शुक्रवार, 30 जून 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 21)

🌹  अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

🔴 इसलिए अपनी सद्गति एवं समाज की प्रगति का मार्ग समझकर, व्यक्तिगत सुख- स्वार्थ की अंधी दौड़ बंद करके व्यापक हितों की साधना प्रारंभ करनी चाहिए। अपनी श्रेयानुभूति को क्रमशः सुखों, स्वार्थों से हटाकर व्यापक हितों की ओर मोड़ना ही हमारे लिए श्रेयस्कर है।
  
🔵 भगवान ने मनुष्य को इतनी सारी सुविधाएँ, विशेषताएँ, इसलिए नहीं दी हैं कि वह उनसे स्वयं ही मौज- मजा करे और अपनी काम- वासनाओं की आग को भड़काने और उसे बुझाने के गोरखधंधे में लगा रहे। यदि मौज- मजा करने के लिए ही ईश्वर ने मनुष्य को इतनी सुविधाएँ दी होतीं और अन्य प्राणियों को अकारण इससे वंचित रखा होता तो निश्चय ही वह पक्षपाती ठहरता। अन्य जीवों के साथ अनुदारता और मनुष्य के साथ उदारता बरतने का अन्याय भला वह परमात्मा क्यों करेगा, जो निष्पक्ष, जगत पिता, समदर्शी और न्यायकारी के नाम से प्रसिद्ध है।
 
🔴 युग निर्माण सत्संकल्प में इस अत्यंत आवश्यक कर्तव्य की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है कि मनुष्य का जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए है। शास्त्रों में अपनी कमाई को आप ही खा जाने वाले को चोर माना गया है।

🔵 जो मिला है उसे बाँटकर खाना चाहिए। मनुष्य को जो कुछ अन्य प्राणियों के अतिरिक्त मिला हुआ है वह उसका अपना निज का उपार्जन नहीं, वरन् सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के श्रेष्ठ सत्पुरुषों के श्रम एवं त्याग का फल है। यदि ऐसा न हुआ होता तो मनुष्य भी एक दुर्बल वन्य पशु की तरह रीछ- वानरों की तरह अपने दिन काट रहा होता। इस त्याग और उपकार की पुण्य प्रक्रिया का नाम ही धर्म, संस्कृति एवं मानवता है। उसी के आधार पर, प्रगति पथ पर इतना आगे बढ़ जाना संभव हुआ।

🔴 यदि इस पुण्य प्रक्रिया को तोड़ दिया जाए, मनुष्य केवल अपने मतलब की बात सोचने और उसी में लग रहने की नीति अपनाने लगे, तो निश्चय ही मानवीय संस्कृति नष्ट हो जाएगी और ईश्वरीय आदेश के उल्लंघन के फलस्वरूप जो विकृति उत्पन्न होगी, उससे समस्त विश्व को भारी त्रास सहन करना पड़ेगा। परमार्थ की आधारशिला के रूप में जो परमार्थ मानव जाति की अंतरात्मा बना चला आ रहा है, उसे नष्ट- भ्रष्ट कर डालना, स्वार्थी बनकर जीना निश्चय ही सबसे बड़ी मूर्खता है। इस मूर्खता को अपनाकर हम सर्वतोमुखी आपत्तियों को ही निमंत्रण देते हैं और उलझनों के दलदल में आज की तरह ही दिन- दिन गहरे धँसते चले जाते हैं।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.32

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/apane.2

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 9)

🔴 आप जागरूक रहिए। आप उदार तो रहें; लेकिन भलमनसाहत को उस सीमा तक मत ले जाएँ, कि आपकी जागरूकता ही चली जाए। दुनिया में बहुत अच्छे आदमी हैं; लेकिन बुरे आदमी भी कम नहीं हैं। बुरे आदमियों के प्रति आपको जागरूक रहना चाहिए, कोई आप पर हमला न कर दे, कोई आपकी भलमनसाहत का अनुचित फायदा न उठा ले—इस दृष्टि से आपके जागरूक रहने की भी जरूरत है और उदार रहने के लिए? दूसरों की सेवा करने के लिए मैं आपसे कब मना करता हूँ? दूसरों की सहायता करने के लिए मैं आपसे कब मना करता हूँ? लेकिन मैं यह कहता हूँ कि आप ऐसा मत कीजिए कि आपकी सद्भावना और उदारता का लोग अनुचित लाभ उठा जाएँ और आपको उल्लू बनाते फिरें। ऐसा मत कीजिए। जागरूक भी रहिए और उदार भी बनिए। दोनों का समन्वय कीजिए।

🔵 आप सज्जन भी रहिए और शूरवीर भी रहिए। नहीं, हम तो सज्जन रहेंगे। सज्जन रहेंगे, तो क्या कायर बनेंगे?  सज्जन का मतलब क्या यह होता है कि कोई आदमी आपकी बहिन-बेटी से छेड़खानी करे और आपके प्रति बुरा सलूक करे तब भी आप सब कुछ देखते-सहते रहें? यही सोचते रहेंगे कि हमें क्या करना है, भगवान की मर्जी है, ऐसा ही हमारे भाग्य में लिखा है, तब आप ऐसा ही करेंगे। नहीं, सज्जन तो बनिए; लेकिन उसके साथ में अपनी शूरवीरता को गँवाइए मत। सज्जन इसीलिए हारते रहे हैं कि उन्होंने शूरवीरता गँवा दी। सज्जन हो गये, तो कायर हो गये। सज्जनता का अर्थ कायरता नहीं होता। सज्जनता के साथ में शूरता की भी प्रमुखता रहनी चाहिए। आप समग्र जीवन जिएँ। सज्जन भी बनें और शूरवीर भी बनें, उदार भी बनें और जागरूक भी बनें, नम्र भी बनें और सम्मान भी दें। इसी तरीके से जीवन में दोनों को मिला करके जियेंगे, तो बहुत अच्छा रहेगा।

🔴 आप जा ही रहे हैं तो एक और नया दृष्टिकोण बना करके जाइए कि हमारे आप सघन मित्र और सहयोगी हैं। आप गुरु-चेले की बात मत कीजिए। गुरु-चेला उसे कहते हैं, जो दिया करता है और लिया करता है। आप ऐसा मत कीजिए। आप हमारे सहयोगी और मित्र बन जाइए। मित्र मुझे बहुत पसन्द रहे हैं। मित्रों को मैं बहुत प्यार करता हूँ। क्यों? क्योंकि मित्र कीमत चुकाकर कीमत उतार देते हैं और भिखारी, गुरु-चेले? ये ऐसे ही हैं, चावल दे दिये, माला पहना दी, बस प्रसन्न हो गये। आप ऐसा मत कीजिए। आप मित्र बन जाइए हमारे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 June

🔴 आध्यात्मिक साधना की सफलता के लिए सबसे पहला एवं अनिवार्य कदम “इन्द्रिय निग्रह” है। यों ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच मानी जाती हैं, पर उनमें से दो ही प्रधान हैं पहली- स्वादेन्द्रिय और दूसरी कामेन्द्रिय। इनमें से स्वादेन्द्रिय प्रधान है। उसके वश में आने से कामेन्द्रिय भी वश में आ जाती है। रसना को जिसने जीता, वह विषय वासना पर भी अंकुश रख सकेगा। चटोरा आदमी ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकता, उसे सभी इन्द्रियाँ परेशान करती हैं, विशेष रूप से काम वासना तो काबू में आता ही नहीं। इसलिए इन्द्रिय-निग्रह की तपश्चर्या संयम, साधना, स्वाद को, जिव्हा को वश में करके आरंभ की जाती है। चटोरेपन की वेदी पर न केवल आरोग्य और दीर्घ जीवन बलि चढ़ जाता है, वरन् आत्मसंयम की साधना भी मात्र मखौल बनकर रह जाती है।

🔵 संयमी और सदाचारी ही प्राणवान, शक्तिवान, स्वस्थ एवं संस्कारी बनते तथा भौतिक और आध्यात्मिक आनन्द की उपलब्धि कर सकते हैं। ओजस्वी, तेजस्वी एवं मनस्वी होने का अर्थ है मन, वचन तथा कर्म से सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना। ब्रह्मचर्य इसे ही कहा जाता है। इसका पालन न तो कठिन है न असंभव। आवश्यकता मात्र ऊर्ध्वरेता बनने और ऊंचा उठने की आकाँक्षा की है। इस संबंध में महात्मा गाँधी का कहना है कि आत्म संयम की साधना करने वाले को सर्वप्रथम अपनी रसना को वश में रखना अनिवार्य है। इसके लिए स्वाद नियंत्रण परमावश्यक है।
                                              
🔴 अपनी वासनाओं पर काबू रखना, उन्हें कुमार्ग पर न जाने देना मनुष्य के शौर्य, पराक्रम एवं पुरुषार्थ का प्रधान चिन्ह है। मनः क्षेत्र में कुहराम मचाने वाली उत्तेजनाएँ, आवेश, असंतुलन एवं विकार इन्द्रियों के असंयम के ही परिणाम होते हैं। जब तक स्वाद या चटोरेपन के वशीभूत हो स्वादेन्द्रिय पेट पर अत्याचार करती रहेंगी, तब तक इन विकारों से छुटकारा पाना संभव नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 30 June 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 June 2017


👉 जीवन लक्षः-

🔵 एक नौजवान को सड़क पर चलते समय एक रुपए का सिक्का गिरा हुआ मिला। चूंकि उसे पता नहीं था कि वो सिक्का किसका है, इसलिए उसने उसे रख लिया।  सिक्का मिलने से लड़का इतना खुश हुआ कि जब भी वो सड़क पर चलता, नीचे देखता जाता कि शायद कोई सिक्का पड़ा हुआ मिल जाए।

🔴 उसकी आयु धीरे-धीरे बढ़ती चली गई, लेकिन नीचे सड़क पर देखते हुए चलने की उसकी आदत नहीं छूटी। वृद्धावस्था आने पर एक दिन उसने वो सारे सिक्के निकाले जो उसे जीवन भर सड़कों पर पड़े हुए मिले थे। पूरी राशि पचास रुपए के लगभग थी। जब उसने यह बात अपने बच्चों को बताई तो उसकी बेटी ने कहा:-

🔵 "आपने अपना पूरा जीवन नीचे देखने में बिता दिया और केवल पचास रुपए ही कमाए। लेकिन इस दौरान आपने हजारों खूबसूरत सूर्योदय और सूर्यास्त, सैकड़ों आकर्षक इंद्रधनुष, मनमोहक पेड़-पौधे, सुंदर नीला आकाश और पास से गुजरते लोगों की मुस्कानें गंवा दीं। आपने वाकई जीवन को उसकी संपूर्ण सुंदरता में अनुभव नहीं किया।

🔴 हममें से कितने लोग ऐसी ही स्थिति में हैं। हो सकता है कि हम सड़क पर पड़े हुए पैसे न ढूंढते फिरते हों, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि हम धन कमाने और संपत्ति एकत्रित करने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि जीवन के अन्य पहलुओं की उपेक्षा कर रहे हैं? इससे न केवल हम प्रकृति की सुंदरता और दूसरों के साथ अपने रिश्तों की मिठास से वंचित रह जाते हैं, बल्कि स्वयं को उपलब्ध सबसे बड़े खजाने-अपनी आध्यात्मिक संपत्ति को भी खो बैठते हैं।

🔵 आजीविका कमाने में कुछ गलत नहीं है। लेकिन जब पैसा कमाना हमारे लिए इतना अधिक महत्वपूर्ण हो जाए कि हमारे स्वास्थ्य, हमारे परिवार और हमारी आध्यात्मिक तरक्की की उपेक्षा होने लगे, तो हमारा जीवन असंतुलित हो जाता है। हमें अपने सांसारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के साथ-साथ अपनी आध्यात्मिक प्रगति की ओर भी ध्यान देना चाहिए। हमें शायद लगता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का मतलब है सारा समय ध्यानाभ्यास करते रहना, लेकिन सच तो यह है कि हमें उस क्षेत्र में भी असंतुलित नहीं हो जाना चाहिए।

🔴 अपनी प्राथमिकताएं तय करते समय हमें रोजाना कुछ समय आध्यात्मिक क्रिया को, कुछ समय निष्काम सेवा को, कुछ समय अपने परिवार को और कुछ समय अपनी नौकरी या व्यवसाय को देना चाहिए। ऐसा करने से हम देखेंगे कि हम इन सभी क्षेत्रों में उत्तम प्रदर्शन करेंगे और एक संतुष्टिपूर्ण जीवन जीते हुए अपने सभी लक्ष्यों को प्राप्त कर लेंगे। समय-समय पर यह देखना चाहिए कि हम अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल हो भी रहे हैं अथवा नहीं। हो सकता है कि हमें पता चले कि हम अपने करियर या अपने जीवन के आर्थिक पहलुओं की ओर इतना ज्यादा ध्यान दे रहे हैं कि परिवार, व्यक्तिगत विकास और आध्यात्मिक प्रगति की उपेक्षा हो रही है।

🌹 पं श्रीराम आचार्य

👉 उदारता और संकीर्णता :-

🔴 राजा सत्यनारायण की दो अलग अलग वाटिका मे एक विशेष वृक्ष था और राजा स्वयं अपने हाथो से उन वृक्षों को जल देने जाते थे और उन्हे सींचते व हमेशा हराभरा बनाये रखते थे!

🔵 एक बार उन्हे अचानक लम्बी अवधी के लिये राज्य से बहुत दुर जाना पड़ा जाते जाते उन्होंने उन वृक्षों की जिम्मेदारी अपनी दो सन्तानों को दी और उन्हे कहा की तुम दोनो का एक ही कार्य है की तुम्हे इन वृक्षों को अपनी जान से ज्यादा सम्भालकर रखना है और याद रखना की इनकी हरियाली समाप्त न हो पाये अन्यथा कहर ढा जायेगा सारा राज्य समाप्त सा होकर रह जायेगा !

🔴 एक वर्ष के बाद राजा पुनः अपने राज्य मे लोटे तो उन्होंने देखा की एक वृक्ष तो हराभरा है और दूसरा खड़ा तो है पर पुरी तरह से सूखा हुआ था!

🔵 राजा ने तत्काल दोनो संतानों को बुलाया और कहा क्यों रे तुमने इन्हे पानी नही दिया तो एक संतान ने कहा हॆ आदरणीय पिताश्री पानी तो हम दोनो ने ही दिया पर इसने वृक्ष की जड़ को समाप्त कर दिया हालाँकि इसने कोई कमी न रखी परन्तु ये जड़ को न बचा पाया और वृक्ष भीतर ही भीतर समाप्त होता चला गया और मैने इसे बहुत समझाया की जड़ को बचा नही तो पुरा वृक्ष समाप्त हो जायेगा परन्तु इसने मेरी एक न सुनी और अब पश्चाताप कर रहा है पर अब बहुत देर हो चुकी है...!

🔴 पर जाते समय मैने कहा था की वृक्ष को खुशहाल रखना है और फल प्राप्त करना है तो जड़ का विशेष ध्यान रखना...!

🔵 हाँ पिताश्री , और आपके कथनानुसार और आपकी कृपा से मैने जड़ को बचा लिया इसलिये ये वृक्ष हराभरा है !

🌹👉 सारांश

🔴 ये सारी सृष्टि और मनुष्य की सारी जिन्दगी एक वृक्ष की तरह ही तो है और "राम" इस सॄष्टि के मूलतत्व है और जिस जिस ने संकीर्णता और विकारों की ज्वाला से  "मूल" को बचा लिया उसके जीवन का वृक्ष कभी नही सूखा और जिसने संकीर्णता की चादर ओढ़ ली एकदिन उसका समूल विनाश हो गया !

🔵 यहाँ दो चादर है एक उदारता की दूसरी संकीर्णता की जिसने उदारता की चादर ओढ़ ली एकदिन उसके लिये सारा जगत "राममय" हो गया वो हर जीव मे , सारी सृष्टि मे , कणकण मे अपने "आराध्य" को देखता है और उसके मानव जीवन का लक्ष्य हराभरा हो जाता है !

🔴 उदारता ही जीवन है और संकीर्णता ही मृत्यु और उदारतापूर्वक अपने आराध्य के मार्ग पे चलते रहना और एक दिन उस अवस्था को पाने का प्रयास करना की हमें हर जीव और कण कण मे अपने आराध्य दिखने लगे जैसे की भक्त प्रहलाद को सर्वत्र नारायण ही दिखाई देते थे और ये उज्जवल अवस्था संकीर्णता से नही उदारता से प्राप्त की जा सकती है इसलिये जिन्दगी मे उदारवादिता के साथ आगे बढ़ना संकीर्णता से नही क्योंकि संकीर्ण एक दिन अशांति के गहरे अन्धकार मे लुप्त हो जाते है।

गुरुवार, 29 जून 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 June

🔴 जीवन को प्रगतिशील दिशा देने वाली प्रतिभा को सुविकसित करने हेतु स्वतः स्वर्णिम सूत्र-

(1) मस्तिष्क से असफल होने के विचारों को निकाल फेंके और अपनी अन्तर्निहित क्षमताओं को समझें।

(2) स्व-सहानुभूति को पृथक करके अपने दोष दुर्गुणों अथवा दुर्बलताओं को निरीक्षण-परिक्षण करें।

(3) अपने ही स्वार्थ के विषय में सोच-विचार बन्द करें, दूसरों की सेवा-सहायता को भी सोचें और कार्य रूप में परिणत करें।

(4) ईश्वर-प्रदत्त इच्छा शक्ति का सही समुचित प्रयोग करें। उसकी दिशा धारा को व्यर्थ-निरर्थक न बहने दें।

(5) जीवन लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ही जीवनचर्या का निर्धारण करें।

(6) मानसिक ऊर्जा को नियंत्रित करके उपयोगी दिशा में नियोजित करें। चिन्तन की दिशा को सदैव सृजनात्मक बनाए रखें।

(7) जीवन के प्रत्येक दिन सुबह और शाम उस परब्रह्म की समर्थसत्ता के साथ संपर्क-

(8) सान्निध्य बिठाने का अभ्यास किया जाय, जो असंभव दिखने वाले कार्य को भी संभव बना सकने की शक्ति प्रदान करती है।

(9) ये वे महत्वपूर्ण सूत्र हैं जिनका अवलम्बन लेकर हर कोई अपनी प्रतिभा को कुण्ठित होने से बचा कर स्वयं को प्रगति के परम शिखर तक पहुँचा सकता है। प्रतिभा ही तो सफलता का बीज है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 June 2017



👉 आज का सद्चिंतन 29 June 2017


👉 अभिलाषा इतनी भर है:—

🔵 देवत्व परास्त हो जाय, धर्म हार जाय, विवेक कराहता रहे, चिर-संचित मानव-सभ्यता को निर्बल कर दिया जाय, यह नहीं होने दिया जायेगा। लड़ाई जारी रखी जायेगी, दुनिया के योद्धा, नेता, धनी, बुद्धिमान्, विद्वान साथ न दें तो निराश न बैठा जायेगा। रीछ-वानरों को-अपने नगण्य स्तर के परिजनों को लेकर अखण्ड-ज्योति आगे आयेगी, और सोने की लंका में साधन सम्पन्न-कुम्भकरणों, मेघनाथों, रावणों को ललकारेगी। विजय दूर हो तो हर्ज नहीं। आगे बढ़ना और लड़ना अपना काम है, सो उसे बिना राई-रत्ती हिचकिचाहट लाये, दिन-दूने-रात चौगुने उत्साह के साथ जारी रखा जायेगा।

🔴 अभिलाषा इतनी भर है कि अपने परिवार से जो आशायें रखी गई हैं, उन्हें कल्पना मात्र सिद्ध न होना पड़े। अखण्ड-ज्योति परिजन अपना उत्साह खो न बैठें और जब त्याग, बलिदान की घड़ी आवे, तब अपने को खोटा सिक्का सिद्ध न करने लगें। मनुष्य की महानता उसकी उन सत्प्रवृत्तियों की चरितार्थ करने में है, जिनसे दूसरों को प्रकाश मिले। जिसमें ऐसा कुछ नहीं- जो उदरपूर्ण और प्रजनन प्रक्रियाओं तक सीमाबद्ध है, उसे नर-पशु ही कहा जा सकता है। हम नहीं चाहते कि हमारे बड़ी आशाओं के साथ संजोये हुए सपनों की प्रतिमूर्ति- परिजन उसी स्तर के चित्र हों, जिसका कि घर-घर में कूड़ा-कटकर भरा पड़ा है।

🔵 इस महत्वपूर्ण वेला में जो अपने कर्त्तव्यों का स्मरण रख सकें और जो उसके लिये वासना और तृष्णा को एक सीमा में नियन्त्रित रखकर कुछ अवसर अवकाश युग की पुकार- ईश्वरीय पुकार को सुनने, समझने और तद्नुसार आचरण करने में लग सकें, वे ही हमारी आशाओं के केन्द्र हो सकते हैं। उन साथी, सहचरों, में हम आगे बढ़ते और निर्धारित मोर्चों पर लड़ते हुए आगे बढ़ेंगे।

🌹 पं श्रीराम आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति, दिसम्बर 1966, पृष्ठ 65
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1968/December/v1.65

मंगलवार, 27 जून 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 120)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ

🔵 हमारी जीवन साधना की परिणतियाँ यदि कोई सिद्धि स्तर पर ढूँढ़ना चाहे तो उसे निराश नहीं होना पड़ेगा। हर कदम अपने कौशल और उपलब्ध साधनों की सीमा से बहुत ऊँचे स्तर का उठा है। आरम्भ करते समय सिद्धि का पर्यवेक्षण करने वालों ने इसे मूर्खता कहा और पीछे उपहासास्पद बनते फिरने की चेतावनी भी दी, किंतु मन में इस ईश्वर के साथ रहने का अटूट विश्वास रहा जिसकी प्रेरणा उसे हाथ में लेने को उठा रही थी। लिप्सारहित अंतःकरणों में प्रायः ऐसे ही संकल्प उठते जो सीधे लोकमंगल से सम्बन्धित हों और जिनके पीछे दिव्य सहयोग मिलने का विश्वास हो।

🔴 साधना की ऊर्जा सिद्धि के रूप में परिपक्व हुई तो उसने सामयिक आवश्यकताएँ पूरी करने वाले किसी कार्य में उसे खपा देने का निश्चय किया। कार्य आरम्भ हुआ और आश्चर्य इस बात का है कि सहयोग का साधन जुटाने का वातावरण दीखते हुए ही प्रयास इस प्रकार अग्रगामी बने मानों वे सुनिश्चित रहे हों और किसी ने उसकी पूर्व से ही सांगोपांग व्यवस्था बना रखी हो। पर्यवेक्षकों में से अनेकों ने इसे आरम्भ में दुस्साहस कहा था लेकिन सफलताएँ मिलती चलने पर वे उस सफलता को साधना की सिद्धि कहते चले गए।

🔵 इन दुस्साहसों की छुटपुट चर्चा तो की जा चुकी है। उन सबको पुनः दुहराया जा सकता है।
  
🔴 १. पंद्रह वर्ष की आयु में चौबीस वर्ष तक गायत्री महापुरश्चरण, चौबीस वर्ष में पूरा करने का अनेक अनुबंधों के साथ जुड़ा हुआ संकल्प लिया गया। वह बिना लड़खड़ाए नियत अवधि में सम्पन्न हो गया।
  
🔵 २. इस महापुरश्चरण की पूर्णाहुति में निर्धारित जप का हवन करना था। देश भरके गायत्री उपासक आशीर्वाद देने आमंत्रित करने थे। पता लगाकर ऐसे चार लाख पाए गए और वे सभी मथुरा में सन् १९५८ में सहस्र कुण्डीय यज्ञ में आमंत्रित किए गए। प्रसन्नता की बात थी कि उनमें से एक भी अनुपस्थित नहीं रहा। पाँच दिन तक निवास, भोजन, यज्ञ आदि का निःशुल्क प्रबंध रहा। विशाल यज्ञशाला, प्रवचन मंच, रोशनी, पानी सफाई आदि का सुनियोजित प्रबंध था। सात मील के घेरे में सात नगर बसाए। सारा कार्य निर्विघ्न पूरा हुआ। लाखों का खर्च हुआ, पर उसकी पूर्ति बिना किसी के आगे पल्ला पसारे ही होती रही।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/hamari.2

👉 आज का सद्चिंतन 28 June 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 June 2017



👉 सफलता का रहस्य


🔴 एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या  है?

🔵 सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो.वो मिले. फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा.और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया. लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा , लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे तब तक डुबोये रखे जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा. फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की वो थी हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना.

🔴 सुकरात ने पूछा, जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”

🔵 लड़के ने उत्तर दिया, ”सांस लेना”

🔴 सुकरात ने कहा, यही सफलता का रहस्य है. जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम सांस लेना  चाहते थे  तो वो तुम्हे मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है।

👉 धर्म का सार

🔵 नाना प्रकार के मत-मतांतरों, संप्रदायों के उलझन भरे कर्मकांडों के जंजाल में भटकते रहने से धर्म-तत्त्व की प्राप्ति नहीं हो सकती। जो धर्म को प्राप्त करना चाहते हैं, सच्चे अर्थों में धर्मात्मा बनना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि अपनी इच्छा, रुचि और आदतों की कड़ी समालोचना करके देखें कि इनमें कितने अंश ऐसे हैं, जो दूसरों के उचित अधिकारों से टकराते हैं।

🔴 अपनी स्वार्थपरता, अनुदारता, संग्रहशीलता और भोगेच्छा को घटाना चाहिए और दया, उदारता, परमार्थ, प्रेम, सेवा, सहायता, त्याग, सात्त्विकी प्रवृत्तियों को बढ़ाना चाहिए। स्वार्थ की मात्रा जितनी घटती जाती है और परमार्थ की मात्रा जितनी बढ़ती जाती है, उतना ही मनुष्य धर्मात्मा, पुण्यात्मा, बनता जाता है। इसी मार्ग पर चलता हुआ पुरुष स्वर्ग या मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

🔵 संसार के सारे दु:खों, क्लेशों, संघर्षों का एकमात्र कारण यह है कि लोग अपने लिए जो बातें चाहते हैं, वैसा दूसरों के साथ व्यवहार नहीं करते। खरीदने के बाट और रखना चाहते हैं तथा बेचने के और। यह घातक नीति ही अशांति की जड़ है। स्वार्थ की निकृष्ट इच्छा से अंधे होकर जब हम अपने लिए बहुत अच्छा बर्ताव चाहते हैं और दूसरों के साथ बहुत बुरा व्यवहार करते हैं तो उसका निश्चित परिणाम कलह ही होता है। मनुष्य को आमतौर से जो व्यवहार नापसंद हैं, वे पाप हैं। जो इन पाप-कर्मों को करता है, वह पापी है।

🌹 अखण्ड ज्योति, मार्च 1944 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/March/v1.13



👉 Quintessence of Religion

🔵 The element of religion can’t be found in the mirage of rituals, cults or communal doctrines and rites. If you are true seeker, want to adopt religion in the truest sense, you must first introspect and sincerely analyze your aspirations, interests, habits and behavior to whether and to what extent these might trouble or hurt others or hinder their justified rights… You must restrain and curtail the tendencies of selfish possession, passions for sensual pleasures and ruthlessness and insensitivity to others.

🔴 Simultaneously, the altruistic tendencies and sentiments of kindness, generosity, love, amity, feeling of service, sharing and
cooperation should be cultivated and enhanced consistently. The only measure of one’s religiousness is – the less one’s selfishness and the more his/her altruism, the greater is his/her religiousness and spirituality. It is only through this path or religiousness that the individual self realizes higher realms of divine grace and salvation.

🔵 The major cause of all misery, adversities and sufferings in the world is that – knowingly or unknowingly, people do not behave with others in a manner, which they expect and like others to behave. This disparity of – “different weight used in the same balance for buying and for selling” is the root of all mistrusts, conflicts and animosity. Ego, avarice and selfishness make one blind and
debauch from the path of religion. If you do what your conscience would not allow, or what you would not like someone else doing to you, then you are committing a sin. So be vigilant towards your ambitions, attitude and actions.

🌹 Akhand Jyoti, Mar. 1944

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 June

🔴 जीवन की महत्ता और सफलता उसकी आत्मिक प्रगति पर निर्भर है, यह विश्वास मन में रखना चाहिए व नित्य सुदृढ़ बनाना चाहिए। भौतिक सफलताएं तो उतनी ही देर आनन्द देती हैं, जब तक कि उनकी प्राप्ति नहीं हो जाती। मिलते ही आनन्द समाप्त हो जाता है व और अधिक के लिए व्याकुलता, बेचैनी आरंभ हो जाती है। जो मानव जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर उस आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक हैं, जिसके लिए यह जन्म मिला है, उन्हें आत्मिक प्रगति के लिए तत्पर होना चाहिए और उसके दोनों आधारों उपासना और साधना का अवलम्बन लेना चाहिए।

🔵 मनुष्य में जो असीम एवं अपरिमित शक्तियाँ भरी पड़ी हैं उनके अस्तित्व में विश्वास करने और तद्नुरूप उन्हें हस्तगत कर लेने की योग्यता-क्षमता को प्रतिभा के नाम से जाना जाता है। यह न तो जन्मजात उपलब्धि है और न किसी का दिया हुआ वरदान-आशीर्वाद। भाग्यवश मिला हुआ आकस्मिक संयोग-सुयोग भी नहीं कहा जा सकता। वह स्व उपार्जित ऐसी विलक्षण सम्पदा है, जिसके सहारे जीवन की प्रतिकूल दीखने वाली परिस्थितियों को अनुकूल बनाया जा सकता है।
                                              
🔴 जिन व्यक्तियों ने अपनी प्रसुप्त प्रतिभा को उपयोगी दिशा में लगाया है, उसके सत्परिणाम उन्हें हाथों हाथ मिलते देखे गये हैं। परिस्थितियाँ कितनी विपन्न और विषम क्यों न बनी रही हों, पर धुन के धनी लोगों ने जीवन की महत्वपूर्ण सफलताएँ अर्जित कर दिखाई हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (अंतिम भाग)

🔴 शास्त्रकार ने लिखा है-

“यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवताः’’ 
“जहाँ नारी की पूजा की जाती अर्थात् आदर-सत्कार होता है वहाँ देवता निवास किया करते है।”

🔵 इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले हजार बारह-सौ वर्षों से हम भारतीय लोग नारी का तिरस्कार उसकी उपेक्षा करते चले आ रहे है और जिसके अभिशाप पतन के गहरे गर्त में गिर पड़े है। अब हमें अपनी चेतना में आना चाहिए और नारी को उचित स्थान देकर अपना तथा अपने राष्ट्र का कल्याण करना चाहिए। हमें ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि हमारे राष्ट्र की नारियाँ, समाज की जननी अब असहाय अबला भीरु बनकर न रहे बल्कि वे देवी, दुर्गा, शक्ति बनकर शीघ्र ही उठे और समाज की नव रचना में बराबर का हाथ बँटायेंगे।

🔴 हम अपनी राष्ट्र निर्मात्री का घर की बंदिनी, परदे की प्रतिमा अथवा पैर की जूती न रखकर उसे स्वतंत्रता शिक्षा तथा प्रकाश की सुविधा दें जिससे कि वे सुसंस्कृत, संस्कारी सुयोग्य तथा स्वावलम्बी बनकर खड़ी हों ओर वर्तमान में राष्ट्र की सेवा में हाथ बँटायें और भविष्य के लिये सुन्दर स्वरूप तथा संस्कारवान् सन्तानें दे सकने में समर्थ हो सकें। नारी जीवन माता, पत्नी तथा भगिनी हर रूप में पूज्य है, उसका आदर होना ही चाहिए।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.27

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 8)

🔴 आप अपना सम्मान चाहते रहें और दूसरों के लिए अपमान का व्यवहार करते रहें, तब आप ऐसा कीजिए, अब आप यहाँ से जब कायाकल्प करके जा ही रहे हैं, तो अपने आपको नम्र बनाकर जाइए और दूसरों को सम्मान देना शुरू कीजिए। अब तक आप यह अपेक्षा करते रहे कि दूसरे आदमी आपके प्रति नम्र रहें और आपका सम्मान करें, तब मैं आपसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आप इस रवैये को बदल दीजिए। आप जो दूसरों से नम्रता की आशा करते थे, वह नम्रता आप अपने ऊपर हावी कर लें।

🔵 आप स्वयं नम्र रहें, जितने ज्यादा नम्र हो सकते हों, सुशील हो सकते हों, विनयशील हो सकते हों, सज्जन हो सकते हों, बन जाइए, दूसरों पर इस सम्बन्ध में दबाव मत डालिए और सम्मान? सम्मान आप प्राप्त करना चाहते थे न? मेरी प्रार्थना है, आप यह नियम बदल दीजिए। दूसरों को सम्मान दीजिए। दूसरों को सम्मान देंगे, तो आप देखेंगे कि यह प्राप्त कर सकना आपके लिए सम्भव था। दूसरे आपका सम्मान करें, इसमें दबाव डालने के लिए आप क्या कर सकते हैं, बताइए? नहीं दिया तब? इसलिए पाने का एक ही तरीका है—देना, सम्मान दीजिए और बदले में लीजिए।

🔴 आप उज्ज्वल भविष्य की उम्मीदें कीजिए। आप भविष्य के बारे में समय-समय पर जो बुरी आशाएँ लगाये बैठे रहते हैं, कहीं ऐसा न हो जाए, वैसा न हो जाए, ऐसा हो गया फिर क्या होगा? आप ऐसी कल्पनाएँ क्यों करते हैं? यह कल्पनाएँ क्यों नहीं करते कि भविष्य हमारा अच्छा-ही है। भविष्य अच्छा-अच्छा करते रहे और न हुआ तब? होगा कैसे नहीं? पानी के गिलास में आधा गिलास पानी आपके पास है, आप चाहें, तो यह कहिए कि आधा गिलास कम है और चाहे आप यह कहिए कि खाली गिलास की तुलना में आधा गिलास आ गया। आधा गिलास क्या कम है? पहले खाली गिलास था। अब आधा गिलास हो गया। आप यों प्रसन्न क्यों नहीं हो सकते कि आधा गिलास पानी हमारे पास है।

🔵 आप यही सोचते रहेंगे कि पूरा गिलास नहीं है। बात तो वही हुई; लेकिन विचार करने के तरीके अलग-अलग हो गए। आप विचार करने के तरीके बदलिए। अपने भविष्य के बारे में हमेशा अच्छी आशाएँ कीजिए। लेकिन बुरे के लिए तैयार भी रहिए। अगर ऐसी मुसीबत आयेगी, तो हम लड़ेंगे, मुकाबला करेंगे और साहस का परिचय देंगे—यह हिम्मत भी रखिए और उम्मीदें भी अच्छी कीजिए, खराब उम्मीदें आप क्यों करेंगे? क्या खराब उम्मीद की गारण्टी है कोई? जब खराब भविष्य की गारण्टी नहीं है, फिर आप अच्छे भविष्य की कल्पना करने में क्यों संकोच करते हैं? अच्छे भविष्य की कल्पना करने के लिए आप अपने आपको तैयार कीजिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 21)

🌹  अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

🔴 स्त्रियों के बारे में पुरुषों ने जो ऐसी मान्यता बना रखी है कि शरीर में भिन्नता रहने मात्र से नर और नारी में से किसी की हीनता या महत्ता मानी जाए, वह ठीक नहीं। यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि हम समाज के अभिन्न अंग हैं। जिस प्रकार एक शरीर से संबंधित सभी अवयवों का स्वार्थ परस्पर संबद्ध है, उसी प्रकार सारी मानव जाति एक ही नाव में बैठी हुई है। पृथकता की भावना रखने वालो, भिन्न स्वार्थों, भिन्न आदर्शों और भिन्न मान्यताओं वाले लोग कहीं बहुत बड़ी संख्या में अधिक इकट्ठे हो जाएँ तो वे एक राष्ट्र, एक समाज, एक जाति नहीं बन सकते। एकता के आदर्शों में जुड़े हुए और उस आदर्श के लिए सब कुछ निछावर कर देने की भावना वाले व्यक्तियों का समूह ही समाज या राष्ट्र है। शक्ति को स्रोत इसी एकानुभूति में है। यह शक्ति बनाए रखने के लिए हर व्यक्ति स्वयं को विराट् पुरुष का एक अंग, राष्ट्रीय मशीन का एक प्रामाणिक पुर्जा मानकर चले, सबके संयुक्त हित पर आस्था रखे, यह आवश्यक है। हमारी सर्वांगीण प्रगति का आधार यही भावना बन सकती है।
  
🔵 सबके हित में अपना हित सन्निहित होने की बात जब कही जाती है तो लोग यह भी तर्क देते हैं कि अपने व्यक्तिगत हित में भी सबका हित साधना चाहिए। यदि यह सच है तो हम अपने हित की बात ही क्यों न सोचें? यहाँ हमें सुख और हित का अंतर समझना होगा। सुख केवल हमारी मान्यता और अभ्यास के अनुसार अनुभव होता है, जबकि हित शाश्वत सिद्धांतों से जुड़ा होता है। हम देर तक सोते रहने में, कुछ भी खाते रहने में सुख का अनुभव तो कर सकते हैं, किंतु हित तो जल्दी उठने, परिश्रमी एवं संयमी बनने से ही सधेगा। अस्तु व्यक्तिगत सुख को गौण तथा सार्वजनिक हित को प्रधान मानने का निर्देश सत्संकल्प में रखा गया है।
 
🔴 व्यक्तिगत स्वार्थ को सामूहिक स्वार्थ के लिए उत्सर्ग कर देने का नाम ही पुण्य, परमार्थ है, इसी को देशभक्ति, त्याग, बलिदान, महानता आदि नामों से पुकारते हैं। इसी नीति को अपनाकर मनुष्य महापुरुष बनता है, लोकहित की भूमिका संपादन करता है और अपने देश, समाज का मुख उज्ज्वल करता है। मुक्ति और स्वर्ग का रास्ता भी यही है। आत्मा की शांति और सद्गति भी उसी पर निर्भर है। इसके विपरीत दूसरा रास्ता यह है जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए, सारे समाज का अहित करने के लिए मनुष्य कटिबद्ध हो जाता है। दूसरे चाहे जितनी आपत्ति में फँस जाएँ, चाहे जितनी हानि और पीड़ा उठाएँ, पर अपने लिए किसी की कुछ परवाह न की जाए। अपराधी मनोवृत्ति इसी को कहते हैं। आत्म- हनन का, आत्म- पतन का मार्ग यही है। इसी पर चाहते हुए व्यक्ति नारकीय यंत्रणा से भरे हुए सर्वनाश के गर्त में गिरता है।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.30

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/apane.1

👉 Quintessence of Religion

🔵 The element of religion can’t be found in the mirage of rituals, cults or communal doctrines and rites. If you are true seeker, want to adopt religion in the truest sense, you must first introspect and sincerely analyze your aspirations, interests, habits and behavior to whether and to what extent these might trouble or hurt others or hinder their justified rights… You must restrain and curtail the tendencies of selfish possession, passions for sensual pleasures and ruthlessness and insensitivity to others.

🔴 Simultaneously, the altruistic tendencies and sentiments of kindness, generosity, love, amity, feeling of service, sharing and
cooperation should be cultivated and enhanced consistently. The only measure of one’s religiousness is – the less one’s selfishness and the more his/her altruism, the greater is his/her religiousness and spirituality. It is only through this path or religiousness that the individual self realizes higher realms of divine grace and salvation.

🔵 The major cause of all misery, adversities and sufferings in the world is that – knowingly or unknowingly, people do not behave with others in a manner, which they expect and like others to behave. This disparity of – “different weight used in the same balance for buying and for selling” is the root of all mistrusts, conflicts and animosity. Ego, avarice and selfishness make one blind and
debauch from the path of religion. If you do what your conscience would not allow, or what you would not like someone else doing to you, then you are committing a sin. So be vigilant towards your ambitions, attitude and actions.

🌹 Akhand Jyoti, Mar. 1944

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 20)

🌹  अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

🔴 सामाजिक न्याय का सिद्धांत ऐसा अकाट्य तथ्य है कि इसकी एक क्षण के लिए भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। एक वर्ग के साथ अन्याय होगा तो दूसरा वर्ग कभी भी शांतिपूर्वक जीवनयापन न कर सकेगा। सामाजिक न्याय, अधिकारों का उपयोग दूसरों की भाँति ही कर सकें, ऐसी स्थिति पैदा किए बिना हमारा समाज शोषण- मुक्त नहीं हो सकता। सौ हाथों से कमाओ भले ही, पर उसे हजार हाथों से दान अवश्य कर दो अर्थात् अगणित बुराइयों को जन्म देने वाली संग्रह- वृत्ति को पनपने न दो।
  
🔵 कोई व्यक्ति अपने पास सामान्य लोगों की अपेक्षा अत्यधिक धन तभी संग्रह कर सकता है जब उसमें कंजूसी, खुदगर्जी, अनुदारता और निष्ठुरता की भावना आवश्यकता से अधिक मात्रा में भरी हुई हो। जबकि दूसरे लोग भारी कठिनाइयों के बीच अत्यंत कुत्सित और अभावग्रस्तता जीवनयापन कर रहे हैं, उनके बच्चे शिक्षा और चिकित्सा तक से वंचित हो रहे हों, जब उनकी आवश्यकताओं की ओर से जो आँखें बंद किए रहेगा, किसी को कुछ भी न देना चाहेगा, देगा तो राई- रत्ती को देकर पहाड़- सा यश लूटने को ही अवसर मिलेगा तो कुछ देगा, ऐसा व्यक्ति ही धनी बन सकता है। सामाजिक न्याय का तकाजा यह है कि हर व्यक्ति उत्पादन तो भरपूर करे, पर उस उपार्जन के लाभ में दूसरों को भी सम्मिलित रखे। सब लोग मिल- जुलकर खाएँ, जिएँ और जीन दें। दुःख और सुख सब लोग मिल- बाँट कर भोगे। यह दोनों ही भार यदि एक के कंधे पर आ पड़ते हैं, तो वह दब कर चकनाचूर हो जाता है, पर यदि सब लोग इन्हें आपस में बाँट लेते हैं तो किसी पर भार नहीं पड़ता, सबका चित्त हलका रहता है और समाज में विषमता का विष भी उत्पन्न नहीं हो पाते।
 
🔴 जिस प्रकार आर्थिक समता का सिद्धांत सनातन और शाश्वत है उसी प्रकार सामाजिक समता का मानवीय अधिकारों की समता का आदर्श भी अपरिहार्य है। इसको चुनौती नहीं दे सकते। किसी जाति, वंश या कुल में जन्म लेने के कारण किसी मनुष्य के अधिकार कम नहीं हो सकते और न ऊँचे माने जा सकते हैं। छोटे या बड़े होने की, नीच या ऊँच होने की कसौटी गुण, कर्म, स्वभाव ही हो सकते हैं। अपनी व्यक्तिगत विशेषताओं के कारण किसी का न्यूनाधिक मान हो सकता है, पर इसलिए कोई कदापि बड़ा या छोटा नहीं माना जा सकता कि उसने अमुक कुल में जन्म लिया है। इस प्रकार की अविवेकपूर्ण मान्यताएँ जहाँ भी चल रही हैं, वहाँ कुछ लोगों का अहंकार और कुछ लोगों का दैन्य भाव ही कारण हो सकता है। अब उठती हुई दुनियाँ इस प्रकार के कूड़े- कबाड़ा जैसे विचारों को तेजी से हटाती चली जा रही है।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.29

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 7)

🔴 परिणामों के बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता। जो परिणाम आपके हाथ में नहीं हैं, फिर क्यों आप ऐसा करते हैं कि उनके बारे में इतना ज्यादा लालच बनाये रखें और अपनी शान्ति को खो बैठें। आप केवल कर्तव्य की बात सोचिए, केवल माली की बात सोचिए, मालिक की बात खत्म, अधिकार की बात खत्म। कर्तव्य आपके हाथ में हैं, अधिकार दूसरों के हाथ में हैं। दूसरे देंगे तो अधिकार मिलेगा, नहीं देंगे, तो कैसे मिलेगा? आप अधिकार को लौंग मानिए और अपने कर्तव्यों को, जिम्मेदारी को उससे सुगन्धित कीजिए।

🔵 एक और बात मैं कहता हूँ, आप अपने स्वभाव में से एक और चीज को बदल सकते हैं। खीज़ बदल दीजिए, नाउम्मीदी की खीज़, अभावों की खीज़। आप खीज़ को छोड़कर एक नई चीज ग्रहण कर लें—मुसकराना। आप हर समय मुसकराने की कोशिश कीजिए, बनावटी ही मुसकराहट, फिर देखिए आपके स्वभाव में किस तरह परिवर्तन होता है? मन को हल्का-फुल्का रखें, खिलाड़ी की तरह जिन्दगी जिएँ, नाटक के तरीके से अभिनय तो आप कीजिए; पर इतने ज्यादा मशगूल मत हो जाइए, जिससे आपकी स्वाभाविक प्रसन्नता ही चली जाए। आप हँसते रह सकते हैं। ताश खेलते समय में बादशाह काट दिया, बेगम काट दी, गुलाम भी काट दिया, सब काट दिये; लेकिन तब भी चेहरे पर शिकन नहीं। आप ऐसा ही कीजिए।

🔴 आपको प्रसन्नता हो, खुशी के, सफलताओं के मौके आएँ, ठीक हैं, आप अच्छे रहिए; लेकिन जब मुसीबतों के मौके आएँ, तब? तब भी आप प्रसन्न रहिए, मुसकराते रहिए। मुसीबतें जो-जो आती हैं, वह आपको मजबूत बनाने के लिए आती हैं, आपकी हिम्मत और दिलेरी जताने के लिए आती हैं, आपकी समझदारी को तीखा करने के लिए आती हैं और आपका व्यक्तित्व सोने में तपाकर खरा जैसा बना देने के लिए आती हैं। आप मुसीबतों की भी शोहबत कीजिए। यह नहीं कहता हूँ कि मुसीबतों को न्यौत बुलाइए; लेकिन मुसीबतें जब आएँ, तब घबड़ाइए मत, हिम्मत से काम लीजिए। ऐसा आप नहीं कर पायेंगे क्या? आप ऐसा ही कीजिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (भाग 6)

🔴 नारी अपने विभिन्न रूपों में सदैव मानव जाति के लिये त्याग, बलिदान, स्नेह श्रद्धा, धैर्य, सहिष्णुता का जीवन बिताती रही है। नारी धरा पर स्वर्गीय ज्योति की साकार प्रतिमा मानी गई है। उसकी वाणी जीवन के लिये अमृत स्रोत है। उस नेत्रों में करुणा, सरलता और आनन्द के दर्शन होते है। उसके हास में संसार की समस्त निराशा और कटुता मिटाने की अपूर्व क्षमता है। नारी संतप्त हृदय के लिये शीतल छाया और स्नेह सौजन्य की साकार प्रतिमा है। नारी पुरुष की पूरक सत्ता है। वह मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। उसके बिना पुरुष का जीवन अपूर्ण है। नारी ही उसे पूर्ण बनाती हैं जब मनुष्य का जीवन अंधकार युक्त हो जाता है तो नारी की संवेदना पूर्ण मुस्कान उसमें उजाला बिखेर देती है।

🔵 पुरुष के कर्तव्य शुष्क जीवन की वह सरलता प्रकट करते हुए श्रीमती महादेवी वर्मा ने एक स्थान पर लिखा है-

🔴 नारी केवल माँस-पिंड की संज्ञा नहीं है। आदिम काल से आज तक विकास पथ पर पुरुष का साथ देकर उसकी यात्रा को सफल बनाकर उसके अभिशापों को स्वयं झेलकर और अपने वरदानों से जीवन में अक्षय शाँति भर कर मानवों ने जिस व्यक्तित्व, चेतना और हृदय का विकास किया है, उसी का पर्याप्त नारी है।

🔵 कहना न होगा कि नारी का सहयोग तथा उसका महत्व मानव जीवन में उन्नति एवं विकास के लिये सदा अनिवार्य रहा है, आज भी है और आगे भी रहेगा। वह समाज, राष्ट्र, परिवार अथवा व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता जो किसी भी रूप में नारी का आदर नहीं कर सकता। जो समाज परिवार अथवा राष्ट्र नारी का जो कि उनका आधार तथा भक्ति स्रोत है अधिकार छीन लेता है वह पंगु होकर पर-दलित अथवा पतित अवस्था में पड़ा रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.26

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 June

🔴 सर्वव्यापी निराकार सत्ता से व्यक्तिगत मैत्री इस प्रकार नहीं जगायी जा सकती जैसे कि दुनियादार मतलब के लिए गधे को भी बाप बना लेते हैं और स्वार्थ सिद्ध न होने पर उसके साथ उपेक्षा या शत्रुता का व्यवहार करने लगते हैं। स्मरण रहे ईश्वर पर किसी की निन्दा प्रेरणा का प्रभाव नहीं पड़ता। वह अपने सामने वालों को सदा महानता अपनाने की प्रेरणा देता है और जिसने इस अनुशासन को जितनी मात्रा में अपनाया, उसे उतनी ही मात्रा में अपने स्नेह एवं अनुग्रह प्रदान करता है।

🔵 ईश्वर के निकटवर्ती एवं विश्वासी वे हैं जो उसके इस विश्व उद्यान को अधिक सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न करते हैं, जो अपने आप को मलीनताओं से छुड़ाकर अधिक से अधिक पवित्र और प्रखर बनाने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः जीवन साधना ही सच्ची ईश्वर उपासना है। पूजाकृत्य ऐसी ही मनोभावना विकसित करने के लिए अपनाये जाते हैं।
                                              
🔴 मनुष्य के मस्तिष्क को यदि भानुमति का पिटारा कहा जाय, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी, क्योंकि इसमें इतनी और ऐसी-ऐसी अद्भुत और आश्चर्यजनक क्षमताएँ भरी पड़ी हैं, जिन्हें यदि जीवन्त जाग्रत कर लिया जाय, तो यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि मनुष्य दीन-हीन स्थिति में पड़ा नहीं रह सकता। यदा-कदा यही क्षमताएँ दुर्घटनावश जग पड़ती है, तो हर कोई यह विश्वास करने लगता है कि यदि प्रयासपूर्वक मनुष्य इन्हें जगा ले, तो मनुज - चोले में ही वह नारायण की क्षमता अर्जित करने में सफल हो सकता है ।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 लक्ष्य की दिशा में अग्रसर

🔵 मनुष्य उज्ज्वल भविष्य की मनोरम कल्पनाएँ किया करता है। सुखमय जीवन का स्वप्न देखता है। उन्नति की योजनाएँ बनाता है। सफलता के सूत्र ढूँढ़ता है। लक्ष्य की दिशा में अग्रसर होने के लिए हर तरह की कोशिशें करता है। पर जब वह पीछे मुड़कर उपलब्धियों का मूल्याँकन करना चाहता है तो पता चलता है कि उसकी मनचाही योजनाएँ या तो मन में धरी रही गईं अथवा उनका क्रियान्वयन आधा-अधूरा हो पाया। इससे इसे अपने पुरुषार्थ पर खीज भी आती है व आक्रोश भी कारण ढूँढ़ पाने में वह सफल नहीं हो पाता।

🔴 असफलताजन्य खीज की प्रतिक्रियाएँ प्रायः दो अतिवादी स्वरूपों में अभिव्यक्ति होती हैं। एक व्यक्ति अपने को नितान्त अयोग्य मानकर घोर निराशा में निमग्न हो जाता है। एवं सारा दोष, भाग्य, भगवान अथवा परिस्थितियों के मत्थे मढ़कर निश्चित हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्तियों के जीवन में सफलता की सम्भावनाएँ क्रमशः धूमिल होती जाती हैं।

🔵 दूसरा वर्ग सफल व्यक्तियों का है। असफलता के कारणों की छान-बीन करते समय इनका दृष्टिकोण सन्तुलित रहता है। अपनी गतिविधियों का पर्यवेक्षण निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह करने पर पता चलता है कि स्वयं के भीतर पल रही अवाँछनीय और अनुपयुक्त विचार ही असफलताओं का मूल कारण है।

🔴 आदतें क्रियात्मक नहीं मूलतः विचारात्मक होती हैं। अतः सुधार की प्रक्रिया बहिरंग के साथ अन्तरंग में भी चलनी चाहिए। चिन्तन और व्यवहार का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। इसलिए सुधार-परिवर्तन के लिए दोनों मोर्चों पर समान रूप से तैनाती की आवश्यकता रहती है। इस उभय पक्षीय प्रयोजन की पूर्ति का सरल उपाय यह है कि विचारों को विचारों से ही काटा जाय। लब्ध प्रतिष्ठ मनोचिकित्सक सर नार्मन विंसेंट पील के प्रयोग इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 June 2017


👉 आज का सद्चिंतन 27 June 2017


सोमवार, 26 जून 2017

👉 समस्याओं का समाधान दृष्टिकोण के परिष्कार पर निर्भर

🔵 कोई आदमी अच्छा है या बुरा? यह उसकी आदतों का स्तर देखकर पता चलता है। ये आदतें कहीं बाहर से आकर नहीं चिपटतीं। मनुष्य की विचारणा और क्रिया ही दीर्घकालीन अभ्यास से स्वभाव का अंग बन जाती है।

🔴 विख्यात मनोविज्ञान वेत्ता विलियम जेम्स ने आदतों का विश्लेषण करते हुए एक स्थल पर लिखा है कि किसी प्रक्रिया की बार-बार आवृत्ति से हमारे मस्तिष्क में एक मनोवैज्ञानिक खाँचा बन जाता है। उस कार्य अथवा विचार की आवृत्ति उस खाँचे को और गहरी करती रहती है। यह खाँचा जितना गहरा होता जाता है, मन को उससे विरत करना उतना ही कठिन लगने लगता है।

🔵 आदतों की उत्कृष्टता-निकृष्टता ही जीवन में उत्थान-पतन की परिस्थितियाँ रचा करती हैं। अच्छी आदतें अन्तरंग सहयोग की तरह हर जगह अनुकूलता प्रदान करती हैं। इसके विपरीत बुरी आदतें हमेशा अपने पालक के अनगढ़पन की चुगली करती फिरती हैं। बने बनाए कामों तथा मधुर सम्बन्धों में खटाई डाल देना इस दुष्प्रवृत्ति का प्रिय व्यसन है।

🔴 कुछ बुरी आदतें स्वभाव में जड़ जमाकर इतनी पक्की हो जाती हैं कि उनके दुष्परिणाम भुगतने वाला भी उससे अनभिज्ञ बना रहता है। उदाहरण के लिए, जो दाँतों से नाखून काटता रहता है- चाहे किसी रूप में- आमतौर पर ‘नर्वस’ समझा जाता है। जो सदा देर से कहीं पहुँचता हो, वह लोगों की नजर में स्वार्थी और दूसरों का न ख्याल करने वाला होता है। टालमटोल करने वाला व्यक्ति अविश्वस्त माना जाता है, उसे कोई दायित्व वाला काम नहीं सौंपा जाता। यदि प्रयास किया जाय तो इन प्रवृत्तियों से मुक्ति भी पायी जा सकती है। अपने चिन्तन एवं व्यवहार में दैनन्दिन स्वयमेव समीक्षा करते रहने से यह दुष्कर लगने वाला कार्य भी सम्भव हो सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 26 June 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 June 2017


रविवार, 25 जून 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 June 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 June 2017


👉 रूपान्तरण कैसे हो

🔴 एक शिष्य ने अपने गुरुदेव से पूछा- "गुरुदेव, आपने कहा था कि धर्म से जीवन का रूपान्तरण होता है। लेकिन इतने दीर्घ समय तक आपके चरणों में रहने के बावजूद भी मैं अपने रूपान्तरण को महसूस नहीं कर पा रहा हूँ, तो क्या धर्म से जीवन का रूपान्तरण नहीं होता है?"

🔵 गुरुदेव मुस्कुराये और उन्होंने बतलाया- "एक काम करो, थोड़ी सी मदिरा लेकर आओ।"(शिष्य चौंक गया पर फिर भी शिष्य उठ कर गया और लोटे में मदिरा लेकर आया।) गुरुदेव ने शिष्य से कहा- "अब इससे कुल्ला करो।"(अपने शिष्य को समझाने के लिए गुरु को हर प्रकार के हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। मदिरा को लोटे में भरकर शिष्य कुल्ला करने लगा। कुल्ला करते-करते लोटा खाली हो गया।)

🔴 गुरुदेव ने पुछा- "बताओ तुम्हें नशा चढ़ा या नहीं?"शिष्य ने कहा- "गुरुदेव, नशा कैसे चढ़ेगा? मैंने तो सिर्फ कुल्ला ही किया है। मैंने उसको कंठ के नीचे उतारा ही नहीं, तो नशा चढ़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

🔵 इस पर संत ने कहा- "इतने वर्षो से तुम धर्म का कुल्ला करते आ रहे हो। यदि तुम इसको गले से नीचे उतारते तो तुम पर धर्म का असर पड़ता।

🔴 जो लोग केवल सतही स्तर पर धर्म का पालन करते हैं। जिनके गले से नीचे धर्म नहीं उतरता, उनकी धार्मिक क्रियायें और जीवन-व्यवहार में बहुत अंतर दिखाई पड़ता है। वे मंदिर में कुछ होते हैं, व्यापार में कुछ और हो जाते है। वे प्रभु के चरणों में कुछ और होते हैं एवं अपने जीवन-व्यवहार में कुछ और, धर्म ऐसा नहीं हैं, जहाँ हम बहुरूपियों की तरह जब चाहे जैसा चाहे वैसा स्वांग रच ले।

🔵 धर्म स्वांग नहीं है, धर्म अभिनय नहीं है, अपितु धर्म तो जीने की कला है, एक श्रेष्ठ पद्धति है।।"

शनिवार, 24 जून 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 19)

🌹  इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।

🔴 ध्यान रखना चाहिए कि जो उपार्जन से बचाया जाए, उसे उचित प्रयोजन में नियोजित कर दें। कमाने में न अनीति बरती जाए और न उपेक्षा। खर्च करने में सज्जनता एवं सत्परिणामों की जाँच पड़ताल रखी जाए अन्यथा संपन्नता, दरिद्रता से भी अधिक घातक सिद्ध होती है। इससे समाज में दूषित परंपराएँ पनपती है। धन के लक्ष्मी कहते हैं। सत्प्रयोजन में लगे तो लक्ष्मी, अपव्यय किया जाए, अनीति से कमाया या खर्च किया जाए तो वह माया है। माया का नाश सदैव हुआ है।
  
🔵 संयम पर न टिक पाने का कारण उसका स्वरूप न समझ पाना है। स्वरूप न समझ पाने से व्यक्ति उसी तरह फँस जाते हैं, जैसे अंधेरी रात में मार्ग में भरे पानी को सूखी जमीन समझकर व्यक्ति उसमें पैर फँसा देता है। स्वरूप एवं महत्त्व समझना कठिन नहीं है, परंतु उसके लिए मनुष्य को पूरा प्रयास तथा नित्य प्रति अभ्यास करना होगा। स्वरूप और महत्त्व समझने के लिए आवश्यक उद्योग न कर पाना भी असंयम की वृत्ति की ही प्रतिक्रिया है। अतः जो संयम का लाभ लेना चाहें वे उसका स्वरूप और महत्त्व समझें। संयम काँप एक पक्ष जहाँ अनावश्यक अपव्यय को रोकना है, वहाँ दूसरी हो उसे सृजनात्मक कार्यों हेतु नियोजित करना भी है। सामर्थ्य तभी श्रेयस्कर परिणाम उत्पन्न करती है, जब उसे अस्त- व्यस्तता एवं अनुपयुक्तता से बचाकर सृजनात्मक सत्प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाए।
 
🔴 सप्तर्षियों की बैठक होने वाली थी। उससे पूर्व ही वेदव्यास को महाभारत लिखकर देना था। समय कम था, तो भी उन्होंने गणेश जी की मदद ली और महाभारत लिखना प्रारंभ कर दिया। महाभारत समय से पूर्व ही लिख गया। अंतिम श्लोक लिखाते व्यास जी ने कहा- गणेश आश्चर्य है कि पूरा महाभारत लिख गया और इस बीच आप एक शब्द भी नहीं बोले। गणेश जी ने कहा- भगवन् इस संयम के कारण ही हम लोग वर्षों का कार्य कुछ ही दिन में संपन्न करने में समर्थ हुए हैं। बातों में समय नष्ट करने से काम में विलंब होता है। अपने काम में दत्तचित्त एवं शांत होकर लगे रहना चाहिए।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.27

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (भाग 5)

🔴 वेद इतिहास के ग्रंथों का अनुशीलन करने से पता चलता है कि प्रारम्भिक समय में जब साधनों की कमी होने से पुरुषों को प्रायः जंगलों से आहार सामग्री प्राप्त करने तथा आत्म शिक्षा के कामों में अधिक ध्यान देना पड़ता था तब व्यवस्था, ज्ञान-विज्ञान तथा सभ्यता संस्कृति सम्बन्ध विषयों में अधिकाँश काम नारियाँ ही किया करती थी। इसलिये अनेक तत्त्ववेत्ता अन्वेषक मनुष्यों को आदिम सभ्यता की जन्मदात्री नारी को ही मानते है। ऐसा महत्वपूर्ण तथा जीवनदायिनी नारी की उपेक्षा करना कहाँ तक ठीक है यह विचारणीय विषय है।

🔵 नारी संसार की सुंदरता तथा श्रृंगार है। यदि नारी का मोहक रूप न होता तो बर्बर पुरुष बर्बर ही बना रहता है। हिंसा, आखेट तथा युद्ध में ही लगा रहता है यह नारी का ही आकर्षण तथा परामर्श था जिसने उसे हिंसा से विरत कर पशु पालन तथा खेती-बाड़ी के काम में लगाया। उसकी स्नेहमयी करुणा ने ही पुरुष की कठोरता जीतकर उसे सद्गृहस्थ में बदल दिया पारिवारिक बना दिया। यदि नारी न होती तो पुरुष में न तो सरसता का जागरण होता और न कला-कौशल से प्रेम।

🔴 रूप की अय्याशी उसकी आँख संसार में अपना केंद्र खोजते-खोजते थककर पथरा जाती। आखेट खोल लाने के अतिरिक्त उसकी आँखों का वह मूल्य महत्व तथा उपयोग न रहता जिसके आधार पर उसे प्रकृति के सुन्दर दृश्य और आकाश के सुंदर रंग अनुभूत करने की चेतना मिल सकी है। नारी के प्रति स्नेह आकर्षण ने पुरुष हृदय में न केवल कला का ही स्फुरण किया अपितु काम को भी जन्म दिया। नारी के रूप में भी नारी का महत्व कुछ कम नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.25

👉 आप किसी से ईर्ष्या मत कीजिए। (अंतिम भाग)

🔵 जो लोग यह समझते हैं कि वे ईर्ष्या की कुत्सित भावना को मन में छिपा कर रख सकते हैं और मानते हैं कि दूसरों व्यक्ति उसे जान न सकेगा। वे बड़ी भूल करते हैं। प्रथम तो यह भावना छिप ही नहीं सकती, किसी न किसी रूप में प्रकट हो ही जाती है। दूसरे दुराचार और छिपाने की भावना मनोविज्ञान की दृष्टि से अनेक मानसिक रोगों की जननी है। कितने ही लोगों में विक्षिप्त जैसे व्यवहारों का कारण ईर्ष्याजन्य मानसिक ग्रन्थि होती है। ईर्ष्या मन के भीतर ही भीतर अनेक प्रकार के अप्रिय कार्य करती रहती है।

🔴 मनुष्य का जीवन केवल उन्हीं अनुभवों, विचार, मनोभावनाओं संकल्पों का परिणाम नहीं जो स्मृति के पटल पर है। प्रत्युत गुप्त मन में छिपे हुए अनेक संस्कार और अनुभव जो हमें खुले तौर पर स्मरण भी नहीं हैं, वे भी हमारे व्यक्तित्व को बनाते हैं। फ्राँस के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वर्गसाँ ने मनुष्य के जीवन विकास का उपर्युक्त सिद्धान्त माना है। ईर्ष्या, क्रोध, काम, भाव, द्वेष, चिंता, भय, दुर्व्यवहार का प्रत्येक अनुभव अपना कुछ संस्कार हमारे अंतर्मन पर अवश्य छोड़ जाता है। ये संस्कार और अनुभव सदैव सक्रिय और पनपने वाले कीटाणु हैं। इन्हीं के ऊपर नवजीवन के निर्माण का कार्य चला करता है।

🔵 ईर्ष्या के विकार अंतर्मन में बैठ जाने पर आसानी से नहीं जाते। उससे स्वार्थ और अहंकार तीव्र होकर सुप्त और जागृत भावनाओं में संघर्ष और द्वन्द्व होने लगता है। निद्रा-नाश, घबराहट, प्रतिशोध लेने की भावना, हानि पहुँचाने के अवसर की प्रतीक्षा देखना, विमनस्कता इत्यादि मानसिक व्यथाएं ईर्ष्यापूर्ण मानसिक स्थिति की द्योतक है। यदि यह विकार बहुत तेज हुआ तो मन पर एक अव्यक्त चिंता हर समय बनी रहती है जल, अन्न, व्यायाम, विश्राम का ध्यान नहीं रहता, शयन समय घात प्रतिघात का संघर्ष और अव्यक्त की उद्भूत वासनाएं आकर विश्राम नहीं लेने देतीं। अतः मनुष्य की पाचनेन्द्रिय बिगड़ जाती है, रुधिर की गति में रुकावट होने लगती है, शारीरिक व्याधियाँ भी फूट पड़ती हैं। सम्पूर्ण शरीर में व्यवधान उपस्थित होने से मस्तिष्क का पोषण उचित रीति से नहीं हो पाता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/June/v1.20

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 June 2017



शुक्रवार, 23 जून 2017

👉 आज का सद्चिंतन 24 June 2017


👉 कौवे की परेशानी

🔴  यदि आपको सुखी रहना है तो किसी से अपनी तुलना नहीं करो। ‘आप’ आप ही हो। आप के समान कोई नहीं। फिर क्यों दूसरों से अपनी तुलना करना, ईर्ष्या करना? आइये इस बात को एक कहानी के माध्यम से समझते हैं –
एक कौआ जंगल में रहता था और अपने जीवनसे संतुष्ट था। एक दिन उसने एक हंस को देखा,  “यह हंस कितना सफ़ेद है, कितना सुन्दर लगता है।”, उसने मन ही मन सोचा।

🔵 उसे लगा कि यह सुन्दर हंस दुनिया में सबसे सुखी पक्षी होगा, जबकि मैं तो कितना काला हूँ! यह सब सोचकर वह काफी परेशान हो गया और उससे रहा नहीं गया, उसने अपने मनोभाव हंस को बताये।

🔴  हंस ने कहा – “वास्तिकता ऐसी है कि पहले मैं खुदको आसपास के सभी पक्षिओ में सुखी समझता था। लेकिन जब मैने तोते को देखा तो पाया कि उसके दो रंग है तथा वह बहुत ही मीठा बोलता है। तब से मुझे लगा कि सभी पक्षिओ में तोता ही सुन्दर तथा सुखी है।”

🔵 अब कौआ तोते के पास गया।

🔴  तोते ने कहा – “मै सुखी जिंदगी जी रहा था, लेकिन जब मैंने मोर को देखा तब मुझे लगा कि मुझमे तो दो रंग ही, परन्तु मोर तो विविधरंगी है। मुझे तो वह ही सुखी लगता है।”

🔵 फिर कौआ उड़कर प्राणी संग्रहालय गया। जहाँ कई लोग मोर देखने एकत्र हुए थे।

🔴  जब सब लोग चले गए तो कौआ उसके पास जाकर बोला –“मित्र, तुम तो अति सुन्दर हो। कितने सारे लोग तुम्हे देखने के लिए इकट्ठे होते है! प्रतिदिन तुम्हे देखने के लिए हजारो लोग आते है! जब कि मुझे देखते ही लोग मुझे उड़ा देते है। मुझे लगता है कि अपने इस ग्रह पर तो तुम ही सभी पक्षिओ में सबसे सुखी हो।”

🔵 मोर ने गहरी सांस लेते हुए कहाँ – “मैं हमेशा सोचता था कि ‘मैं इस पृथ्वी पर अतिसुन्दर हूँ, मैं ही अतिसुखी हूँ।’ परन्तु मेरे सौन्दर्य के कारण ही मैं यहाँ पिंजरे में बंद हूँ। मैंने सारे प्राणी में गौर से देखे तो मैं समझा कि ‘कौआ ही ऐसा पक्षी है जिसे पिंजरे में बंद नहीं किया जाता।’  मुझे तो लगता है कि काश मैं भी तुम्हारी तरह एक कौआ होता तो स्वतंत्रता से सभी जगह घूमता-उड़ता, सुखी रहता !”

🔴  मित्रों, यही तो है हमारी समस्या। हम अनावश्यक ही दूसरों से अपनी तुलना किया करते है और दुखी-उदास बनते है। हम कभी हमें जो मिला होता है उसकी कद्र नहीं करते इसीके कारण दुःख के विषचक्र में फंसे रहेते है। 
🔵 प्रत्येक दिन को भगवान की भेट समझ कर आनंद से जीना चाहिए। सुखी होना तो सब चाहते है लेकिन सुखी रहेने के लिए सुख की चाबी हाथ करनी होगी तथा दूसरों से तुलना करना छोड़ना होगा। क्योंकि तुलना करना दुःख को न्योता देने के सामान है।

गुरुवार, 22 जून 2017

👉 दूसरों के दोष ही गिनने से क्या लाभ (अंतिम भाग)

🔵 अतएव हमें महात्मा कबीरदास की नम्रतापूर्ण उक्ति को सदा ध्यान में रखना चाहिए।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न दीखा कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझ सा बुरा न होय॥


🔴 दूसरों के व्यक्तिगत दोषों के प्रति हमारा क्या रुख होना चाहिए इसका विवेचन करते हुए महात्मा तुलसी दास लिखते हैं कि “साधुओं का चरित्र कपास जैसा निर्मल और शुभ्र होता है, उसका फल परम गुणमय होता है और वह स्वयं दुख सहकर दूसरों के पाप रूपी छिद्रों को ढकता है। इसी गुण के कारण वह संसार में वन्दनीय है। अतएव यदि हमें भी इस शुभ्र कपास जैसा वन्दनीय होना है तो हमें दूसरों की व्यक्तिगत भूलों के प्रति बड़ा सहृदय होना चाहिए। सहृदय होने पर ही, हम किसी व्यक्ति के हृदय में स्थान पा सकते हैं। तभी वह हमें अपना हितेच्छु जानकर हम पर अपने हृदय का भेद प्रकट कर सकता है और तभी हम उसके मन की गाँठें खोलने में उसकी सहायता कर उसका सच्चा सुधार कर सकते हैं।

🔵 हमें किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत दोषों के लिए जितना सहृदय होना है उतना ही हमें सामाजिक अपराध करने वालों के प्रति निर्मम होना पड़ेगा। सामाजिक अपराध करने वालों के उन अपराधों को हजार कान और आँखों से हमें सुनना और देखना पड़ेगा और उन्हें उनका दण्ड दिलवाना होगा।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति-अप्रैल 1949 पृष्ठ 18
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/April/v1.18

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 119)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ
🔵 साधना से सिद्धि का तात्पर्य उन विशिष्ट कार्यों से है, जो लोक-मंगल से सम्बन्धित होते हैं और इतने बड़े भारी तथा व्यापक होते हैं, जिन्हें कोई एकाकी संकल्प या प्रयास के बल पर नहीं कर सकता फिर भी वे उसे करने का दुस्साहस करते हैं और आगे बढ़ने का कदम उठाते हैं और अंततः असम्भव लगने वाले कार्य को भी सम्भव कर दिखाते हैं। समयानुसार जन सहयोग उन्हें भी मिलता रहता है। जब सृष्टि नियमों के अनुसार हर वर्ग के मनस्वी को सहयोग मिलते रहते हैं तब कोई कारण नहीं कि श्रेष्ठ कामों पर वह हर विधान लागू न होता हो। प्रश्न एक ही है अध्यात्मवादी साधनों और सहयोगों के अभाव में भी कदम बढ़ाते हैं और आत्मविश्वास तथा ईश्वर-विश्वास के सहारे नाव खेकर पार जाने का भरोसा रखते हैं। सामान्यजनों की मनःस्थिति ऐसी नहीं होती। वे सामने साधन सहयोग की व्यवस्था देख लेते हैं तभी हाथ डालते हैं।

🔴 साधनारत सिद्ध पुरुषों द्वारा महान् कार्य सम्पन्न होते रहे हैं। यही उनका सिद्ध चमत्कार है। देश में स्वतंत्रता आंदोलन आरम्भ कराने के लिए समर्थ गुरु रामदास एक मराठा बालक को आगे करके जुट गए और उसे आश्चर्यजनक सीमा तक बढ़ाकर रहे। बुद्ध ने संव्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध विश्वव्यापी बुद्धवादी आंदोलन चलाया। और उसे समूचे संसार तक विशेषतया एशिया के कोन-कोने में पहुँचाया। गाँधी ने सत्याग्रह आंदोलन छेड़ा। मुट्ठी भर लोगों के साथ धरसना में नमक बनाने के साथ शुरू किया। अंततः इसका कैसा विस्तार और कैसा परिणाम हुआ, यह सर्वविदित है।

🔵 विनोबा द्वारा एकाकी आरम्भ किया गया भूदान आंदोलन कितना व्यापक और सफल हुआ। यह किसी से छिपा नहीं है। स्काउटिंग, रेडक्रास आदि कितने ही आंदोलन छोटे रूप में आरम्भ हुए और वे कहीं से कहीं जा पहुँचे। राजस्थान का वनस्थली बालिका विद्यालय, बालासाहब आम्टे का अपंग एवं कुष्ठ रोगी सेवा सदन ऐसे ही दृश्य मान कृत्य हैं, जिन्हें साधना से सिद्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण कहा जा सके। ऐसी अगणित घटनाएँ संसार में सम्पन्न हुई हैं, जिनमें आरम्भ कर्त्ताओं का कौशल, साधन एवं सहयोग नगण्य था, पर आत्मबल असीम था। इतने भर से गाड़ी चल पड़ी और जहाँ-तहाँ से तेल-पानी प्राप्त करती हुई क्रमशः पूर्व से अगली मंजिल तक जा पहुँची। सदुद्देश्यों की ऐसी पूर्ति के पीछे साधना से सिद्धि की झाँकी देखी जा सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/hamari

👉 आज का सद्चिंतन 23 June 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 June 2017


👉 जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि



🔵 एक बार राजा भोज की सभा में एक व्यापारी ने प्रवेश किया। राजा भोज की दृष्टि उस पर पड़ी तो उसे देखते ही अचानक उनके मन में विचार आया कि कुछ ऐसा किया जाए ताकि इस व्यापारी की सारी संपत्ति छीनकर राजकोष में जमा कर दी जाए। व्यापारी जब तक वहां रहा भोज का मन रह रहकर उसकी संपत्ति को हड़प लेने का करता। कुछ देर बाद व्यापारी चला गया। उसके जाने के बाद राजा को अपने राज्य के ही एक निवासी के लिए आए ऐसे विचारों के लिए बड़ा खेद होने लगा।

🔴 राजा भोज ने सोचा कि मैं तो प्रजा के साथ न्यायप्रिय रहता हूं। आज मेरे मन में ऐसा कलुषित विचार क्यों आया? उन्होंने अपने मंत्री से सारी बात बताकर समाधान पूछा। मन्त्री ने कहा- इसका उत्तर देने के लिए आप मुझे कुछ समय दें। राजा मान गए।

🔵 मंत्री विलक्षण बुद्धि का था। वह इधर-उधर के सोच-विचार में समय न खोकर सीधा व्यापारी से मैत्री गाँठने पहुंचा। व्यापारी से मित्रता करने के बाद उसने पूछा- मित्र तुम चिन्तित क्यों हो? भारी मुनाफे वाले चन्दन का व्यापार करते हो, फिर चिंता कैसी?

🔴 व्यापारी बोला- मेरे पास उत्तम कोटि के चंदन का बड़ा भंडार जमा हो गया है। चंदन से भरी गाडियां लेकर अनेक शहरों के चक्कर लगाए पर नहीं बिक रहा है। बहुत धन इसमें फंसा पडा है। अब नुकसान से बचने का कोई उपाय नहीं है।

🔵 व्यापारी की बातें सुनकर मंत्री ने पूछा- क्या हानि से बचने का कोई उपाय नहीं? व्यापारी हंसकर कहने लगा- अगर राजा भोज की मृत्यु हो जाए तो उनके दाह-संस्कार के लिए सारा चन्दन बिक सकता है। अब तो यही अंतिम मार्ग दिखता है।

🔴 व्यापारी की इस बात से मंत्री को राजा के उस प्रश्न का उत्तर मिल चुका था जो उन्होंने व्यापारी के संदर्भ में पूछा था। मंत्री ने कहा- तुम आज से प्रतिदिन राजा का भोजन पकाने के लिए चालीस किलो चन्दन राजरसोई भेज दिया करो। पैसे उसी समय मिल जाएंगे।

🔵 व्यापारी यह सुनकर बड़ा खुश हुआ। प्रतिदिन और नकद चंदन बिक्री से तो उसकी समस्या ही दूर हो जाने वाली थी। वह मन ही मन राजा के दीर्घायु होने की कामना करने लगा ताकि राजा की रसोई के लिए चंदन लंबे समय तक बेचता रहे।

🔴 एक दिन राजा अपनी सभा में बैठे थे। वह व्यापारी दोबारा राजा के दर्शनों को वहां आया। उसे देखकर राजा के मन में विचार आया कि यह कितना आकर्षक व्यक्ति है। इसे कुछ पुरस्कार स्वरूप अवश्य दिया जाना चाहिए।

🔵 राजा ने मंत्री से कहा- यह व्यापारी पहली बार आया था तो उस दिन मेरे मन में कुछ बुरे भाव आए थे और मैंने तुमसे प्रश्न किया था। आज इसे देखकर मेरे मन के भाव बदल गए। इसे दूसरी बार देखकर मेरे मन में इतना परिवर्तन कैसे हो गया?

🔴 मन्त्री ने उत्तर देते हुए कहा- महाराज! मैं आपके दोनों ही प्रश्नों का उत्तर आज दे रहा हूं। यह जब पहली बार आया था तब यह आपकी मृत्यु की कामना रखता था। अब यह आपके लंबे जीवन की कामना करता रहता है। इसलिए आपके मन में इसके प्रति दो तरह की भावनाओं ने जन्म लिया है। जैसी भावना अपनी होती है, वैसा ही प्रतिबिम्ब दूसरे के मन पर पडने लगता है।

🔵 दोस्तों, यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है। हम किसी व्यक्ति का मूल्यांकन कर रहे होते हैं तो उसके मन में उपजते भावों का उस मूल्यांकन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए जब भी किसी से मिलें तो एक सकारात्मक सोच के साथ ही मिलें। ताकि आपके शरीर से सकारात्मक ऊर्जा निकले और वह व्यक्ति उस सकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित होकर आसानी से आप के पक्ष में विचार करने के लिए प्रेरित हो सके क्योंकि जैसी दृष्टि होगी, वैसी सृष्टि होगी।

👉 आप किसी से ईर्ष्या मत कीजिए। (भाग 3)

🔵 ईर्ष्या द्वारा हम मन ही मन दूसरे की उन्नति देखकर मानसिक दुःख का अनुभव किया करते हैं। अमुक मनुष्य ऊँचा उठता जा रहा है। हम यों ही पड़े हैं, उन्नति नहीं कर पा रहे हैं। फिर वह भी क्यों इस प्रकार उन्नति करे। उसका कुछ बुरा होना चाहिए। उसे कोई दुःख, रोग, शोक, कठिनाई, अवश्य पड़नी चाहिए। उसकी बुराई हमें करनी चाहिये। यह करने से उसे अमुक प्रकार से चोट लगेगी। इस प्रकार की विचारधारा से ईर्ष्या निरन्तर मन को क्षति पहुँचाती है। शुभ विचार करते, सद्प्रवृत्तियों तथा प्राणशक्ति का क्रमिक ह्रास होने लगता है।

🔴 ईर्ष्या से उन्मत्त हो मनुष्य धर्म, नीति, तथा विवेक का मार्ग त्याग देता है। उन्मादावस्था ही उसकी साधारण अवस्था हो जाती है और दूसरे लोगों की उन्माद और साधारण अवस्था उसे अपवाद के सदृश्य प्रतीत होती है। मस्तिष्क के ईर्ष्या नामक विकार से नाना प्रकार की विकृत मानसिक अवस्थाओं की उत्पत्ति होती है। भय, घबराहट, भ्रम ये सब मनुष्य की ईर्ष्या और विवेक बुद्धि के संघर्ष से उत्पन्न होते हैं।

🔵 प्रत्येक क्रिया से प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होती है। ईर्ष्या की क्रिया से मन में तथा बाह्य वातावरण में जो प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, वे विषैली हैं। आपकी अपवित्र भावनाएं इर्द-गिर्द के वातावरण को दूषित कर देती हैं। वातावरण विषैला होने से समाज का अपकार होता है। जो ईर्ष्या की भावनाएँ आपने दूसरों के विषय में निर्धारित की है, संभव है, दूसरे भी प्रतिक्रिया स्वरूप वैसी ही धारणाएं आपके लिए मन में लायें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 20

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 June

🔴 सामाजिक ढर्रे जब बहुत पुराने हो जाते हैं, तब उनमें जीर्णता और कुरूपता उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है। इसे सुधारा और बदला जाना चाहिए। समय की प्रगति से जो पिछड़ जाते हैं, समय उन्हें कुचलते हुए आगे बढ़ जाता है। ऋतु परिवर्तन के साथ आहार-विहार की नीति भी बदलनी पड़ती है। युग की माँग और स्थिति को देखकर हमें सोचना चाहिए कि वर्तमान की आवश्यकताएँ हमें क्या सोचने और करने के लिए विवश कर रही हैं। विचारशीलता की यही माँग है कि आज की समस्याओं को समझा जाय और सामयिक साधनों से उन्हें सुलझाने का प्रयत्न किया जाय।

🔵 उपासना का आरम्भ कहाँ से किया जाय? इसका उदाहरण किसी स्कूल में जाकर देखा जा सकता है। वहाँ नये छात्रों का वर्णमाला, गिनती, सही उच्चारण, सही लेखन आदि से शिक्षण आरम्भ किया जाता है और पीछे प्रगति के अनुसार ऊँची कक्षाओं में चढ़ाया जाता है। स्नातक बनने के उपरान्त ही अफसर बनने की प्रतियोगिता में प्रवेश मिलता है और जो उस कसौटी पर खरे उतरते हैं उन्हें प्रतिभा के अनुरूप ऊँचे दर्जे के दायित्व सौंपे जाते हैं।
                                              
🔴 अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को व्रतशीलता की दीक्षा लेनी पड़ती है। व्रत का अर्थ मात्र आहार क्रम में न्यूनता लाना नहीं है वरन् यह भी है कि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए संकल्पवान होना, औचित्य को अपनाये रहने में किसी दबाव या प्रलोभन से अपने को डगमगाने न देना। श्रेष्ठता के मार्ग से किसी भी कारण विचलित न होना। जो दृढ़तापूर्वक ऐसी व्रतशीलता का निर्वाह करते हैं उन्हें अपने चारों ओर ईश्वर की सत्ता ज्ञान चक्षुओं से विद्यमान दीख पड़ती है। उन्हें किसी शरीरधारी की छवि चर्म चक्षुओं से देखने में न वास्तविकता प्रतीत होती है न आवश्यकता।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (भाग 4)

🔴 नारी को अर्धांगिनी ही नहीं सह-धारिणी भी कहा गया है। पुरुष का कोई भी धर्मानुष्ठान पत्नी के बिना पूरा नहीं होता। बड़े-बड़े राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों में भी यजमानों को अपनी पत्नी के साथ ही बैठना पड़ता था और आज भी षोडश संस्कारों से लेकर तीर्थ स्नान तक का महत्व तभी पूरा होता है जब गृहस्थ पत्नी को साथ लेकर पूरा करता है। किसी भी गृहस्थ का सामान्य दशा में अकेले धर्मानुष्ठान करने का निषेध हैं इतना ही नहीं भारतीय धर्म में तो नारी को और भी अधिक महत्व दिया गया है।

🔵 ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे देवताओं का क्रिया-कलाप भी उनकी सह-धर्मियों, सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती के बिना पूरा नहीं होता। कहीं किसी स्थान पर भी यह अपनी शक्तियों से रहित नहीं पायें जाते। विद्या, वैभव तथा वीरता की अधिष्ठात्री देवियों के रूप में भी नारी की प्रतिष्ठा व्यक्त की गई है और उसे शारदा, श्री दुर्गा शक्ति के नामों से पुकारा गया है।

🔴 नारियों की धार्मिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय सेवाओं के लिये इतिहास साक्षी है। जिससे पता चल सकता है नारी पुरुष से किसी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं अनसूया, गार्गी, मैत्रेयी, शतरूपा अहिल्या, मदालसा आदि धार्मिक सीता, सावित्री, दमयंती तथा पद्मावती वीरबाला वीरमती, लक्ष्मीबाई व निवेदिता कस्तूरबा प्रभृति नारियाँ राष्ट्रीय व सामाजिक क्षेत्र की प्रकाशवती तारिका है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.25

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 7)

🔴 कुछ नई स्कीम है, जो आज गुरुपूर्णिमा के दिन कहना है और वह यह है कि प्रज्ञा विद्यालय तो चलेगा यहीं, क्योंकि केन्द्र तो यही है, लेकिन जग...