गुरुवार, 22 जून 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 18)

🌹  इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे।

🔴 विचारों को आवारा कुत्तों की तरह अचिंत्य चिंतन में भटकने न देने का नित्य अभ्यास करना चाहिए। विचारों को हर समय उपयोगी दिशाधारा के साथ नियोजित करके रखना चाहिए। अनगढ़, अनुपयुक्त, निरर्थक विचारों से जूझने के लिए सद्विचारों की सेना को पहले से ही तैयार रखना चाहिए। अचिंत्य चिंतन उठते ही जूझ पड़ें और उन्हें निरस्त करके भगा दें। चिड़िया घर में बड़ा होता है, उसमें पशु- पक्षियों का घूमने- फिरने की आजादी होती है, पर बाहर जाने नहीं दिया जाता, ठीक यही नीति विचार वैभव के बारे में भी बरती जाए, उन्हें जहाँ- तहाँ बिखरने न दिया जाए।
  
🔵 परिश्रम एवं मनोयोग का प्रत्यक्ष फल धन है। भौतिक एवं आत्मिक दोनों क्षेत्रों में व्यक्ति को अपव्यय की छूट नहीं है। पैसा चाहे अपना हो या पराया, मेहनत से कमाया गया हो या मुफ्त में मिला हो, उसे हर हालत में जीवनोपयोगी, समाजोपयोगी सामर्थ्य मानना चाहिए। श्रम, समय एवं मनोयोग मात्र सत्प्रयोजनों हेतु ही व्यय करना चाहिए। श्रम, समय एवं मनोयोग तीन संपदाएँ भगवत् प्रदत्त हैं। अतः धन को काल देवता एवं श्रम देवता का सम्मिलित अनुदान मानना चाहिए। जैसी दूरदर्शिता समय और विचार के अपव्यय के लिए बरतने की है, वैसी ही धन पर भी लागू होती है।
 
🔴 बचाया धन परमार्थ में ही लगाना ठीक रहता है। बुद्धिमानी इसी में है कि जितना भी कमाया जाए, उसका अनावश्यक संचय अथवा अपव्यय न हो। जो कमाए हुए धन का सदाशयता में उपयोग नहीं करता, वह घर में दुष्प्रवृत्तियों को आमंत्रित करता है। लक्ष्मी उसी घर में फलती- फूलती है, जहाँ उसका सदुपयोग होता है। आडम्बरयुक्त विवाह, प्रदर्शन, फैशन परस्ती में अनावश्यक खर्च करने से उपार्जन का सही उपयोग नहीं होता। यहीं से सामाजिक अपराधों को बढ़ावा मिलता है। पारिवारिक कलह, मुकदमेबाजी आदि भी इन्हीं कारणों से उपजती है। समुद्र संचय नहीं करता, मेघ बनकर बरस जाता है, तो बदले में नदियाँ दूना जल लेकर लौटती हैं। यदि वह भी कृपण हो, संचय करने लगता, तो नदियाँ सूख जातीं, अकाल छा जाता और यदि अत्यधिक उदार हो घनघोर बरसने लगता तो अतिवृष्टि की विभीषिका आ जाती। अतः समन्वित नीति ही ठीक है।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.26

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...