता है, अथवा यदि वह ईमानदार हो तो क्षमा भी मांग सकता है। परंतु यह संवाद कभी भी इतना सरल एवं सुखद नहीं होता। यह संवाद दो दलों या सरकारों के बीच हो सकता है, या फिर पती-पत्नी, माता-पिता और संतान, दो मित्र या एक प्रबंधक एवं कार्यकर्ता के बीच हो सकता है। कभी कभी सकारात्मक एवं रचनात्मक रूप से आमना सामना करना ही असहमति को दूर करने का एक मात्र मार्ग होता है। किसी से टकराव करना एक प्रकार का संवाद है – एक अवांछनीय संवाद जिस से व्यक्ति अपने को दोषी, लज्जित एवं क्रोधित महसूस कर सकता है। तो लीजिए मैं आप के सामने प्रस्तुत करता हूँ टकराव के तीन अमूल्य सिद्धांत।

🔶 ऊँचे स्वर में बात न करें

🔷 यदि आप किसी भी सकारात्मक परिणाम की आशा कर रहे हैं तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आप चिल्लायें नहीं। इस विषय पर विचार करें – हम किसी का सामना इसलिए करते हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि वह हमारी बात सुने तथा अपनी लापरवाही को स्वीकार करे अथवा यह स्वीकार करे कि उस के कारण हमे पीड़ा पहुँची है। इस का एक मात्र मार्ग है कि आप ऊँचे स्वर में बात न करें। क्यों? मानव मन सुखद वार्तालाप करने के लिए स्वाभाविक रूप से उत्सुक है। जब आप धीमे स्वर में बात करेंगे तो हो सकता है कि वे आप से सहमत ना हों, परंतु उनका मस्तिष्क उन्हें आप की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देगा। वार्तालाप करने और विवाद करने में प्राथमिक अंतर स्वर की ध्वनि एवं प्रबलता है। वार्तालाप एवं विवाद दोनों करते समय असहमति हो सकती है परंतु बहस के समय दोनों व्यक्ति केवल स्वयं बात करने में मग्न रहते हैं, दूसरों की सुन ने में नहीं। जब आप किसी पर चिल्लाते हैं, वे तुरंत ही मानसिक रूप से स्वयं को आप से दूर कर देते हैं। उनका मन वार्तालाप को छोड़ विषय से दूर हट जाता है अथवा आत्मरक्षात्मक हो जाता है। परंतु यदि आप सामान्य स्वर में बात करें, हो सकता है कि आप को लगे वे स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं पा रहे हैं, किंतु अवश्य ही आप के शब्द उन के मन में घुस जाएंगे। हाँ इस का यह अर्थ नहीं कि वे अपना व्यवहार अवश्य ही बदल देंगे।

🔶 आक्रामक रूप से बात न करें


🔷 याद रखें कि किसी का सामना करने का लक्ष्य यह है कि वह व्यक्ति आप के दृष्टिकोण को समझ सके तथा वह अपना व्यवहार बदले। आक्रामक रूप से बात कर के या उनकी निंदा कर के आप इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। उन्हें प्रायश्चित करने का अवसर दें। आप यह मान कर चलें कि उन से एक भूल हो गई। फिर वार्तालाप को इस विषय पर केंद्रित रखें कि कैसे उनका व्यवहार आप को या आप दोनों के रिश्ते को हानी पहुँचा रहा है अथवा कैसे यह उनके हित में नहीं है। ऐसा करने पर वह आप की बात और ध्यान से सुनेंगे। किंतु यदि हम उनकी आक्रामक रूप की आलोचना करें, उन्हें दोषी ठहरायें तब हम स्वतः दोनों के बीच एक विशाल बाधा खड़ा कर देते हैं। वे आत्मरक्षात्मक हो जाते हैं तथा अपनी सुरक्षा के लिए प्रत्याक्रमण करते हैं। इस कारण दोनों व्यक्तियों में दूरी और बढ़ जाती है, वे क्रोधित हो जाते हैं और टकराव करने के उद्देश्य की पूर्ती ही नहीं हो पाती।

🔶 विषय से न भटकें

🔷 तीनों सिद्धांतों में यही सबसे कठिन है। कई बार जब हम किसी से टकराव करते हैं वे उस विषय को टालना या उस से दूर रहना चाहते हैं। किसी प्रकार के स्पष्टीकरण, क्षमा याचना या परिणामों से बचने के लिए, वास्तविक मुद्दे से भटकने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। यदि दोनों व्यक्ति भावनात्मक हो कर विषय से भटकने लगें तो वार्तालाप में किसी प्रकार की संवेदनशीलता बनाए रखना असंभव हो जाता है। शीघ्र ही ऐसा वार्तालाप एक बहस अथवा एक कटुतापूर्ण असहमति बन जाएगा। जब अन्य व्यक्ति विषय से भटकने लगते हैं, तो आप सम रहकर उन्हें बात पूरी कर लेने दें, फिर विनम्रता से वार्तालाप को प्राथमिक विषय पर ले आएं। यदि आप भी विषय से भटकते हैं तो यह केवल एक व्यर्थ वाद विवाद बन कर रह जाएगी जिसका कोई सफल परिणाम नहीं होगा। यह अति आवश्यक है कि आप केवल मुद्दे पर ही केंद्रित रहें तथा संक्षिप्त रूप से बात करें। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी से उन के देर से आने के विषय में बात करना चाहते हैं, तो केवल वर्तमान उदाहरण के विषय में ही बात करें। यह ना कहें कि वे सदैव देर से आते हैं, या वे कुशल या सक्षम नहीं हैं।

🔶 याद रखें कि किसी से टकराव करने का उद्देश्य यह है कि आप उस व्यक्ति को यह अहसास दिला सकें कि आप उसके कुछ कार्यों से असहमत हैं तथा उन कार्यों को नापसंद करते हैं। उद्देश्य उन को नीचा दिखाना नहीं है। इसलिए परिणाम इस पर निर्भर है कि आप किन शब्दों का प्रयोग करते हैं, किस स्वर में बात करते हैं, ठीक किस समय बात करते हैं तथा आप के शरीर के हाव-भाव कैसे हैं। किंतु यदि आप को बार बार एक ही विषय पर किसी का सामना करना पड़े, फिर तो उन में परिवर्तन लाने की आशा बहुत कम है, क्योंकि बुद्धिमान के लिए तो संकेत ही पर्याप्त है। यदि वह व्यक्ति स्वयं की भूल को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं, तो किसी भी प्रकार के संवाद का कोई परिणाम नहीं निकल सकता।

🔷 मुल्ला नसरुद्दीन से उसका गधा उधार लेने के लिए उस का एक मित्र उस के पास आया। “मेरा गधा तो कल रात को ही भाग गया। और अब मुझे वह मिल नहीं रहा है”, मुल्ला ने कहा। संशयपूर्ण ढंग से उसके मित्र ने उसे देखा। मुल्ला ने अविचलित एवं शांत चेहरा बनाए रखा। तभी उसका गधा चिल्लाने लगा। “मुल्ला! तुम्हारे घर से मुझे तुम्हारे गधे की आवाज़ सुनाई दे रही है। तुमने मुझसे झूठ बोला! मैं समझता था कि तुम मेरे सच्चे मित्र हो।” “निस्संदेह! क्या तुम्हे अपने मित्र के शब्दों से अधिक एक गधे की आवाज़ पर विश्वास है।”

🔶 जीवन रंगीन एवं आकर्षक इसलिए है क्योंकि इस में विभिन्न रंग हैं; सभी रंग केवल श्वेत नहीं हो सकते, ना ही केवल लाल या केवल काला। उसी प्रकार सभी संवाद सुखद नहीं हो सकते हैं। व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत रिश्तों में सफलता इस पर निर्भर है कि आप अप्रिय संवाद तथा मतभेद से कैसे निपटते हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 21 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 April 2018


👉 An unhealthy mind

🔶 Mental health or the lack of it can not be observed with the naked eye, we are often quite unaware of it as a result. On a careful and deeper look, though, we will find that our minds are more unhealthy than our bodies. Mental illnesses such as insomnia, memory issues, headaches, mental fogginess and delirium are on a rapid rise. Our lives are getting pushed into a downward spiral due to mental disorders like excessive worrying, fear, despondency, and apathy.

🔷 Emotional disturbances are depriving us of human qualities of joy, happiness, grit, courage, generosity, kindness and compassion. As a result of this deprivation, our human soul is reduced to a subhuman existence, unable to exploit the God-given human possibilities. If only we could cultivate the generous and grand human emotions, we could live an extraordinary life filled with happiness and joy paralleling that of the great souls, even within ordinary circumstances.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama 66:1.33

👉 मानसिक अस्वस्थता

🔶 मानसिक अस्वस्थता ऑंखों से दिखाई नहीं पड़ती, इसलिए लोग उसके संबंध में प्राय: बेखबर रहते हैं। पर यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो शरीर से भी कहीं अधिक रुग्ण एवं दुर्बल मन पाए जायेंगे। अनिद्रा, सिरदर्द, स्मरण शक्ति की कमी, मूढ़ता, उन्माद जैसे मस्तिष्कीय रोगों की तो बाढ़ ही आ रही है। चिंता, भय, निराशा, आवेश, निरुत्साह जैसे मनोविकार अधिकतर लोगों को अपना शिकार बनाए हुए अनेक व्यक्तिगत जीवनों को पतनोन्मुख बनाए हुए हैं।

🔷 भावनात्मक अस्वस्थता के कारण अधिकांश लोग प्रफुल्लता, उल्लास, साहस, पुरुषार्थ, उदारता, वीरता, सहृ्दयता, सज्जनता जैसे मानवोचित गुणों से वंचित हो रहे हैं। फलस्वरूप मनुष्य के शरीर में रहते हुए भी उनकी जीवात्मा पाशविक स्तर का जीवनयापन कर रही है। ईश्वर प्रदत्त महान महत्ताओं से वह तनिक भी लाभ नहीं उठा पाती है। काश, मनुष्य की भावनाएँ उद्दात्त एवं उत्कृष्ट रही होतीं तो सामान्य परिस्थितियों और सामान्य साधनों के रहते हुए भी उसने महापूरुषों जैसा, नर-रत्नों जैसा प्रकाश एवं आनंदमय जीवन जिया होता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.१६)

👉 Poet Kalidas

🔶 In the course of their stroll in the royal gardens, king Vikramaditya suddenly remarked to the great poet Kalidas: “How creative and talented  you are! You are a litterateur par excellence. I wish God had given you a matching and handsome body”. The satire was not lost on the wise Kalidas. He did not say anything at that time. On return to the palace, he ordered for two pots, one of clay and the other of gold. Both were filled with water.

🔷 After some time, Kalidas asked the king. “Now tell us, which of the two waters is cooler”? “That of the clay pot”, replied Vikramaditya. A smiling Kalidas then said: “Just as coolness does not depend on the pot’s outer shell; even so, talent too is unrelated to the physical appearance of the body. O King! One should look at the inner qualities, not the external beauty. It is the beauty of the soul that is supreme. Learning and greatness are linked with the soul, not the body.

🔶 Happiness always looks small while you hold it in your hands, but let it go, and you learn at once how big and precious it is.

📖 From Akhand Jyoti

👉 तितिक्षा ही हमें सुदृढ़ बनाती है। (भाग 1)

🔶 कठिनाइयों से डर कर यदि हिम्मत हार बैठा जाय बात दूसरी है अन्यथा प्राणधारी की अदम्य जीवनेच्छा इतनी प्रबल है कि वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में जीवित ही नहीं-फलता-फूलता भी रह सकता है।

🔷 उत्तरी ध्रुव पर ‘एस्किमो’ नामक मनुष्य जाति चिरकाल से रहती है। वहाँ घोर शीत रहता है। सदा बर्फ जमी रहती है। कृषि तथा वनस्पतियों की कोई सम्भावना नहीं। सामान्य मनुष्यों को उपलब्ध होने वाले साधनों में से कोई नहीं फिर भी वे जीवित हैं। जीवित ही नहीं परिपुष्ट भी हैं। परिपुष्ट ही नहीं सुखी भी हैं। हम अपने को जितना सुखी मानते हैं वे उससे कम नहीं कुछ अधिक ही सुखी मानते हैं और सन्तोषपूर्वक जीवन यापन करते हैं। जरा सी ठण्ड हमें परेशान कर देती है पर एस्किमो घोर शीत में आजीवन रहकर भी शीत से प्रभावित नहीं होते।

🔶 जीवनेच्छा जब तितीक्षा के रूप में विकसित होती है और कष्ट साध्य समझी जाने वाली परिस्थितियों से भी जूझने के लिए खड़ी हो जाती है तो मानसिक ढाँचे के साथ-साथ शारीरिक क्षमता भी बदल जाती है और प्रकृति में ऐसा हेर-फेर हो जाता है कि कठिन समझी जाने वाली परिस्थितियाँ सरल प्रतीत होने लगें। वन्य प्रदेशों के निवासी-सभ्य शहरी लोगों की तुलना में जितने अभाव ग्रस्त हैं उतने ही सुदृढ़ भी रहते हैं। परिस्थिति को अनुकूल बनाने का प्रयत्न तो करना चाहिए पर परिस्थिति के अनुकूल अपने को ढालने की मनस्विता एवं तितीक्षा के लिए भी तत्पर रहना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 55

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/March/v1.55

👉 गुरुगीता (भाग 91)

👉 सत् चित् आनन्दमयी सद्गुरु की सत्ता

🔶 ध्यान की यह अवधि एवं प्रक्रिया क्या हो, भगवान् महेश्वर अगले प्रकरण में स्पष्ट करते हैं-

अंगुष्ठमात्रपुरुषं ध्यायतश्चिन्मयं हृदि। तत्र स्फुरति भावो यः शृणु तं कथयाम्यहम्॥ ११५
अगोचरं तथाऽगम्यं नामरूपविवर्जितम्। निःशब्दं तद्विजानीयात् स्वभावं ब्रह्म पार्वति॥ ११६॥
यथा गंधः स्वभावेन कर्पूरकुसुमादिषु। शीतोष्णादिस्वभावेन तथा ब्रह्म च शाश्वतम्॥ ११७॥
स्वयं तथाविधो भूत्वा स्थातव्यं यत्र कुत्रचित्। कीटभ्रमरवत् तत्र ध्यानं भवति तादृशम्॥ ११८॥
गुरुध्यानं तथा कृत्वा स्वयं ब्रह्ममयो भवेत्। पिण्डे पदे तथा रूपे मुक्तोऽसौ नात्र संशयः॥ ११९॥

🔷 हृदय में चिन्मय आत्मज्योति के अंगुष्ठ मात्र स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। इस ध्यान की गहनता, सघनता व प्रगाढ़ता से जो भाव स्फुरित होते हैं, उन्हें सुनो॥ ११५॥ भगवान् शिव कहते हैं-हे पार्वती! इन्द्रियों से परे, सब भाँति अगम्य, नाम-रूप आदि विशेषताओं से परे, शब्द से रहित ब्रह्म का अनुभव अपने ही स्वरूप में होता है॥ ११६॥ जिस तरह से कर्पूर एवं पुष्प आदि सुगन्धित पदार्थों में स्वाभाविक ही सुगन्ध व्याप्त है। जिस भाँति सर्दी एवं गर्मी स्वाभाविक है, उसी भाँति ब्रह्म शाश्वत है॥ ११७॥ अपनी आत्मचेतना में ध्यान करते रहने से कीट-भ्रमर सान्निध्य की भाँति यह जीवात्मा ब्रह्म के ध्यान से स्वयं ब्रह्म हो जाता है॥ ११८॥ यह ब्रह्म का ध्यान यथार्थ में गुरु का ध्यान ही है। शिष्य अपने चित्त में गुरु का ध्यान करने से, गुरु की निराकार ज्योति का ध्यान करते रहने से सर्वथा मुक्त एवं ब्रह्ममय हो जाता है॥ ११९॥

🔶 गुरुगीता में बताई ध्यान की विधियों में यह विधि अनूठी है। इसमें कहा गया है कि सद्गुरु का ध्यान हृदय में करो और उसे अंगुष्ठ मात्र चिन्मयज्योति के रूप में अनुभव करो। ऐसा करने से स्वयं ही ब्रह्मानुभूति हो जायेगी। ध्यान के इस उपदेश में एक विलक्षणता है और वह विलक्षणता यह है कि हृदय में भावमय भगवान् के सगुण रूप का ध्यान करते हैं। निराकार यह ज्योतिर्ध्यान आज्ञाचक्र या भू्र-मध्य में किया जाता है; परन्तु यहाँ अंगुष्ठ मात्र ज्योति पुरुष का ध्यान हृदय में करने का निर्देश है। इस निर्देश में कई संकेत निहित हैं। इन संकेतों पर ध्यान दें, तो पता चलता है कि जीवात्मा-परमात्मा एवं सद्गुुरु की चेतना तात्विक रूप से एक ही है। यदि कोई साधक हृदयस्थल में इस अंगुष्ठ मात्र ज्योति का ध्यान करता है, तो स्वयं ही सद्गुरु की भगवत्ता की उपलब्धि कर लेता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 137

👉 उपासना और आत्म-निरीक्षण

🔶 मित्रो ! उपासना का तात्पर्य अपने आपको महानता के आदर्श के अधिकाधिक निकट लाना तथा आग और ईधन की तरह तादात्म्य स्थापित कर लेना है। साधना का तात्पर्य है संचित कुसंस्कारों और कषाय-कल्मषों की छाती पर चढ़ बैठना, उन्हें बेरहमी के साथ कुचल-मसल कर रख देना। इंद्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम की चतुर्विध तपश्चर्या के सहारे ही जीवन की वरिष्ठïता उभरती है और उस आत्मबल का उदय होता है जिसे संसार का सबसे बड़ा सामर्थ्य स्त्रोत कहा जाता है। आराधना वह है जिसमें 'आत्मवत् सर्वभूतेषु की, 'वसुधैव कुटुंबकम् की अनुभूति होती है। उपासना, साधना और आराधना का अवलंबन करके ही कोई वास्तविक आत्मिक प्रगति कर सका है। आत्मिक प्रगति का वास्तविक मार्ग एक ही है समूची जीवन- चर्या में उत्कृष्टता का समावेश। जिसने यह समझ लिए उसने अध्यात्म का सारतत्व समझ लिया।

🔷 मित्रो ! आत्म-निरीक्षण करके गुण, कर्म, स्वभाव में भरे हुये दोष दुर्गुणों को ढूंढा जा सकता है और उन्हें निरस्त करने का प्रयास आरम्भ किया जा सकता है। लोहे से लोहा कटता है और विचारों से विचारों की काट की जाती है। हेय आदतें, इच्छायें और मान्यतायें जो अपने मन: क्षेत्र में जड़ जमाये बैठी हों, उन्हें आत्म- निरीक्षण की टार्च जलाकर बारीकी से तलाश करना चाहिए और निश्चय करना चाहिए कि उनका उन्मूलन करके ही रहेंगे। प्रत्येक निकृष्टï विचार के विरोधी विचारों की एक सुसज्जित सेना खड़ी करनी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य