सोमवार, 20 अगस्त 2018

👉 आत्म निरीक्षण

🔷 “परमात्मा ने हमें बुद्धि दी है सोचने के लिये; इन्द्रियाँ दी है निरीक्षण के लिये। हमें भली प्रकार निरीक्षण कर वस्तुओं के गुण-दोष समझकर तर्क द्वारा ही सच्चाई की खोज करनी चाहिये। यही हमारा ब्रह्मास्त्र है। देशकाल के अनुसार परिस्थितियाँ बदल जाती है, नई बातें पुरानी हो जाती है। कोई बात नई या पुरानी होने से लाभदायक नहीं होती, बुद्धि से सिद्ध किया हुआ उसका उपयोग ही उसे व्यवहार के योग्य बनाता है।”

सन्त सुकरात

👉 देने वाला कौन?

🔷 एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।

🔶 कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला। लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।

🔷 समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा---ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।

🔶 अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया। लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं। उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।

🔷 लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया। यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।

🔶 कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा---ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।

🔷 साधु ने समझाया, तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया, इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।

🔶 कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया!

🔷 दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं तो कहते हैं मैंने दिलाया। वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निहित मात्र बनाया हैं उन तक उनकी जरूरतों तक पहुचाने के लिये तो निहित होने का घमंड कैसा ??

🔶 दान किए से जाए दुःख, दूर होएं सब पाप, प्रभु आकर द्वार पे, दूर करें संताप!!

👉 आज का सद्चिंतन 20 Aug 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 32)

👉 प्रतिभा के बीजांकुर हर किसी में विद्यमान हैं

🔷 अर्जुन ने पाताल से गंगा उभारकर भीष्म को ताजा जल पिलाया था। भीष्म भी कुछ कम न थे। शर शैया पर पड़े हुए असह्य वेदना सहते हुए भी उन्होंने मौत से कह दिया था कि अभी मरने की फुरसत नहीं है। वह लौट गई और तब आई जब उत्तरायण सूर्य में उन्होंने चलने का मुहूर्त निश्चित किया था। मनस्वी के आगे नियति भी पानी भरती है। सावित्री ने यमराज के हाथों से अपने मृत पति को जीवित करा, वापस लौटा लिया था। दमयंती के नेत्र तेज से व्याध का जल जाना प्रसिद्ध है।

🔶 गौतम ऋषि के शाप से सगर पुत्रों की क्या दुर्गति हुई थी, यह भी इतिहास प्रसिद्ध है। राणा सांगा अस्सी गहरे घावों से आहत हुए भी मृत्युपर्यंत शत्रु से लड़ते रहे थे। वाल्टेयर ने अस्पताल की चारपाई पर पड़े-पड़े ही इतने महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखे थे कि उनके पुरुषार्थ को देखते हुए आश्चर्यचकित हुए बिना रहा नहीं जाता। संसार के इतिहास में ऐसे अनेकों करोड़पतियों का उल्लेख है, जिनकी निजी योग्यता और पूँजी नहीं के बराबर थी फिर नियति ने उन्हें अदम्य उत्साह, सूझ-बूझ के सहारे धन कुबेर बनने का अवसर प्रदान किया। बाटा से लेकर टाटा एवं हेनरी फोर्ड, रॉकफेलर तक की बड़ी नामावली इसी पंक्ति में खड़ी दीख पड़ती हैं।
  
🔷 सरदार पटेल द्वारा बागी रियासतों को भी भारत में विलय के लिए सहमत कर लिया जाना ऐसा कार्य है, जिसमें उनके महान व्यक्तित्व की झलक झाँकी मिलती है। बारडोली सत्याग्रह में भी वे अपना कमाल दिखा चुके थे। जापान के गाँधी कागबा ने एक गंदे मुहल्ले में सेवा कार्य आरंभ करते हुए अंतत: जापान के पतितोद्धारक के रूप में अद्भुत प्रतिष्ठा अर्जित की थी। बिहार का हजारी किसान अपनी लगन के बल पर उस क्षेत्र में हजार आम्र उद्यान लगाने में सफल हुआ था।
  
🔶 ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। वे भूतकाल में भी असंख्य थे और अब भी जहाँ-तहाँ एक-से-एक बढ़ी-चढ़ी सफलताएँ अर्जित कर रहे हैं। इसमें व्यक्ति विशेष का नहीं, वरन् उसकी परिष्कृत प्रतिभा का ही चमत्कार दृष्टिगोचर होता है। यह हर किसी के लिए संभव है। आवश्यकता इतनी भर है कि लगन सच्ची हो और उसके लिए योजनाबद्ध रूप से पुरुषार्थ करने में कुछ उठा न रखा जाए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 41

👉 Vedmurti Taponishtha Pandit Shriram Sharma Acharya

🔷 It is indeed rare in the history of mankind that great souls like Bhagirath and Dadhichi graced the Earth with the nectar of the holy Ganges and nurtured the roots of divinity by their tapa and self-sacrifice. Pandit Sriram Sharma Acharya undoubtedly belongs to this category of divine rishis. His life and work represent a marvellous synthesis of the noble thoughts and deeds of great personalities like Swami Vivekanand, Sri Aurobindo, Mahatma Gandhi, Socrates and Confucius. Rev. Pt. Sriram Sharma was a rishi of the present age whose heart pulsated with compassion for all beings.

🔶 Every moment of his life was devoted to the welfare of people and the refinement of the moral and cultural environment. He also pioneered the revival of spirituality and creative integration of the modern and ancient sciences and religion relevant in the challenging circumstances of the present times. His personality was a harmonious blend of a saint, spiritual scientist, yogi, philosopher, psychologist, writer, reformer, freedom fighter, researcher, eminent scholar and visionary. It would require several volumes to record the attainmens of his life. Here we are only giving a glimpse of his superhuman personality. Acharya Sriram Sharma (revered as "Gurudev" by his disciples) was a great devotee of Goddess Gayatri and had attained perfection in realising its utmost potential.

🔷 He successfully practised and mastered the highest kinds of sadhanas described in Hinduism. He also deciphered the hidden science of Tantras. He attained the supreme knowledge of the philosophy and science of the Gayatri Mantra and yoga. In essence, he perfected a vast range of spiritual disciplines. He pioneered experiments on simple sadhanas, which could be easily pursued by the common masses. He initiated programmes of spiritual and intellectual refinement of millions of people without any discrimination of religion, caste, creed, sex, or social status. He propagated this knowledge for the enlightenment of people across the globe.

🔶 The early years: Sriram Sharma was born on the 20th September 1911 as the son of Pt. Roopkishor Sharma and Mata Dankunvari Devi in Anvalkheda (Dist. Agra, India). That his saintly heart was concerned for the welfare of common masses was clearly expressed since his childhood when, as a small boy, he took a brave step of nursing an old "untouchable" woman suffering from leprosy against the strong disapproval and displeasure of his family.

🔷 The eminent patriot, scholar and founder of the Banaras Hindu University Pt. Madan Mohan Malaviya initiated Sriram in the worship of Gayatri mantra when he was nine years old. On the auspicious day of Vasant Panchami festival, January 18, 1926, a guru by the name of Swami Sarveshvaranandji "a great Himalayan yogi" appeared before him in astral body from the flame of the dipaka (lamp)1 during his Gayatri worship. This sparked the revelation of the divine origin and purpose of his life and bestowed upon him with the grace and guidance of his guru...

📖 Akhand Jyoti, Jan Feb 2003

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग 2)

🔷 आये दिन जो अज्ञात विपत्तियाँ सामने आती रहती हैं, उनकी भयंकरता भी कम नहीं। राजनैतिक संघर्षों के कारण जनता के कष्टों में वृद्धि होती है, कोई उपद्रव करता है दण्ड किसी को सहना पड़ता है। निर्दोष व्यक्ति का भी कलेजा काँपता रहता है कि कही अकारण ही कोई चपेट मुझे न लग जाये। देवी प्रकोप का भी पूरा जोर है। इस साल नदियों में बड़ी भारी बाढ़ें आईं, जिससे हजारों गाँव का नुकसान हुआ लाखों बीघा कृषि नष्ट हो गई, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूचाल, तूफान, अंधड़ के कारण बहुत भारी क्षति उठानी पड़ी। गुँडे बदमाशों का जोर बढ़ने से आये दिन अपराध बढ़ते रहते हैं। आज का दिन किसी प्रकार कट गया हो कल के लिए आशंका बनी रहती है कि कही कोई नई विपत्ति न टूट पड़े। शान्ति, स्थिरता, संतोष में कमी होती जाती है और बेचैनी बढ़ती जाती है।

🔶 यदि सब कठिनाइयों, कष्टों, व आपत्तियों को आशंकाओं को मिलाकर देखा जाय तो लगता है मनुष्य जाति अपने को बड़ा दुखी और व्यथित प्रभु कर रही है। किन्हीं-किन्हीं प्रदेशों पर कभी-कभी कुछ आपत्तियाँ आते रहने के उदाहरण इतिहास में प्राप्त हो गये हैं परन्तु ऐसे अवसर बहुत ही कम आये हैं जब समस्त संसार पर एक बारगी इतनी बड़ी चतुर्मुखी विपत्ति आई हो। आज तो युद्ध में लगे हुए और बिना लगे हुए, सभी देशों की जनता को ‘विविध प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समस्त विश्व में एक साथ ऐसी विपत्ति क्यों आई? आइए, इसके सम्बन्ध में कुछ विचार विनिमय करें -

🔷 वर्तमान कष्टों के कारणों की विवेचना करते हुए हम देखते हैं कि भौतिक विज्ञान की उन्नति ने रेल, तार, रेडियो, गैस, जलयान, वायुयान आदि की सहायता से समस्त संसार को एक सूत्र में बाँध दिया है। इन साधनों की सहायता से सारी मनुष्य जाति आपस में बहुत अधिक सम्बन्धित हो गई है। व्यापारिक दृष्टि से एक देश दूसरे देश पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अब शारीरिक और मानसिक खुराकें प्राप्त करने के लिए अन्य देशवासियों के सहयोग की भी आवश्यकता अपेक्षित होती है। अब सेनाओं को केवल देश की आन्तरिक समस्याओं को ही हल नहीं करना पड़ता वरन् अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी उतना ही महत्व देना पड़ता है।

🔶 इस प्रकार मानव परिवार का दायरा अधिक विस्तृत हो गया है और साथ ही एक देश की जनता के भले बुरे आचरण की जिम्मेदारी दूसरे देशों पर भी आ गई है! अक्सर अमेरिका के बुद्धिमान लोग ऐसा कहा करते हैं कि भारत की समस्या मित्र राष्ट्रों की समस्या है। भारत की अवनति का दोष इंग्लैण्ड को दिया जाया करता है। धुरी राष्ट्रों द्वारा पराधीन बनाये गये देशों की स्वतन्त्रता दिखाने का आश्वासन मित्र राष्ट्र दे रहे हैं। यह सब उदाहरण यह बताते हैं कि अब कोई देश केवल अपनी ही सीमा तक कर्तव्य बद्ध नहीं हैं वरन् उसकी जिम्मेदारी का दायरा बढ़कर अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 4

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

👉 हमारे विचारों और अद्भुत प्रभाव (भाग 1)

🔷 जीवन है? और उसको धारण करने का क्या प्रयोजन है? एक परिपूर्ण सफल जीवन क्या होता हैं? उसके क्या साधन हो सकते हैं? इस प्रकार के अन्य और बहुत से विचार कुछ स्वभावतः ही मनुष्य के मन में उठा करते हैं।

🔶 वास्तव में मनुष्य जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है वह तो एक ही है केवल ईश्वर प्राप्ति परन्तु यह तो सर्व श्रेष्ठ और घोर अन्तिम श्रेणी की बात है। जहाँ पर पहुँचने का सौभाग्य, महान् पुण्यात्मा योगी जनों को ही प्राप्त होता है।

🔷 सर्व साधारण हम आप जैसे मनुष्यों का तो जीवन उद्देश्य कर्त्तव्य पालन ही है-अर्थात् कुशलता, निष्कपटता एवं सरलता पूर्वक सहज स्वभाव से अपना-2 कार्य करना और परिणाम स्वरूप संसार से जाते समय अधिक से अधिक खुशी का भण्डार संसार में छोड़ते हुए विशेष आनन्द और शान्ति को साथ ले जाना। यह है साँसारिक साधारण जीवन की सफल झाँकी।

🔶 हमें ऐसा कर्त्तव्यनिष्ठ सरल जीवन बनाने का सतत प्रयत्न करते रहना चाहिये। इस प्रकार के जीवन का मूलाधार हमारे विचार ही होते हैं। एक आदर्श जीवन विचारों का ही तो संग्रह होता है।

🔷 दूसरों की उन्नति अथवा पतन देखकर जब हम अशुद्ध मन से ईर्ष्या आदि बुरे भावों के शिकार होते हैं तो इस प्रकार दूसरों के कल्याण चाहने वाले बुरे विचारों का संग्रह होकर हमारा मन घोर कलुषित हो जाता है जिस कारण हम स्वयमेव दुःख सागर में डुबकियाँ लेने लगते हैं इस प्रकार हमारा आध्यात्मिक पतन होना शुरू हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1943 पृष्ठ 8